अभिनवगुप्त के अनुसार दीक्षा का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है :
दीयते ज्ञानसद्भाव: क्षीयते पशुबंधना।
दान-क्षपणासंयुक्ता दीक्षा तेनेह कीर्तिता।।[६]
दीक्षा का वस्तविक अर्थ है उस ज्ञान का दान जिससे जीवन का पशुत्वबंधन कट जाता है और वह पाशों से मुक्त होकर शिवत्व प्राप्त कर लेता है। वेशभूषा और नियम मिश्रित दीक्षा बहूधा जीवन शैली या यशादि तक रह जाती है। बाहर से एक दिखने पर भ्रम होता है अतः इनके अन्तर को समझना आवश्यक है।
कईयों के अनुसार उपरोक्त श्लोक किसी और का है पर वे स्पष्टतः नामोल्लेख नहीं कर पाए। कम से कम रचना का अर्थ तो मानना चाहिए।
साधु :- सज्जन व्यक्ति फिर चाहे वह किसी भी क्षेत्र में कर्मरत हो। वह अपने विषय का जानकार होने के साथ उसे समझाने में कुशल हो और उससे संबंधित प्रश्नों को झेल सके। यानि अनुभवी हो, केवल शाब्दिक ज्ञान न हो या शास्त्रपशु, शास्त्रशिल्पी, शास्त्रबंधु न हो जो शास्त्रों का बोझ ढोते रहते हैं। इनसे अलग रहने वाले सही-सही साधु होते हैं जो औरों के दुःखों को दूर करने प्रयास करते हुए ठकुरसुहाती से दूर रहते है। ऐसा साधु उस शल्यचिकित्सक की भाँति है जो निर्भय होकर अपना दायित्व पूरा करता है। वह दुःखों को ढकने की सलाह नहीं देता। वह व्यक्ति के आँसूओं से अपने लिये तरणताल नहीं बनाता। रामचरितमानस के अनुसार - साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू॥ जो सहि दु:ख परछिद्र दुरावा।
जाँचने के सूत्रों के अनुसार एक ही लक्ष्यार्थ सामने आता है। जिस तरह निरस कपास नाना कष्टों को सह वस्त्र बनकर रक्षा करता है वैसे ही साधु पराए दुःख दूर करता है। वह व्यक्ति विशेष की भूल, पीडा औरों को नहीं बताता। अगर भोगने वाला पूछे तब धीरे-धीरे समझाता है। कई बार साधु सांकेतिक भाषा में कमी की ओर संकेत करता है ताकि भोगने वाला दिए गए उदाहरण से समझ ले। यह सब तरीके व्यक्ति विशेष की स्थिति पर निर्भर है जिसकी जानकारी साधु को होनी चाहिए। उपरोक्त चौपाई को बिना जाँचे कहने पर अर्थ का अनर्थ होगा जैसे साधु कपडे की भाँति दूःख ढकता है।
ऋषि :- समाज हेतु शोध कर लेने वाला वर्ग जो अपना समय शोध रूपी साधना में लगा चुका और समाज उसकी देखरेख करता था। ये जीवन से जुड़े पहलुओं पर विश्लेषण पश्चात दिशा निर्देश देते थे और इनमें से कई मंत्र द्रष्टा होते थे। ऐसे ऋषि मन्त्रों का साक्षात्कार या अनुभव करते यानि उस विद्या विशेष को सर्वप्रथम जाननेवाले होते थे। चूँकि काल विशेष में ही उनकी जरूरत होती है अतः अभी कोई नहीं है। अगर यह कहा जाये - उपकरण का आविष्कार करने वाले ने भी तो सर्वप्रथम उस चीज को जाना तब वह मन्त्र द्रष्टा क्यों नहीं? उपकरण आदि में बदलाव होते हैं पर जीवन के मूलभूत पक्ष एक जैसे रहते हैं।
इनमें वे ही गृहस्थ होते थे जिन्हें सृष्टि को आगे बढाने का दायित्व मिला था। यह न बतलाकर अविवाहित जीवन जीने वाले की हँसी उडाना न्यायसंगत नहीं। इनमें और आविष्कार करने वालों में अन्तर है। वैज्ञानिकों के आविष्कार का दुरूपयोग होना सरल है। कई बार दबाव में शोध होता है, कई बार प्रतिस्पर्धा या हिंसात्मक प्रतिस्पर्धा के चलते शोध होता है। ऋषियों में समष्टि हित प्रधान होता है। इनकी खोज अनूठी होती थी जबकि वैज्ञानिकों के आविष्कार में सुधार या विकल्प बनते रहते हैं।
मुनि :- ये लोग शोधरत नहीं रहकर सतत मनन करते थे सिद्धान्तों का जो ऋषि वर्ग द्वारा खोजे गए। उसे समझाने हेतु कथाओं का उपयोग होता था।
महात्मा :- कायिक, वाचिक और मानसिक स्तर पर एक जैसा रहने वाले लोगों को महात्मा कहते हैं। यहाँ वेषभूषा मुख्य नहीं है।
संन्यासी :- वह आत्माभ्यासी होता है यानि अनात्म
वस्तुओं से आसक्ति लगातार दूर करते रहता है क्योंकि देह रहने तक भावनाएँ के झोकों को झेलना पड़ता है। कम से कम अपने शरीर से तो व्यवहार होगा है फिर चाहे वन में रहे या गुफा, पर्वत की चोटी पर। केवल कर्म त्याग या मुफ्त की सुविधा या अव्यक्त अभिप्राय की पूर्ति हेतु लिया गया संन्यास वेष मात्र है। भोगविलास की वृत्ति को यह कहकर पूरा करना, - 'मैं आत्मा तु आत्मा, शरीर का क्या वो तो आते जाते रहता है', उचित नहीं।
इसके चलते सैकडों गृहस्थ स्वयं को संन्यासी कहने लग गये व्यवहार तथा आचरण से मुखौटा उतर जाता है। तभी अपने यहाँ आचरण प्रधान माना गया। यक्ष संवाद ने इसे ब्राह्मणत्व का प्रमाण माना।
