सृजन परिवार, जनवरी 2021 अंक में प्रकाशित साध्वी मीराबाई की मर्दानगी (पृष्ठ ४६) विषय पर लेख ब्लॉग (एक अंश) से भेजा गया था जिसमें साहित्य के अनुरागी पाठकों हेतु पद का संक्षिप्त विश्लेषण भी है।
शीर्षक से संबंधित जानकारी 💠 जनवादी लेखक संघ पश्चिम बंगाल के साठ दिवसीय सीधे प्रसारण वाले कार्यक्रम अन्तर्गत १७ - ९ - २०२० को मीराबाई पर वक्तव्य रखा। प्रसारण के मध्य वृन्दावन का प्रसंग और दो एक बातें कही गई थी और उसकी प्रतिक्रिया देते हुए प्राध्यापक राम आह्लाद चौधरी जी ने लिखा - (मीरा की मर्दानगी) --- यह नामकरण में काम आ गया। वह वीीडियो चैनल में उपलब्ध है :-
साध्वी मीराबाई की मर्दानगी
https://youtu.be/gwiBo7hHDHE
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ज्ञान, भक्ति, वैराग्य की त्रिपुटी में स्थित मीराबाई के इष्ट श्रीकृष्ण थे और उनके माध्यम से सामाजिक आंदोलन की याद दिलाने के लिए 'गिरधर, गिरधारी' संबोधन का प्रयोग वहाँ किया जहाँ जगाने की ओर संकेत करना था। लीलानुसार गोवर्धन पर्वत उठाना एक सामाजिक आंदोलन था जो शासक वर्ग की ठकुरसुहाती या उसके कर्तव्यों को अतिरंजित शैली में महिमामंडित कर उसे सिर पर बिठाने की परंपरा चली आ रही थी। शिष्टाचारवश मान देना अलग बात है पर यहाँ मामला अतिशयोक्ति का था जहाँ एक वर्ग की पूजा में श्रद्धा कम भय की अधिकता थी। वहीं दूसरी ओर आम व्यक्ति से जुडे वन प्रदेश, कृषि, पर्वत, जल स्रोतादि की समुचित देखभाल अत्यंत जरूरी है। वही उनका मान सम्मान है। इस बिन्दु पर कृष्ण ने केवल उकसाने का काम नहीं किया वरन शासक वर्ग की निरंकुश प्रतिक्रिया समक्ष ढाल बनकर खडे हुये। यह है सफल आंदोलनकारी नेता जिसने मीराबाई को राह ही नहीं बताई वरन रक्षा भी की। ऐसा अनूठा प्रगतिवादी कदम किसी और देश के प्राचीन साहित्य में नहीं है। जन आंदोलन या जागरण केवल उकसाने, हिंसात्मक प्रतिक्रिया, अभिव्यक्ति का दुरूपयोग, उच्छृंखलता, उदण्डता नहीं। वह अधिकार तथा कर्तव्य में सामंजस्य बनाये तभी सफल है। 'मेरे तो गिरधर गोपाल', - चूँकि वह लीला एक काल खंड मध्य घटी अतः कुछ पदों में वेशादि का वर्णन है पर शब्द चयन में सावधानी बर्ती गई है। जहाँ वे जनहित हेतु जगाना चाह रही हैं वहीं गिरधर शब्द प्रयुक्त हुआ है। कूप मंडूक मानसिकता अपना भला तक नहीं कर पाती इसीलिए लीला की याद दिलवाकर वे संदेश दे रही हैं। दूसरी ओर यह उन्हें पता था कि वे स्वयं ढाल नहीं बन सकती तभी जनता को उत्तेजित नहीं किया। समाज की ग्रहण क्षमतानुसार समझाते हुए निर्गुण सगुण में तालमेल स्थापित किया जो त्रिपुटी (ज्ञान, भक्ति, वैराग्य) में स्थित रचनाकार ही कर सकता है। तभी मनोराज्य या पलायनवाद उनके साहित्य में नहीं है। यही गुण स्थापित नौ दर्शनों में है। एक अन्य पद में उन्होंने कहा, 'माई म्हांने सुपणा मां परण्या दीनानाथ… पधारयां(यं) दूल्हो सिरी ब्रजनाथ...मीरा रो गिरधर मिल्यारी पुरब जणम रो भाग' -- जाग्रत की अतृप्ता, असहनीय वेदना, अपनों से मिली मार्मिक चोट, आत्यंतिक समाधान हेतु उचित मार्गदर्शक न मिलने का दर्द, पीडा को साँझा करने हेतु योग्य पात्र का अभाव जैसे अनेक कारणों के चलते स्वप्न आते हैं। यहाँ 'दीनानाथ' शब्द उस स्थिति का द्योतक है जहाँ अवचेतन मन सहायता हेतु आर्त भाव से पुकार रहा है उस सर्वनियंत्रक नामरूपहीन सत्ता को जो दीन अवस्था में पडे मानव की 'नाथ' रूप में रक्षा करे। यहाँ आर्त भाव मानसिक यंत्रणा के चलते पैदा हुआ। जो संबंध पारिवारिक एकता तथा समाज की नींव समान है उनसे पीडा अधिक प्राप्त हुई। 'दूल्हो सिरी ब्रजनाथ' में नारी सम्मान छिपा है जहाँ योग्य वर से पुत्री ब्याहने की शिक्षा दी गई है। 