Wednesday, 21 July 2021

साध्वी मीराबाई की मर्दानगी

 सृजन परिवार, जनवरी 2021 अंक में प्रकाशित साध्वी मीराबाई की मर्दानगी (पृष्ठ ४६) विषय पर लेख  ब्लॉग (एक अंश) से भेजा गया था जिसमें साहित्य के अनुरागी पाठकों हेतु पद का संक्षिप्त विश्लेषण भी है। 



शीर्षक से संबंधित जानकारी 💠 जनवादी लेखक संघ पश्चिम बंगाल के साठ दिवसीय सीधे प्रसारण वाले कार्यक्रम अन्तर्गत १७ - ९ - २०२० को  मीराबाई पर वक्तव्य रखा। प्रसारण के मध्य वृन्दावन का प्रसंग और दो एक बातें कही गई थी और उसकी प्रतिक्रिया देते हुए प्राध्यापक राम आह्लाद चौधरी जी ने लिखा - (मीरा की मर्दानगी) --- यह नामकरण में काम आ गया। वह वीीडियो  चैनल में उपलब्ध है :-
साध्वी मीराबाई की मर्दानगी 
https://youtu.be/gwiBo7hHDHE

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भारतीय शिक्षण पद्धति में साहित्य सम्मत शैली द्वारा मानसिक तथा बौद्धिक जागरण की स्वस्थ परंपरा है। यह शैली लालित्य प्रधान है जहाँ लक्ष्यार्थ से ही रचनाकार का उद्देश्य सामने आता है। गतिशील रचनाधर्मिता परंपरा में भक्ति साहित्य ने इस शैली को जी भर अपनाया। इससे मानसिक तथा बौद्धिक तृप्ति का अहसास हुआ समाज को। इस शैली के सशक्त मनीषियों में साध्वी मीराबाई ने समाज को जगाने का सफल प्रयास किया। यह और बात कि उनके पद वाच्यार्थ या समझाने-बुझाने वाले के अपने स्तर तक सिमट कर रह जाते हैं। अपने देश की विडंबना है कि फूट डालो राज करो की भाँति भक्तिकालिन साहित्य को प्रेम, श्रद्धा तथा भक्तिभाव से बाँटा गया। उतनी चेष्टा भगवान और ईश्वर के भेद तथा महत्व को समझने में लगती तो शिक्षा  जगत का भला होता। करने के नामपर यह किया की स्वयं मिलकर रह नहीं सकते और चिन्मय सत्ता को बाँटा ही नहीं वरन उसके आधार पर धार्मिक राजनीति का कुटिल खेल शुरू कर दिया। पहले उसे निर्गुण - सगुण में विभाजित किया फिर सगुण को कृष्ण, रामादि में। कहीं-कहीं सुफी मत वाले (नजीर अकबराबादी आदि) को कृष्ण भक्त कहकर अलग खाँचे में रखा। रचनाओं के लक्ष्यार्थ के नामपर पर अपना मताग्रह या प्रायोजक की अतृप्त एषणा याा  पंथ विशेष की व्यक्तिगत दृष्टि हावी हो गई और बहुधा उन निर्धारित सुत्रों की अवहेलना हुई जो निहितार्थ को खोलने हेतु प्राचीन ऋषियों ने समाज को दिये। इन बातों की सच्चाई तनिक जाँच करें मीराबाई के साहित्य द्वारा। उनके संकलित पद विभिन्न नामों से प्रकाशित हुए :- गीत गोविन्द की टीका, राग सोरठा के पद, राग गोविन्द, मीराबाई की मल्हार, राग विहाग, मीरा पदावली, नरसी जी रो मायरो। इनमें से कई पद जिनमें सतही विचार हैं वे इनके नहीं लगते क्योंकि उनकी संगति अन्य पदों के साथ नहीं लगती और उनके स्तर के साथ मेल नहीं खाते। प्रस्तुत विश्लेषण उनके अवहेलित भावों पर केन्द्रित है जो संगति के अभाव में अलग-थलग रह गए और समाज स्वस्थ, सार्थक, संदेश से वंचित रह गया। चर्चा के नामपर आरोपित बाहरी भक्ति का बोलबाला है । जबकि वह उनकी भक्ति का स्वरूप नहीं है। उनका स्त्री स्वातंत्र्य रूप तथा उसका परिणाम एक तरह से ढका रह गया। 

ज्ञान, भक्ति, वैराग्य की त्रिपुटी में स्थित मीराबाई के इष्ट श्रीकृष्ण थे और उनके माध्यम से सामाजिक आंदोलन की याद दिलाने के लिए 'गिरधर, गिरधारी' संबोधन का प्रयोग वहाँ किया जहाँ जगाने की ओर संकेत करना था। लीलानुसार गोवर्धन पर्वत उठाना एक सामाजिक आंदोलन था जो शासक वर्ग की ठकुरसुहाती या उसके कर्तव्यों को अतिरंजित शैली में महिमामंडित कर उसे सिर पर बिठाने की परंपरा चली आ रही थी। शिष्टाचारवश मान देना अलग बात है पर यहाँ मामला अतिशयोक्ति का था जहाँ एक वर्ग की पूजा में श्रद्धा कम भय की अधिकता थी। वहीं दूसरी ओर आम व्यक्ति से जुडे वन प्रदेश, कृषि, पर्वत, जल स्रोतादि की समुचित देखभाल अत्यंत जरूरी है। वही उनका मान सम्मान है। इस बिन्दु पर कृष्ण ने केवल उकसाने का काम नहीं किया वरन शासक वर्ग की निरंकुश प्रतिक्रिया समक्ष ढाल बनकर खडे हुये। यह है सफल आंदोलनकारी नेता जिसने मीराबाई को राह ही नहीं बताई वरन रक्षा भी की। ऐसा अनूठा प्रगतिवादी कदम किसी और देश के प्राचीन साहित्य में नहीं है। जन आंदोलन या जागरण केवल उकसाने, हिंसात्मक प्रतिक्रिया, अभिव्यक्ति का दुरूपयोग, उच्छृंखलता, उदण्डता नहीं। वह अधिकार तथा कर्तव्य में सामंजस्य बनाये तभी सफल है। 'मेरे तो गिरधर गोपाल', - चूँकि वह लीला एक काल खंड मध्य घटी अतः कुछ पदों में वेशादि का वर्णन है पर शब्द चयन में सावधानी बर्ती गई है। जहाँ वे जनहित हेतु जगाना चाह रही हैं वहीं गिरधर शब्द प्रयुक्त हुआ है। कूप मंडूक मानसिकता अपना भला तक नहीं कर पाती इसीलिए लीला की याद दिलवाकर वे संदेश दे रही हैं। दूसरी ओर यह उन्हें पता था कि वे स्वयं ढाल नहीं बन सकती तभी जनता को उत्तेजित नहीं किया। समाज की ग्रहण क्षमतानुसार समझाते हुए निर्गुण सगुण में तालमेल स्थापित किया जो त्रिपुटी (ज्ञान, भक्ति, वैराग्य) में स्थित रचनाकार ही कर सकता है। तभी मनोराज्य या पलायनवाद उनके साहित्य में नहीं है। यही गुण स्थापित नौ दर्शनों में है। एक अन्य पद में उन्होंने कहा, 'माई म्हांने सुपणा मां परण्या दीनानाथ… पधारयां(यं) दूल्हो सिरी ब्रजनाथ...मीरा रो गिरधर मिल्यारी पुरब जणम रो भाग' -- जाग्रत की अतृप्ता, असहनीय वेदना, अपनों से मिली मार्मिक चोट, आत्यंतिक समाधान हेतु उचित मार्गदर्शक न मिलने का दर्द, पीडा को साँझा करने हेतु योग्य पात्र का अभाव जैसे अनेक कारणों के चलते स्वप्न आते हैं। यहाँ 'दीनानाथ' शब्द उस स्थिति का द्योतक है जहाँ अवचेतन मन सहायता हेतु आर्त भाव से पुकार रहा है उस सर्वनियंत्रक नामरूपहीन सत्ता को जो दीन अवस्था में पडे मानव की 'नाथ' रूप में रक्षा करे। यहाँ आर्त भाव मानसिक यंत्रणा के चलते पैदा हुआ। जो संबंध पारिवारिक एकता तथा समाज की नींव समान है उनसे पीडा अधिक प्राप्त हुई। 'दूल्हो सिरी ब्रजनाथ' में नारी सम्मान छिपा है जहाँ योग्य वर से पुत्री ब्याहने की शिक्षा दी गई है। 'सिरी' (श्री) शब्द का प्रयोग केवल पैसेवाला नहीं वरन स्वास्थ्य, स्वभाव, संतोष, संयम जैसे धन से धनी वर। रुपया पैसा तो आततायी, तस्करादि के पास भी होता है पर वैसा वर यहाँ समर्थित नहीं। यहाँ 'दीनानाथ' शब्द का प्रयोग अपमान कर देता। तब स्पष्ट संदेश जाता की कोई विवाह नहीं कर रहा इसलिए 'दीन' पर दया कर उसे अपना ले ताकि हँसी न उडे। यहाँ उस जातिवादी मानसिकता पर छिपा व्यंग्य है जहाँ गुणवती कन्या अयोग्य लडके से जातिगत समानतावश ब्याही जाती है। उसका परिवार जाति से बाहर योग्य लडके को जल्दी से नहीं स्वीकारता। इसमें तथा अन्य पदों में अपनी वैधव्य जनित पीडा को पीते हुए वे 'अमर सुहाग' की बात कहकर अद्वैत भावाव्यक्ति द्वारा 'एकीकार या एकत्व' का उद्घोष करती हैं। उनमें देहधारी पति से वापस मिलने की चाह न देहाधारित आवागमन में रूचि है। यह है शुद्ध ब्रह्म दृष्टि जिसके चलते वे सबके सामने भाव प्रकट कर पाईं - सर्व खल्विदं ब्रह्म - जहाँ दृष्टि जाय वहाँ ब्रह्म भावना रखनी। इसका अर्थ यह नहीं की मनचाही करो या गलत संग करो या भोग को ब्रह्मरूप मानकर भोगो। तभी उन्होंने नामरूपात्मक जगत हेतु स्वप्न शब्द प्रयोग करते हुए उसके मिथ्यात्व का प्रतिपादन किया । अब स्वप्न के समयहवह सच्चा लगता है और जगने पर भ्रम दूर होता है। उसी तरह जाग्रत  व्यवहार है जहाँ भावनाओं संग न बहते रहना ही जगना है। यह समझने से उनकी साधना का स्तर समझ में आएगा नहीं तो सारा मामला सतही नामरूपात्मक या श्रृंगारिक या बाहरी भक्ति तक सिमट जायेगा। यहाँ सोचा जाय की पंक्ति ऐसी भी है - 'जाके सिर मुकुट मेरो पति सोई' और अन्य जगह सपने में विवाह की बात है तब यही अर्थ निकलेगा की वे रूपात्मक उल्लेख लगाव चलते कर रहीं हैं। उन्हें कृष्ण के लक्ष्यार्थ की जानकारी है। जैसे सन्त तुलसीदास को राम के अर्थ की अनुभूति थी तभी वे कह पाय 'सियाराम मय सब जग जानी' और सामाजिक दृष्टि से पूरी राम कथा कही जो अवतार केन्द्रित थी। गौण भाव कभी मुख्य नहीं होता रचनाकार हेतु। मीराबाई के साहित्य में तभी शान्त रस प्रधान है जबकि श्रृंगार का नाम अधिक लिया जाता है क्योंकि पदों का सतही स्तर देखने वाले ज्यादा हो तब उनमें डुबकी कौन और क्यों लगाय। उनके लिए कुछ पंक्तियाँ ही बहुत है और उनमें प्रयुक्त शब्द श्रृंगार की ओर संकेत कर रहे हैं तब वही प्रमाण। कबीरदास साहिित्य में प्रयोग मिलता - 'राम मोर पिउ मैं राम की बेहरिया' -  तकनीकी रूप से ऊपर वाला कहें या तत्व वही सबका पति है। यह शब्द सांसारिक पति-पत्नी के अर्थ में न लिया जाय। यहाँ आध्यात्मिकता की बात है। सारी सृृष्टि उसीका विराट रुप है। 

