शंकराचार्य और सांई बाबा
इसी वर्ष आंग्ल भाषा में एक लेख को देखकर कतिपय महानुभावों ने हिन्दी में विचार व्यक्त करने को कहा। यूँ तो हमारे अन्य लेख, विडियो, पुस्तकें हिन्दी में भी है पर इसपर लेखनी उस समय उठ नहीं पाई। मुख्य कारण उस स्थान पर टंकण व्यवस्था केवल आंग्ल भाषा में थी। अब यकायक माँग उठी है और कुछ आधी अधुरी व्यवस्था भी है। आप लोगों के चलते कुछ अभ्यास हो जायेगा वैचारिक संप्रेषणियता का। यह लेख आंग्ल भाषा में व्यक्त विचारों का अनुवाद नहीं है। सबको धन्यवाद।
आस्था के नामपर कोई चाहे जिसको माने - न माने एक बात है। जब वह सबसे मनवाने या उसे सर्वोत्तम कहने का खेल खेला जाय या उसके नामपर औरों को हेय कहना और साधारण रूप से प्रदर्शित करना धर्मोचित कार्य कैसे हो सकता है? तब प्रश्न उठने स्वाभाविक है। नैष दोष - कोई दोष नहीं। प्रश्नकर्ता को आस्था के नामपर रोकना या प्रश्नों को नास्तिकता का जामा पहनाना सदा सर्वदा अनुचित है। यह आस्था के नामपर बाँटने का प्रश्न नहीं वरन अव्यक्त अभिप्राय पर चोट हो जो धार्मिक खिचड़ी बनाकर सनातन धर्म को विकृत कर रही है। इस प्रसंग को आहार से न जोड़ा जाए क्योंकि वैदिक वाड्मय में नाना अवधारणाएं हैं। अतः उसे आधार नहीं बनाया जा सकता।
चमत्कार या सिद्धियों के पीछे भागना मानवीय कमजोरी है और उसे भगवान या अवतार मानना मनोवैज्ञानिक रोग तथा उसे औरों से वैसा मनवाना एक सुनियोजित षड्यंत्र। प्रायः कोई न कोई विशेषता सबमें होती है या रोजी-रोटी हेतु अर्जित करनी पड़ती है। कोई - कोई बचपन से ही किसी विशेष गुणवाला होता है जो समकालीन समाज हेतु कौतुहल का विशय बनकर इतिहास में अपना नाम अंकित करता है। इन आधारों पर सार्वजनिक मन्दिरों का निर्माण उचित नहीं है। मन्दिर शब्द हिन्दुओं के साथ जुड़ा है अतः उनकी मान्यताओं पर कुठाराघात करना शोभा नहीं देता। यह कैसे हुआ? साईबाबा अवतार ही नहीं वरन त्रिदेवों का चित्र उनके सिर पर आशीर्वाद देते हुए या पैरों के पास छोटे आकार में चित्रित करना या मन्दिर में अन्य देवी-देवताओं को अलग स्थान देना और मुख्य विग्रह के रूप में साई को रखना धर्म सम्मत नहीं है। क्या हमारे पारंपरिक देवी-देवताओं का सामर्थ्य, साहस इतना कुंठित हो गया जो औरों की उपासना करनी अनिवार्य हो गयी है? ऊपर से गायत्री मंत्र बनवाना, प्रतिष्ठित गायक - गायिकाओं से भजन द्वारा प्रचार प्रसार और हिंदू धर्म के देवी-देवताओं की आरतियों तथा भजनों के साथ सिडी में देकर बिकवाना भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। अब तो बृहस्पतिवार का व्रत शुरू हो गया है। गुरू पूर्णिमा का पर्व महामुनि वेदव्यास जी के जन्मदिन से जुड़ा है। उन्होंने ज्ञान राशि के रूप में उपलब्ध वेद का संपादन कर उसे अलग अलग बाँटा था। भारत के कुछ चर्चित प्रकाशकों ने अपने कैलेंडर में साईबाबा की तस्वीर छाप दी। धीरे-धीरे यह प्रमाण बन जायेगा।
पहले ये अवतार घोषित नहीं माने गये। फिर विष्णु जी का अवतार कहीं-कहीं कहा गया। अब शिवजी और स्वामी दत्तात्रेय का अवतार घोषित कर दिया गया। बिना बड़ा नाम लिये लोग आकर्षित कैसे हों? धाक नहीं जमेगी।
एक मानसिक व्याधि मध्य युग से पल्लवित हुई- आदि शंकराचार्य जी का खंडन और येन केन प्रकारेण अपनी मान्यताओं का मंडन ही नहीं वरन उसे श्रेष्ठ कहना। अधिकांश संप्रदाय वाले अपने बुते पर कुछ कह नहीं पाय। साईबाबा के भक्त उससे आगे निकल गये। कैसे? उनके अनुसार साईबाबा आदि शंकराचार्य जी के गुरू भाई थे। यह शब्द सहपाठी या एक गुरू से दीक्षा लेनेवालों पर प्रयुक्त होता है। कट्टर भक्तों के अनुसार हिमालय क्षेत्र में लगभग ५००० वर्ष के योगी रहते हैं और दोनों ने उनसे योगशिक्षा ग्रहण की। अब योग में तो इतनी आयु बतलाना साधारण बात है। पर इस विषय में कोई प्रमाण कहीं नहीं है। आदि शंकराचार्य जी के विरोधियों तक ने ऐसा उल्लेख नहीं किया और न उनके द्वारा स्थापित चार मठ(द्वारिका, जोशीमठ, जगन्नाथ पूरी और कर्नाटक में श्रींगेरी) के शंकराचार्यों ने कभी ऐसे किसी का नाम लिया।