'सिरी' (श्री) शब्द का प्रयोग केवल पैसेवाला नहीं वरन स्वास्थ्य, स्वभाव, संतोष, संयम जैसे धन से धनी वर। रुपया पैसा तो आततायी, तस्करादि के पास भी होता है पर वैसा वर यहाँ समर्थित नहीं। यहाँ 'दीनानाथ' शब्द का प्रयोग अपमान कर देता। तब स्पष्ट संदेश जाता की कोई विवाह नहीं कर रहा इसलिए 'दीन' पर दया कर उसे अपना ले ताकि हँसी न उडे। यहाँ उस जातिवादी मानसिकता पर छिपा व्यंग्य है जहाँ गुणवती कन्या अयोग्य लडके से जातिगत समानतावश ब्याही जाती है। उसका परिवार जाति से बाहर योग्य लडके को जल्दी से नहीं स्वीकारता। इसमें तथा अन्य पदों में अपनी वैधव्य जनित पीडा को पीते हुए वे 'अमर सुहाग' की बात कहकर अद्वैत भावाव्यक्ति द्वारा 'एकीकार या एकत्व' का उद्घोष करती हैं। उनमें देहधारी पति से वापस मिलने की चाह न देहाधारित आवागमन में रूचि है। यह है शुद्ध ब्रह्म दृष्टि जिसके चलते वे सबके सामने भाव प्रकट कर पाईं - सर्व खल्विदं ब्रह्म - जहाँ दृष्टि जाय वहाँ ब्रह्म भावना रखनी। इसका अर्थ यह नहीं की मनचाही करो या गलत संग करो या भोग को ब्रह्मरूप मानकर भोगो। तभी उन्होंने नामरूपात्मक जगत हेतु स्वप्न शब्द प्रयोग करते हुए उसके मिथ्यात्व का प्रतिपादन किया । अब स्वप्न के समयहवह सच्चा लगता है और जगने पर भ्रम दूर होता है। उसी तरह जाग्रत व्यवहार है जहाँ भावनाओं संग न बहते रहना ही जगना है। यह समझने से उनकी साधना का स्तर समझ में आएगा नहीं तो सारा मामला सतही नामरूपात्मक या श्रृंगारिक या बाहरी भक्ति तक सिमट जायेगा। यहाँ सोचा जाय की पंक्ति ऐसी भी है - 'जाके सिर मुकुट मेरो पति सोई' और अन्य जगह सपने में विवाह की बात है तब यही अर्थ निकलेगा की वे रूपात्मक उल्लेख लगाव चलते कर रहीं हैं। उन्हें कृष्ण के लक्ष्यार्थ की जानकारी है। जैसे सन्त तुलसीदास को राम के अर्थ की अनुभूति थी तभी वे कह पाय 'सियाराम मय सब जग जानी' और सामाजिक दृष्टि से पूरी राम कथा कही जो अवतार केन्द्रित थी। गौण भाव कभी मुख्य नहीं होता रचनाकार हेतु। मीराबाई के साहित्य में तभी शान्त रस प्रधान है जबकि श्रृंगार का नाम अधिक लिया जाता है क्योंकि पदों का सतही स्तर देखने वाले ज्यादा हो तब उनमें डुबकी कौन और क्यों लगाय। उनके लिए कुछ पंक्तियाँ ही बहुत है और उनमें प्रयुक्त शब्द श्रृंगार की ओर संकेत कर रहे हैं तब वही प्रमाण। कबीरदास साहिित्य में प्रयोग मिलता - 'राम मोर पिउ मैं राम की बेहरिया' - तकनीकी रूप से ऊपर वाला कहें या तत्व वही सबका पति है। यह शब्द सांसारिक पति-पत्नी के अर्थ में न लिया जाय। यहाँ आध्यात्मिकता की बात है। सारी सृृष्टि उसीका विराट रुप है।
भारतीय दर्शनों पर इनकी पकड पदों तथा व्यवहार दोनों में दिखती है। एक बार वृन्दावन में अपने गुरू आश्रम में जाने पर उन्हें सुनने को मिला (अन्य शिष्यों द्वारा) 'स्वामीजी नारियों से नहीं मिलते'। इसपर उन्होंने पूछा 'यहाँ पुरुष' 'एक है दुसरा कहाँ से आ गया' - यह बात सुनते ही स्वामीजी जल्दी से बाहर आये। यहाँ याद आती है नजीर अकबराबादी की पंक्ति 'पुरे हैं वही मर्द जो हर हाल में खुश हैं'। अपने परिवारजनों के दुर्व्यवहार से क्षुब्ध होकर वे उन्हें अभिशाप न देकर कहतीं हैं 'राणाजी थार देसा म साध नइ स लोग बस्या स कुडो' (राणाजी आपके राज में सार नहीं है। अधिकतर संकुचित कलुषित मानसिकता वाले लोगों का वास है)। चूँकि उनको सुनने वाले गृहस्थ अधिक थे और वे घरेलू कामकाज को भक्ति या प्रभु सेवा रूप में नहीं ले पा रहे थे अतः उन्हें कोरा ज्ञान न देकर समझाया 'प्रेम सहित मैं करुंगी रसोई म्हारे गिरधर के भोग लगाई'। भक्ति हेतु समयाभाव की बात थी, है, रहेगी। ऊपर से घरेलू काम-काज बहुतों को विशेषतः उच्च शिक्षितों को बोझ लगता है और वे भक्ति पसंद करते हैं पर उसका मर्म समझ नहीं पाते। इसीलिए उनके कार्यों में उकताहट, परेशानी, बोझरूप या सामाजिक बाध्यतावश वश करना दिखता है। उनका जीवन कलह क्लेश तनाव से भरा रहता है। शिक्षा केवल विषय विशेष की जानकारी दे रही है जिसका विनियोग आजीविका में होता है। यहाँ इसका खंडन नहीं हो रहा वरन बतलाया जा रहा है कि दंभी न बने और उसे भक्ति रूप में लें। इसका अर्थ यह नहीं की कार्यालयादि में अलग से कर्मकाण्ड करें। गीता के एकादश अध्याय में तभी कहा गया की स्वयं को केवल निमित्त समझो कर्ता नहीं। यह अकेला