भारतीय दर्शनों पर इनकी पकड पदों तथा व्यवहार दोनों में दिखती है। एक बार वृन्दावन में अपने गुरू आश्रम में जाने पर उन्हें सुनने को मिला (अन्य शिष्यों द्वारा) 'स्वामीजी नारियों से नहीं मिलते'। इसपर उन्होंने पूछा 'यहाँ पुरुष' 'एक है दुसरा कहाँ से आ गया' - यह बात सुनते ही स्वामीजी जल्दी से बाहर आये। यहाँ याद आती है नजीर अकबराबादी की पंक्ति 'पुरे हैं वही मर्द जो हर हाल में खुश हैं'। अपने परिवारजनों के दुर्व्यवहार से क्षुब्ध होकर वे उन्हें अभिशाप न देकर कहतीं हैं 'राणाजी थार देसा म साध नइ स लोग बस्या स कुडो' (राणाजी आपके राज में सार नहीं है। अधिकतर संकुचित कलुषित मानसिकता वाले लोगों का वास है)। चूँकि उनको सुनने वाले गृहस्थ अधिक थे और वे घरेलू कामकाज को भक्ति या प्रभु सेवा रूप में नहीं ले पा रहे थे अतः उन्हें कोरा ज्ञान न देकर समझाया 'प्रेम सहित मैं करुंगी रसोई म्हारे गिरधर के भोग लगाई'। भक्ति हेतु समयाभाव की बात थी, है, रहेगी। ऊपर से घरेलू काम-काज बहुतों को विशेषतः उच्च शिक्षितों को बोझ लगता है और वे भक्ति पसंद करते हैं पर उसका मर्म समझ नहीं पाते। इसीलिए उनके कार्यों में उकताहट, परेशानी, बोझरूप या सामाजिक बाध्यतावश वश करना दिखता है। उनका जीवन कलह क्लेश तनाव से भरा रहता है। शिक्षा केवल विषय विशेष की जानकारी दे रही है जिसका विनियोग आजीविका में होता है। यहाँ इसका खंडन नहीं हो रहा वरन बतलाया जा रहा है कि दंभी न बने और उसे भक्ति रूप में लें। इसका अर्थ यह नहीं की कार्यालयादि में अलग से कर्मकाण्ड करें। गीता के एकादश अध्याय में तभी कहा गया की स्वयं को केवल निमित्त समझो कर्ता नहीं। यह अकेला उदाहरण नहीं है खोजने पर समाजोपयोगी शिक्षा के कई उदाहरण मीराबाई के साहित्य में मिलेंगे। अपना स्तर औरों पर न थोपकर सबको गीता का कर्मयोग बतला दिया की प्रभु सेवा तथा ईश्वरार्पण बुद्धि से कार्य करो। भक्ति अलग से करने वाली क्रिया नहीं इसलिए अलग से समय न मिले तो कर्तव्य पालन को भक्ति समझने में दोष नहीं। एक प्रश्न प्रायः पूछा जाता है कि उच्च पद पर नौकरी करते हुए भक्ति के लिए समय नहीं मिलता और रोज तो बिल्कुल नहीं। गलत शिक्षा देनेवाले वैसी नौकरी छोडने की सलाह देते हैं। जबकि गीता केवल कर्तृत्वाभिमान छोडने की बात करती है आजीविका नहीं। 

वे अपने निर्णय लेने में स्वतंत्र थी पर उन्होंने संत तुलसीदास से समाधान पूछा क्योंकि वे भी त्रिपुटी में स्थित थे। यह भाव सिखाता है योग्यता का सम्मान करना और उसके लिए स्वयं को योग्य बनाना ताकि वह सही प्रतिभा को पहचान सके। उनके समकालीन अन्य रचनाकारों में अधिकांश राजाश्रित थे जो भक्ति की आड में भोग विलास रचनाएँ लिख अपने प्रायोजक को खुश करने में मगन थे। उनके लिए कृष्ण नाम आवरण मात्र था अतृप्त एषणा की पूर्ति का। उन्हें त्रिपुटी से लेनादेना नहीं था। जो मुट्ठी भर रचनाकार स्वतंत्र रूप से लिख रहे थे उनके ज्ञानचक्षु ठीक से खुले नहीं थे इसलिए वे भक्ति को साध्य तथा ज्ञान, ध्यानादि को साधन मानते तो कई ज्ञान, भक्ति, वैराग्य को स्वतंत्र मार्ग मानते थे। इसीलिए मीराबाई ने गोस्वामी को चिट्ठी लिखी जिनका समाज में नाम यूँ ही नहीं हुआ। उनके पंद्रह वर्ष के अध्ययन, मनन, निदिध्यासन, ध्यान की पूँजी चलते वे आगे बढे। उन्होंने भी आचार्य मधुसूदन सरस्वती से अपने रामचरितमानस पर टिप्पणी माँगी थी जो उन्हें मिली। इसीलिए दो योग्य मनीषियों में संपर्क हुआ नहीं तो जरा सा यश होते ही व्यक्ति किसी को अपने बराबर नहीं समझता। ऊपर से सही सुझाव देना याद नहीं रहता। यहाँ बातों-बातों में महत्वपूर्ण शिक्षा दी गई। इनपर ध्यान न देकर जो कर्तव्य या शरीर निर्वाह हेतु आजीविका छोडकर आश्रम को घर बनाते हैं वे भारतीय दर्शनों से पूर्णतः अपरिचित हैं। विडंबना यह है कि जिनपर राह बताने का दायित्व है उनमें अधिकतर अपनी भूमिका ढंग से नहीं निभाते । विपरीत भाव समझाने वाले हर समय थे और समाज को सही राह बताने कोई न कोई आता है पृथ्वी पर। 




उनकी भक्ति केवल बाहरी या मन की ऊपरी सतह तक हलचल मचाने या समय व्यतीत करने या पालन पोषण की शैली से उत्पन्न त्रिआयामी प्रक्षेपण जिसमे स्वसम्मोहन वश दर्शन के दावे तक सीमित नहीं थी
वरन ज्ञान वैराग्य सहित थी। त्रिपुटी के तीनों शब्द एक दूजे के पूरक है प्रतिद्वंद्वी नहीं। स्वस्थ सामाजिक बदलाव तभी संभव है जब पाठ्यक्रम में इसके (त्रिपुटी) धारकों के साहित्य की सही व्याख्याओं को स्थान दिया जाय। नहीं तो मीराबाई के पद भजन संध्या या शास्त्रीय संगीत सिखने तक रह जायेंगे। यहाँ पूर्व पक्ष उठ सकता है कि जैसी दृष्टि यानि पदों को समझने की चेष्टा वैसी सृष्टि या व्याख्या। इसकेनुसार अक्षय चैतन्य के विचार उनके अपने हैं जैसे औरों के। प्रतिपादन शैली भिन्न भले हो पर नींव की ईंट नहीं बदल सकती। देखना यह है कि संगति कहाँ और किसकी लग रही है। आखिर प्रश्न एक रचनाकार का नहीं उस थाती का है जिसका धारक समाज है। यहाँ थाती वह साहित्यिक धरोहर है जो सही राह बताने हेतु है अपनी चकाचौंध से भ्रमित करने को नहीं। अब प्यास की तृप्ति पेय पदार्थ से होगी और ख्याली पुलाव से क्षुधा निवृत्ति नहीं होगी। उसी तरह मनमानी या प्रायोजित व्याख्या त्रिपुटी में स्थित रचनाकारों का सम्मान नहीं करतीं। उन्हें बाहरी भक्ति के नामपर देह धरे का दंड स्वीकार नहीं क्योंकि उसकी आड में देहासक्ति जीवित रहती है। इसीलिए वे वृन्दावन में पशु पक्षी तक बनने की बात नहीं करती। यह नहीं की उन्हें मोक्ष प्रिय है पर बन्धन मुक्ति का खेल समझ चुकी हैं। आखिर दोनों देहाधारित धारणा है और दर्शन धीरे-धीरे उससे ऊपर उठने की ओर ले जाता है। तभी उनके पदों में यह भाव नाना तरीकों से आया है 'पूरण ब्रह्म बसे घट भीतर'। इसी ओर संकेत करते हुए ब्रह्मानन्दजी कहा था की बाहरी अभ्यास तबतक निष्फल है जबतक घट (देह) में तत्वबोध नहीं हुआ। आखिर जो बाहर है वही भीतर है - जरूरत उसके अनुभव की है। जब राणा ने सर्व व्यापक तत्वविषयक प्रश्न किया तब सुनने मिला 'म्हारो रमैयो थारे घट में बिराज थारे हिये की क्यूं फूटी'। यहाँ ज्ञानचक्षु खुलने की बात है जिससे अन्तःकरण साफ होता है। यह सफाई व्यवहार सुधार कर मानवीय गुण जगाती है। 

