Monday, 30 October 2023

उपनिषद सबके तथा सबमे

भाष्यकार ने सीधे वेद पर क्यों नहीं लिखा? 

           
प्रायः यह प्रश्न पूछा जाता है कि आदि शंकराचार्य जी ने प्रस्थान त्रयी (ब्रह्मसूत्र, उपनिषद, श्रीमद्भगवतगीता) पर भाष्य लिखा पर सीधे-सीधे वेद पर नहीं लिखा। जबकि वेद को इस तरह महिमामंडित किया गया है मानो उसके बिना मनुष्य का उद्धार असंभव है। दूसरी ओर क्या उपनिषद सबके लिए है? क्या उनम केवल आत्म ज्ञान का उपदेश है? 

वेद के नाम से जो पुस्तक प्रकाशित हुई उसे पढा या न पढा, दोनों समान है। उसे पढने पढाने का खोखला अभिमान न पाले कोई और यह न सोचकर कोई इतराए की उसे पढने की जरूरत नहीं। इसकी आड में शोषण-दमन करने वालों पर कहा गया मानस में :- बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं॥
कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी॥
आजीविका या यश कमाने या समाज को वश में करने के लिए वेद को बेचने वाले पाशव (पाशविक स्वभाव) औरों के पाप सबको बतलाते रहते हैं। ऐसे कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी (अपना अवांछित अनैतिक अनाधिकार वाला लाभ न होने पर आया तामसी या राक्षसी क्रोध) सही में वेद का अवमूल्यन करने वाले और विश्व विरोधी हैं। यह कठोर टिप्पणी वेद की अपनी सुविधानुसार परिभाषा और अनुक्रमणिका तैयार करने वालों पर प्रहार है। ऐसे लोग गोस्वामी तुलसीदास जी के समय भी थे। 

वेद विद् धातु से बना शब्द है जिसका प्रधान अर्थ है जानकारी जो अनुभव पश्चात व्यक्ति विशेष के लिए ग्यान कहलाती है। अनुभव बिना उसे ज्ञान कहें पर वह जानकारी है क्योंकि उसे केवल माना पर अनुभवहीन रहा या जाना नहीं। ज्ञ वर्ण ज + ञ से बना जो जानने की बात कहता है सीधे-सीधे ग्यान की नहीं। वैदिक वाङमय का संपादन महर्षि व्यास ने किया और उन्हें वेदव्यास भी कहा जाता है। यह एक व्यक्ति का नाम था या विद्वानों के समूह का या किसी संस्था का जो इस कार्य के बनी थी वह अलग विषय है। छन्द के आधार पर वेद तीन और सामग्री के आधार पर चार हैं। अथर्वेद को बाद में नहीं जोड़ा गया और उसके तो क्षात्र वेद (राजधर्म पर अधिक मन्त्र), ब्रह्म वेद (ब्रह्म नामक ऋषि के चलते जो ४०० से अधिक मन्त्रों के द्रष्टा थे), भिष्ज या भिष्ग वेद (जल एवं सूर्य किरण चिकित्सा इसीमें है), तीन नाम और भी हैं। इसमें तन्त्र मन्त्र की अवधारणा अधिक होने के कारण इसे पृथक कर दिया गया। जहाँ कहीं भी त्रयी विद्या का उल्लेख है वहाँ छन्द के अनुसार बात कही गयी है। अतः यह पुस्तक मात्र नहीं और न कोई आदेश जिसे मानना अनिवार्य है। अब जानकारी किसी भी विषय की हो सकता है। भले ही कुछ विषय किसी-किसी को पसंद न आए तब इसका मतलब यह नहीं कि वह ज्ञान ही नहीं। एक तो उसमें केवल जानकारी ऊपर से अधूरी तब वह किसी काम की नहीं।
जैसे प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से जन्मना वर्ण व्यवस्था मानने वालों ने अपने-अपने प्रायोजकों सहित मिलकर इसे पुस्तक रुपेण प्रचारित करवाया और बाहर से समाज सुधारक बनने का दिखावा किया जैसे जनेऊ आदि पर सबको अधिकार देना इत्यादि। 

दो एक संस्थाएँ जन्मना वर्ण व्यवस्था का विरोध करती 
हैपर शिखा सूत्र संध्या आदि की उपनिषद वाली परिभाषा नहीं बताती। और तो और अतिरंजित तरीके से पुस्तकों को महिमामंडित किया। कईयों ने अपने-अपने यहाँ उसे शीशे के ढाँचें में रख ऊपर से 'वेद भगवान' लिखवा प्रदर्शित किया। इस आग को मध्ययुगीन संप्रदायों ने आहूतियाँ देकर भड़काया। 'नास्तिकों वेद निनादकः (मनुस्मृति २.११) जैसी अनर्गल बातें सामने आई ताकि नौ आस्तिक दर्शनों की अन्दरूनी एकता दिखाई न दे और समाज उनकी उपयोगिता से वंचित रहे। देख जाए तो उपलब्ध मनुस्मृति के सारे संस्करण बाद में बने अतः ऐसी पंक्तियाँ लिखने में संकोच नहीं हुआ। 

ज्ञान प्रस्फुटित होता है उन मनीषियों के ह्रदयाकाश या मानस पटल पर जिन्हें हम मन्त्र द्रष्टा ऋषी कहते हैं। समष्टि योजना में आवश्यकतानुसार वे धरा पर आते हैं। इनकी तुलना आविष्कारकों से कर तो सकते हैं पर स्तर दोनों का पूरा एक नहीं है। जिन आविष्कारों का खंडन नहीं हो सकता और वे जो जस के तस रहते हैं जैसे आग, चक्का, विज्ञान के वे सिद्धांत जो एक जैसे रहते हैं उनके आविष्कारको की तुलना मन्त्र द्रष्टा ऋषि से कर सकते हैं। उपभोक्ता प्रधान वस्तुएँ तकनीकी बदलाव पर निर्भर है। उसकी खोज करनेवाले वैज्ञानिक हैं मन्त्रद्रष्टा नहीं। बारुद का आविष्कार अल्फ्रेड नोबल ने स्वीडन में किया। यह ऋषि स्तरीय उदाहरण है। संक्षेप में समझें तब वह सिद्धांत जो सदा एक जैसे रहे। बारुद का मूल उपयोग आजतक वही है जो पहले था। कम से कम वह खाने या खाद बनाने या निर्माण में काम नहीं आ सकती। 

सुनियोजित षड्यंत्र के चलते वेद को अतिरंजित तरीके से महिमामंडित किया गया संप्रदायों तथा संस्थाओं द्वारा। उसके लिए जरूरी था कि उसे इस भाँति प्रकाशित करें ताकि वे उपनिषद न आएं जिनसे धर्म दुकानदारी पर चोट पहुँचती है। एक वर्ग ने शोषण-दमन किया वेद के नामपर दूसरा आया सुधारक बन पर उनमे से अधिकतर लोगों ने तथ्यों को सामने नहीं रख, खुद को रखा मानो वे अपनी तरफ से कर रहे हैं भला जैसे सबको जनेऊ देना आदि। श्रीमद्भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय में बताए गए यज्ञों को न बताकर हवन रुपी कर्मकांड को महिमामंडित कर दिया। आजीविका के नामपर सब किया गया जिससे स्वाभिमान नहीं बढा। क्या कर्मकांड का अधिकार ही एकमात्र प्राप्ति है। समान अधिकार की आड में 'वेद' का भला नहीं हो रहा। वृहत समाज आत्मिक दृष्टि या आत्मज्ञान से दूर हो गया और उसके नाम पर ढोंग चल पडा। जो लोग हर तरह के आविष्कार का श्रेय वेद को देते हैं वे दो चार चीजें भी नहीं बनाकर दिखा पाए जो वेद पर आधारित हैं ।

कुछ अनर्गल बातें :-
१. सबसे पुराना ऋग्वेद और नया अथर्ववेद है जिसे वेद की मान्यता बाथ में मिली - - चारों नाम उपनिषदों में है तथा कई जगह अलग - अलग उपनिषदों के दो चार मन्त्र एक ही है। 

२. उपनिषदों में कहानियां और ऐसे नाम आते हैं जो ऐतिहासिक है - एक तरफ श्रुति को माँ कहना और दूसरी ओर यह आशा करना की वह संतान विशेष की इच्छानुसार सारे कार्य करे। यहाँ श्रुति शब्द सुनना या श्रवण करना है। पहले सुनने का चलन था इसीलिए श्रुत और वेद रुपी जनकारी को श्रुति। 