उदाहरण नहीं है खोजने पर समाजोपयोगी शिक्षा के कई उदाहरण मीराबाई के साहित्य में मिलेंगे। अपना स्तर औरों पर न थोपकर सबको गीता का कर्मयोग बतला दिया की प्रभु सेवा तथा ईश्वरार्पण बुद्धि से कार्य करो। भक्ति अलग से करने वाली क्रिया नहीं इसलिए अलग से समय न मिले तो कर्तव्य पालन को भक्ति समझने में दोष नहीं। एक प्रश्न प्रायः पूछा जाता है कि उच्च पद पर नौकरी करते हुए भक्ति के लिए समय नहीं मिलता और रोज तो बिल्कुल नहीं। गलत शिक्षा देनेवाले वैसी नौकरी छोडने की सलाह देते हैं। जबकि गीता केवल कर्तृत्वाभिमान छोडने की बात करती है आजीविका नहीं।
वे अपने निर्णय लेने में स्वतंत्र थी पर उन्होंने संत तुलसीदास से समाधान पूछा क्योंकि वे भी त्रिपुटी में स्थित थे। यह भाव सिखाता है योग्यता का सम्मान करना और उसके लिए स्वयं को योग्य बनाना ताकि वह सही प्रतिभा को पहचान सके। उनके समकालीन अन्य रचनाकारों में अधिकांश राजाश्रित थे जो भक्ति की आड में भोग विलास रचनाएँ लिख अपने प्रायोजक को खुश करने में मगन थे। उनके लिए कृष्ण नाम आवरण मात्र था अतृप्त एषणा की पूर्ति का। उन्हें त्रिपुटी से लेनादेना नहीं था। जो मुट्ठी भर रचनाकार स्वतंत्र रूप से लिख रहे थे उनके ज्ञानचक्षु ठीक से खुले नहीं थे इसलिए वे भक्ति को साध्य तथा ज्ञान, ध्यानादि को साधन मानते तो कई ज्ञान, भक्ति, वैराग्य को स्वतंत्र मार्ग मानते थे। इसीलिए मीराबाई ने गोस्वामी को चिट्ठी लिखी जिनका समाज में नाम यूँ ही नहीं हुआ। उनके पंद्रह वर्ष के अध्ययन, मनन, निदिध्यासन, ध्यान की पूँजी चलते वे आगे बढे। उन्होंने भी आचार्य मधुसूदन सरस्वती से अपने रामचरितमानस पर टिप्पणी माँगी थी जो उन्हें मिली। इसीलिए दो योग्य मनीषियों में संपर्क हुआ नहीं तो जरा सा यश होते ही व्यक्ति किसी को अपने बराबर नहीं समझता। ऊपर से सही सुझाव देना याद नहीं रहता। यहाँ बातों-बातों में महत्वपूर्ण शिक्षा दी गई। इनपर ध्यान न देकर जो कर्तव्य या शरीर निर्वाह हेतु आजीविका छोडकर आश्रम को घर बनाते हैं वे भारतीय दर्शनों से पूर्णतः अपरिचित हैं। विडंबना यह है कि जिनपर राह बताने का दायित्व है उनमें अधिकतर अपनी भूमिका ढंग से नहीं निभाते । विपरीत भाव समझाने वाले हर समय थे और समाज को सही राह बताने कोई न कोई आता है पृथ्वी पर।
उनकी भक्ति केवल बाहरी या मन की ऊपरी सतह तक हलचल मचाने या समय व्यतीत करने या पालन पोषण की शैली से उत्पन्न त्रिआयामी प्रक्षेपण जिसमे स्वसम्मोहन वश दर्शन के दावे तक सीमित नहीं थी
वरन ज्ञान वैराग्य सहित थी। त्रिपुटी के तीनों शब्द एक दूजे के पूरक है प्रतिद्वंद्वी नहीं। स्वस्थ सामाजिक बदलाव तभी संभव है जब पाठ्यक्रम में इसके (त्रिपुटी) धारकों के साहित्य की सही व्याख्याओं को स्थान दिया जाय। नहीं तो मीराबाई के पद भजन संध्या या शास्त्रीय संगीत सिखने तक रह जायेंगे। यहाँ पूर्व पक्ष उठ सकता है कि जैसी दृष्टि यानि पदों को समझने की चेष्टा वैसी सृष्टि या व्याख्या। इसकेनुसार अक्षय चैतन्य के विचार उनके अपने हैं जैसे औरों के। प्रतिपादन शैली भिन्न भले हो पर नींव की ईंट नहीं बदल सकती। देखना यह है कि संगति कहाँ और किसकी लग रही है। आखिर प्रश्न एक रचनाकार का नहीं उस थाती का है जिसका धारक समाज है। यहाँ थाती वह साहित्यिक धरोहर है जो सही राह बताने हेतु है अपनी चकाचौंध से भ्रमित करने को नहीं। अब प्यास की तृप्ति पेय पदार्थ से होगी और ख्याली पुलाव से क्षुधा निवृत्ति नहीं होगी। उसी तरह मनमानी या प्रायोजित व्याख्या त्रिपुटी में स्थित रचनाकारों का सम्मान नहीं करतीं। उन्हें बाहरी भक्ति के नामपर देह धरे का दंड स्वीकार नहीं क्योंकि उसकी आड में देहासक्ति जीवित रहती है। इसीलिए वे वृन्दावन में पशु पक्षी तक बनने की बात नहीं करती। यह नहीं की उन्हें मोक्ष प्रिय है पर बन्धन मुक्ति का खेल समझ चुकी हैं। आखिर दोनों देहाधारित धारणा है और दर्शन धीरे-धीरे उससे ऊपर उठने की ओर ले जाता है। तभी उनके पदों में यह भाव नाना तरीकों से आया है 'पूरण ब्रह्म बसे घट भीतर'। इसी ओर संकेत करते हुए ब्रह्मानन्दजी कहा था की बाहरी अभ्यास तबतक निष्फल है जबतक घट (देह) में तत्वबोध नहीं हुआ। आखिर जो बाहर है वही भीतर है - जरूरत उसके अनुभव की है। जब राणा ने सर्व व्यापक तत्वविषयक प्रश्न किया तब सुनने मिला 'म्हारो रमैयो थारे घट में बिराज थारे हिये की क्यूं फूटी'। यहाँ ज्ञानचक्षु खुलने की बात है जिससे अन्तःकरण साफ होता है। यह सफाई व्यवहार सुधार कर मानवीय गुण जगाती है।