न जाने क्या कारण है कि त्रिपुटी को समझाने वाले पद या तो पाठ्यक्रम में नहीं रहते या उनको हल्के रूप में समझाया जाता है। कई जगह उनपर रहस्यवाद की छाप लगा उन्हें अलग खाँचे में रखा गया। लक्ष्यार्थ को परे रख कई पदों को मधुरा या माधुर्य भक्ति का उदाहरण माना। दर्शनों और त्रिपुटी के संबंध को तो क्या उनके स्वरूप से पूर्णतः अनभिज्ञ 'तथाकथित बुद्धिजीवियों' ने इसका (रहस्यवाद) प्रयोग धडल्ले से किया। जिन बातों को समझने के लिए सूक्ष्म बुद्धि या खुले ज्ञान चक्षु या आन्तरिक समझ जो वास्तविक अन्तर्मुखता से आती है वह उनके पास नहीं थी इसलिए वे और क्या करते। ऐसे सोये हुए लोग विश्व स्तरीय जागरण या इससे मिलते विषयों पर पुस्तकें लिखते हैं। समझदारी का स्तर यह कि कोरी बहिर्मुखता पहली पसंद इसीलिए रहस्यवाद, छायावाद जैसे शब्दों का प्रयोग कर अपने खोखलेपन का ढोल जी भर बजाया। हर हथकंडे अपनाय जिससे की त्रिपुटी का महत्व परे रहे और उसी तरह पाठ्यक्रम तैयार हुआ। सारा दोष मैकाले की शिक्षा पद्धति देने से पूर्व अपने अंदर झाँक लेना चाहिए। भारतीय भाषाओं के प्रति ऐसी उदासीनता तथा अंग्रेजी का विरोध कुछ और संकेत कर रहा है। मानस में ऐसो का परिचय देते हुए कहा गया, 'मूरख हृदय न चेत जो गुरु मिलहि विरंचि सम ।' संप्रदायों तथा संस्थाओं का ऐसा खेल उनकी प्रभुत्व कायम रखने की लालसा प्रदर्शित करता है पर शिक्षा विभाग कम से कम उन पदचिन्ह पर न चले। यहाँ तो ताल मिलाते हुए कई प्रकाशकों ने उनको (त्रिपुटी को समझाने वाले पद) प्रकाशित तक नहीं किया और ऊपर से प्रामाणिक पदों के प्रकाशन का दंभ उनके दावे पर प्रश्नचिह्न लगाता है। पाठभेद या मिलते-जुलते अन्य रचनाकार के पद के नामपर न छापने खेल खेलना उचित नहीं। चिन्तन यात्रा के किसी मोड पर एक जैसा भाव कई समकालीन रचनाकारों में हो सकता है। वहाँ निष्पक्ष जाँच करके निर्णय लेना चाहिये जो यहाँ नहीं हुआ। मीराबाई ने जिस समय अपनी प्रतिभा का परिचय सामने रखा वह प्रगतिशील कदम था। जब आयातित वाद की गंध तक नहीं थी तब भारतीय दर्शनों में छिपी प्रगतिशीलता सहारे जगने - जगाने का कार्य सराहनीय है। एक महत कार्य संपादन हेतु घर की चारदीवारी लाँघ समाज के मध्य जाना साधारण बात नही थी उस समय और उन्होंने वह कर दिखाया - 'लोक लाज की काण न मांनू। निरभै निसाण घुरास्या हो माई।।' यहाँ छिपा अव्यक्त मलिन अभिप्राय नहीं था वरन घट - घट में स्थित चिन्मय सत्ता को स्वीकारते हुए सामाजिक हितार्थ कदम उठाना था। 'निरभै निसाण' धर्म के नामपर भयभीत करने की कोशिशों का विरोध ताकि लोग अभय होने के लिए धर्म का मर्म समझ अपने अन्दर झाँकना शुरू करे। उन्होंने उन रीति रिवाजों से निर्भय होने का संदेश दिया जो स्थान, काल, परिस्थितिनुसार बनते-बिगड़ते हैं क्योंकि मनुष्य उनके लिये नहीं बना, वे मनुष्य हेतु बनाय गए। यह बात विश्लेषणात्मक तरीके से न समझाकर लोग आँख मूँदकर सबका समर्थन या विरोध करने लग जाते हैं। समाज तथा संसाधनों पर आधिपत्य बनाय रखने हेतु उनपर अपरिवर्तनशील की छाप लगा धर्म की आड में दुकानदारी शुरू होती है। विरोधस्वरूप मीराबाई ने महल के बाहर कदम रख स्वस्थ उदाहरण पेश किया। बौद्धिक व्यायाम विशेषज्ञ नारी मुक्ति या नारीवाद या स्त्री स्वातंत्र्य का ढोल भले बजाय मीराबाई ने पहले ही उसपर चलकर दिखा दिया। उसमें भ्रमित करने, अव्यक्त अभिप्राय पूर्ति, उदण्डता, अभिव्यक्ति का दुरुपयोग, असंयमित इन्द्रिय व्यवहार, चारित्रिक स्वाधीनता जैसी बातें नहीं है। इस रूप में वे अपने समय की आधुनिक नारी थी जिन्होंने उन रीति रिवाजों की अनदेखी की जो उनके गुणों को दबाने के साथ घुट - घुट कर जीने को विवश कर रहे थे। दर्शनों के सार को दर्शाती स्वाधीनता सराहनीय है। अपने व्यवहार से वे प्रेरणा स्रोत बनी उन नारियों के लिए जो बात - बात पर शोषित हो रहीं थीं। वे समझ गई की सात्विक रूप से विरोध किया जा सकता है। उनकी स्वाधीनता पुरुष प्रतिद्वंद्वी या उनसे आगे निकलने का माध्यम या बदला लेनेवाली नहीं वरन मानवतावादी दृष्टि वाली थी जहाँ नारी को मनुष्य समझा जाय। यह पाश्चात्य नारी स्वाधीनता से अलग है जहाँ बात - बात पर प्रतिस्पर्धात्मक दृष्टि अधिक है। घरेलु उत्पीडन वहाँ काफी है पर बहिर्मुखी भाव प्रधान समाधान तलाशा जाता है। इधर मीराबाई की नारी स्वाधीनता पर सोच विवेक पर आधारित है। 
उनका समय इस मामले में काफी पीछे था। यह स्थिति केवल मुगल काल के कारण नहीं वरन उससे पहले से चली आ रही थी जहाँ शोषण-दमन प्रधान साहित्य लिखकर उसे वैदिक वाड्मय का अंश कहकर प्रचारित करवाया गया। कुछ अन्य जगह ऐसे श्लोक मिलते हैं जो सतही तौर से नारी समाज को दुसरे दर्जे का नागरिक कहते से लगते हैं पर वह सही नहीं। जैसे उनके संस्कृत बोलने पर निषेध या भागवत में नारियों को वेद से अलग रखना आदि। तभी ऐसी विभूति आती है मार्ग दिखाने के लिए। स्वाधीनता के नामपर गुमराह करने वाले बहुत थे मीराबाई सा कोई - कोई। उन्होंने आँख मूँद कर किसी धर्मध्वजी का संग नहीं किया वरन दो एक पाखंडियों को सद्बुद्धि दी। हाँ इतना अवश्य है कि उनपर अलग से नहीं कहा। वह कार्य कबीरदास, तुलसीदास, कमाल, आदि ने कर दिया। 
धार्मिक दुकानदारी पर मानस में कहा गया - 
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं॥
कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी॥
वेद का अर्थ है ज्ञान और वह किसी भी विषय के बारे में हो सकता है। कुछ लोग आजीविका के नामपर इच्छानुसार उसका दुरूपयोग करते हैं। यहाँ तक कि उसे केवल पुस्तक के रूप में मानना या इच्छानुसार अनुक्रमणिका बनाना, मनगढंत बातें लिख उसे वैदिक वाड्मय के नाम से प्रचार-प्रसार करना, उसके नामपर हर तरह का शोषण करना जैसे कृत्य करना ही 'बेचना' है। इन्हें औरों के पापों का ढिंढोरा पीटने में आनन्द आता है। मानस की दुसरी चौपाई में इनके अन्य 'गुण' वर्णित है। मीराबाई का जीवन निर्भयता का उदाहरण बना - 'म्हें तो गुण गोविन्द का गास्यां हो माई। सीसोद्यो रूठ्यो तो म्हारों काई करसी।। राणाजी रूठ्या बाँरो देश रखासी। हरि रूठ्या कुम्हलास्यां हो माई।।' उनके ससुरालवालों का शासन था अतः नाराजगीवश राणा अपने देश से निकालने के सिवा कुछ और नहीं कर सकता। ऊधर भगवान नाराज हो गये तो उनका जीवन प्रपंच में बहता रहेगा। यहाँ 'हरि' शब्द किसी नामरूप तक सीमित न रहकर शुद्ध अन्तःकरण में होनेवाले अनुभव का द्योतक है। किसी बाहरी शक्ति को ही मानने से दुनियादारी में फँसे लोगों की परवाह करने के साथ हर समय भय सताता है कि लोग क्या कहेंगे या समाज में रहना है तो बात माननी पडेगी। ऐसे लोगों में कुछ एक परिवर्तन चाह कर भी स्वयं कदम उठाना नहीं चाहते। उन्हें केवल बहती गंगा में हाथ धोने से मतलब। मीराबाई ने केवल बातें न बनाकर अपना उदाहरण सामने रखा। वे राणा की परवाह करतीं तो संसार में उलझी रहती। यहाँ आशय यही है कि राणा एक क्षेत्र का शासक है दुनिया का नहीं और उसपर इतना दंभ - दर्प। अतः छोटे के बदले बडे शासक की परवाह उचित है। बडा शासक अन्दर बाहर दोनों जगह है और उसके बिना कोई जगह नहीं। अतः वह नाराज होकर कहाँ जाने को कहेगा। मुलायम तरीके से राणा को उसका स्तर बता दिया। वे विध्वंसात्मक विद्रोह की बात न कर आत्मबल बढाने पर जोर देती हैं और यह काम आता है जीवन संघर्ष में। यहाँ शंका उठनी स्वाभाविक है की उन्होंने दर्शनों का अध्ययन कहाँ तथा कब किया। यह जन्मों की कमाई का परिणाम है। यह जरूरी नहीं की सबकुछ पाठशाला या पुस्तक या किसी मानव देहवाले से सिखने पर वह अध्ययन कहलाएगा और यह एक जन्म का सफर नहीं। व्यक्ति के गुण, कर्मादि का ज्ञानचक्षु द्वारा विश्लेषण उसके दार्शनिक धरातल को बतलता है। तभी जन्मजात प्रतिभा के हजारों उदाहरण जगह-जगह देखने को मिलते हैं जहाँ अपनी उम्र के अनुसार व्यक्ति कार्य न कर उससे अधिक करता है। इसके पक्ष में एक उदाहरण देखा जाए जहाँ वे कहती हैं -
 फेरी न फेरु सन्तो फिरबा न जाऊँगी / भुखी रहु ना अन्न खाउंगी / एक फकीरी सतगुरा ने बताई / घर बैठी फल फल पाउंगी 
सन्तो फकीरी आज तो मेलो र र मइया / घर मालकडी क जाऊंगी / तीरथ न जाऊं सन्तो गंगा न नाहुंगी / अडसठ तीरथ बसे बसे घट भीतर / घर बैठी गंगा नहाँउगी 
जडी न खाऊं सन्तो, बुटी ना पीऊगीं / नहीं कोई बैद बुलाउंगी / पुरण ब्रह्म बसे घट भीतर / पाचां न मार पचीसा न बस कर मईया / इतना म नर सुलाउगी।। 

दैहिक मानसिक बौद्धिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मनुष्य समाधान खोजता है। चूँकि उसका अपना स्वरूप आनन्दमय है इसलिए वह उसकी खोज में जहाँ तहाँ घुमते हुए अस्थायी बाहरी आनन्द में गोते लगाता है। यहाँ तक की आनन्द देने वाले माध्यम को अतिश्योक्ति ढंग से महिमामंडित करते हुए आत्यंतिक समाधान तबतक नहीं सुझता जबतक निष्पक्ष विवेक न जगे। जो विवेकी बन जाए उसका आहार-विहार व्यवहार संतुलित होता है। उपाधि रहित आत्म ज्ञान में सचेष्ट व्यक्ति के विवेकवान बनते हुए आत्माभ्यासी बनता है। यह अभ्यास धीरे-धीरे मोह तृष्णा का वेग नियंत्रित करते हुए उसके अनुरूप बहना बंद करता है। ऐसा अभ्यासी ऊपरी और बाहरी ज्ञान भक्ति वैराग्य से परे रह उनकी त्रिपुटी में स्थित होने लगता है जहाँ वे तीनों का एकत्व व्यक्ति को सही मायने में तत्वदर्शी बनाता है। इस मार्ग पर चलनेवाला आत्यंतिक समाधान के लिए अलग से दौड धूप नहीं करता। उपरोक्त पद इसी अवस्था पर आधारित है। उदाहरण के लिए अर्जुन की मनःस्थिति देखे जहाँ वह भक्त तथा समझदार होते हुए भी आत्मविद्या से अनजान था। मीराबाई इसी उहापोह से निकली अवस्था समझाते हुए भटकना बंद होने की बात कह रही हैं। व्यवहार में भी किसी शंका के समाधान पश्चात उसके बारे में अनावश्यक संदेह पैदा नहीं होता। 
पद में 'भुखी रहु ना अन्न खाउंगी' संयम संतुलन तथा संतोष की ओर संकेत कर रहा है। 'सतगुरु' (तत्वदर्शी ज्ञानी) से प्राप्त हुई 'एक फकीरी' आत्मज्ञान रुपी तरकीब के चलते आनन्द, सुख, शान्ति अपने ही अन्दर मिल गई। दुसरे अनुच्छेद में संकेत संसार छोडने की ओर है। ऐसा संकेत सन्त कबीरदास की वाणी में मिलता है जब वे कहते हैं 'नैहरवा हमका न भावे'। उपनिषदों में आत्मज्ञान रुपी तीर्थ को बाहरी तीर्थों से अधिक महत्व दिया गया है। यह बाहरी तीर्थो की अवहेलना नहीं वरन सच्चाई का उद्घोष है क्योंकि जरुरत अपने अन्दर झाँकने की है। निष्पक्ष मनन यही कहता है कि कई क्षेत्रों का विकास तीर्थो के रुप में संभव हुआ जैसे बदरीनाथ, रामेश्वरं आदि जो धीरे-धीरे आस्था के केंद्र बने। इनका सीधे-सीधे संबंध आत्मज्ञान या ब्रह्यविद्या से नहीं है। इसीलिए पद में बाहरी माध्यमों से अलग रहने की बात कही गई है। यूँ भी अनुभवी महापुरुषों के अनुसार जो बाहर है वही भीतर है - 'यद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे'। 'अडसठ तीरथ बसे बसे घट भीतर' में चौदह (अडसठ = ८+६=१४) लोक की ओर संकेत है। इसका अनुभव त्रिपुटी द्वारा होता है जहाँ योग दर्शन सहयोग करता है। इसके लिए त्रिपुटी में स्थित होना काफी है अलग से कहीं जाकर साधना करनी जरुरी नहीं। 
अन्तिम अनुच्छेद में 'पाँच न मार' द्योतक है पंच ज्ञानेन्द्रियों के विषय (शब्द, स्पर्श, रुप, रस, गन्ध) पर नियंत्रण या उसकेनुसार न बहते रहने का भाव। 'पचीसा न बस कर' में सांख्य दर्शन के पच्चीस तत्वों की ओर संकेत है जिनका प्रभाव मीराबाई पर नहीं रहा यानि वृत्तियाँ उन्हें अपने-अपने वश में नहीं रख पा रही। यहाँ सांख्य दर्शन का खंडन या अवहेलना नहीं वरन साधना में चरणबद्ध विकास समझाने के क्रम में दैहिक धरातल से बात शुरु की गई क्योंकि बिना देहाभिमानी हुए कोई चेष्टा नहीं होती। वही भावना पहले समाधान के लिए घुमाती फिराती है और मिलने के बाद व्यक्ति पत्थर भाँति पडा नहीं रहता पर तब वह अपने आनन्द में डुबा रहता है। इस पद में दुसरी स्थिति का उल्लेख है। पहली वाली स्थिति चार्वाक से लेकर पूर्व मिमांसा तक बनी रहती है जिसकी ओर परोक्ष रूप से संकेत किया गया प्रथम अनुच्छेद में 'फेरी न फेरु सन्तो फिरबा न जाऊँगी' के द्वारा जिसपर ऐसा कहने पर प्रश्न उठना चाहिए। आखिर वेदांत ही देहभाव से ऊपर उठने की बात करता है और इस शब्द का संबंध प्रामाणिक उपनिषदों से है। यहाँ अन्तिम पद में 'इतना म नर सुलाउगी' में मनोराज्य का नाश है जिसके चलते व्यक्ति सही-सही में तत्वदर्शी बनता है। उसके पहले स्थापित दर्शन पडाव बन जीवन में आते जाते रहते हैं। उत्तम स्थिति हेतु व्यवहारिक संतुलन, संयमित दिनचर्या, अष्टांग योग का संगम सहायता करता है। 