३, चतुर्थ वर्ण तथा नारियों को वेद के पठन-पाठन और श्रवण तक का अधिकारी नहीं - सरासर गलत। इन्हें दूर रखा गया मानो इनके चलते वेद अपवित्र हो जाएंगे। वर्ण व्यवस्था गुण कर्म पर आधारित है जन्मना पर नहीं। कहीं कोई पंक्ति दिखे दूसरी बात करने वाली तो जाँचना चाहिए शोर मचाने के बदले। जब चारों वर्ण मनुष्य को छोड औरों में पाए जाते हैं तब आधार जन्मना नहीं होगा। इसको पढने या सुनने से वंचित रखना कदापि उचित नहीं। यूँ कर दिया गया मानो न जाने इसमें ऎसा क्या अनोखा है जिसपर सबका अधिकार नहीं। 

४, शिखा सूत्र चतुर्थ वर्ण के लिए नहीं और वेदाध्ययन हेतु वह जरुरी है - उपनिषद साहित्य में शिखा सूत्र (जनेऊ), संध्या, अष्टांग योग की परिभाषा समाज के सामने नहीं रखी गई। दो एक जगह पूछने पर उत्तर मिला - 'यह सिद्धों के लिए है जनता के लिए नहीं' - - वाह क्या दुकानदारों है। ज्ञानमयी शिखा को असली शिखा मानता है उपनिषद बालों के गुच्छे को नहीं। चैनल में प्लेलिस्ट है वेद पर - - उसे तनिक सुनें।

५. नारी वर्ग गायत्री मंत्र नहीं जप सकता - - क्योकि अगर गायत्री छन्द पर आधारित पंक्ति जिसे गायत्री मंत्र कहते हैं, का जाप करले तब वह माँ नहीं बन सकती। देखा जाए तो इस प्रक्रिया में पुरुष पहले आता है क्योंकि वीर्य उत्पन्न उसके शरीर में होता है। केवल बाकी उपकरण न होने के कारण नारी की आवश्यकता होती है। वे उसके शरीर में होते हैं। प्रश्नोंपनिषद में इसीका उल्लेख है। यह सांकेतिक शैली के द्वारा उपरोक्त तथ्य समझाया गया है। गायत्री जप से पुरुष सुरक्षित रहता है तो नारी क्यों नहीं रह सकती।

६. वेद में केवल शाकाहार तथा गौ दूथ की प्रशंसा है - - अष्टका श्राद्ध, सौत्रामणी यज्ञ जैसे कई कर्मकांडों में चुनिन्दा पशुओं की बलि देकर प्रसाद रूप में ग्रहण का विधान है राजवंश और क्षत्रियों के लिए। भागवत तक में कथा मिलती है जिसके अर्थ को कईयों ने घुमा दिया है। भागवत वाली प्लेलिस्ट में ३ - ९ स्कंध वाला वीडियो सुनें। 

दूध के मामले में हाल यह है कि कथाकार नहीं बतलाते की कृष्ण गायों के साथ भैंस और बकरी चराया करते थे। चरवाहों के समाज में यह साधारण बात है। भेड बकरी का उल्लेख उपनिषद में है किसानों से संबंधित उपासना में - छान्दोग्य उपनिषद। भैंस का दूध और उससे बना घी क्षत्रियों तथा कठिन शारीरिक श्रम करने वालों के लिए उत्तम है। इन दो के लिए मांसाहार की छूट है। इसका चरित्र या तामसी स्वभाव से संबंध नहीं। अन्य आहार लेनेवाले चरित्रहीन निर्दयी कालाबाजारी विश्वासघाती आदि होते ही हैं। अपनी-अपनी हठधर्मिता वश इस विषय पर लोग एक तरफा विश्लेषण करते हैं। संस्कृत व्याकरण के लचीलेपन के चलते शब्दार्थ पलटना उचित नहीं। 

७. वेद अपौरुषेय हैं - - 
 वेद को अपौरुषेय कहने के पीछे यही नियम है कि जो वस्तु जैसी है उसे वैसा ही समझना। सुपारी को सुपारी समझना अपौरुषेय ज्ञान है और गणेश समझना पौरुषेय या प्रयोजन हेतु पुरुष रचित ज्ञान। समाज में प्रचलित परिभाषा, की जिसका रचयिता कोई नहीं वह ज्ञान अपौरुषेय है, एक सोची समझी कूटनीति का फल है। इसके पीछे भौतिक सुखों की अदम्य लालसा काम कर रही थी।

८. वेद भौतिकवाद से ओतप्रोत - - - 
  चारों वेद में भौतिक सुखों की लालसा से ओतप्रोत प्रार्थनाएं हैं यानी येन-केन-प्रकारेण वही हाय- हाय। यहां तक कि शत्रु को सपरिवार मारने कि विनती की गई है। उपासना के नामपर लेन देन वाली भक्ति को महिमामंडित किया गया है। जैसे - हम यह आहुति दे 
रहे हैं आप वह काम कर दें या फला काम करने के लिए यह आहुति दी जा रही है। देह निर्वाह हेतु रोजी-रोटी का साधन सबको चाहिए, परिश्रम से अधिक या उसके बराबर प्रार्थना करना उचित काम हो सकता है,उसके लिए हवनादि करना भी उचित हो सकता है पर उसके उपरांत यह कहना कि भारतीय संस्कृति भौतिकवाद से परे है यह उचित नहीं। इसी आधार पर चार्वाक को मौजमस्ती, सुखवादी, जडवादी, भौतिकवादी दर्शन कहकर उसका खंडन किया गया। जबकि लक्ष्मी पूजन, श्रीयंत्र अराधना आदि से लेकर अर्गला स्तोत्र, रुद्रं, जैसे सैकडों स्तोत्र भोतिकता का खुलकर समर्थन करते हैं। अनियंत्रित कामनाओं का अंबार का समर्थन चार्वाक दर्शन तक ने नहीं किया जबकि स्तोत्र उनसे भरे हुए हैं। पूरा-पूरा कर्मकांड वाला भाग भौतिकता के लिए है। 
इसका सदुपयोग - दुरुपयोग दूसरा विषय है। यह अध्यात्म को साथ लिए चलती है यह और बात है।
 आवश्यकता न्यूनाधिक हो सकती है पर उससे परे कोई नहीं। सनातन या वैदिक धर्म के नाम पर इसकी निंदा नहीं करनी चाहिए। केवल वर्तमान युग ही अर्थ प्रधान नहीं, यह तो पहले से ही परम्परा चली आ रही है। राम जी द्वारा अपने समय का जो चित्र खींचा गया था उसका प्रमाण योगवशिष्ठ में है। प्रश्नों के माध्यम से जो समस्याएं उठाई गई वे आज भी जीवित हैं। इसपर चर्चा कभी और की जाएगी आज हम वेद के सार पर ध्यान देते हैं। 'वेदांतो नाम उपनिषद् स प्रमाण' - यानी वेद का सार है उपनिषद्, कोई कोई वेदांत का अर्थ वेद के अंतिम अध्याय से लगाते हैं, यह उचित नहीं है क्योंकि दर्जनों उपनिषद् अलग अलग जगहों पर हैं । यह दुर्भाग्य ही है कि इस पर ध्यान नहीं दिया गया । वेद के रूप में जो भी प्रकाशित सामग्री है उनमें उनमें केवल ईशावास्योपनिषद् को संहिता का भाग बताकर रखना और बाकियों को अलग कर देना उचित नहीं है । कुछ विद्वानों का कहना है कि अन्य उपनिषदों में इतिहास या कथा का समावेश है अतः वे साथ में प्रकाशित नहीं हो सकते। अगर वेद को प्रभु कि मुर्ति या ज्ञान की मुर्ति सही में मानते हैं तब प्रभु को इतना अधिकार होना ही चाहिए कि वह किन - किन तरीकों से अपनी बात समझाए ।

उपनिषद् यानी समीप बैठकर उपयोगी बातों का श्रवण करना। वे आवश्यकता के अनुसार बतलाई जाती हैं। अगर हम वेद को प्रभु का रूप मानते हैं तब उन्हें इतना अधिकार होना चाहिए कि वे योग्यतानुसार समझाएं। कहीं क्लिष्ट तो कहीं कथात्मक शैली में एक ही बात समझाई जा रही है। कुछ स्थानों या व्यक्तियों के नाम आ जाने मात्र से इतिहास का अंग नहीँ बन जाती। पूरा साहित्य अलग- अलग काल खंड में लिखा गया है। आपसी तालमेल या संगति हेतु सूत्र दिए गए हैं जिनके आधार पर जांचने का अधिकार दिया गया है। उससे यह प्रमाणित हो जाता है कि किसी ग्रन्थ का भाग या पूरा ग्रन्थ ही वैदिक साहित्य का भाग है या नहीँ है।