न जाने क्या कारण है कि त्रिपुटी को समझाने वाले पद या तो पाठ्यक्रम में नहीं रहते या उनको हल्के रूप में समझाया जाता है। कई जगह उनपर रहस्यवाद की छाप लगा उन्हें अलग खाँचे में रखा गया। लक्ष्यार्थ को परे रख कई पदों को मधुरा या माधुर्य भक्ति का उदाहरण माना। दर्शनों और त्रिपुटी के संबंध को तो क्या उनके स्वरूप से पूर्णतः अनभिज्ञ 'तथाकथित बुद्धिजीवियों' ने इसका (रहस्यवाद) प्रयोग धडल्ले से किया। जिन बातों को समझने के लिए सूक्ष्म बुद्धि या खुले ज्ञान चक्षु या आन्तरिक समझ जो वास्तविक अन्तर्मुखता से आती है वह उनके पास नहीं थी इसलिए वे और क्या करते। ऐसे सोये हुए लोग विश्व स्तरीय जागरण या इससे मिलते विषयों पर पुस्तकें लिखते हैं। समझदारी का स्तर यह कि कोरी बहिर्मुखता पहली पसंद इसीलिए रहस्यवाद, छायावाद जैसे शब्दों का प्रयोग कर अपने खोखलेपन का ढोल जी भर बजाया। हर हथकंडे अपनाय जिससे की त्रिपुटी का महत्व परे रहे और उसी तरह पाठ्यक्रम तैयार हुआ। सारा दोष मैकाले की शिक्षा पद्धति देने से पूर्व अपने अंदर झाँक लेना चाहिए। भारतीय भाषाओं के प्रति ऐसी उदासीनता तथा अंग्रेजी का विरोध कुछ और संकेत कर रहा है। मानस में ऐसो का परिचय देते हुए कहा गया, 'मूरख हृदय न चेत जो गुरु मिलहि विरंचि सम ।' संप्रदायों तथा संस्थाओं का ऐसा खेल उनकी प्रभुत्व कायम रखने की लालसा प्रदर्शित करता है पर शिक्षा विभाग कम से कम उन पदचिन्ह पर न चले। यहाँ तो ताल मिलाते हुए कई प्रकाशकों ने उनको (त्रिपुटी को समझाने वाले पद) प्रकाशित तक नहीं किया और ऊपर से प्रामाणिक पदों के प्रकाशन का दंभ उनके दावे पर प्रश्नचिह्न लगाता है। पाठभेद या मिलते-जुलते अन्य रचनाकार के पद के नामपर न छापने खेल खेलना उचित नहीं। चिन्तन यात्रा के किसी मोड पर एक जैसा भाव कई समकालीन रचनाकारों में हो सकता है। वहाँ निष्पक्ष जाँच करके निर्णय लेना चाहिये जो यहाँ नहीं हुआ। मीराबाई ने जिस समय अपनी प्रतिभा का परिचय सामने रखा वह प्रगतिशील कदम था। जब आयातित वाद की गंध तक नहीं थी तब भारतीय दर्शनों में छिपी प्रगतिशीलता सहारे जगने - जगाने का कार्य सराहनीय है। एक महत कार्य संपादन हेतु घर की चारदीवारी लाँघ समाज के मध्य जाना साधारण बात नही थी उस समय और उन्होंने वह कर दिखाया - 'लोक लाज की काण न मांनू। निरभै निसाण घुरास्या हो माई।।' यहाँ छिपा अव्यक्त मलिन अभिप्राय नहीं था वरन घट - घट में स्थित चिन्मय सत्ता को स्वीकारते हुए सामाजिक हितार्थ कदम उठाना था। 'निरभै निसाण' धर्म के नामपर भयभीत करने की कोशिशों का विरोध ताकि लोग अभय होने के लिए धर्म का मर्म समझ अपने अन्दर झाँकना शुरू करे। उन्होंने उन रीति रिवाजों से निर्भय होने का संदेश दिया जो स्थान, काल, परिस्थितिनुसार बनते-बिगड़ते हैं क्योंकि मनुष्य उनके लिये नहीं बना, वे मनुष्य हेतु बनाय गए। यह बात विश्लेषणात्मक तरीके से न समझाकर लोग आँख मूँदकर सबका समर्थन या विरोध करने लग जाते हैं। समाज तथा संसाधनों पर आधिपत्य बनाय रखने हेतु उनपर अपरिवर्तनशील की छाप लगा धर्म की आड में दुकानदारी शुरू होती है। विरोधस्वरूप मीराबाई ने महल के बाहर कदम रख स्वस्थ उदाहरण पेश किया। बौद्धिक व्यायाम विशेषज्ञ नारी मुक्ति या नारीवाद या स्त्री स्वातंत्र्य का ढोल भले बजाय मीराबाई ने पहले ही उसपर चलकर दिखा दिया। उसमें भ्रमित करने, अव्यक्त अभिप्राय पूर्ति, उदण्डता, अभिव्यक्ति का दुरुपयोग, असंयमित इन्द्रिय व्यवहार, चारित्रिक स्वाधीनता जैसी बातें नहीं है। इस