द्वितीय शंका उठती है त्रिपुटी तथा भारतीय दर्शनों के तालमेल पर। यहाँ दोनों का उल्लेख हुआ है। दोनों एक सिक्के दो पहलू हैं। त्रिपुटी तनिक संक्षिप्त और उसे समझने के लिए दर्शनों का दर्शन विराट रूप है क्योंकि उन्हें क्रमानुसार समझना पडता है। कई बार प्रकृति यह कार्य स्वयं करती है। स्थापित नौ दर्शन का अन्दरूनी तालमेल या एकता समझने के पश्चात क्रियान्वयन करने वाला रचनाकार त्रिपुटी में स्वतः स्थित हो जाता है। तभी मीराबाई के कृष्ण हो या तुलसीदास के राम दोनों नामरूप या अवतार तक बँधे नहीं है। इसके लिये जरूरी था भक्ति साहित्य का प्रगतिवादी पक्ष अवहेलित रहे। उपरोक्त त्रिपुटी में स्थित हर रचनाकार के साथ यही हुआ। उनको इस तरीके से बाँटा गया की उनका साहित्य जीवन में लागू नहीं हो पाया। वे कक्षा या भजन संध्या तक सिमट गये। ऐसी अनुपम धरोहर को जीवन से जोडकर पढाने की जरूरत है तभी शिक्षा नीति समाजोपयोगी होगी। आयातित विचारों से ही सामाजिक सुधार की बात करना दासता है स्वाधीनता नहीं। यहाँ की तासीर के अनुकूल विचार वैदिक वाड्मय में है। उनपर स्वस्थ सार्थक संवाद करने, मानने तथा लागू करने की जरूरत है। 


साधना वृत्ति वाले गुरुभाई सत्यव्रत ने इस पद पर विचार-विमर्श करने को कहा :-
आली री मोहे लागे वृन्दावन नीको,
घर घर तुलसी ठाकुर सेवा, दर्शन गोविंद जिको
निर्मल नीर बहत यमुना को, भोजन दूध दही को,
रतन सिंहासन आप विराजे, मुकुट धरे तुलसी को,
कुंजन कुंजन फिरत राधिका, शब्द सुनत मुरली को,
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, भजन बिना नर फीको,
आली री मोहे लागे वृन्दावन नीको।। 

      यह पद वहाँ के निवासियों को जगाने के लिए गाया था स्थान को अतिश्योक्ति ढंग से महिमामंडित करने हेतु नहीं। इनसब को जाँचने के लिए जो सुत्र हैं उनके आधार पर लक्ष्यार्थ खुलता है। महाभारत तथा भागवत महापुराण में कृष्ण का प्राचीन परिचय मिलता है। बाद में लिखे ग्रन्थों को उच्च स्तरीय चर्चा में वह मान नहीं देना चाहिए क्योंकि वे संप्रदायों द्वारा आयोजित तथा प्रायोजित हैं। बढ़ा-चढ़ाकर कहना अनिवार्य है प्रभावित करने के लिए। 

घर - घर ठाकुर (कृष्ण विग्रह) होने की बात करते हुए उनकी दृष्टि उस बोध पर थी जो हर युग में जरूरी है। जिस तरह कृष्ण ने गोवर्धन लीला के माध्यम से शासक की निरंकुशता का दमन करते हुए समाज की रक्षा की और शासक को स्वधर्म या अधिकार के साथ-साथ कर्तव्य पथ याद दिलवाया ((क्योंकि उस पद में अधिकार कर्तव्य दोनों मिले हुए हैं)) या वनभोज जैसी प्रथा सिखाई जहाँ लोग अपने-अपने घर से लाया भोजन मिलबाँट कर स्नेह से खाते हैं वैसे ही मीराबाई समाज से मिलकर रहने का आह्वान किया ताकि शासक मनमानी न करे और समाज मिलकर रहे। आखिर हर व्यवस्था में संपन्न - विपन्न वर्ग दोनों होते है। दोनों वर्गों के अन्दर  ऊँचा मध्य नीचा स्तर तक होता है। सुविधा के लिए नाम चाहे जो हो। पूर्व पक्ष उठाते हुए अन्य लीलाओं के आधार उछलकूद मचाने वाले यूट्यूब में अक्षय चैतन्य नामक चैनल की भागवत महापुराण प्लेलिस्ट के दसवें स्कन्ध वाला वीडियो सुने। (१)

यहाँ उपरोक्त पद में राधा नामक पात्र का नाम लिया गया जिसका उल्लेख मध्ययुगीन पूर्व साहित्य में नहीं मिलता। तो क्यों एक नए पात्र का उल्लेख हुआ। पौराणिक साहित्य में भक्ति माता तथा उसके दो पुत्र ज्ञान वैराग्य का प्रतीकात्मक वर्णन है। संबंध की जाँच करने जैसा व्यर्थ कार्य छोडकर समझना यह है की ये तीनों साथ-साथ रहते हैं। भागवत महात्म्य में इसका वर्णन है जहाँ भक्ति माता वृन्दावन तक में अपने पुत्रों की अवस्था से चिन्तित है। अधिकांश कथाकार उसे खुश बताते हुए कुछ श्लोकों का वर्णन करते हैं पर बाद का उदासी वाला प्रसंग नहीं बताते जिसके अनुसार वह वृन्दावन तक छोडने को तैयार है क्योंकि उसके पुत्रों की वृद्धावस्था दूर नहीं हुई। किसी के द्वारा न चाहने के कारण उनकी यह दशा हुई जो समाज की अनियंत्रित भोग-विलास वृत्ति तथा धर्म को मात्र दोहन या धंधा बनाने की लत दर्शाती है। तब सीधे-सीधे भक्ति शब्द न रखकर राधा क्यों रखा। उस समय इस पात्र की रचना के साथ इसे स्थापित किया गया कृष्ण के साथ जोडकर। इसलिये पौराणिक साहित्य में यथेष्ट विरोध है परिचय में। उसे कहीं कृष्ण की आत्मा, कहीं उसकी शक्ति, कहीं उसकी रिश्तेदार ही नहीं वरन रुक्मिणी बताकर अच्छी खासी कथा बना दी विश्वास जगाने के लिए। हल्का-फुल्का पाठभेद एक बात यहाँ कहानी हर बार नई। ऊपर से कहीं विवाहिता तो कहीं कृष्ण के साथ विवाह होने की बात। इसपर वीडियो है और उसके डिस्क्रिशन (विवरण) में तनिक अन्य बिन्दुओं का उल्लेख है। (२)  संक्षिप्त चर्चा पश्चात आते हैं पद की ओर। मीराबाई ने इस पात्र द्वारा ज्ञान वैराग्य की याद दिलाते हुए मिलजुलकर रहने, आततायी का सामना करने का उपदेश दिया है। माहात्म्य का लक्ष्यार्थ इसी ओर संकेत कर रहा है। इसीलिए यथास्थान 'गिरधर' शब्द का प्रयोग किया गया। 

यहाँ 'भोजन दूध दही को' कहने के पीछे प्राप्त कर्मफल में संतोष करने का भाव है। ग्रामीण अर्थ व्यवस्था में बैलों के अधिक प्रयोग से गायों की देखभाल ठीक से होती थी। उसके फलस्वरूप दूध, दही, छाछ, आदि सहज सुलभ थे। एक तरफ कर्मफल तथा दूसरी ओर उस वर्ग के साथ बाँटना जो इससे वंचित था। सभीके लिए उस भोजन की बात कहने के पीछे यही अभिप्राय है। तुलसी का मुकुट कोरा श्रृंगारिक प्रयोग नहीं है। रत्न सिंहासन पर बैठने वाला हरियाली या कृषि उत्पादन और कृषिकर्म को सम्मान दे। अर्थ में भूल तब होती है जब तुलसी पीपल वट जैसे शब्द आते ही धार्मिक रीति रिवाज तक उन्हें सीमित कर दिया जाता है। यहाँ एक पंक्ति में हर युग में पालन योग्य राज धर्म सिखाया गया है। 

इसमें भजन शब्द का प्रयोग घर के कामकाज से भागने या कर्तव्य से मुँह फेरने के रुप में प्रयुक्त नहीं हुआ। प्रायः प्रमाद प्रिय मानसिकता यही रुप पसंद करती है या कार्यक्रम की तरह करके निश्चिंत हो जाती है। वह जीवन में उतारने के लिए भजन शब्द का प्रयोगस्थान ध्यान देने योग्य है। पंक्ति है - 'मीरा के प्रभु गिरधर नागर, भजन बिना नर फीको' - गिरधर के अर्थ पर चर्चा हो चुकी है और उसी रुप में वह हर जगह रखा गया है। वृन्दावन में वे किसी और को पुरूष नहीं मानती अतः जो अपने आपको नर (पुरुष) मानते हैं उनमें कम से कम सद्गुण होने चाहिए और वे तभी विकसित होगें जब भजन का लक्ष्यार्थ अपनाएं - 'आदत बुरी सुधार लो, मन की तरंग मार लो, बस हो गया भजन'। इसकी संगति लगनी जरूरी है - पुरुषत्व का दंभ अमानवीयता अपनाकर नाना मुखौटों में अपनी असलियत छिपाने का प्रयास करता है। मीराबाई ने अपने ससुराल में इसका अनुभव किया था। साथ ही वे समाज की दकियानूसी सोच से मर्माहत थीं। यहाँ  नर शब्द मनुष्य के अर्थ में लिया जा सकता है। उसमें नर नारी दोनों आ जाते हैं। इसमें कोई दोष या विरोधाभास नहीं है। आखिरकार बुराई वर्ग विशेष तक सीमित नहीं। 
तभी तो सुमित्रानंदन पंत ने लिखा - ‘‘मीराबाई राजपूताने के मरूस्थल की मन्दाकिनी हैं।"