कुछ विद्वानों के अनुसार ब्रह्मसुत्र में दिए गए उपनिषद् ही प्राचीन है या आदि शंकराचार्य जी ने जिनपर भाष्य लिखा वे ही ग्रहणीय हैं। यहां यह बतलाना आवश्यक है कि उनके अन्य ग्रन्थ भी उपनिषदों पर ही आधारित हैं। भले ही कुछ एक मे कई उपनिषदों का सार हो पर हैं उपनिषद् ही आधार। जैसे शारीरकोपनिषद है आधार तत्व बोध का, तेजोबिन्दूपनिषद् आधार है अपरोक्षानुभूति, आदि। जिनपर भाष्य है वे ही कहाँ ठीक से समझाए जाते हैं ? विशेषतः छान्दोंग्य में छ प्रकार की गायत्री के विषय में नहीं बतलाया जाता समाज को और केवल कक्षा तक बात सिमट कर रह जाती है । वृहदारण्यक में गायत्री के चार पाद की जानकारी भी कक्षा के अन्दर ही रहती है। क्यों पौराणिक रूप प्रचारित किया गया? इसकी जानकारी हेतु Gayatri - In the eyes of Upanishads वाला पोस्ट देख लें । akshaygroundreality.blogspot.com 

उपनिषदों का ज्ञान सबके अन्दर है और उसकी अनुभूति होती है विवेक के द्वारा जिसका प्रयोग कोई भी कर सकता है। जरूरत केवल उसके प्रयोग की है। 
इन जैसे कुछ अवहेलित उपनिषदों को तनिक देखा जाए ताकि उनसे हम जैसे मूढ मति भी कुछ सीख सकें। 

तेजोबिन्दूपनिषद् के खास बिन्दु :
       १ संपूर्ण जगत ब्रह्ममय है ,इस निश्चय के उपरांत इन्द्रियों को वश में रखना ही यम है। 
        २ अपने स्वरूप में स्थित हो कर संसाराकार वृत्तियों में न बहना ही नियम है। 
         ३. चैतन्य तत्व का साक्षात्कार (अनुभव ) करने के बाद नाम रूप प्रपंच का त्याग ही असली त्याग है। 
         ४ स्वरूपस्थ साधक अन्दर से मौन तथा एकांत में रहता है और उसे ही अंगों की समता सिद्ध होती है। (हम बहुधा बाहर से रहने का दिखावा करते हैं और भ्रम पालते हैं कि अन्दर भी शान्ति है या केवल वाणी के मौन को मौन मानते हुए बाकी अंगों के साथ आराम से व्यवहार करते हैं या निष्क्रिय रहने को समता मानते हैं)  
        ५ आनन्द स्वरूप ब्रह्म ही काल है और जगत का अधिष्ठान न होते हुए भी अधिष्ठान वत् दिखना ही आसन है। 
        ६. द्रष्टा , दर्शन और द्दश्य के भेद का अभाव ही द्दष्टि है केवल नासिका के अग्रभाग को देखते रहना द्दष्टि नहीं है । 
          ७. सर्व पदार्थों में ब्रह्म भावना और इन्द्रिय जनित वृत्तियों को रोकना ही प्राणायाम है। प्रपंच के मिथ्यात्व का निश्चय ही रेचक है। सर्वत्र एक ब्रह्म है , यह वृत्ति पूरक प्राणायाम है। चलायमानता से रहित वृत्ति कुंभक है । 
   ८. चेतन तत्व में चित्त लगाना ही प्रत्याहार है। 
    ९. जहाँ -जहाँ मन जाए वहाँ -वहाँ ब्रह्म का बोध होना ही धारणा है। 
१०. समस्त विषयों से वैराग्य अंकुरित होने पर ध्यान की अवस्था शुरू होती है । जब इसमें दृढता आती है तब वह स्थिति समाधि कहलाती है । 

ब्रह्मबिन्दूपनिषद् के रोचक बिन्दु :
१. विषयासक्त मन बंधन और विषयों के आधीन न रहने वाला मन मुक्त है। 
२. विषयों के संकल्प से दूर रहने पर ही मन का लय होता है । यही ज्ञान है, बाकि जो कुछ है वह ग्रन्थ का विस्तार मात्र है । 
३. मेधावी व्यक्ति ग्रन्थ के सार को ग्रहण करने के बाद पूरे ग्रन्थ को त्याग दे जैसे धान्य चाहने वाला अन्न लेकर पुआल को खलिहान में छोड देता है । 
४. असली ज्ञान बाहरी वेषभूषा पर निर्भर नहीं है । 

पैंगलोपनिषद् के रोचक बिन्दु :
१. अत्यंत चंचल जीवन में चेतन तत्व को जान लेना चाहिए और शास्त्रों के जाल का त्याग कर उस तत्व पर टीके रहने का अभ्यास करना चाहिए । 
२. आत्मज्ञान पश्चात वेद पढने से कोई लाभ नहीं । यानि वेद का उद्देश्य स्वरूपानुसंधान करवाना ही है ।
अब हम ब्रह्मसूत्र के भाष्य में लिखित उस पक्ष के अनुसार उपनिषदों को देखेंगे जहाँ बाहरी तामझाम का संबंध केवल शरीर से माना है । उनका रिश्ता आत्म ज्ञान से नहीं है । ज्ञान उनपर निर्भर नहीं है । जिनको ज्ञान की लालसा है उनके लिए यह जानना जरूरी है । सर्वसाधारण हेतु भी यह जानकारी जरूरी है क्योंकि बाहरी तामझाम के चलते समाज लहुलुहान हो चुका है । 
परब्रह्मोपनिषद् के कुछ रोचक बिन्दु : 
१. जैसे धागा मोतियों में पिरोया हुआ रहता है वैसे ही यह नाम रूपात्मक प्रपंच में ब्रह्म । उस ब्रह्म रूप धागे को धारण करने वाला योगी ही ब्राह्मण है, यति है। (यह कोई विरोधाभास नहीं है पूरा वैदिक वाङमय इसी के पक्ष में है)। 
२. बुद्धिमान बाहरी शिखा सूत्र के बदले ब्रह्म रूप सूत्र को धारण करे। 
३. ज्ञानमयी शिखा परम पवित्र है और वही शिखा है। अग्नि की ज्वालारुप शिखा अग्नि से भिन्न नहीं है । अग्नि को अलग से जलाने की जरूरत नहीं है वैसे ही अलग से केश धारण करने जरूरत नहीं है।
उपरोक्त तथ्य नारदपरिव्राजकोपनिषद् उपदेश ३,मन्त्र ७७,७९ में भी है । 

परमहंसोपनिषद् के रोचक बिन्दु :
१. आत्मा - परमात्मा में कल्पित भेद को भंग करना ही संध्या है। यही हमारी शिखा और यज्ञोपवीत है । 
२. सर्व लौकिक कामनाओं का परित्याग करके अद्वैत में स्थित होना तथा आत्मज्ञान रूपी दण्ड को धारण करने वाला ही दण्डी कहलाता है । 
२. इससे रहित केवल काठ के दण्ड को धारण करने वाला पेट हेतु वेष बनाता है । 

मैत्रेय्युपनिषद् के कुछ बिन्दु :
१. केवल कर्मों के त्याग का नाम या बाहरी विधि से लिए गए सन्यास का नाम सन्यास नहीं है । जीव- ब्रह्म के मध्य जो सन्धि है उसके अभाव रूपी अभेद ज्ञान को ही सन्यास कहा है। 
२. मोह रूपी माता की मृत्यु तथा ज्ञान रूपी सन्तान उत्पन्न होने से दो प्रकार का सूतक लगा है। हम किस प्रकार से संध्या उपासना करें । 
३. हृदयाकाश में चैतन्य रूपी सूर्य उदय हुआ है । सर्वदा एक जैसा प्रकाश रहता है । हम किस प्रकार संध्या उपासना करें । 
४. तत्वचिन्तन उत्तम, शास्त्र चिन्तन या अध्ययन जिसमें केवल शुष्क बौद्धिकता या कोरा तर्क हो वह मध्यम, मन्त्र चिन्तन या जप अधम और तीर्थाटन अधमाधम है। मन का विषय के साथ न बहना ही ज्ञान है और यही मोक्ष है । वह कोई अलग से प्राप्त होने वाली वस्तु या स्थिति नहीं है । शास्त्रों का प्रयोजन अविद्या या उपाधि प्रेम पर चोट करना है और इतना ही समझना है, बाकी ग्रन्थ का विस्तार है और उसमें क्या उलझना ?
ऐसी काम लायक बात समाज से छुपा लेना बौद्धिक आतंकवाद दर्शाता है। अगर यह सोच लें कि यह तथ्य आम जनों के लिए नहीं है तो वह एकतरह का आतंक ही है जो केवल अपनी दाल गलाने के चक्कर में है। समाज और संसाधनों पर अपनी पकड़ बनाय रखने की चाल है। 