रूप में वे अपने समय की आधुनिक नारी थी जिन्होंने उन रीति रिवाजों की अनदेखी की जो उनके गुणों को दबाने के साथ घुट - घुट कर जीने को विवश कर रहे थे। दर्शनों के सार को दर्शाती स्वाधीनता सराहनीय है। अपने व्यवहार से वे प्रेरणा स्रोत बनी उन नारियों के लिए जो बात - बात पर शोषित हो रहीं थीं। वे समझ गई की सात्विक रूप से विरोध किया जा सकता है। उनकी स्वाधीनता पुरुष प्रतिद्वंद्वी या उनसे आगे निकलने का माध्यम या बदला लेनेवाली नहीं वरन मानवतावादी दृष्टि वाली थी जहाँ नारी को मनुष्य समझा जाय। यह पाश्चात्य नारी स्वाधीनता से अलग है जहाँ बात - बात पर प्रतिस्पर्धात्मक दृष्टि अधिक है। घरेलु उत्पीडन वहाँ काफी है पर बहिर्मुखी भाव प्रधान समाधान तलाशा जाता है। इधर मीराबाई की नारी स्वाधीनता पर सोच विवेक पर आधारित है।
उनका समय इस मामले में काफी पीछे था। यह स्थिति केवल मुगल काल के कारण नहीं वरन उससे पहले से चली आ रही थी जहाँ शोषण-दमन प्रधान साहित्य लिखकर उसे वैदिक वाड्मय का अंश कहकर प्रचारित करवाया गया। कुछ अन्य जगह ऐसे श्लोक मिलते हैं जो सतही तौर से नारी समाज को दुसरे दर्जे का नागरिक कहते से लगते हैं पर वह सही नहीं। जैसे उनके संस्कृत बोलने पर निषेध या भागवत में नारियों को वेद से अलग रखना आदि। तभी ऐसी विभूति आती है मार्ग दिखाने के लिए। स्वाधीनता के नामपर गुमराह करने वाले बहुत थे मीराबाई सा कोई - कोई। उन्होंने आँख मूँद कर किसी धर्मध्वजी का संग नहीं किया वरन दो एक पाखंडियों को सद्बुद्धि दी। हाँ इतना अवश्य है कि उनपर अलग से नहीं कहा। वह कार्य कबीरदास, तुलसीदास, कमाल, आदि ने कर दिया।
धार्मिक दुकानदारी पर मानस में कहा गया -
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं॥
कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी॥
वेद का अर्थ है ज्ञान और वह किसी भी विषय के बारे में हो सकता है। कुछ लोग आजीविका के नामपर इच्छानुसार उसका दुरूपयोग करते हैं। यहाँ तक कि उसे केवल पुस्तक के रूप में मानना या इच्छानुसार अनुक्रमणिका बनाना, मनगढंत बातें लिख उसे वैदिक वाड्मय के नाम से प्रचार-प्रसार करना, उसके नामपर हर तरह का शोषण करना जैसे कृत्य करना ही 'बेचना' है। इन्हें औरों के पापों का ढिंढोरा पीटने में आनन्द आता है। मानस की दुसरी चौपाई में इनके अन्य 'गुण' वर्णित है। मीराबाई का जीवन निर्भयता का उदाहरण बना - 'म्हें तो गुण गोविन्द का गास्यां हो माई। सीसोद्यो रूठ्यो तो म्हारों काई करसी।। राणाजी रूठ्या बाँरो देश रखासी। हरि रूठ्या कुम्हलास्यां हो माई।।' उनके ससुरालवालों का शासन था अतः नाराजगीवश राणा अपने देश से निकालने के सिवा कुछ और नहीं कर सकता। ऊधर भगवान नाराज हो गये तो उनका जीवन प्रपंच में बहता रहेगा। यहाँ 'हरि' शब्द किसी नामरूप तक सीमित न रहकर शुद्ध अन्तःकरण में होनेवाले अनुभव का द्योतक है। किसी बाहरी शक्ति को ही मानने से दुनियादारी में फँसे लोगों की परवाह करने के साथ हर समय भय सताता है कि लोग क्या कहेंगे या समाज में रहना है तो बात माननी पडेगी। ऐसे लोगों में कुछ एक परिवर्तन चाह कर भी स्वयं कदम उठाना नहीं चाहते। उन्हें केवल बहती गंगा में हाथ धोने से मतलब। मीराबाई ने केवल बातें न बनाकर अपना उदाहरण सामने रखा। वे राणा की परवाह करतीं तो संसार में उलझी रहती। यहाँ आशय यही है कि राणा एक क्षेत्र का शासक है दुनिया का नहीं और उसपर इतना दंभ - दर्प। अतः छोटे के बदले बडे शासक की परवाह उचित है। बडा शासक अन्दर बाहर दोनों जगह है और उसके बिना कोई जगह नहीं। अतः वह नाराज होकर कहाँ जाने को कहेगा। मुलायम तरीके से राणा को उसका स्तर बता दिया। वे विध्वंसात्मक विद्रोह की बात न कर आत्मबल बढाने पर जोर देती हैं और यह काम आता है जीवन संघर्ष में। यहाँ शंका उठनी स्वाभाविक है की उन्होंने दर्शनों का अध्ययन कहाँ तथा कब किया। यह जन्मों की कमाई का परिणाम है। यह जरूरी नहीं की सबकुछ पाठशाला या पुस्तक या किसी मानव देहवाले से सिखने पर वह अध्ययन कहलाएगा और यह एक जन्म का सफर नहीं। व्यक्ति के गुण, कर्मादि का ज्ञानचक्षु द्वारा विश्लेषण उसके दार्शनिक धरातल को बतलता है। तभी जन्मजात प्रतिभा के हजारों उदाहरण जगह-जगह देखने को मिलते हैं जहाँ अपनी उम्र के अनुसार व्यक्ति कार्य न कर उससे अधिक करता है। इसके पक्ष में एक उदाहरण देखा जाए जहाँ वे कहती हैं -
