Thursday, 23 April 2020

कं ब्रह्म खं ब्रह्म - छान्दोग्य उपनिषद

छान्दोग्य उपनिषद (४-१० - ५) -
 कं ब्रह्म -> भौतिक या विषय सुख --> नाशवान। खं ब्रह्म - भूताकाश --> विषय सुख की भाँति जल्दी शेष नहीं होता। दोनों को एक कहा गया है। 'कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमिती' --> ताकि यह न लगे कि केवल कं ब्रह्म नाशवान है इसीलिए उसे खं ब्रह्म कहा गया। खं ब्रह्म को कं ब्रह्म कहा गया -> चैतन्य विशिष्ट आकाश कोई अलग नहीं। 'कं' स्पष्ट रूप से ब्रह्म नहीं है। इसे 'खं' के विशेषण के रूप में प्रयोग किया गया है।
कं ब्रह्म -> ब्रह्म विशिष्ट सुख = कार्य ब्रह्म।

खं ब्रह्म -> सुख विशिष्ट आकाश को ब्रह्म कहा गया = कारण ब्रह्म।

   यह अहंग्रहोपासना है।
अनुभव == जाग्रतावस्था - विशेषतः नेत्रों में
                 स्वप्नावस्था - कंठ या मन में
                 सुषुप्ति ----- प्राणों में









Tuesday, 21 April 2020

ब्रह्म - जगत दो हो नहीं सकते

योगवासिष्ठ निर्वाण प्रकरण - ३- ७, ८ :-
चित्तो न भिन्नोsनुभवो भिन्नो नाsनुभवादहम्। न मतो भिद्यते जीवो न जीवाद्भिद्यते मनः।। ७।।
मनसो नेन्द्रियं भिन्नं पृथग्देहश्च नेन्द्रियात् ।
न शरीरज्जगद्भिन्नं जगतो नाsन्यदस्तिहि ।।८।।
ब्रह्म से अनुभव (माया वृत्ति में आरुढ चिदात्मा) भिन्न नहीं ; अनुभव से अहं (व्यष्टि समष्टि रूप अहंकार) भिन्न नहीं ; अहं से जीव भिन्न नहीं; जीव से मन भिन्न नहीं; मन से इन्द्रिय भिन्न नहीं; इन्द्रिय से देह भिन्न नहीं; देह से जगत भिन्न नहीं।

ईशावास्योपनिषद - ७ :-
यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यति।।

समझाने की दृष्टि से आत्मा शब्द प्रयुक्त हुआ है। वह और परमात्मा अलग- अलग दो वस्तु नहीं। यहाँ साधक के स्तरानुसार कहा जा रहा है। सर्व भूतों और आत्मा (तत्व) में अध्यास - अधिष्ठान संबंध है कार्य कारण नहीं। जहाँ कार्य महिमामंडित है वहाँ बहिर्मुखी मन कारण तलाशता है। यह स्तर आता है साधना पथ पर। बौद्ध दर्शन में कार्य कारण वाला पक्ष या अन्य दर्शनों में जहाँ कहीं ऐसी बात है वह साधक की प्रारम्भिक अवस्थानुसार कही गई है।

अज्ञानवश दृश्यानुसार सुखी - दुःखी भाव में बहना उचित नहीं। तरंग आयेगी जो स्वाभाविक है, साधना यही है कि हम कितनी जल्दी संभलते हैं। वे स्वतंत्र नहीं है पर यह कहने - मानने तथ तदनुसार आचरण पर दृष्टि रखनी चाहिए। इसीलिए आत्माभ्यासी की बात समझाई गयी। यहाँ माला नहीं जपनी तत्व के नाम की वरन स्वयं को सतत संभालते रहना है।