श्रीजाबालादर्शनोपनिषद् (कहीं - कहीं इसका नाम संन्यासोपनिषद भी है) के कुछ बिन्दु :
१. आत्म रूपी तीर्थ को छोड़कर बाहर के तीर्थों का सेवन वैसा ही है जैसे हाथ में प्राप्त महारत्न का त्याग करके कॉच की तलाश । 
२. सब तीर्थों में जल(यानि लगभग एक जैसी चीजें ) तथा देव प्रतिमा काष्ठ तथा पाषाण से निर्मित हैं । (भगवान् को अन्दर न खोजकर बाहर खोजना एक अन्तहीन खोज है) । 
जो पार करदे वही तीर्थ है। नदी पार करने के लिए नाव तीर्थ है। दसियों स्थलों को अर्थ शास्त्र की दृष्टि से तीर्थ रूप में प्रचलित किया गया है। इसमें कोई दोष नहीं है क्योंकि यूँ तो लोग आएगें नहीं और धर्म के नाम पर आ जाएंगे । पर इसके चलते वहाँ की जमीन के दाम या अन्य वस्तुओं के मुल्य काफी बढ़ गए । यह कलियुग की देन नहीं है । रामजी के जमाने से यही होता आया है किसी न किसी रूप में । तीर्थ वास की ललक ने धार्मिक स्थलों का व्यवसायीकरण कर दिया है। 
३. आत्मन्यग्नीन् समारोप्य सोsग्निहोत्री महायति । प्रपञ्चमखिलं यस्तु ज्ञानाग्नौ जुहुयाद्यति ।। 
आत्मा रूपी अग्नि के समीप रहने वाला ही अग्निहोत्री है और उसने ज्ञानाग्नि या उपाधि रहित आत्मज्ञान में प्रपंच की आहूति दे दी है।

इन उदाहरणों से यह स्पष्ट हो गया कि उपनिषदों में खजाने की कमी नहीं है । कमी उस भावना में है जो वैदिक साहित्य के नाम पर केवल अपनी दाल गलाना जानते हैं । अगर आदि शंकराचार्य के काल को ही इस मामले में प्रमाण मानें तो इन उदाहरणों के द्वारा भी इन उपनिषदों की प्राचीनता प्रमाणित होती है । उनके प्रकरण ग्रन्थ इन्हीं पर आधारित हैं। इस स्वस्थ सार्थक संवाद द्वारा यह समझ में आ गया की मोतिकता की प्रचुरता ने आदि शंकराचार्य जी को वेद पर सीधे-सीधे लिखने से रोक लिया। 



गायत्री मंत्र और आज का समाज

समाज में प्रचलित मान्यताएं असल में कितनी सही, सार्थक व सर्वभूत हितो रता की भावना अपने में संजोए रखती हैं, यह विचारणीय विषय है. विश्लेषण सामर्थ्य सबके पास समान है. इसका उपयोग तो दूर, इसे दबाने में मानव जाति निपुण है. पूर्वाग्रह या मताग्रह ग्रस्त मानसिकता येन-केन-प्रकारेण अपनी सत्ता कायम रखना चाहती है. भाषा, संस्कार, क्षेत्र के प्रति अन्य जंतु सजग रहते हैं. यहां मानव का एकाधिकार नहीं है. भले ही मन-बुद्धि अपनी प्रारंभिक अवस्था में हो, पर वह जंतुओं से लेकर पेड़-पौधों तक में है. मानव में विशेषता यही है कि वह अपने विकसित चिंतन का लाभ स्वयं ए‍वं औरों के आंतरिक-बाहरी विकास में लगा सकता है. यही नहीं, वह इसके द्वारा विकास रोक भी सकता है. स्वयं का खोखलापन ढकना जानता है. विश्लेषण करनेवालों का विरोध करता है. उनके विचारों को नकारात्मक कहने में गर्वबोध करता है. मात्र रोज़ी-रोटी के लिए उपाधियां या मानपत्र बटोरनेवालों के वास्ते ही संत कबीरदास ने कहा था -
  पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय ।
  ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।।

इसका अर्थ बहुधा अनपढ़ या निरक्षर होने से लगाया जाता है. कागज़ी विद्वान डट कर विश्लेषण का विरोध करते हैं. यूं समझाया जाता है मानो शिक्षा का आंतरिक विकास से लेना-देना नहीं है और वह मात्र पेट भरने का साधन है. ऐसे लोग तर्कशास्त्र की कक्षा में प्रश्न तक पूछने नहीं देते.
आचार्य मधुसूदन सरस्वती जी ने गीता पर टीका लिखते हुए अपने परम गुरु आदि शंकराचार्य जी के मत से तनिक भिन्न मत प्रकट कर दिया, गीता को समझाते हुए उनकी परंपरा में इसे गलत दृष्टि से देखा जाता है. उन्होंने अपने गुरु का खंडन नहीं किया, वरन एक तुलनात्मक दृष्टि से अपना चिंतन प्रकट किया. इसमें दोष नहीं है, पर यह समझ सबमें पनप नहीं पाती. विश्लेषण का मान रखते हुए मधुसूदन जी ने अपनी पुस्तक अद्वैत सिद्धि का खंडन करनेवाले अपने शिष्य रामाचार्य की प्रशंसा की. शिष्य भी कम नहीं था. उसने ‘तरंगिणी’ नामक टीका में खंडन किया और दक्षिणा के रूप में अर्पित कर दिया. आखिरकार चिंतन-मनन, विश्लेषण बुद्धि के दायरे में आते हैं और बुद्धि शरीर में रहती है. उसके साथ बहना ही पशुता है. यह समझ जिनमें होती है, वे ही विचारवान हैं. इस स्थिति पर संत कबीरदास जी ने कहा -
             आचारी सब जग मिला, बिचारी मिला ना कोय। क्रोटि अचारी वारिये, एक बिचारी होय ।।
             मानुष सोइ जानिये, जाहि विवेक बिचार । जाहि बिवेक विचार नहिं, सो नर ढोर गंवार ।।

समष्टि योजना के अधीन सभी अपनी भूमिका निभा रहे हैं. हमारी भूमिका विश्लेषण की है. बिना लाग-लपचेड़ के उसे किया जाय. स्वधर्म निभाते हुए सहसा ध्यान गया स्वामी रामसुखदासजी के वचन पर, जहां उन्होंने बजरंग-बाण के पाठ का निषेध किया है. अपने इष्ट को बाध्य या विवश करना धर्मसम्मत नहीं है. दूसरे कीलक द्वारा प्राप्त भोग सद्गुण विनाशक तो होता ही है और साथ में दूसरी या तीसरी पीढ़ी तक विनाश का कारण बनता है. ऐसे कई परिवार मिले, जो अपने इष्ट को बाध्य करके या कीलक प्रयोग द्वारा प्रभुतासंपन्न तो हो गये, पर बाद में पछताना पड़ा. कीलक एक तरह का तंत्र-प्रयोग है, जिसके द्वारा भूमि या भवन-शुद्धि करवाई जाती है. गीता के अनुसार तामसी वृत्तिवाले ही ऐसा करते-करवाते हैं. स्तोत्रों के मामले में कीलकवाले कदापि नहीं पढ़ने चाहिए.
मतभेद की आड़ में विश्लेषण न करके कई लोग पाठ करने को कहते हैं । वे ढेरों मुसीबतों से घिरे रहते हैं पर इस तरफ ध्यान नहीं देते । 

गायत्री मंत्र : स्त्रियों के लिए निषेध नहीं .