फेरी न फेरु सन्तो फिरबा न जाऊँगी / भुखी रहु ना अन्न खाउंगी / एक फकीरी सतगुरा ने बताई / घर बैठी फल फल पाउंगी
सन्तो फकीरी आज तो मेलो र र मइया / घर मालकडी क जाऊंगी / तीरथ न जाऊं सन्तो गंगा न नाहुंगी / अडसठ तीरथ बसे बसे घट भीतर / घर बैठी गंगा नहाँउगी
जडी न खाऊं सन्तो, बुटी ना पीऊगीं / नहीं कोई बैद बुलाउंगी / पुरण ब्रह्म बसे घट भीतर / पाचां न मार पचीसा न बस कर मईया / इतना म नर सुलाउगी।।
दैहिक मानसिक बौद्धिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मनुष्य समाधान खोजता है। चूँकि उसका अपना स्वरूप आनन्दमय है इसलिए वह उसकी खोज में जहाँ तहाँ घुमते हुए अस्थायी बाहरी आनन्द में गोते लगाता है। यहाँ तक की आनन्द देने वाले माध्यम को अतिश्योक्ति ढंग से महिमामंडित करते हुए आत्यंतिक समाधान तबतक नहीं सुझता जबतक निष्पक्ष विवेक न जगे। जो विवेकी बन जाए उसका आहार-विहार व्यवहार संतुलित होता है। उपाधि रहित आत्म ज्ञान में सचेष्ट व्यक्ति के विवेकवान बनते हुए आत्माभ्यासी बनता है। यह अभ्यास धीरे-धीरे मोह तृष्णा का वेग नियंत्रित करते हुए उसके अनुरूप बहना बंद करता है। ऐसा अभ्यासी ऊपरी और बाहरी ज्ञान भक्ति वैराग्य से परे रह उनकी त्रिपुटी में स्थित होने लगता है जहाँ वे तीनों का एकत्व व्यक्ति को सही मायने में तत्वदर्शी बनाता है। इस मार्ग पर चलनेवाला आत्यंतिक समाधान के लिए अलग से दौड धूप नहीं करता। उपरोक्त पद इसी अवस्था पर आधारित है। उदाहरण के लिए अर्जुन की मनःस्थिति देखे जहाँ वह भक्त तथा समझदार होते हुए भी आत्मविद्या से अनजान था। मीराबाई इसी उहापोह से निकली अवस्था समझाते हुए भटकना बंद होने की बात कह रही हैं। व्यवहार में भी किसी शंका के समाधान पश्चात उसके बारे में अनावश्यक संदेह पैदा नहीं होता।
पद में 'भुखी रहु ना अन्न खाउंगी' संयम संतुलन तथा संतोष की ओर संकेत कर रहा है। 'सतगुरु' (तत्वदर्शी ज्ञानी) से प्राप्त हुई 'एक फकीरी' आत्मज्ञान रुपी तरकीब के चलते आनन्द, सुख, शान्ति अपने ही अन्दर मिल गई। दुसरे अनुच्छेद में संकेत संसार छोडने की ओर है। ऐसा संकेत सन्त कबीरदास की वाणी में मिलता है जब वे कहते हैं 'नैहरवा हमका न भावे'। उपनिषदों में आत्मज्ञान रुपी तीर्थ को बाहरी तीर्थों से अधिक महत्व दिया गया है। यह बाहरी तीर्थो की अवहेलना नहीं वरन सच्चाई का उद्घोष है क्योंकि जरुरत अपने अन्दर झाँकने की है। निष्पक्ष मनन यही कहता है कि कई क्षेत्रों का विकास तीर्थो के रुप में संभव हुआ जैसे बदरीनाथ, रामेश्वरं आदि जो धीरे-धीरे आस्था के केंद्र बने। इनका सीधे-सीधे संबंध आत्मज्ञान या ब्रह्यविद्या से नहीं है। इसीलिए पद में बाहरी माध्यमों से अलग रहने की बात कही गई है। यूँ भी अनुभवी महापुरुषों के अनुसार जो बाहर है वही भीतर है - 'यद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे'। 'अडसठ तीरथ बसे बसे घट भीतर' में चौदह (अडसठ = ८+६=१४) लोक की ओर संकेत है। इसका अनुभव त्रिपुटी द्वारा होता है जहाँ योग दर्शन सहयोग करता है। इसके लिए त्रिपुटी में स्थित होना काफी है अलग से कहीं जाकर साधना करनी जरुरी नहीं।