पहले चमत्कार फिर नमस्कार - इसे मानने वाले बहुत हैं। साईबाबा ने न किसी ग्रन्थ की रचना की, न वैदिक वाड्मय का पठन पाठन किया, न योग सिखाया, न ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की त्रिपुटी समझाई। दो-चार समाज सेवा का कार्य किया जो बहुत जने करते हैं। उसे बढ़ा-चढ़ाकर बताना शोभा नहीं देता। रही बात लाभ होने की तो वह बड़ी बात नहीं है। लालन पालन का प्रभाव मानस पर और तदनुसार बाह्य प्रक्षेपण साधारण बात है। मान्यताओं के लेप तले लोग सफलता - असफलता हेतु माध्यम का नाम अधिक लेते हैं। अब बिल्ली के भाग से छींका टूट जाय तो वह नियम नहीं बन बनता और न बििल्ली भगवान। गर साईबाबा को सबकुछ मानने वाले दिपावली दशहरा तीज क्यों मनाते हैं? तीर्थ यात्रा पर क्यों जाते हैं? उनके मन साफ हो गये? घर परिवार में कोई कष्ट नहीं रहा? व्यवहारिक सौम्यता आ गयी? वरन नकारात्मक प्रभाव बढ़ा है क्योोंकि दूध और करेले का एकसाथ सेवन नुकसानदायक है। श्रीमद्भगवद्गीता तक में कहा गया है - जो जिसको पुजता है वह उसीको प्राप्त होता है। यानि तामसी साधक और उनके समर्थक नीचे की योनियों में रहते हैं। ऊपर से दिखावा अन्य त्योहारों - तीर्थों को मानने का तब भला कैसे होगा?
तात्विक दृष्टि से सब एक भले हों पर सबकी उपासना या पुजा एक साथ या एक जैसी नहीं होती। अब पुजा की अलमारी या अलग से बने कमरे या घर के निर्धारित कोने में रखी तस्वीरें या मुर्तियां या दोनों का अपना विज्ञान है। एक रूप की एक ही रहेगी - चाहे तस्वीर हो या मुर्ति। उससे अधिक नहीं रखते क्योंकि पुजा करते हुए तार नहीं जुड़ पाता। गुजर चुके घरवालों की तस्वीरें दक्षिण दिशा में लगती है और कभी ईश्वरीय सत्ता के रूपों के साथ नहीं रखी जाती। इनसे संबंधित आगम शास्त्रों का विशद अध्ययन, लाक्षणिक अर्थ तथा संगति लगाकर निर्णय लिया जाता है। लोग सात्विक, राजसी और तामसी तस्वीरों का तालमेल न लगाकर इच्छानुसार रखते हैं और ऊपर से साईबाबा की मूर्ति या तस्वीर रख लेते हैं। जरा सोचें समझे - असल में चाहिये क्या? भौतिक समृद्धि आवागमन में फँसाती रहेगी। कर्मयोग सिद्ध नहीं होगा क्योंकि ऐसों के पीछे दौड़ना कर्ता - भोक्ता भाव पुष्ट करता रहेगा। कई जने अपनी-अपनी भौतिक सफलता के लिए साई को कारण मानते हैं यानि प्रारब्ध, परिश्रम, शिक्षादि रेखांकित कारण नहीं रहे और मुख्य कोई और। जब वह नहीं था तब किसने सफलता दिलवाई। त्रिआयामी प्रक्षेपण और स्वसम्मोहन वश कई चीजें मानी जाती हैं।
अभिव्यक्ति या अधिकार या धर्म पालन की स्वतंत्रता का तात्पर्य मनमानी नहीं है। कर्तव्य जब अवहेलित हो तब अधिकार महत्वपूर्ण हो जाता है। तब फिर दैहिक या बौद्धिक आतंकवाद हो या लव जिहाद या कुछ और - यह सब करने वालों का भी अपना अधिकार है। शायद हम न देना चाहें। जब नकारात्मक प्रभाव बढ़ेगा तब समाज में वही होगा जो हो रहा है।
पुराने भगवानों से मन ऊब जाता है। आए दिन कुछ नये की तलाश होती है और वह साधारण बात है। आखिर प्रयोगवाद होना चाहिए। यह भगवानों का समाजवाद है जहाँ किसी की भी स्थापना हो सकती है।
यह वैचारिकता मताग्रह, दुराग्रह या हठधर्मिता का फल नहीं है। सनातन परंपरा का निर्वाह मात्र है।