 गायत्री वैदिक छंद है. इसके आधार पर लिखी गयी पंक्ति को गायत्री-मंत्र कहते हैं. उपनिषदों द्वारा समर्थित 36 गायत्री-मंत्रों का पाठ कोई भी कर सकता है. यह प्रशस्ति-गान के रूप में वैदिक वांगमय में उल्लिखित है. ईश्वरीय सत्ता के विभिन्न रूपों, उनके वाहनों तथा आयुध पर मंत्र सबके लिए है. महानारायणोपनिषद में कुछ मंत्र एक साथ दिये गये हैं. शेष मंत्र उनसे संबद्ध उपनिषदों में हैं. उनमें भी कई स्पष्ट रूप से लिखे हुए नहीं हैं. प्रभुकृपा से उन्हें समझा जा सकता है. कहीं भी ना तो इसे नारियों के लिए वर्जित माना गया है, ना ही यज्ञोपवीत उपरांत ही इसका पाठ किये जाने का उल्लेख है. कर्मकांड वाले शास्त्रों की बात और है. गायत्री के मामले में वेद ही प्रमाण है. ऊपर से यह कहना की सही उच्चारण करने से नारियों की प्रजनन क्षमता शेष हो जाएगी एक बचकाना कुतर्क है । 

अब ज़रा देखें कि इस पर आदि शंकराचार्यजी क्या कहते हैं. सामवेद अंतर्गत छान्दोग्योपनिषद के 3, 12, 2-5 पर भाष्य लिखते हुए उन्होंने गायत्री को मंत्र नहीं माना. परंतु उनके द्वारा स्थापित पीठ और परंपरा का एक वर्ग इसे मंत्र मानता है, ‘स्वाहा’ बोल कर हवन करता है एवं नारियों, जनेऊहीन हेतु इसे अपठनीय मानता है. लगे हाथों यह भी जान लें कि महाभारत के सनत्सुजातीय-पर्व पर भाष्य लिखते हुए उन्होंने वेदज्ञ को ब्राह्मण माना है. उनके समर्थक कुछ और मानते हैं. मज़े की बात यह है कि गीताप्रेस के प्राचीन संस्करण में वह पंक्ति है, परंतु बाद के कई अन्य प्रकाशकों ने उसे रखा ही नहीं. अत: आगे बढ़ने से पहले यह जान लें कि उपरोक्त उपनिषद में क्या लिखा है, क्योंकि वेद में यह प्रशस्ति-गान के रूप में है.

छान्दोग्योपनिषद(सामवेद,तलवकार ब्राह्मण) - अध्याय 3, खंड 12, मंत्र 1-5.

गायत्री वा इद (gM) सर्वंभूतं यदिदं किं च वाग्वै गायत्री वाग्वा इद (gM) सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ।।1।।.....

 भाष्य - गायत्री वा इत्यवधारणार्थो वैशब्द: ।
इदं सर्वं भूतं प्राणिजातं यत्किंच स्थावर जंगमं वा तत्सर्वं गायत्र्येव । तस्याश्छन्दोमात्राया: सर्वभूतत्वमनुपपन्नमिति गायत्रीकारणं वाचं शब्दरूपामापादयति गायत्रीं, वाग्वै गायत्रीति ।

गायत्री वै - इस पद में - वै - निश्चयार्थक है. ये समस्त भूत - स्थावर जंगम प्राणी हैं, वे सब गायत्री ही हैं. वह छंदमात्र है. सर्वभूतरूप होना संभव नहीं है ; अत: वाग्वै गायत्री - कारणभूत शब्दरूप वाक् को ही गायत्री कहती हैं श्रुति. वाग्वा इदं सर्वं भूतं - वाक ही समस्त भूतों का गान - शब्द यानी नामोल्लेख करती है जैसे यह गाय है आदि ; तथा यही रक्षा - इससे मत डर. वाणी द्वारा भी रक्षा की जाती है.

या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिव्यस्या(gM) हीद(gM) सर्वं भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव नातिशीयते ।।2।।
प्राणियों से संबंध तभी गायत्री = पृथ्वी में सब स्थित है.

या वै सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन्पुरुषे शरीरमस्मिन्हीमे प्राणा: प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयते ।।3।।
शरीर = इसी में प्राण स्थित है, शरीर पृथ्वी का विकार है. भूत शब्द वाच्य प्राण (वायु) प्रतिष्ठित है यानी उसको अलग से प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं है.

यद्वैतत्पुरुषे शरीरमिदं वाव सा यदिदमस्मिन्जन्त: पुरुषे हृदयमस्मिन्हीमे प्राणा: प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयते ।।4।।
प्राण हृदय में स्थित है. अत: वह गायत्री है.

ऐषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री तदेतद्दचाभ्यनूक्तम् ।।5।।
उपनिषद के अनुसार भूत, वाक, पृथ्वी, प्राण हृदय, शरीर -- छह प्रकार की गायत्री हैं. उसके चार पाद यानी चार चरण हैं. इस तरह कुल 24 अक्षर हैं. परिचय हेतु वाक् या वाणी की प्रतिष्ठा है. इससे जीवादि का परिचय मिलता है. अपरिचितों को जानने या उनसे संभल कर बर्ताव करने की शिक्षा मिलती है. इसके लिए वाणी ज़रूरी है. वह प्राण के भरोसे काम करती है. देह की दृष्टि से वायु का नाम पड़ा प्राण. उसको जगह चाहिए. वह हृदय में रहता है. हृदय देह में और देह पृथ्वी में. उपनिषद में यह तृतीय स्थान पर है. वहां समस्त भूतों यानी जीवों अर्थात् उनकी देहों को ध्यान में रखा गया है. यहां भी बात घूम कर देह या शरीर पर ही आती है.

समाज में प्रचलित एक गायत्री मंत्र के कंपन और प्रभाव पर चर्चा अधिक होती है. उसे सूर्यदेव की गायत्री कहा जाता है. सूर्यदेव पर दो गायत्री मंत्र और हैं.

मंत्रों में स्वयं कंपन नहीं होता - अष्टांग-योग का अभ्यास चाहिए. सतत अभ्यास, पाठ व ध्यान से अंदरूनी शक्ति का आभास होता है. यह कठिनता भी उपनिषद को पसंद नहीं. वह साधना को सरल बनाने के पक्ष में है. इसीलिए वह छह प्रकार की गायत्री की बात कह कर सहज मार्ग बतलाता है. उन पर ध्यान देने से सिद्धियां जल्द मिलती हैं और टिकती भी हैं. रोचक यह है कि वेद में ही एक पंक्ति (तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् )अनेक बार आयी है. जहां पर भु:, भुव: स्व: लगाया गया है, वहां भी सृष्टि के स्रष्टा, संचालक व संहारक को धन्यवाद ही दिया गया है. कहीं भी भिन्न अर्थ नहीं है. इसी आधार को उपनिषदों के अलग-अलग गायत्री मंत्री पुष्ट करते हैं. यह पक्ष भी सामने रखा जाना चाहिए था.

पूरे वैदिक वांगमय में कोई भी ग्रंथ तभी प्रमाण है, जब तक वह वेदानुकूल है. गायत्री के मामले में पुराण पूरे प्रमाण नहीं हैं, क्योंकि वे उपनिषद का समर्थन नहीं करते. देवी-भागवत में यह कुछ और रूप में वर्णित है. उस पुराण का विषय ही मातृरूप को प्रधानता देना है. उसे सिद्धांत नहीं माना जा सकता. यदि कोई मानने पर अड़ा हो, तब कहना पड़ेगा - वह शरीर की दृष्टि से नहीं वरन वात्सल्य की दृष्टि से है. वात्सल्य किसी में भी हो सकता है. जगज्जननी का अर्थ इसी रूप में लगेगा. वात्सल्य या ममता हेतु मादा शरीर की अनिवार्यता नहीं है.

 गायत्री धार्मिक राजनीति का एक स्रोत बन गया. इसे किस्मत की कुंजी के रूप में प्रचारित किया गया. यों लगने लगा मानो यह जीवन की आखिरी उपलब्धि है. इसके बिना सब बेकार है. इसे कर्मकांड का रूप देकर, दसियों पुस्तकें लिखी गयीं. इसे दैनिक तीन बार तिहराने को कहा गया - त्रिकाल-संध्या उपासना के नाम पर इसका प्रचार हुआ. धार्मिक राजनीति ने, गायत्री को, देवी में परिवर्तित कर दिया है. मूर्तियां और मुद्रित-चित्र बाजार में उपलब्ध हैं. महिलाओं को इसे जपने से रोका गया. हालांकि यह रोक समाज-सुधारकों ने काफी हद तक हटाई, परंतु वे भी एक ही पंक्ति का प्रचार करते रहे और पौराणिक अर्थ को महिमामंडित किया. इनसब का परिणाम यह हुआ कि लोग हर किसी पर गायत्री मंत्र बनाने लग गए । 

लकीर का फकीर नहीं बनाते उपनिषद

मनन का विषय यह है - गायत्री मंत्र को जप कर कितने आविष्कार हुए? हर क्षेत्र की महाविभूतियां क्या इसे प्रतिदिन तिहराती थीं? क्या उनकी सफलता परिश्रम या पुरुषार्थ पर केंद्रित नहीं थी? यदि यह इतना शक्तिशाली था, तब भारत सदियों तक पराधीन क्यों रहा? पूर्वकाल के लोग तो और भी विधि-विधान से अनुष्ठान या पुरश्चरण किया करते थे. स्वतंत्रता पश्चात भी इसे जप कर कितनों ने क्या इजाद कर लिये? इसे महिमामंडित करनेवाली कहानियों के पीछे का सच जानने कि कोशिश ही नहीं हुई. इसका वाकई यदि इतना प्रभाव होता, तब इसे जपनेवाले के आस-पास का वातावरण ही पलट जाता. कलियुग को दोष देना व्यर्थ है. अब यह तोता-रटंत की पुरानी आदत छोड़ देनी चाहिए. उपनिषद लकीर का फकीर बनाने के पक्षधर नहीं हैं.
सफलता के पीछे कारण होते हैं. मात्र मंत्र जपने का गुरुमंत्र बता दिया जाता है. प्रचार माध्यमों को प्रचार से मतलब - यही कि अन्य धर्मों के विद्यार्थियों ने मंत्र जपा और सफल हो गये - कुछ विद्यार्थी भी अपनी लगन को अनदेखा कर औरों की बातों में आकर कुछ का कुछ बोल जाते हैं. सफलता-विफलता के ढेरों कारण होते हैं. दो-एक माध्यमों को लेकर थेई-थेई करना उचित नहीं है.