अन्तिम अनुच्छेद में 'पाँच न मार' द्योतक है पंच ज्ञानेन्द्रियों के विषय (शब्द, स्पर्श, रुप, रस, गन्ध) पर नियंत्रण या उसकेनुसार न बहते रहने का भाव। 'पचीसा न बस कर' में सांख्य दर्शन के पच्चीस तत्वों की ओर संकेत है जिनका प्रभाव मीराबाई पर नहीं रहा यानि वृत्तियाँ उन्हें अपने-अपने वश में नहीं रख पा रही। यहाँ सांख्य दर्शन का खंडन या अवहेलना नहीं वरन साधना में चरणबद्ध विकास समझाने के क्रम में दैहिक धरातल से बात शुरु की गई क्योंकि बिना देहाभिमानी हुए कोई चेष्टा नहीं होती। वही भावना पहले समाधान के लिए घुमाती फिराती है और मिलने के बाद व्यक्ति पत्थर भाँति पडा नहीं रहता पर तब वह अपने आनन्द में डुबा रहता है। इस पद में दुसरी स्थिति का उल्लेख है। पहली वाली स्थिति चार्वाक से लेकर पूर्व मिमांसा तक बनी रहती है जिसकी ओर परोक्ष रूप से संकेत किया गया प्रथम अनुच्छेद में 'फेरी न फेरु सन्तो फिरबा न जाऊँगी' के द्वारा जिसपर ऐसा कहने पर प्रश्न उठना चाहिए। आखिर वेदांत ही देहभाव से ऊपर उठने की बात करता है और इस शब्द का संबंध प्रामाणिक उपनिषदों से है। यहाँ अन्तिम पद में 'इतना म नर सुलाउगी' में मनोराज्य का नाश है जिसके चलते व्यक्ति सही-सही में तत्वदर्शी बनता है। उसके पहले स्थापित दर्शन पडाव बन जीवन में आते जाते रहते हैं। उत्तम स्थिति हेतु व्यवहारिक संतुलन, संयमित दिनचर्या, अष्टांग योग का संगम सहायता करता है।
द्वितीय शंका उठती है त्रिपुटी तथा भारतीय दर्शनों के तालमेल पर। यहाँ दोनों का उल्लेख हुआ है। दोनों एक सिक्के दो पहलू हैं। त्रिपुटी तनिक संक्षिप्त और उसे समझने के लिए दर्शनों का दर्शन विराट रूप है क्योंकि उन्हें क्रमानुसार समझना पडता है। कई बार प्रकृति यह कार्य स्वयं करती है। स्थापित नौ दर्शन का अन्दरूनी तालमेल या एकता समझने के पश्चात क्रियान्वयन करने वाला रचनाकार त्रिपुटी में स्वतः स्थित हो जाता है। तभी मीराबाई के कृष्ण हो या तुलसीदास के राम दोनों नामरूप या अवतार तक बँधे नहीं है। इसके लिये जरूरी था भक्ति साहित्य का प्रगतिवादी पक्ष अवहेलित रहे। उपरोक्त त्रिपुटी में स्थित हर रचनाकार के साथ यही हुआ। उनको इस तरीके से बाँटा गया की उनका साहित्य जीवन में लागू नहीं हो पाया। वे कक्षा या भजन संध्या तक सिमट गये। ऐसी अनुपम धरोहर को जीवन से जोडकर पढाने की जरूरत है तभी शिक्षा नीति समाजोपयोगी होगी। आयातित विचारों से ही सामाजिक सुधार की बात करना दासता है स्वाधीनता नहीं। यहाँ की तासीर के अनुकूल विचार वैदिक वाड्मय में है। उनपर स्वस्थ सार्थक संवाद करने, मानने तथा लागू करने की जरूरत है।
साधना वृत्ति वाले गुरुभाई सत्यव्रत ने इस पद पर विचार-विमर्श करने को कहा :-
आली री मोहे लागे वृन्दावन नीको,
घर घर तुलसी ठाकुर सेवा, दर्शन गोविंद जिको
निर्मल नीर बहत यमुना को, भोजन दूध दही को,
रतन सिंहासन आप विराजे, मुकुट धरे तुलसी को,
कुंजन कुंजन फिरत राधिका, शब्द सुनत मुरली को,
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, भजन बिना नर फीको,
आली री मोहे लागे वृन्दावन नीको।।
यह पद वहाँ के निवासियों को जगाने के लिए गाया था स्थान को अतिश्योक्ति ढंग से महिमामंडित करने हेतु नहीं। इनसब को जाँचने के लिए जो सुत्र हैं उनके आधार पर लक्ष्यार्थ खुलता है। महाभारत तथा भागवत महापुराण में कृष्ण का प्राचीन परिचय मिलता है। बाद में लिखे ग्रन्थों को उच्च स्तरीय चर्चा में वह मान नहीं देना चाहिए क्योंकि वे संप्रदायों द्वारा आयोजित तथा प्रायोजित हैं। बढ़ा-चढ़ाकर कहना अनिवार्य है प्रभावित करने के लिए।
घर - घर ठाकुर (कृष्ण विग्रह) होने की बात करते हुए उनकी दृष्टि उस बोध पर थी जो हर युग में जरूरी है। जिस तरह कृष्ण ने गोवर्धन लीला के माध्यम से शासक की निरंकुशता का दमन करते हुए समाज की रक्षा की और शासक को स्वधर्म या अधिकार के साथ-साथ कर्तव्य पथ याद दिलवाया ((क्योंकि उस पद में अधिकार कर्तव्य दोनों मिले हुए हैं)) या वनभोज जैसी प्रथा सिखाई जहाँ लोग अपने-अपने घर से लाया भोजन मिलबाँट कर स्नेह से खाते हैं वैसे ही मीराबाई समाज से मिलकर रहने का आह्वान किया ताकि शासक मनमानी न करे और समाज मिलकर रहे। आखिर हर व्यवस्था में संपन्न - विपन्न वर्ग दोनों होते है। दोनों वर्गों के अन्दर ऊँचा मध्य नीचा स्तर तक होता है। सुविधा के लिए नाम चाहे जो हो। पूर्व पक्ष उठाते हुए अन्य लीलाओं के आधार उछलकूद मचाने वाले यूट्यूब में अक्षय चैतन्य नामक चैनल की भागवत महापुराण प्लेलिस्ट के दसवें स्कन्ध वाला वीडियो सुने। (१)