स्वामी अक्षय चैतन्य 

सन्दर्भ 
१. https://youtu.be/i1yqpkmEJvE
२. https://youtu.be/7gjWKQGUp7I




Saturday, 29 May 2021

शोधसृजन समीक्षात्मक एकल संवाद


शोध सृजन, अप्रैल माह २०२१ में प्रकाशित मार्च वाले अंक की समीक्षा।


एक ओर असहिष्णुता तथा असंजसता का भावानल और दूसरी ओर उस साहित्यिक पत्रिका की समीक्षा करने का अनुरोध जिसमें स्वयं की रचनाएँ प्रकाशित हो रही है एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। 
शोध सृजन पत्रिका परिवार को शुभकामनाएं देते हुए मार्च माह के अंक को तनिक समझा जाय। किसी भी पत्र पत्रिका का संपादकीय महत्वपूर्ण होता है और वह यथासंभव निष्पक्ष निष्कलुष रहने के साथ-साथ पाठकों को जगाने सोचने-विचारने का सफल प्रयास करे तब फिर कहना ही क्या। वैचारिक मतांतर या पूर्व पक्ष तक का स्वागत-सत्कार है क्योंकि उसके लिए यथेष्ट स्वाध्याय ही नहीं वरन पंक्तियों के मध्य पढना तथा संगति लगाने की क्षमता चाहिए। अपने विद्यार्थी जीवन में पढी पंक्ति 'हर आवाज विद्रोह और हर भटकन एडवेंचर नहीं होती' याद आ गई। संपादिका महोदया अर्चना पाण्डेय का संपादकीय वक्तव्य उस मानसिकता पर चोट है जो चिन्मय सत्ता के नारी रुप की अराधना करते हुये उसकी प्रतिनिधि माताओं बहनों का शोषण-दमन करने के लिए नाना उपाय करता है। पुरुषों को उस मुकाबले में शोषण का सामना कम करना पडा। घरेलू हिंसा के शिकार दोनों होते हैं। संपादकीय में स्वर्ग तथा मोक्ष वाले बिन्दु पर जोर है। समर्थ से समर्थ रचनाकार तक जीवन के सारे आयामों पर चिन्तन मनन नहीं कर सकता। एक रचना में भी वह गिने-चुने बिन्दु रखता है। समय की क्रमिक जरुरत के अनुसार चीजे सामने आती हैं। मानस के समय तक शोषणकारी बातें धर्म का जामा पहन चुकी थी जैसे नारी को मोक्ष का अधिकार नहीं, वह संस्कृत पढ - बोल नहीं सकती, इत्यादि। अतः समयानुकूल मोक्ष की प्राप्ति बताई गई मानस में। मीराबाई कबीरदास आदि ने नारी सम्मान को उचित स्थान दिया अपनी शैली में। हाँ इतना अवश्य है कि अनियंत्रित स्वच्छंदता नर नारी दोनों के लिए समर्थित नहीं हुई। सामाजिक ढाँचे को चारित्रिक स्वाधीनता या उच्छृंखलता की भयावहता से बचाने के लिए जो करना चाहिए था उसमें लोलुप राजसत्ता और दरबारी विद्वानों ने टाँग अडाकर पुरुषों को हावी रहने का अधिकार दिया। उसके लिए मनगढंत पुस्तक लिखने से लेकर पुराने ग्रंथों में श्लोक जोडे गये। यहाँ तक की स्थापित नौ दर्शन नारी सम्मान के पक्ष में है। हुआ यह कि चारित्रिक स्वाधीनता को नारी मुक्ति का पर्याय कहा गया। यह तक नहीं सोचा की भले मनुष्य पशु हो पर पाशविक जीवन सामाजिक ढाँचे को खत्म कर देगा। हो वही रहा है फिर चरित्रहीनता पर रोना किसलिए? 
 हिंदी शोध की समस्याएँ शीर्षक लेख ने ध्यानाकर्षण किया जिसमें रचनाकार सरजू प्रसाद मिश्र ने काफी संयमित होकर बातें कहते हुए चुटकियाँ लीं। गागर में सागर भरने का सफल प्रयास और कई सावधानियों के प्रति जागरूक किया। मार्गदर्शक तथा शोधार्थी की कमजोरियों की ओर संकेत किया। आखिर हर तरह के लोग हैं दुनिया में। पुरानी पाण्डुलिपि में फेरबदल से लेकर अन्य शोधार्थी को रुपये देकर लिखवाना और क्या-क्या नहीं होता। इसके अलावा प्रायोजित शोध शिक्षा जगत को दूषित करता है जैसे जबलपुर से एक तथाकथित विद्वान ने मानस में क्षेपकों पर पुस्तक लिखकर प्रकाशित करवाई। अवधी में लिखी गई रचना में हिन्दी के अनुसार या अवधी शब्दों का संस्कृत अर्थ लगाना नासमझी है शोध नहीं। पंद्रह वर्ष के अध्ययन पश्चात लेखनी उठाने वाले रचनाकार को खंडित करने में नाममात्र समय लगता है। मानस या उसकी समकक्ष रचना समझना हँसी ठट्ठा नही है। यह पक्ष शोध में अछूता रहता है और ऐसे ऊटपटांग शोध ग्रन्थ आते हैं की बहुधा आँख शर्म से झुक जाती है। दो दशक पूर्व हमें कहा गया था कि चार्वाक दर्शन को दलित दर्शन प्रमाणित करने पर हुए शोधकार्य को आप समर्थन कर दें क्योंकि आपने उसके सुत्रों को खोला तथा संगति लगाई है। हमने इन्कार कर दिया। नए विषय या पुराने विषय पर नए दृष्टिकोण की आड में खेला जा रहा खेल अपनी जडे काटने के समान है। 
अपना या अपनों का दुखडा साहित्य में साँझा करना एक बात है पर उसमें औरों को कोसना या पूरे वर्ग विशेष को कलंकित करना कुछ और भले हो रचनाधर्मिता नहीं है। आपलोग दलित साहित्य शब्द से परिचित हैं और एक वाक्य नाना तरीके से सुना होगा - 'आप दलित नहीं इसलिए उसका दर्द नहीं समझ सकते। हमलोगों ने बहुत सहा है और अब भी अवहेलित हैं।' इससे इंकार नहीं किया जा रहा पर साहित्य सृजन के बहाने घावों को कुरेद कर ताजा रखा जा रहा है। क्या इससे समस्या सुलझेगी? अवहेलित वर्ग स्वयं अनेक उपजातियों में विभाजित ही नहीं वरन उसके चलते आपस में एक दूसरे का शोषण-दमन करते हैं और रोटी बेटी का संबंध तक नहीं रखते। जब आरक्षण आदि के चलते मोटी तनख्वाह वाली नौकरी करते लगते हैं तब बहुतों को अपने समाज का गरीब तबका याद नहीं रहता पर वे स्वयं योजनाओं से लाभ लेने से नहीं चूकते जो केवल आर्थिक रुप से गरीबों के लिए बनी है। दलित साहित्य के बडे हिस्से को इन बातों से मतलब नहीं। विडम्बना यह भी है कि आहूति देने में प्रायः सब साथ-साथ चलते हैं लेखनी के द्वारा फिर चाहे वे जिस वर्ग (वर्ण) के हो। इस अंक में छपे दलित काव्यभाषा पर लेख ऐसा ही एक उदाहरण है। पूर्व पक्ष उठाते हुए कहा जाय कि यह मात्र परिचय करवा रहा है तो साहित्यिक जगत उससे अनजान नहीं। जरुरत है तत्वदर्शी आलोचना की जिससे बौद्धिक तृपि होती है। इसे व्यक्तिगत कटाक्ष न समझा जाय। इसीलिये केवल रचना का जिक्र किया है। 
अपना अनुभव साँझा किया जाय। २०१३ में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ने भारतीय दर्शन में अंतर्निहित मूल्य पर वक्तव्य देने के लिए आमंत्रित किया था। चार्वाक दर्शन पर बोलने के बाद कई शोधार्थियों ने ने घेर लिया। बातों-बातों में पता चला कि अछूते विषय पर मार्गदर्शक करने वाले नहीं या रुचि नहीं क्योंकि उसमें तैयार मसाला नहीं मिलता। आई आई टी के एक प्राध्यापक ने अपने विद्यार्थी जीवन का अनुभव बताते हुए कहा कि भाषा विज्ञान पर भारत में दकियानूसी सोच अब भी जारी है जिसके चलते उसे संस्था बदलनी पडी और आई आई टी में दाखिला लेना पडा क्योंकि शोध के मामले में उसके तथा विश्वविद्यालय के कई नियम अलग है। उसके अनुसार विषयानुसार मार्गदर्शक न मिलने पर निदेशक या अन्य किसी अधिकारी को मार्गदर्शक बनना पडता है नियम की रक्षा के लिए। जब स्वतंत्र जाँच-पड़ताल की चार्वाक दर्शन पर तो उसे अलग पाया। जब शैक्षिक जगतवालों से संपर्क साँधा तो कुछ ने खुलकर या संकेत में समझा दिया की दर्शन का विद्यार्थी होना जरूरी है। अधिकांश लोग आयातित विचारों के आधार पर यहाँ के दर्शनों की पारिभाषिक शब्दावली की परिभाषा मानने में सहूलियत महसूस कर रहे थे। 
रैदास पर भवदीय राम आह्लाद चौधरी का मननशील लेख संत परंपरा की याद दिलाता है जो कट्टरता से ऊपर है। लेख में प्रवेश करते हुए वे एक जगह कहते हैं, 'इस पर गौर करने से यह पता चलता है कि जीवन को निष्कलंक निष्पाप बनाने में जहां रचनाशीलता की भमिूका होती है इसलिए कि सृजनशीलता हमेशा सर्जक को सत्ता और उसके गलियारे से दर रखती है।' यह दरबारी रचनाकारों पर कटाक्ष है जो नाम भले कमा ले पाठ्यक्रम में शामिल हो जायें पुरस्कृत हो जायें शिक्षा जगत में बर्चस्व कायम कर लें पर समाज को सही दिशा नहीं दे सकते।(१)
रैदास का साहित्य उपनिषदों का सरलीकरण करते हुए सामाजिक पाखंड पर प्रहार करता है जहाँ शास्त्रों की दुहाई देकर शोषण धर्र सम्मत बना दिया गया। जैसे वैदिक वाड्मय गुण कर्म की बात करता है। इसी आधार पर सृष्टि कार्य बँटे हैं पर पढाया कुछ और गया। घर में आग लगी घर के चिराग से। इसीलिये ऐसे विचारक आते हैं समाज में अलख जगाने। ज्ञान, भक्ति, वैराग्य की त्रिपुटी में स्थित संतों ने प्रामाणिक उपनिषदों को समाज तक पहुँचाया। स्थान काल परिस्थिति वश समझाने की शैली भले अलग हो पर मूल चीज़ एक है। यहाँ तत्त्व एक है कहने मात्र से लक्ष्यार्थ नहीं खुलता रचनाओं का। आखिर ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती। गीता कर्मयोग पर कहती है कि राग-द्वेष में बहना बंद करके कर्तव्य पालन करो और वही स्वधर्म है। अन्य तरीके से कहें तो सृष्टि प्रबंधन द्वारा प्राप्त भूमिका को निभाते रहो। (२)
एक बार सत्संग के लिए रैदास से संबंधित आश्रम के महंत से मिलने गये। पदों पर चर्चा के बदले सुनने को मिला, 'उनके पहले कोई गुरु नहीं हुआ। पहले ऋषि होते थे। आपके यहाँ शिष्य अलग थाली में खाना खाता है, तब ब्रह्म एक कैसे हुआ। हमलोग एक थाली में खाते हैं, हमारे यहाँ कोई भेदभाव नहीं।' जबकि वे अलग पोशाक पहने ही नहीं अलग सजे हुए आसन पर बैठे थे। चर्चा के नामपर वे रैदास रचनाओं से अनर्गल बातें करते रहे। हमलोग संत साहित्य को वाद या नाम के आधार पर बाँट देते हैं डुबकी नहीं लगाते। यह लेख डुबकी लगाने की ओर संकेत कर रहा है। 
कविता के विदूषक शीर्षक लेख अच्छा प्रयास है वेदमित्र शुक्ल का। ऐसे कार्यक्रम सतही वाहवाही हेतु आयोजित होते हैं। यह भी काले धन को सफेद करने का अच्छा माध्यम है जहाँ स्तर के बदले अन्य सभी बातों का ख्याल रखा जाता है। गद्य को खुल्लमखुल्ला नई कविता के नामपर चलाकर फूहड़ उत्तेजित भड़काऊ शब्दों द्वारा वाहवाही लुटी जाती है। आयोजक क्या करें समाज में हर तरह के श्रोता हैं औरू ऐसे कवियों की माँग अधिक रहती है। राजनीतिक दल ऐसे कवियों का उपयोग अपने प्रचार-प्रसार हेतु करते हैं। 
 एक अन्य शीर्षक पर ध्यान गया- साहित्य : वैचारिकता तथा बौद्धिकता। अरे, यह तो अपने द्वारा लिखी गई है। निज कबित्त केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका॥ इच्छा हुई अपनी पीठ थपथपाते की। अपने परंपरावादी न प्रयोगवादी, विवादी न प्रतिवादी। अब जरा सा और कह दिया जाय स्वरचित कविता आँसू द्वारा:-
  तुमसा उपकारी न दूजा / एक से निकल / दूजे का वजन बढाते / तुमसे सजता रचना संसार / वाद वाद खेल खिला / लगाते प्रयोजनवादी कतार / कहीं ऊष्म आँसू कहीं शीतल आँसू / कहीं नर आँसू, कहीं मादा आँसू / कहीं अपने आँसू, कहीं पराये आँसू / कहीं अगडा आँसू, कहीं पिछडा आँसू / कहीं प्रेमी आँसू कहीं विरही आँसू / कहीं धोते आँसू, कहीं धुलाते आँसू / कहीं छिपे आँसू, कहीं दिखे आँसू / कहीं छिपते आँसू, कहीं छिपाते आँसू / कहीं छपते आँसू, कहीं छपवाते आँसू / कहीं छल के आँसू, कहीं मन के आँसू / कहीं भरमाते आँसू, कहीं घबराते आँसू / कहीं दीन आँसू, कहीं मीन आँसू / कहीं हँसते आँसू, कहीं हँसाते आँसू / कहीं रोते आँसू, कहीं रुलाते आँसू / तु क्या है आँसू ? / तुम्हें साहित्य का वास्ता / धर्मध्वजी का वास्ता / मसानिया वैराग का वास्ता / कुर्सी का वास्ता / मगरमच्छ का वास्ता / इन नैनों से न निकलना / निरावरन न करना । (३)