कैसे शापित हो गया गायत्री-मंत्र ?

क्या गायत्री-मंत्र शापित है? प्रचलित मान्यताओं के अनुसार इसे कहीं एक तो कहीं तीन ऋषियों ने शाप दिया. उस पर कथाएं हैं और सच प्रमाणित करने हेतु बड़े ऋषियों के नाम जोड़ दिये गये. यह कपोल-कल्पना वेदोक्त या वेदसम्मत कदापि नहीं है. जब छह प्रकार की गायत्री का वर्णन स्वयं वेद में है और इसे छंद माना गया है, तब शाप कौन और किसको देगा भला? प्रशंसासूचक, प्रशस्तिवाचन या महिमामय वाक्य को कोई शाप देने की नासमझी नहीं दिखा सकता. जब शापित ही नहीं है, तब उसे मुक्त करने का दावा भी उचित नहीं है.

मनमाने तरीके से देव-देवी की कल्पना ने वेद-सम्मत ईश्वरीय सत्ता एवं उसके अवतारों को नकारा ही नहीं, वरन हेय तक प्रमाणित करने का प्रयास किया है. सबसे बड़ा उदाहरण हैं स्वर्गाधिपति इंद्र. उनके विषय में पुराण नकारात्मक चित्रण से भरे हुए हैं. वराह, कूर्म, मत्स्य तो ब्रह्मा के अवतार माने गये हैं. प्रजापति भी ब्रह्मा के प्रतिनिधि के रूप में सृजन-कार्य किया करते थे. कहीं-कहीं मत्स्य को भी प्रजापति का अवतार माना गया है. इसमें कोई विरोधाभास नहीं है. विष्णुजी की प्रधानता बढ़ने से वे सब उनके खाते में डाल दिये गये. सारे पुराण व उप-पुराणों को मनचाहे ढंग से तैयार किया गया एवं मुनिवर वेद व्यास के नाम से प्रचारित करवा दिया गया. ऐसे में गायत्री कैसे अछूती रहे.

आदि शंकराचार्य के चलते लोगों का रुझान रुद्रपीठ की ओर अधिक हुआ. इसमें गणेशजी अग्रपूज्य हैं. अधिकतर ग्रंथ गणेश-वंदना से शुरू हुए. उनसे पहले रचित ग्रंथों में ऐसा नहीं है. अब त्रिकाल-संध्या के चलते अर्धरात्रिवाली चतुर्थ संध्या अंधेरे में ही रह गयी. जबकि वह संक्षिप्त रूप से देव्युपनिषद में वर्णित है. यहां एक शंका और उठती है. इस लेख में अथर्ववेद का नाम क्यों नहीं आया? उच्चारण-शैली के अनुसार वेद तीन है या युं कहें कि छंदानुसार तीन और सामग्री के अनुसार चार. अथर्ववेद भी गायत्री-मंत्र के बारे में कोई अलग मत प्रकट नहीं करता.
वैदिक उपासना या साधना सबके लिए है. उसकी मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए.

कलियुग को पाँच स्थान रहने के लिए दिए गए

                 कलियुग को पाँच स्थान 

(धन्यवाद देते हैं राजस्थान के आचार्य अजय पुंडीर को जो सत्संग के माध्यम से नाना प्रसंग उठाते हैं। उनको कहीं यह विवेचना पढने सुनने को नहीं मिली जो पाँच स्थान देनै का विश्लेषणात्मक उत्तर दे) 


राजा परीक्षित ने कलियुग को पाँच स्थान रहने के लिए दिए - जुआ, मद्य, नारी संग, हिंसा तथा सोना। पाँचो स्थान हर समय थै, है, रहेंगे क्योंकि इनमें सभी मनुष्यों का पूरा जीवन समाया हुआ है। इससे यही प्रमाणित हुआ कि कलयुग कहाँ नहीं है। तब विकल्प क्या है बचने का - - अन्दरूनी अनुसन्धान या इच्छाओं के संग न बहना या अपने स्वरुप में स्थित रहना ही कलयुग से बचना है। यह कठिन है असंभव नहीं। 

चूँकि शब्दार्थ से बात समझ में नहीं आएगी अतः लक्ष्यार्थ जानना जरूरी है। पहले कलियुग की परिभाषा देखे। चारों युग न्यूनाधिक रुप में हर समय और हर जगह रहते हैं। जहाँ कलह, क्लेश, हिंसात्मक प्रतिस्पर्धा का बोलबाला हो वहाँ कलियूग है। 


जुआ / द्युत :- चौसर या चोपड समय व्यतीत करने वाला खेल है जो बिसात, गोटियाँ और पासे या कौडी से खेला जाता है। यह खेल धन, वस्तु, व्यक्ति को दाँव पर लगाने से जुआ कहलाता है और तब इसमे छल कपट प्रधान होता है। पासा या कौडी फेंकने में चतुराई दोनों में जरुरी है। पर उनकी बनावट में अन्दरूनी फेरबदल छल है। 
जीवन चौसर, इन्द्रियाँ गोटियाँ और व्यवहार पासा है। सोच समझकर व्यवहार करना उचित है पर समाज को बाँटना, मन मुटाव बढवाना, अपनी अतृप्त एषणा की पूर्ति हेतु औरों के साथ घृणित व्यवहार जुआ है जो नाना तरीकों से होता है। जैसे शास्त्रों के नामपर छल - मनमानी व्याख्या, तथ्यों को छिपाना, भागवत के नामपर श्रृंगारिकता तथा इधर-उधर की बातें, अप्रामाणिक बातों का प्रचार-प्रसार, पौराणिक प्रसंगों को बिना जाँचे और संगति लगाए बोलना, प्याज लहसुन के नामपर धार्मिक राजनीति, शिखा सूत्र की उपनिषद वाली परिभाषा न बताना, आदि जुआ ही है। 
भारतीय समाज में मुफ्तखोरी के प्रति आकर्षण अधिक है। कई आध्यात्मिक संस्थाएँ और राजनीतिक दल इसके माध्यम से कट्टर समर्थकों की संख्या बढाते हैं। लोगों को आजीविका के बदले मुफ्तखोरी की लत में डुबाए रखना चाहते हैं। (१)
जीवन के हर क्षेत्र में जुआ खेला जाता है। यह और बात है कि अधिकतर लोग समझ नहीं पाते या बहती नदी में डुबकी लगाने के फेर में रहते हैं। तभी समस्याओं के प्रति जागरूकता स्वयं को चर्चित कराने, समर्थकों की भीड जुटाने तथा आभासिय दुनिया के मंचों (सोशल नेटवर्किंग साइट्स) पर पसंद (लाइक), सदस्यता (सब्सक्राइब) तथा सहयोग (सपोर्ट) के लिए कहते रहते हैं। इसीलिए ऐसे जागरुक सतही चिन्तन को सबकुछ समझतै हैं। 