यहाँ उपरोक्त पद में राधा नामक पात्र का नाम लिया गया जिसका उल्लेख मध्ययुगीन पूर्व साहित्य में नहीं मिलता। तो क्यों एक नए पात्र का उल्लेख हुआ। पौराणिक साहित्य में भक्ति माता तथा उसके दो पुत्र ज्ञान वैराग्य का प्रतीकात्मक वर्णन है। संबंध की जाँच करने जैसा व्यर्थ कार्य छोडकर समझना यह है की ये तीनों साथ-साथ रहते हैं। भागवत महात्म्य में इसका वर्णन है जहाँ भक्ति माता वृन्दावन तक में अपने पुत्रों की अवस्था से चिन्तित है। अधिकांश कथाकार उसे खुश बताते हुए कुछ श्लोकों का वर्णन करते हैं पर बाद का उदासी वाला प्रसंग नहीं बताते जिसके अनुसार वह वृन्दावन तक छोडने को तैयार है क्योंकि उसके पुत्रों की वृद्धावस्था दूर नहीं हुई। किसी के द्वारा न चाहने के कारण उनकी यह दशा हुई जो समाज की अनियंत्रित भोग-विलास वृत्ति तथा धर्म को मात्र दोहन या धंधा बनाने की लत दर्शाती है। तब सीधे-सीधे भक्ति शब्द न रखकर राधा क्यों रखा। उस समय इस पात्र की रचना के साथ इसे स्थापित किया गया कृष्ण के साथ जोडकर। इसलिये पौराणिक साहित्य में यथेष्ट विरोध है परिचय में। उसे कहीं कृष्ण की आत्मा, कहीं उसकी शक्ति, कहीं उसकी रिश्तेदार ही नहीं वरन रुक्मिणी बताकर अच्छी खासी कथा बना दी विश्वास जगाने के लिए। हल्का-फुल्का पाठभेद एक बात यहाँ कहानी हर बार नई। ऊपर से कहीं विवाहिता तो कहीं कृष्ण के साथ विवाह होने की बात। इसपर वीडियो है और उसके डिस्क्रिशन (विवरण) में तनिक अन्य बिन्दुओं का उल्लेख है। (२) संक्षिप्त चर्चा पश्चात आते हैं पद की ओर। मीराबाई ने इस पात्र द्वारा ज्ञान वैराग्य की याद दिलाते हुए मिलजुलकर रहने, आततायी का सामना करने का उपदेश दिया है। माहात्म्य का लक्ष्यार्थ इसी ओर संकेत कर रहा है। इसीलिए यथास्थान 'गिरधर' शब्द का प्रयोग किया गया।
यहाँ 'भोजन दूध दही को' कहने के पीछे प्राप्त कर्मफल में संतोष करने का भाव है। ग्रामीण अर्थ व्यवस्था में बैलों के अधिक प्रयोग से गायों की देखभाल ठीक से होती थी। उसके फलस्वरूप दूध, दही, छाछ, आदि सहज सुलभ थे। एक तरफ कर्मफल तथा दूसरी ओर उस वर्ग के साथ बाँटना जो इससे वंचित था। सभीके लिए उस भोजन की बात कहने के पीछे यही अभिप्राय है। तुलसी का मुकुट कोरा श्रृंगारिक प्रयोग नहीं है। रत्न सिंहासन पर बैठने वाला हरियाली या कृषि उत्पादन और कृषिकर्म को सम्मान दे। अर्थ में भूल तब होती है जब तुलसी पीपल वट जैसे शब्द आते ही धार्मिक रीति रिवाज तक उन्हें सीमित कर दिया जाता है। यहाँ एक पंक्ति में हर युग में पालन योग्य राज धर्म सिखाया गया है।
इसमें भजन शब्द का प्रयोग घर के कामकाज से भागने या कर्तव्य से मुँह फेरने के रुप में प्रयुक्त नहीं हुआ। प्रायः प्रमाद प्रिय मानसिकता यही रुप पसंद करती है या कार्यक्रम की तरह करके निश्चिंत हो जाती है। वह जीवन में उतारने के लिए भजन शब्द का प्रयोगस्थान ध्यान देने योग्य है। पंक्ति है - 'मीरा के प्रभु गिरधर नागर, भजन बिना नर फीको' - गिरधर के अर्थ पर चर्चा हो चुकी है और उसी रुप में वह हर जगह रखा गया है। वृन्दावन में वे किसी और को पुरूष नहीं मानती अतः जो अपने आपको नर (पुरुष) मानते हैं उनमें कम से कम सद्गुण होने चाहिए और वे तभी विकसित होगें जब भजन का लक्ष्यार्थ अपनाएं - 'आदत बुरी सुधार लो, मन की तरंग मार लो, बस हो गया भजन'। इसकी संगति लगनी जरूरी है - पुरुषत्व का दंभ अमानवीयता अपनाकर नाना मुखौटों में अपनी असलियत छिपाने का प्रयास करता है। मीराबाई ने अपने ससुराल में इसका अनुभव किया था। साथ ही वे समाज की दकियानूसी सोच से मर्माहत थीं। यहाँ नर शब्द मनुष्य के अर्थ में लिया जा सकता है। उसमें नर नारी दोनों आ जाते हैं। इसमें कोई दोष या विरोधाभास नहीं है। आखिरकार बुराई वर्ग विशेष तक सीमित नहीं।
तभी तो सुमित्रानंदन पंत ने लिखा - ‘‘मीराबाई राजपूताने के मरूस्थल की मन्दाकिनी हैं।"
स्वामी अक्षय चैतन्य
सन्दर्भ
१. https://youtu.be/i1yqpkmEJvE
२. https://youtu.be/7gjWKQGUp7I