स्वामी अक्षय चैतन्य 
संदर्भ :--
१. रचनाधर्मिता 
https://youtu.be/9x1eZXZ0DkQ
हिन्दी साहित्य का उपयोग 
https://youtu.be/2xrmh1Q1V_Y
साकेत (दो राहा - कथा संग्रह) कोलकाता से प्रकाशित। 
२. वेलकम और भीडकम 
https://youtu.be/SAMO8F2wNaM
३. स्वरचित कविताओं द्वारा संवाद 
https://youtu.be/0yuoOHThHGM

Sunday, 28 March 2021

साहित्य : वैचारिकता तथा बौद्धिकता


शोध - सृजन पत्रिका के मार्च माह में प्रकाशित रचना (साहित्य : वैचारिकता तथा बौद्धिकता पृष्ठ ५३) को ब्लॉग से भेजा गया था।


बचपन में सुना करते थे कि पहले का जमाना बहुत अच्छा था और आजकल मुल्यों का पतन हो गया है। पचपन तक आते-आते वही वाक्य औरों को यो सुनाने लगे मानो यह नवीन खोज है। अपने यहाँ औरों पर दोष थोपने की सुदृढ़ परंपरा ने किसी को नहीं छोडा। भगवान, से लेकर पश्चिमी शिक्षा, मनोरंजन के साधन आदि याद आए पर उसमें अपना योगदान देखना भूल गये। बस आँख बन्द कर समर्थन या विरोध में जुट गए। ऊपर लिखने का वेग हावी हो जाय तो कहना ही क्या। आनन फानन में साहित्यिक सेवा शुरु हो कर किसी-किसी के लिए सुनामी का रुप ले लेती है। भले ही कायदे से प्रश्नपत्र हल न किया हो समस्याओं पर अपनी समझ सही बताते हैं। अपना खोखलेपन बचाने खातिर हर वह उपाय करते हैं जिससे उनकी रचनाधर्मिता प्रतिष्ठित हो जाय। 

वैचारिकता की वर्तमान कडी साहित्य केन्द्रित है जहाँ अपनी-अपनी संकीर्ण बौद्धिकता के बोझ तले रचनाधर्मिता को ठीक से जीने नहीं जीने दिया जाता। बहुतों को इसका बोध अन्तिम साँस तक नहीं होता और वे साहित्य सृजन के नामपर अपनी अतृप्त एषणा, व्यक्तिगत मानसिक विकार, शाब्दिक दंगल में समाज को भरमाते हैं। 