स्वतंत्र सत्ता किसी और की नहीं। यह भौतिकी द्वारा भी समझ में आता है।  अतः यह कोई मनगढंत या अपने को मनवाने वाली बात नहीं है। ब्रह्म शब्द जिस तत्व हेतु प्रयुक्त हुआ है उसे ही शक्ति कहा गया है। उसकी शक्ति से ही सब शक्तिशाली हैं। उस शक्ति की अवहेलना या अनादर उचित नहीं है --->> केनोपनिषद - समझाने हेतु आख्यायिका दी गई है जिसके अनुसार संग्राम में विजय पश्चात देवों में निज सामर्थ्य का अभिमान आ गया। एक अलौकिक प्रकाश प्रकट हुआ और एक तिनका सामने रखकर बारी - बारी से वायु देव को उडाने तथा अग्नि को जलाने को कहा पर दोनों असमर्थ हो परे हट गये। तब देवराज इन्द्र सामने आये। उनके सामने माँ उमा (आद्य शक्ति का रूप) प्रकट हुई तथा उस क्रियाशक्ति के बारे में जानकारी दी जिससे सब कार्य करते हैं। यहाँ यह नहीं कहा जा रहा है कि दोनों अलग - अलग है या उनसे त्रिदेव की उत्पत्ति हुई जैसा कुछ ग्रन्थों में उल्लेखित है पर प्रामाणिक नहीं। पौराणिक तथा उससे नीचे का साहित्य स्वतः सिद्ध नहीं है अतः उसके आधार पर उछलकूद मचाना उचित नहीं। 

निष्क्रिय को ब्रह्म और सक्रिय को शक्ति - बस यही समझना है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस उसे ही आद्याशक्ति कहते हैं। 

साधना के प्रारम्भिक चरण में पूजादि जरूरी है। जब मन में निकटता का अनुभव होने लगे तब साधन स्वतः अलग हो जाते हैं। देखा- देखी छोडना गलत है क्योंकि उसके चलते निमय पालन का अभ्यास होता है। धीरे-धीरे सतत अभ्यास के चलते मानसिक अराधना होने लगती है। परमहंजी द्वारा की गई पूजा अन्दरूनी स्नेह का प्रतिफलित रूप है। उन्हें अलग से इसकी जरूरत नहीं थी। 

कोरे भक्त हेतु शक्ति और जगत, दोनों सत्य हैं यानि माया तक सच क्योंकि वह शक्ति है जिसके साथ मिलकर ईश्वर के सारे कार्य होते हैं। केवल मनन, चिन्तन, निदिध्यासन, ध्यान आदि उस माया या प्रकृति या शक्ति के भीतर होने वाले नाटक हैं। जरूरत मन के लय या सतत समाधिस्थ रहने की है। यह तभी संभव है जब ब्रह्म और उसकी माया या शक्ति, दोनों की ठीक से समझ हो। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की त्रिपुटी में स्थित संतों ने इसे ठगनी और कई तरह से संबोधित किया है पर निंदा नहीं है। कवि के भाव समझने हेतु काव्यात्मक प्रतिभा चाहिए। सूर्य और उसकी किरण, पंछी और उसका चहचहाना, आग और उसकी ज्वलन शक्ति, पानी और लहर, चाँद और चाँदनी, दोनों एक हैं। चिन्तन अकेले एक पर करने का दंभ शोभा नहीं देता। वह हमेशा भटकाता है। 

ब्रह्म और जगत को समझने हेतु जरूरी है कि दोनों को समझा जाए। केवल एक को पकडने से मुश्किल होती है। जगत को सच मानने से मन किसी एक अवतार या उसकी एक अवस्था या एक लीला को सबकुछ मानने लगता है। वह उसमें डूब जाता है और इस भाँति अपने को बाँध लेता है। इससे बहिर्मुखता दृढ होती है जिसे अधिक महिमामंडित किया गया है। माला जप पर स्वामी शरणानन्दजी (इनके निर्देशानुसार इनका दाह संस्कार हुआ) ने कहा -'क्या उधार ले रखा है जो गिनकर चुका रहे हो। वो तो आधे नाम पर ही आ जाता है। प्रेम और अपनत्व से एक बार नाम ले लो', 'अभ्यास का नाम भजन नहीं है प्रियता का है'। दैहिक अभ्यास विवेकहीन या विश्लेषणहीन अधिक होता है। जैसे समयानुसार कार्य करने की लत अन्तःकरण से पूर्ण तादात्म्य पर निर्भर नहीं रहती। एक कार्य का अभ्यास है जो होने के नामपर हो जाता है। जो एकाग्रता (कभी कभार) आती है वह कार्य पश्चात चली जाती है।