संन्यास की समझ
https://youtu.be/j7llK9tKM1s
दंडी :- वाणी का संयम मौन, शरीर का संयमित जीवन,
मन का संयम प्राणायाम - - ये तीन दंड जिसके पास वही दंडी संन्यासी है। भागवत तथा प्रामाणिक उपनिषदों में दंडी की यही परिभाषा है। इनके साथ जो दंड धारण करे वही सही में दंडी स्वामी है।
केवल बाहरी वेशभूषा तथा ऊपरी नियम पालन यश दिलाते है। संप्रदायानुसार तथा समयानुसार नियमों में परिवर्तन चाहे जितना हो उपरोक्त तीन दंड अनिवार्य हे।
संत :-- संतों की वाणी में भेद नहीं महंतों की वाणी में होता है। व्याकरण की आड में अर्थ लगाकर कहना - जो शांत / सांत है वही संत है, जो मधुर स्वभाव का है, वही संत है। और तो और यह कहना कि प्राचीन संतो में मतभेद था, अपने दिमागी दिवालियेपन का प्रदर्शन मात्र है।
आधुनिक व्याकरण के लचीलेपन के चलते मनमाने या ऐसे अर्थ निकलते हैं जिनकी संगति ठीक से लगनी चाहिए। किसी न किसी कारणवश वह नहीं की जाती। तथाकथित विद्वान जो मन में आया बोल देते हैं और उनके समर्थक उसे प्रमाण मानते हैं । कानपुर में एक प्रश्नोत्तर के दौरान एक विद्यार्थी ने पूछा, 'आपकी बात कैसे मान लें? आपकी द्वारा बतलाई निष्पत्ति का प्रमाण क्या है?' ऐसे अच्छे प्रश्न सुनने को कम मिलते हैं। सब जगह जो उत्तर दिया वही वहाँ कहा। उसे यहाँ बताया जा रहा है । प्रामाणिकता हेतु तीन सुत्र दिए गए हैं जिनके प्रयोग से बातों का खुलासा होता है। बस देखना यह है कि जैसे रसायन विज्ञान में जीव विज्ञान के अनुसार या भौतिक विज्ञान में छन्द शास्त्र के अनुसार विश्लेषण नहीं करना चाहिए और वैसा करना उचित नहीं, वैसे ही शास्त्रों में प्रयुक्त शब्दों का अर्थ उसकी विधानुसार होना चाहिए । इसपर व्याकरण या निरूक्त या बड़े शब्दकोशों का नाम लिया जाता है। वे सहायक हैं पर प्रमाण नहीं और उन्हें ही सबकुछ मानने की बात सिखाई जाती है। इसके चलते ही शास्त्रों की नाना प्रकार की व्याख्याएं चल पडी। यहाँ सूत्रों का प्रयोग किया है।
All the terms discussed till now do not have exact translation in any foreign language.
Here we will discuss the meaning of hermit, monk, sage and saint.
Hermit : - - A person who isolates himself/herself from the society for religious reasons or for searching inner peace. If it is for religious reason, the matter is related with private ceremony. When there is chaos in the life due to the family or society, the person wants to run away from that. In this domain there are full chances of returning back home. Normally totally extrovert or those who are unable to balance behaviour and spiritualism trues to saty like this in rural areas or beaches or in forest or in the mountains. For them external environment is more important than their own internal level.
Monk :-- A person belonging to a religious or spiritual order. He / she may or may not stay in a monastery or an ashram. The person never cares about the previous family. Few questions came during a satsang. In one case the swami was staying with the parents in the ashram which was a branch of a spiritual organization. Now that depends on the constitution of the cult or organization. Like one swami used to send money to his dependent mother staying in the native village. It also depends on the cult. Staying in touch with the family members can be viewed in different ways. If there is a trust to look after the needs, the monk or sanyasi have to take full interest in the family of the trusties. Their emotions, events must be addressed properly. He /she can't stay neutral which will be a disaster in the long run.
Sage :-- A wise person who uses eyes of wisdom. A profound philosopher can be called a sage if his /her behaviour is based on hearty intellect.
Saint :- In English it denotes a designation related with Christianity where a deceased male - female monk is awarded by this title on the basis of the work done for the society and /or showing miracles in the life of the believers is also a parameter.