मद्य - सुरा, शराब का लक्ष्यार्थ है नशा और वह आयु, पद, दैहिक बल, धनबल, जनबल, पहुँच, योग्यता आदि का होता है। यह आज नहीं तो कल जीवन को नष्ट करता है। अल्कोहॉल (शराब) का उपयोग सैकडों दवाओं में होता है यानी यह स्वयं में बुरी नहीं। इसका दुरुपयोग मानवीय मूल्यों को नष्ट करने लगता है। यह वैसा ही है जैसे धन स्वयं में अच्छा है और लक्ष्मी के नाना रूपों में सम्मानित होता है। इसका नशा जब सिर पर सवार होने लगे तब विवेक नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है। ऐसी स्थिति हर तरह के नशे के साथ होती है जहाँ येन केन प्रकारेण जीतने की ललक या अपनी श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए औरों को मारने तक में संकोच नहीं होता। ऊपर से ऐसे हजारों उदाहरण मिलते हैं जहाँ व्यक्ति अपनी आजीविका के क्षेत्र में किसी अन्य को आगे बढने नहीं देता। उसके द्वारा नष्ट करवाई प्रतिभाओं पर कोई नहीं रोता। यहाँ तक कि पैसेवालै अपने गरीब रिश्तेदार को मन से पसंद नहीं करते। जिस तरह मुनि अष्टावक्र को देख राजा जनक की सभा हँसने लगी थी उसी तरह का व्यवहार अभीतक हो रहा है समाज में फिर चाहे ऐआध्यात्मिक संस्था ही क्यों न हो। बाहरी या दैहिक आकर्षण के नशे में आन्तरिक सुन्दरता की बात समय व्यतीत करने का माध्यम बनती है व्यवहार में नहीं उतरढी। केवल गृहस्थ ही नहीं आध्यात्मिक संस्थाएँ तक पीछे नहीं है इस मामले में। तनिक उनको देखा जाए। पुष्कर के महंत स्वामी सोम गिरी कार दुर्घटना में चल बसे। जाँच पर उन्हें नशे में पाया गया और गाडी में शराब की बोतले थी। यह पद का नशा ही है मद्य के नशे के संग। 


अपने कुरूप शिष्य की शिक्षा पूरी होने पर सुन्दर गुरु कह देता है कि 'यह मिशन है आश्रम नहीं', दूसरी जगह मुलायम तरीके से कहा गया कि 'हमारे लोग हँसेगे, बातें सुना सकते है आपको अच्छा नहीं लगेगा। बच्चे आपको देखकर डर जाएंगे। हम अपना सेन्टर कैसे दें'। जगन्नाथ पूरी में सत्संग करने गए एक सफेद दाग वाले साधु को रहने की अनुमति मठाधीश ने दी पर अन्य वरिष्ठ साधु ने आपत्ति उठाई और सचिव ने दूसरे दिन कहीं अन्य जगह रह कर कार्यक्रम में आने को कहा। उस साधु ने मठाधीश द्वारा दी गई अनुमति की बात कहते हुए उनसे मिलने की बात कही पर सचिव ने कठोर तरीके से कहा, 'हम फिर किसलिए हैं। हम यहाँ के सचिव हैं। महाराज ने कहा तो क्या आप तुरंत चले जाइए। चौथे मामले में उत्तराखंड के एक आश्रम के पुस्तकालय में एक साधु को सफेद दाग के चलते पुस्तक नहीं दी गई। देनेवाले व्यक्ति को संकेत से समझा दिया गया हाँलाकि महंत देने की बात कही थी पर तीन-चार घुमानै के बाद जब नहीं मिली तब काम-काज संभाले को पूछा पुस्तक माँगने वाले साधु ने। पुस्तकालय संभालने वाला वहां के अन्य वरिष्ठ साधु के पास गया और उसे संकेत से समझा दिया गया की ये सफेद दाग वाले हैं इन्हें मत देना। समानता वाला बिन्दु है महंत / मठाधीश द्वारा एक बात कहना और दूसरे द्वारा कुछ और। यह गृहस्थ शैली है व्यवहार की - स्वयं मत बोलो अन्य से कहलवाओ। ऋषिकेश मुझे ही सुनने को मिला, 'सफेद दागवालों को ज्ञान नहीं हो सकता और न व्यसनी को'। पढाई का नशा व्यक्ति को भारवाही बनाता है। शिक्षण संस्थाओं वाली दुनियादारी की पढाई हो या आध्यात्मिक प्रायः लोग पचा नहीं पाते। दूसयी ओर अनपढ या कम शिक्षित होने का नशा अधिक भयावह होता है। 



नारी संग - इसकी व्याख्या केवल परस्त्रीगमन तक सीमित कर दी गई जो स्वयं में बौद्धिक हिंसा तथा जुआ का मिला-जुला उदाहरण है। नारियों के प्रति गलत भावना अधिक फैली जैसे वह संस्कृत नहीं बोल सकती, वेद नहीं पढ सकती, गायत्री मंत्र नहीं जप सकती इत्यादि। ब्रह्मचर्य शब्द की व्याख्या तक ठीक से नहीं की गई और नारियों को एक तरह से अपमानित किया गया। यह विशेष रूप से किया गया योग तथा कई संप्रदायों के उन महानुभावों द्वारा। राजतन्त्र के युग में नारी को अधिकतर वस्तु के रुप में समझा जाता था। राजाओं की उसके प्रति विलासिता वाली भावना को सुरक्षित तथा बढाने के लिए आयुर्वेद में अलग से दर्जनों औषधियों का उल्लेख किया राजा - आश्रित वैद्यों ने। ऐसी विचित्र परंपरा में नारी संग संकुचित रुप में रहेगा। 

तब प्रश्न उठता है कि कलियुग को रहने का स्थान देने के पीछे कारण क्या है। भारतीयों में भेदभावपूर्ण लालन-पालन के चलते बेटी के प्रति दो दृष्टि सामने आती है। एक में पूरी स्वाधीनता जिसके चलते वह उच्छृंखल, उदण्ड, अविवेकशील और दूसरे में उसकी क्षमता को विकसित न होने देना, उसे नाना कुंठाओं में जीने को विवश करना जैसी बातें रहती है। अधिकतर मामलों में वैसा ही परिवेश मिलते रहता है जिससे स्वस्थ समाज बनाने में उसकी भूमिका उसके लिए नुकसानदायक होती है तथा समाज का भला होनै से रहा। 
कई उल्लेखित प्रसंगों से संबंधित लिंक दिए जा रहे हैं जिन्हें सुनने से वे बिन्दु अधिक स्पष्ट होगें। (२)


हिंसा :-
अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च न पढाकर ढोंगी पाखंडी केवल प्रथम तीन शब्द बोल कर गलत संदेश देते हैं। आतताइयों, आक्रमणकारियों को मारना हिंसा नहीं है। उपचार हेतु शल्यक्रिया रूपी हिंसा जरुरी है। सुधारने के लिए डाँटने जैसी हिंसा उचित है। क्रोध हमेशा गलत और कमजोरी की निशानी नहीं होता । क्रोध रूपी हिंसा तक अमृत तुल्य है। (३)
हिंसा की संकुचित व्याख्या करनेवाले बहुधा निजी जीवन में हिंसक, यश के नशे में मदमस्त तथा जुआ खेलने में पारंगत होते हैं। 

स्वर्ण - इस पाँचवे स्थान को केवल धातु के अर्थ में न लें क्योंकि यह प्रतीक है धन का जो कई रुपों में रहता है। धन कमाने, रखने, बचाने, संभालने, बढाने में साम दाम दंड भेद का उपयोग साधारण बात है और इन चारों के बिना सरकारी, गैरसरकारी, आध्यात्मिक, आदि संस्थाएँ तक नहीं चलती। ऊपर से दो नम्बरी कमाई के भरोसे अधिकांश सेवाकार्य चलते हैं। अतः केवल दुष्ट वृत्ति वाले राजा का मुकूट पहनने से परीक्षित की मति भ्रष्ट हुई कहना शोभा नहीं देता। क्या के अनुसार राजा परीक्षित को अत्यधिक प्यास लगी थी। शरीर में जल की कमी सही नहीं जा रही थी जो स्वाभाविक प्रतिक्रिया है शरीर की। इससे संबंधित हॉर्मोन मन - बुद्धि पर हावी होता है ठीक उसी तरह जैसे अन्य हॉर्मोन कुपित (अनियंत्रित) होने पर। ऐसी विकट स्थिति को सही तरीके से समझाना चाहिए। दूसरी ओर जिसने देखा था राजा का व्यवहार उसने सहायता नहीं की। और तो और ऋषि पुत्र ने अपने विवेक का प्रयोग न करते हुए अपनी क्षमता का दुरुपयोग किया जो नशे का ही उदाहरण है। 


संदर्भ 
१ - रेवडी संस्कृति 
https://youtu.be/Pwa-unw_9tA

Part time monk 
http://akshaywaves.blogspot.com/2018/07/part-time-monk.html

२ - ब्रह्मचर्य जीवन शैली 
https://youtu.be/JhzkKFbibas

छान्दोग्य उपनिषद में छ प्रकार की गायत्री 
https://youtu.be/w3htB2B7ZOA

योगवासिष्ठ तथा पुष्प वाटिका में राम जी का व्यवहार 
https://youtu.be/ho2wj6iNYKQ

संस्कारहीनता घर से शुरु होती है। तदनुसार वातावरण दिशा देता है बच्चों को। 
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=442781291362346&id=100053847755549&sfnsn=wiwspwa&extid=a