दुसरी ओर जगत को केवल कल्पना या असत कहने से व्यवहारिक निष्क्रियता या निष्ठुरता जन्म लेती है। साधक का मन इसमें भी संकुचित हो जाता है। यह तथ्य वेदांत के पठन पाठन में परिलक्षित होता है जहाँ तथाकथित वेदांती तामझाम में फँसकर अपनी अतृप्त एषणा की पूर्ति करते हुये बहुधा अशोभनीय कार्य करते हैं। उत्पत्ति, पालन और संहार जैसी क्रिया को विवर्त या आभास मानने मात्र से व्यवहार में निष्ठुरता ही बढती है क्योंकि व्यवहार में साम, दाम, दंड, भेद का प्रयोग गृहस्थों तथा उनके द्वारा परिचालित संस्थाओं में देखा जाता है।इसीलिए आश्रम बहुत है साधक नाममात्र। साधना के नामपर आश्रम की संपदा वृद्धि, रखरखाव तथा गृहस्थपने में जीवन व्यतीत होता है। आ. मधुसूदन सरस्वती ने भक्ति रसायन में कहा - द्रूत चित्त हेतु भक्ति और अद्रूत चित्त हेतु वेदांत जो कि लगभग एक शताब्दी से द्रूत चित्त वाले या पुस्तकों से पढते या सुन लेते हैं। जैसे योग के नामपर यम नियम का प्रचलन परे हो गया और पूरा जोर आसन, प्राणायाम और व्यायाम पर है। करने को ऐसा योग असुर तक करते थे पर वे समाज के काम नहीं आये।

ज्ञानेन्द्रियों का ज्ञान बँटा रहता है। बहिर्मुखी इन्द्रियों द्वारा आई जानकारी को आँख मूँद कर हर समय ज्ञान मान लेना तथा तदनुसार व्यवहार नाना जटिलताएं पैदा करता है। वहाँ बात का बतंगड या तिल का ताड बनता है और कुछ नहीं। भिन्नता वाले बाहरी ज्ञान को महिमामंडित कर आस्था का काढा पिलाया जाता है। यहाँ ध्यान देना है- आस्था विवेक विरोधी न हो। माँ द्वारा बालक की देखभाल अलग से विवेक की माँग नहीं करती पर वह विवेक विरोधी नहीं है। इसीलिए केवल चर्चा या चिन्तन सत्संग नहीं है। वह असत से दूर करे तब सत्संग है। प्रायः सब सत की चर्चा और संग असत का करते हैं ज्ञान यज्ञों और कथाओं में । दोनों जगह केवल पोथी खोलकर काम चला लिया जाता है। प्रश्न तक ठीक से पूछे नहीं जाते और कभी-कभार पूछ लिये गये तो उनका सीधा ऊत्तर नहीं दिया जाता। 'संग' के धरातल पर विवेक चाहिए।

वे महानुभाव जिन्हें देहभाव का प्रचार-प्रसार करना था उन्होंने इसमें भेद बतलाया। संस्कृत व्याकरण का लचीलापन उनके लिए ढाल बना और उसकी आड में वैदिक वाड्मय की मनमानी व्याख्यायें हुई, समाज में नाना भ्रांतियां स्थापित हुई, व्यापक स्तर पर पौराणिक साहित्य के साथ छेड़छाड़ हुई, इत्यादि।
ttps://youtu.be/l1ZXXrFoNFA

विवेक से विश्वास तथा कर्तव्य दृढ होते हैं। इस स्तर पर पहुँचा हुआ व्यक्ति अपना जीवन सफल बनाता है।