Saturday, 7 November 2020

आचार्य वंदना

[आचार्य वंदना] 
        🙏श्रद्धेय आचार्य स्वामी सुबोधानन्द जी 🙏
(विक्रम संवत २०७७ अधिक माह - आश्विन - - पुरुषोत्तम माह की शुक्ल पक्ष एकादशी को सिद्धबाड़ी में पंच भौतिक देह छोडने वाले अपने आचार्य स्वामी सुबोधानन्दजी को उद्भित भाव द्वारा काव्यांजली तथा चित्रांजली) <-> अभिधा, व्यंजना तथा लक्षणा में 🙏

तपस फल बन जीवन में
जिस क्षन आप आए
नव दर्शन के दर्शन कराए 
शोधन प्यास जगाए 
अबोध को बोध कराए 
नाम सार्थक कर जाए । 

लकीर के फकीर न 
विरोध के नाम विरोध 
श्रवन मनन निदिध्यासन 
दूर करे नाना अवरोध 
ऐइसन घुट्टी पिलाए 
नाम सार्थक कर जाए। 

बोध ओर ले जाए 
मन साधक हो जाए 
वेदना अंत करवाए 
वेदांत बीज बो जाए 
संभालना उसे सिखाए 
नाम सार्थक कर जाए। 

 जिलाये जगाये जाए 
निज तप में तपाये जाए 
सोधा जोधा बनाये जाए 
त्रिपुटी मर्म समझा जाए 
शान्ति क्षान्ति देय जाए 
नाम सार्थक कर जाए । 

फूल निज गंध से खींचे 
सूरज न ढोल बजाए 
संत लक्षन यूँ बताए 
इशारों में खोल जाए 
सबद भेदना सिखाए 
नाम सार्थक कर जाए। 

फूल रहे चाहे जहाँ 
खुशबु फैलाए वहाँ 
 तुमसे अलग हुए नहीं 
मिला तुमसे भुले नहीं 
निमित्त बना साँझा कराए 
नाम सार्थक कर जाए। 

सुनते रहे सालों अनेक 
गुनने न बनने में एक 
रहे सरीर या सतह तक 
तत्व पथ चला कोई एक
गुरुसेवा वही कर जाए 
नाम सार्थक कर जाए। 

सरीर से सरीर सेवा 
सबद, गुरु कहीं चेला 
उलझन ने संसार घेरा 
न रहे वेस से नेहा 
मुसकान से समझा जाए 
नाम सार्थक कर जाए।

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(श्रवण चित्रों द्वारा संप्रेषित) 

( श्रुत परंपरा में द्रष्टव्य: श्रोतव्य: मन्तव्य: निदिध्यासितव्य: जरूरी है। पढना, घोटना, रटना व्यवहारिक विषयों के लिए है। वेदांत पर इसे न थोपें)।

विजयादशमी तथा दशहरा में भेद

विजयादशमी तथा दशहरा मा भेद जान ल्यो इह बार। दस से हारे की शुभकामना रावन बनाय बार - बार।
          वे दस हैं - ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय 

बाजि बाजीगरी दिखा सरपर रहे सवार।
दसो बेलगाम यूँ बन रावन कर तैयार।।
दसहरा मरम समझ लै दस खींचै हर बार।
   वृत्यानुसार जो बहे दस लै बाजी मार।।
मन में नाम चाम दाम मुँह सो निकसत राम।
कइसन न रावन बनै भीतर झाँको राम।। 
कुल करम वरन पढाई ना बनिहे परमान।
आचरन सुधारे बिना रावन बन्यो जान।।
दसहरा दसहरा करत उमरिया बीत जात। 
बिजयादसमी बिसरात किस विध बनई बात।।
दस ही राम रावन बन समझ लै मूल बात।
नियमन दस करलै अभी न तो रहे पछतात।। 
मन ही राम रावन बन मन लै बाजी मार।
दसो के कारन बनै दसानन बार बार।।
जलाय सेस हो नाही रूप बदल रह जाय। 
ज्ञान विज्ञान सब कहै रावन हो बच जाय।। 
दस जब जब खावै मात मन राम होय जात।
सफल होय बिजयादसमी काहे न सुनौ बात।। 
दस सै हारे वह डरे धारत अरथ कोय। 
दसहरा कवन सुभ बनै कहत न आई लाज।। 

(शुभकामना देते वक्त अर्थ पता न होने से अमंगल होना निश्चित है।) यह विडियो सुनने का कष्ट करें :--
असुरत्व और रिवाज
https://youtu.be/PXb7PWo-eY8