साहित्य शब्द सामने आते ही उसकी नाना विधाएँ मानस पटल पर आ आलोड़ित कर व्यक्ति विशेष की रुचि के अनुसार उसका स्वागत करती है। हर विधा वैचारिक संप्रेषण का सशक्त माध्यम होते हुये भी नाटक, कहानी, कविता, उपन्यास समाज में अधिक लोकप्रिय हैं। जबकि प्रबंध, निबंध, आलेख, समीक्षा, शोधपत्र, शोधग्रन्थ, आत्मकथा आदि की पहुँच वर्ग विशेष तक रहती है। सीधे-सीधे सामाजिक प्रभाव डालने वाली विधाएँ समकालीन विषय केन्द्रित रहती हैं। इनमें पत्रकारिता नामक विधा मुख्यतः समाचार तथा सुचना प्रधान है जिसका उद्देश्य बिना लाग-लपेट के समाज को तात्कालिक परिस्थितियों से अवगत कराना है। उनकी विवेचना संपादकीय में होती है और इसीलिए इसे समाचार पत्र तथा पत्रिका की जान कहा जाता है। आधुनिक संचार माध्यमों में होनेवाली परिचर्चाओं से ऐसी ही विवेकवान विवेचना की आशा समाज करता है। समाज को निराशा तब होती है जब विधाएँ येन-केन प्रकारेण स्वयं को स्थापित करने की अदम्य लालसा से ग्रस्त त्रस्त पस्त हो संप्रेषण करतीं हैं। इस लालसा में उन सबका प्रत्यक्ष - परोक्ष अवदान रहता है जो संसाधनों पर एकाधिकार मानते तथा समाज को मात्र 'वस्तु' समझते हुए बौद्धिक आतंकवाद बढाते हैं। बौद्धिकता और आतंकवाद का मिलन वह विष है जो योजनाबद्ध तरीके से फैलाया जाता है। कभी धीमे-धीमे असर करनेवाले तो कभी एकदम उत्तेजनात्मक शैली का प्रयोग होता है। धीमे असर करनेवाला विष पाठ्यक्रम, चलचित्र, धारावाहिक के माध्यम से पिलाया जाता है। इनमें पाठ्यक्रम सबसे सरल माध्यम है जहाँ पाठ्य पुस्तक को अलग रखना मुमकिन नहीं और इसकी चपेट में पीढ़ी दर पीढ़ी तक आती है। नए खिलाडी परिवर्तन के नामपर इसे ही खेलते रहते हैं। इसमें दूर से दिखने वाली बुराई सत्तासीन होते ही अच्छाई या आवश्यकता में बदल जाती है जैसे कई विषयों पर विपक्षी का विरोध सत्ता प्राप्ति पश्चात भूला दिया जाता है। केवल राजनीति नहीं यह प्रवृत्ति कमोवेश व्यवहार तथा आजीविका के हर क्षेत्र में औरों पर अनाधिकार शासन करने की लालसा द्वारा उस समय मुखर होती है जहाँ मनन, चिन्तन, निदिध्यासन, अनुभव का स्थान नहीं रहता। बहुधा ऐसी पडताल को ढकोसला पाखंड कहकर व्यक्ति अपने खोखलेपन को उजागर करता है। यह और बात है कि पत्रकारिता के मामले में समाचार देते हुए यह पडताल नहीं हो पाती पर संपादकीय में विश्लेषण द्वारा वह (पडताल) होनी जरूरी है बशर्ते व्यक्तिगत हित हावी न हो जो कई रुपों में प्रभावित करते हैं। फिर चाहे वह बदले की भावना, सत्ता का दबाव या ठकुरसुहाती, क्षेत्रवाद, दो एक घटना की आड में पुरे वर्ग या राज्य विशेष को बदनाम करना, समस्या से अधिक व्यक्ति विशेष पर बोलना - लिखना, समाधान बतलाने की आड में अपना खेल खेलना हो या अन्य कारण जो समस्या केन्द्रित नहीं रहते। 
यहाँ पहले के समय के अच्छे होने की प्रामाणिकता पर शंका स्वाभाविक है। राजतंत्र के दीर्घकालीन इतिहास में नाना तरह के शासक होते चले गये। यूँ तो हर व्यवस्था कुछ विद्वानों को पालती है ताकि वे उसे महिमामंडित करे और हर वह उपाय अपनाए जिससे उसकी कमजोरी उजागर न हो। इसके लिए नवीन ग्रन्थों की रचना से लेकर पुराने में छेड़छाड़ की गई। दुसरी ओर विजेता द्वारा लिखा गया इतिहास भी मनगढन्त बातों से भरा रहता और जानी हुई बात है कि पराजित शासक जल्दी से इतिहास नहीं लिखवाएगा। ऊपर से अधिकांश साहित्य में साधारण व्यक्ति नदारद है। रचनाकार केवल शासक तक सिमट गये और उससे जुडी बातों का विस्तार किया। औपचारिक लिपाई की तरह कहीं-कहीं दो एक वाक्य समाज के ऊपर दिखते हैं पर वे स्पष्ट जानकारी नहीं देते। यह तो है नहीं की किसी को कोई कष्ट नहीं था। सत्व, रज, तम से बनी सृष्टि में हर तरह की वृत्तियों का चक्र घुमते रहता है और उसके चलते भावनात्मक द्वन्द्व हर युग में था, है, रहेगा। तब समाज का यथार्थ या कम से कम यथासंभव चित्रण न करना ही साहित्य को अप्रासंगिक बनाता है उस समय के लिए जिसके बारे में जानने का प्रयास किया गया। इसीलिए शिष्ट आचार्यों ने पौराणिक साहित्य को विश्वसनीय नहीं माना। उसके बाद में रचित रचनाएँ दरबारी रचनाकारों की देन अधिक थी जिसमें अपने-अपने प्रायोजक शासक को खुश करना प्राथमिकता थी। अधिकतर रचनाकार भक्ति की आड में भोग विलास रचनाओं द्वारा अपने प्रायोजक को खुश करने में मगन थे। उनके लिए कृष्ण या अन्य प्रतीक आवरण मात्र था अतृप्त एषणा की पूर्ति का। समाज की वास्तविकता बतलाने के बदले उसे दबाकर रखने पर जोर देते हुए युगानुसार परिवर्तनशील रीति रिवाजों को मानने की बाध्यता प्रचारित करने के अलावा उनमें बढोत्तरी की। एक वर्ग ने प्राचीन साहित्य के नामपर शोषण किया तो नकली सुधारकों ने अपनी वाक्पटुता द्वारा उनके पास आने को कहा और शोषित लोग उधर गये पर दोनों ने यह नहीं बताया की सही-सही साहित्य लिखा क्या है। इन मगरमच्छी आँसू बहाने वाले सुधारकों ने पंथ या संस्थागत कट्टरता फैलाई जिससे लोग पहले के प्रामाणिक साहित्य में निहित मुल्यों से वंचित रहे और इसका प्रबल उदाहरण मिलता है स्थापित नौ दर्शनों के पठन-पाठन में। चार्वाक दर्शन को तो आजतक उचित मान नहीं दिया गया और उपनिषदों के जीवन मुल्य सामने नहीं आ पाए। दरबारी और पंथों का साहित्य अपने-अपने अन्नदाता को खुश करने में जुटा था। तभी दर्शन और साहित्य का संबंध में खाई बनी और व्यक्तिगत विचारों ने समाज को भ्रमित किया। यहाँ तक की भक्ति के नामपर अशालीन श्रृंगारिक साहित्य तक लिखा गया। शाक्त अघोरी तथा वामाचार विचार का बोलबाला जिन इलाकों में था वहाँ का साहित्य भोंडेपन से भरा था। सबमें साधारण व्यक्ति का जीवन नदारद था और सब अपना वर्चस्व स्थापित करने की लालसा में एक दुजे के लिए अमर्यादित भाषा का प्रयोग धडल्ले से कर रहे थे। अतः इस आपाधापी में जनता का दुःख दर्द महत्वपूर्ण नहीं रहा। 
अगर यह कहा जाय की अंग्रेजों के शासनकाल में साहित्य का संबंध सीधे-सीधे जनता से जुडा तो यह प्राचीन साहित्य का अपमान होगा क्योंकि उनमें छिपे मुल्य समाज के समक्ष नहीं रखे गये। इस मामले में बौद्धिकता आयातित विचारो या सुनी सुनाई बातों के जाल में उलझ गई। एक तरफ पारंपरिक राजतंत्र था जिसका समय विदेशी शासक की जी हजूरी या लडने में व्यतीत होने लगा और रचनाकार उसी अनुसार ढलते चले गए। अंग्रेजों से लडने वाले शासकों के समर्थक रचनाकार उनमें जोश भरने या समाज को जगाने वाला साहित्य लिखने लगे। यह उस समय की माँग थी जिसके चलते स्वतंत्रता संग्राम में गीता के कर्मयोग पर विस्तृत चर्चा की बालगंगाधर तिलक ने अपनी पुस्तक गीता रहस्य में। यानि पहले के साहित्य में भी मुल्यों की कमी नही थी पर उन्हें ठीक से उजागर नहीं किया गया। व्यवहार सुधारने वाले साहित्य को पूजा पाठ तक सीमित रखने में भ्रमित लोगों का हाथ था। कुछ ऐसा व्यवहार मानस के साथ हुआ। यहाँ तक की वैदिक वाड्मय में वर्णित नौ दर्शनो की उपादेयता भुला दी गई। उनपर दकियानूसी या पाखंड फैलाने तक का आरोप घुमा-फिराकर लगा दिया गया। अतः आयातित विचार अधिक प्रेरक बने उन सबके लिए जिन्होंने फैलाई गई बातों या विकृत पाठ्यक्रम को आँख मुँद कर प्रमाण माना। कई बार सत्ता या संस्कृति विरोधी आन्दोलन की सफलता के लिए मनगढन्त किस्से-कहानियाँ या अफवाएँ फैलाई जाती है जिससे लोगों में उन्माद बढे और वे मरने-मारने हेतु तैयार हो जाएं। भारत में यह खेल जिन तरीकों से खेला गया उनमें साहित्य भी शामिल था। इस खेल में व्यक्ति विशेष के लालन-पालन ने बडी भुमिका निभाई और कई शिक्षित लोगों को धर्म परिवर्तन सबसे सरल रास्ता लगा। ऐसे शिक्षित लोग प्राचीन साहित्य खँगाल नहीं पाए क्योंकि संस्कृत पठन-पाठन की भाषा नहीं रही, तथ्य समझाने वालों से दुरियाँ, व्यक्तिगत रुचि का पूर्णतः अभाव, विदेशी जीवन शैली का मोह जैसे कारणों का प्रभाव हावी रहा। जहाँ मैक्सिको, क्युबा जैसे देशों ने आयातित विचारों को अपनी-अपनी माटी के अनुकूल बनाकर अपनाया वहीं भारत में न के बराबर परिवर्तन किया गया। ऊपर से यहाँ के पारंपरिक दर्शनों को दरकिनार कर छायावाद, रहस्यवाद जैसे शब्दों के सहारे रचनाकारों को बाँट दिया। पहले भक्ति साहित्य के साथ यह खेल जी भरकर खेला गया था। (१)
आधुनिक साहित्य में कई रचनाकार हुए जिन्होंने यहाँ की तासीर के अनुकूल रचनाधर्मिता निभाई। शोषण-दमन का भरपूर चित्रण किया पर विध्वंसात्मक प्रतिक्रिया का समर्थन अधिक नहीं किया। तभी प्रेमचंद की लेखनी से बडे घर की बेटी जैसी रचना निकलती है। यह उनके साहित्य की अकेली रचना नहीं हैं जिसमें अन्य वर्गों के पारिवारिक मनोविज्ञान और बिगड़ती स्थितियों को सँभालने की बात न हो। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से अवगत कराना गलत नहीं है। शिवानी की रचनाओं में यह भाव निखर कर सामने आया। विन्दु जी शर्मा की रचनाओं में समाज के साथ स्वस्थ संवाद है। यहाँ लकीर के फकीर बनने की बात नहीं वरन नीर क्षीर विवेक वाली दृष्टि है जो मूल्य तथा मूल्यहीनता को समाज के सामने बिना भेदभाव रखे। मध्ययुगीन रचनाओं में रामचरितमानस एक चर्चित उदाहरण है जिसमें कथात्मक शैली में दोनों पक्ष रखे गए। इसमें ढेर सारे दोष देखने वाले कथाकारों ने नई रामकथा लिखी, दो एक तथाकथित विद्वानों ने पुनरावृत्ति / पुनरुक्ति दोष दिखाया मानस में पर भूल गए कि यह एक अलंकार भी है। ऐसे सिरफरों के अनुसार तुलसी असहिष्णु थे, कबीर विरोधी थे - वाह रे बौद्धिक गुलामी तेरा जवाब नहीं। बिना बीजक में ठीक से डुबकी लगाय कबीरदास की आड में जातिवाद का खेल खेल खेलते हुए भूल जाते हैं कि कबीर बने बिना कबीर को समझना टेढी खीर है। सतही चिन्तन प्रसाद, पंत, महादेवी वर्मा आदि की गहराई मापने की कोशिश भले करे पर उनकी संगति दर्शनों के साथ लगा नहीं पाती क्योंकि अन्तर्मुखता की उपादेयता से वह अलग है। क्या प्रगतिशील या प्रयोगवाद के नामपर ऐसी टिप्पणी विकृत मानसिकता नहीं दर्शाती? नब्बे के दशक में कोलकाता के कई तथाकथित बुद्धिजीवियों ने यह बात खुलकर कही। वे सब शिक्षा जगत के जिम्मेवार पदों पर आसीन थे तब भी कहने के पूर्व सोचा-समझा नहीं। धीरे-धीरे इनकी मंडली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नामपर समझाने लगी की कामायनी, साकेत, दीपशिखा आदि कैसे लिखे जाने चाहिये थे। ऐसा कहने वालों ने स्वयं उस स्तर के ग्रन्थ नहीं लिखे और न उनके रचनाकार इनसे ((परदेसी विचारप्रचारक)) शिक्षा प्राप्त कर सके। अब प्रसाद को प्रसाद बुद्धि से समझने की जरूरत है। स्थापित दर्शनों को जानने तथा जीने वाले रचनाकारों की श्रृंखला की एक कडी थे। केवल छायावाद का ठप्पा लगाना बहिर्मुखता की निशानी है। जो चाहे जितनी ताल ठोक ले आयातित ऐनक से यहाँ की माटी पहचानी नहीं जा सकती एवं उससे यहाँ के उन रचनाकारों पर जो स्थापित नौ दर्शनों को जी चुके हैं या ज्ञान, भक्ति, वैराग्य की त्रिपुटी में स्थित हैं - - मनमाना वक्तव्य देना वाणी का अपमान, अतृप्त एषणा के वशीभूत तथा बिना निदिध्यासन के लिखना भारतीयता नहीं। तत्वदर्शी समालोचना ही ग्रहणशील है। उसीसे शिक्षा का सम्मान है। बोलने की स्वाधीनता कुछ भी बोलने का पर्याय नहीं।(२) ऐसे महानुभावों हेतु गोस्वामीजी ने कहा - नहिं कोउ अस जन्मा जग माहीं | प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ||