३ - क्रोध अमृत तुल्य है 
https://youtu.be/6hDOOzbMo2I



आई समझ

एक कुटिल कूटनीतिज्ञ, चालाक राजनीतिज्ञ ने भारतीय समाज को भ्रमित किया चतुराई से। 

उम्र के इस मोड पर रह रहकर याद आई वे तीन बात जो सुनी थी छुटपन में। उस समय की प्रायोजित शिक्षा ने कुछ का कुछ बतलाया और रटवाया। देखा है कई पीढ़ियों को उस भ्रम में जीते हुए। पाठ्यक्रम में गलत अर्थ दे दिए ताकि बच्चे उस पर अधिक सोच विचार न करे। रटंतु पढाई परीक्ष में अंक दिलाये, समाज में नाम और हो सके तो नौकरी दे कर मुँह बंद कर देती है पर समझदारी? वह जीवन संग्राम को झेलते हुए आती। उसका आनंद अलग है। 

तब आओ जरा देखे की समय ने इन तीन पंक्तियाँ का क्या अर्थ समझाया ही नहीं वरन दिखला दिया। बुरा-मत-कहो, बुरा-न-देखो, बुरा-मत-सुनो जैसे वाक्य 
 उन सभी संस्थाओं तथा संगठनों हेतु अनुकरणीय है जो सकारात्मक सोच पर ध्यान देना सिखाते हुए मुंडन करते है। जो व्यवस्था जितनी ऊँघी कुर्सी पर बैठता है उसे यह तीनों वाक्य जल्दी समझ में आते हैं। औरों को कई साल लगते है सयझने तथा विश्वास करने में। 

अपनों पर कौन आँघ आने देता है और ऊपर से सबकी सेवा करते-करते अपनी सुध तक रहती नहीं तब बुरा - भला सब एक हो जाता है। ऐसी दिव्यता - भव्यता वाली भक्ति समझाती है - बुरा मत देखो - किसी में नहीं और अपनों में बिल्कुल नहीं। कोई भूला भटका अपने में मिल जाए तब वह वैसे ही शुद्ध हो जाता है। अब विरोधियों को बुराई दिखती है तो दिखा करे। यूँ भी हर जगह, हर समय विरोधियों को बुराई तभी तक दिखती है जबतक सत्ता न मिले। ऊपर से कब किससे कौन-सा काम निकलवाना हो क्या पता? क्यों किसी में बुराई देखे? अगर कुर्सी पर दृष्टि है या वह मिल चुकी तब सबको अच्छा समझ उन्हें सीढियाँ बना अपनी उन्नति करथे रहो। किसी के लिए कभी स्वयं सीढ़ी बनना हो तो सोच समझ कर करे। अब बुरा मत देखो का सवाल है। 

इसी तरह बुरा-मत-सुनो, बुरा-मत-कहो को जीवन में सिद्ध करना चाहिए। संचार माध्यम भड़काना, लड़वाना जानते हैं पर वे स्वयं नहीं लडते। अपने तथा अपनो का विकास होता रहेगा। 

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               अहिंसा परमो धर्मः
               धर्म हिंसा तथैव च:

केवल प्रथम पंक्ति पढाई जाती है जानबूझकर और इतना ही नहीं वरन संचार माध्यम तथा साहित्य द्वारा इसका प्रचार-प्रसार किया गया। 

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कोई एक गाल पर तमाचा मारे तब दुसरा  गाल आगे करने की बात न्यूटेस्टामेन्ट में है वैदिक वाङमय में नहीं ।  कायर, डरपोक बनाने वाला उपदेश त्याज्य है। 

जाति - वर्ण पर प्रश्न

अतिवादी बन आँख मूँद कर समर्थन न विरोध पर तत्वदर्शी समालोचना जरूरी है। 

क्या वर्ण व्यवस्था केवल मनुष्यों के लिए है? 
नहीं। सृष्टि प्रबंधन में चारों वर्ण आते हैं। 

यानि पशु पक्षी आदि चारों में विभाजित हैं। इसका प्रमाण? 
सहजतम प्रमाण है आयुर्वेद जहाँ साँपों को ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शुद्र में बाँटा गया है। 

वर्ण व्यवस्था का तात्पर्य क्या था?
वर्ण व्यवस्था सबको समान अवसर देने के लिए बनी। जैसे एक विधा में कुशल व्यक्ति उसे आजीविका का माध्यम बना ले। उसे चयन समिति या समाज द्वारा स्वीकारने में जन्मना परिचय, प्रांत आदि बाधा न सहायक बने।  

 जाति क्या है? 
जिस परिवार में जन्म लिया उससे जो पारिवारिक परिचय मिला वह जातक की जाति कहलाया। 

क्या इसके फलस्वरूप कोई विशेषता या न्युनता आती है? 
परिवार विशेष में आना वैज्ञानिक प्रक्रिया है इसमें सन्तान या माता-पिता की इच्छा अनिच्छा काम नहीं आती। 

क्या ईश्वर के कारण ब्राह्मण शरीर मिलता है? 
यह सरासर गलत है। ऐसा होता तब ईश्वर भेदभावपूर्ण वाला होगा जो उसे स्वयं पसंद नहीं आएगा। 

क्या जाति वर्ण एक हैं? 
जाति वर्ण एक बिल्कुल नहीं है। 


जाति परिवर्तिन के ऐतिहासिक और भागवत के उदाहरण पाठ्यक्रम में शामिल क्यों नहीं ? 
समाज को अपने-अपने तरीके से चलाने के लिए। 

आठ तरह के ब्राह्मणों में अधिक संख्या किस श्रेणी की है? 
मात्र जो प्रथम श्रेणी है। 
     
श्रीमद्भगवतगीता १८- ४२,४३, ४४ के अनुसार :- 
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥४२॥

śamo damastapaḥ śaucaṃ kṣāntirārjavameva ca
jñānaṃ vijñānamāstikyaṃ brahmakarma svabhāvajam ।। 42।।

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥४३॥

śauryaṃ tejo dhṛtirdākṣyaṃ yuddhe cāpyapalāyanam
dānamīśvarabhāvaśca kṣātraṃ karma svabhāvajam ।। 43।। 


कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् |
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् || 44||

kṛiṣhi-gau-rakṣhya-vāṇijyaṁ vaiśhya-karma svabhāva-jam
paricharyātmakaṁ karma śhūdrasyāpi svabhāva-jam।। 44।।

इन्हें पढाने - पढने वाले अधिकतर इसका पालन नहीं करते। वैवाहिक संबंध तथा कई बार व्यवहार में जन्मना वाली अवधारणा को आगे करते हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण है वर्ण संकरता का प्रचार-प्रसार। सही अर्थों में यह होती है की नहीं इसकी विश्लेषणहीनता दक्षिणपंथी की मजबूरी है।

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स्कन्दपुराणानुसार आठ तरह - 
मात्र - जिसका जन्म मात्र उस कुल में हुआ है पर योग्यता से वंचित है। 
ब्राह्मण - जो व्यक्तिगत स्वार्थ की उपेक्षा करके वैदिक आचार का पालन करता है ।
श्रोत्रिय - जो वेद की एक शाखा को कल्प और छहो अंगों सहित पढ़कर ब्राह्मणोचित छः कर्मों में संलग्न रहता है ।
अनूचान - जो वेद-वेदांग का तत्वज्ञ, शुद्धचित्त, श्रेष्ठ, श्रोत्रिय विद्यार्थियों को पढ़ाने वाला और विद्वान् है ।
 
भ्रूण - जो अनूचान के समस्त गुणों से युक्त होकर यज्ञ 
और स्वाध्याय में संलग्न, यज्ञशिष्ट भोजन और इन्द्रियों को वश में रखता है ।

ऋषिकल्प - जो वैदिक और लौकिक विषयों का ज्ञान प्राप्त करके, मन और इन्द्रियों को वश में रखते हुए सदा आश्रम में निवास करता है । 

ऋषि - जो नैष्ठिक ब्रह्मचारी होकर नियमित भोजन करता है, जिसको किसी विषय में कोई संदेह नहीं है तथा जो शाप - वरदान में समर्थ है ।

मुनि - जो निवृत्ति मार्ग में स्थित, तत्वज्ञ, काम-क्रोधादि में न बहने वाला ध्याननिष्ठ, नए विकार न पालने वाल तथा मिटटी और सुवर्ण को समान समझने वाला ।
इस प्रकार वंश, विद्या और सदाचार से ऊँचे उठे हुए ब्राह्मण 'त्रिशुक्ल' कहलाते है । वे ही यज्ञ आदि में पूजे जाते है ।