सांस्कृतिक चेतना जगाने के लिए इतिहास आधारित रचनाएं सामने आई। यह राजतंत्र वाले युग में अधिक हुआ जहाँ अंग्रेजों का शासन भी था। बातें सीधे-सीधे कहने में अनावश्यक खतरा था विदेशी शासक का। प्रस्तुतिकरण के प्रति जागरूक रहकर भी जगदीश च माथुर ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई। अपने समय की तकनीक (रेडियो) को भी समाज से जोडा ताकि लोग वंचित न रहें। कोरे शास्त्रार्थ से बौद्धिक खुजली भले तुष्ट हो समाज को दिशा नहीं मिलता । मंचित और रेडियो की प्रस्तुति में फर्क होता है। यहाँ अनुभवी रचनाकार या प्रस्तुति करनेवाला सामंजस्य करते हुए अपनी बात कह देता है। हर तरह तथा हर जगह का शासन तंत्र अपनी दाल गलवाने के फेर में लगा रहता है। जगदीश च. माथुर हो या जयशंकर प्रसाद या उस स्तर के अन्य रचनाकार ने उसका एक तरह से विरोध किया और उसके लिये आयातित वादों को आँख बन्द करके नहीं माना। ऐसे कई जने हैं यहाँ उदाहरण हेतु चन्द नाम लिये गये। दुसरी तरफ ऐसे रचनाकारों को संख्या कम नहीं जो केवल परदेसी ऐनक से भारत को जाँच रहे थे। जुगाड लगाकर काले धन को सफेद करनेवाली संस्थाओं के अध्यक्ष से लेकर उनकी पत्रिकाओं के संपादक बनने आदि की होड में साहित्यिक सेवा का वह स्वरुप सामने लाता हैं जहाँ जागरुकता छल के सिवा कुछ नहीं। 
स्वरचित काव्यात्मक शैली में इस भाव का अनुभव करें :- कविता है क्या - - 
 सनसनी - समाचार - सतही संवाद नहीं / कतरन - कलह - कलेस नहीं / हिसाब - किताब नहीं / शब्दकोश - शब्दजाल नहीं / सीधा प्रसारन नहीं / कविता को कविता रहने दो / सहज सरिता बनती कविता। 
कविता, है सविता / अधपके भाव न डाल / साफ सरिता से हमसब / कलम-कविता, दोनों सविता / रव छोर कलरव अपना / सुभाव सुधार अपना / सविता का वरदान / कविता में उतार जरा / मन काँव काँव नहीं / कविता चाह रहा / भारहीनता चाह रहा / बदला नहीं बदलाव चाह रहा / संडास नहीं सुवास चाह रहा / कविता को कविता रहने दो ।(३)
विकट विषम परिस्थितियाँ हर युग में थी, है, रहेगी। समाज से लेकर संस्कृति का उत्थान पतन वह घुमता पहिया है जो किसी का शासन चिरस्थाई रहने नहीं देता। समष्टि प्रबंधनानुसार प्राकृतिक या प्रकृति प्रेरित मानवीय घटना फेरबदल करती है। इसे देखने, जानने, समझने के उपरान्त कर्ताभाव में मन बहते रहता है। वह अपने-अपने क्षेत्र में किसी और को आगे बढाना तो दूर हतोत्साहित कर जात पात, क्षेत्र, भाषा की आहूति पा व्यक्ति विशेष को अधिक दम्भी बनाते हुए कच्ची, अधपकी, जली भावनाओं को लेखनी द्वारा परोसते रहता है। अगर इस विकृत मानसिकता वाले शिक्षा जगत में अपना स्थान बना ले तब पाठ्यक्रम तक कलुषित कर देते हैं खंडन मंडन की कूटनीति चलाकर। एक चर्चित साहित्यिक संस्था के अध्यक्ष ने कहा था कि वे उन्हीं रचनाओं की समीक्षा छापते हैं जिनको उठाना होता है। ऐसी मानसिकता वाला वर्ग समस्या के बिना जी नहीं सकता और उसपर मनन किये बिना लेखनी उठाकर खोखली संवेदनशीलता का ढिंढोरा पीटता है। अपनी समकालीन समस्याओं पर नजर रखने से ज्यादा विरोधी खेमे के रचनाकारों की सक्रियता पर ध्यान देता है। हर समस्या (दुष्कर्म, महामारी, शोषण-दमन, आदि) कुछ को रचनाकार अवश्य बनवाकर पहले से लिखने वालों के लिए प्रेरणादायी बनती है। एक आम समस्या की जाँच की जाय । महंगाई उस समय भी कचोटती थी जब गेहूं दो रुपये किलो बिकने लगा या कोलकाता में सार्वजनिक यातायात की टिकटों में पाँच पैसे बढे। यातायात वाले ईंधन का मूल्य सभीको कचोटता है पर कोई सरकार से पूछ कर गृहस्थ जीवन शुरू नहीं करता जबकि उसीपर तथाकथित महंगाई की अधिकतम मार पडती है। साज श्रृंगार या स्तर दिखानेवाले सामान का मूल्यवान होना सहज स्वीकार्य है पर कृषि उत्पादन का नहीं। लोग पाँच दस साग सब्जियों का नाम लिख दो चार पंक्तियाँ और जोड कविता या अन्य विधा में किस्मत आजमाते हैं। इस तरह सब्जी मण्डी का हिसाब-किताब साहित्यिक रुप लेता है। इस दोहरी नीति में विश्लेषण की याद नहीं आती। 
काव्यात्मक शैली में (स्वरचित) :- मसाला - - 
साहित्य सृजन बाबा / मसाले का सवाल बाबा खेमों-गुटों-वादों खातिर / गहन मनन से बैर बाँधा / परदेसी वाद से संबन्ध साँधा / समझदारी छोर दी बाबा / सृजन सवाल हल हो रहे बाबा / अनाचार, दुराचार, व्यभिचार / फलते फूलते रहे / चले जितनी चाहे / चलती रहे इनकी / भरे रहे खलिआन / साहित्य पल रहा बाबा / पीएचडी दिलवाता बाबा / पुरस्कार दिलवाता बाबा / उपाधियों का चुल्हा, शोषण का ईंधन / कुर्सी की कडाही, भावना का तेल / खेमों की चाशनी, शब्दों की जलेबी / संगत मिली बाबा रंग जमा बाबा / नागफनी किस सहारे पले बाबा / थोरा कहा बहुत समझना बाबा । (४)
इस संक्षिप्त चर्चा में साहित्य हेतु समस्या रुपी संजीवनी की अनिवार्यता समझ में आई। धीरे-धीरे दो स्थितियाँ उभरी। पहले में कथात्मक या साहित्य सम्मत शैली वाले ग्रन्थ जैसे मानस हैं जिनमें समस्या को ज्यों का त्यों नहीं रखा गया और न ही उसके आधार पर किसी क्षेत्र, समुदाय, वर्ग विशेष को कठघरे में खडा कर दिया। दुसरे क्षोर पर वह साहित्य जो सीधे-सीधे मन की भंडास या बहुधा दिखावे की संवेदनशीलता दिखलाता है। इस कंटक सम्मत शैली में मुस्कान तक कंटीली रहती है। यहाँ प्रश्न उठता है रचना के संघटक या अवयवों का जो आधार बनते हैं साहित्यिक विधा का। किसी विषय पर लिखने के लिए तदनुसार सामग्री जुटा लेने के साथ-साथ विवेक विवेचना जरूरी है। कलम का सिपाही बनने के लिए जो अन्दरूनी तैयारी चाहिए उसपर ध्यान नहीं जाता। अधिकतर लोग कलम का मालिक कहलवाने की होड में रचनात्मक गुणवत्ता याद नहीं रखते। और तो और लेखन में भेदभाव का ख्याल रखते हुए अपने-अपने प्रिय शासक दल वाले क्षेत्र के कुकर्मों पर नहीं लिखते भले ही वे साधारण व्यक्ति द्वारा किए गये हों। गिने-चुने उदाहरण सामने आते हैं जहाँ कुछ रचनाकारों ने अपने दल द्वारा हो रहे उत्पीडन का सार्वजनिक विरोध किया पर दो एक की पिटाई होते देख बाकी मौन हो गए। अपने घर परिवार के दुष्कर्म पर जागरूक रचनाकार तक ढंग से लिख नहीं पाता और उसके अपने द्वारा हो रहे कार्यों को भूल जाता है। अपने दुष्कर्म पर सजगता तो दूर वह गलत ही नहीं लगता और ध्यान स्वयं को चर्चा में लगाए रखने पर रहता है। वह यह भूल जाता है कि उसके द्वारा कितना मानसिक उत्पीडन, व्यभिचार तथा बौद्धिक आतंकवाद क्रियान्वयन हो रहा है। केवल स्थूल देह से ही व्यभिचार नहीं होता। अपने सूक्ष्म तथा कारण शरीर से खिलने वाले गुल से संभलने के बदले उन्हें साहित्य द्वारा भुनाना जानता है। वह अपनी कुंठित भावनाओं की चिकित्सा करवाने के बदले उनपर कविता कहानी लिख यश कमाना चाहता है। इन स्थितियों पर नादानी मजबूरी समय की हवा जैसे शब्दों का ठप्पा लगा दिया जाता है। हाल यह है कि पैसेवाले परिवार में पल रहे दिव्यांग बच्चे की पीडा या उसके माँ बाप का दर्द नहीं रुलाता। आर्थिक तंगी वाले परिवार हर जगह है पर उनकी पीडा व्यक्त करने में भेदभाव किया जाता है। बदले की भावना तथा भेदभाव में बहने वाले रचनाकार नहीं बनते भले ही साहित्यकार कहलवाने लगे। उन्हें कार से मतलब है जो रचना तथा साहित्य जैसे शब्द के साथ जुडकर उनका स्तर बढाता है। बडी पत्रिकाओं के बन्द होने पर व्यवस्था को कोसनेवाले अक्सर भूल जाते हैं कि उन्होंने स्वयं लघु पत्रिकाओं का संरक्षण कितना किया। (५)
रचनाकार बनने की स्पर्धा में भावना शोधित नहीं होती। जिस तरह स्वयं को सुनने में सक्षम वक्ता जानता है कि उससे क्या कहा जा रहा है वैसे ही लिखतै हुए पाठक तथा तत्वदर्शी आलोचक की दृष्टि होनी चाहिए जो स्वान्तः सुखाय की ओर ले जाती है। आवश्यकता भावनाओं को पकाने की है और इसके लिए बहुआयामी पठन-पाठन या भ्रमण आवश्यक है। केवल पाठ्यक्रम या एकाध समस्याओं पर लिखी रचनाओं को पढने से दृष्टि संकुचित रहती है। आखिर एक रचनाकार विभिन्न क्षेत्रों तथा सभी समस्याओं पर नहीं लिख पाता इसीलिए सजग पाठक अन्दरूनी विकास हेतु नाना तरह की रचनाएँ ध्यान से पढते हुए आँचलिक रचनाओं में वर्णित सामाजिक मूल्यहीनता में भेद तथा समानता समझ पाता है। उसके लिए यशस्वी रचनाकार मायने नहीं रखता और वह औरों को भी एकबार जरूर पढता है। इससे व्यक्ति महामना बनने की अग्रसर होता है और यही अवस्था भ्रमण से उपजती है। अब लिखने के पैदाइशी गुण सबमें नहीं होते वे पहले बताये गये तरीकों से अर्जित करने पडते है। 
साहित्य समाज का केवल दर्पण नहीं नूतन समाज का निर्माता है। जनसंख्या का बडा हिस्सा उससे आजतक प्रेरणा लेता है। दर्पण प्रतिबिंबित करता है अतः व्यक्ति अपने स्तर के अनुसार ही लिखेगा और ऊपर से संस्कारहीन परिवार परिवेश का प्रभाव वैसा फल तब दिखाता है जब रचनाकार उसके अनुरूप बहता है। वह संयमित जीवन को ढकोसला मानकर समस्याओं पर बोलता है। केवल एक पक्षीय या एक देशीय अवधारणा घिनौने खेल को साहित्य कहने में संकोच नहीं करती। घाव की चिकित्सा या प्रदर्शन में अन्तर पकड में आना चाहिए और बिना सोचे समझे रामचरितमानस या अन्य ग्रन्थ को जलाने या विरोध में पुस्तक लिखने से समस्या नहीं सुलझा करती। बहुधा परिचित संपादकों से स्तरहीन थोक या लाट में कविता कहानी प्राप्ति की बात सुनने को मिलती है। उनके अनुसार ऐसे-ऐसे रचनाकारों को गहन चिंतन वाला लेख माँग लो तो मौन छा जाता है। एक संपादक ने हमसे लेख माँगा और अस्वस्थतावश वीडियो भेज दिया जिससे वे सामग्री ले सकें। दो दिन पश्चात जवाब आया एकाग्रहीनता के चलते किसी से संभव नहीं हो पा रहा अतः आप ही लिखकर दें। वह कार्य किसी तरह हुआ पर रुचि का अभाव तथा सतही मानसिकता साहित्य के साथ न्याय नहीं कर सकती और किसी तरह छपास रोग पूरा करने में समय व्यतीत होता है। रचनाकर्म कारखाने का उत्पादन नहीं बनना चाहिए। ऊपरर से पाठकों की कमी का रोना शोभा नहीं देता। आखिरकार परोसा क्या जा रहा है इसपर ध्यान जाता नहीं। समाज समस्याओं से अनजान नहीं और रचनाकार सीधे प्रसारण की भाँति बताए जा रहा है। ऐसी रचनाएँ चाय समोसे के बलपर थोडे दिन टिकती है और वहाँ भी एक दुजे की पीठ थपथपा कर उसी विदेशी संस्कृति को कोसा जाता है जिसके अधिकतर विचार आँख मूँद कर मान लिए गए। यहाँ तक की साहित्यिक संस्थाएँ तक श्रोताओं की घटती संख्या से परेशान नजर आती हैं। नब्बे के दशक में कुछ साहित्य अनुरागी युवाओं ने एक संस्था की युवा गोष्ठी से जुडकर कई अच्छे कार्यक्रम किए और लोगों को जोडना शुरू किया जो वहाँ के सचिव को पसंद नहीं आया। उसने अपने साथ प्रबंधन समिति के एक रईस सदस्य का समर्थन जुटा उस युवा गोष्ठी को छिन्न-भिन्न करवा दिया। अब उसके चाटुकारों का साहित्य से लेना-देना था नहीं और वे अन्य प्रतिभाशालियों को आगे बढने नहीं देना चाहते थे। कर्मठ युवाओं द्वारा कम लागत में चर्चित कार्यक्रम करवाना संस्था सह नहीं पाई। अपने अन्दर झाँकने की आदत अविकसित होने के फलस्वरूप साहित्य समाज को देने लायक बातें सही तरीके से दे नहीं पाता। (६)
मध्ययुगीन रचना मानस की चौपाई इस प्रसंग में याद आती है :-
बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि।। 
आधी चौपाई में ही साहित्य का एक लक्षण बता दिया - रामकथा के माध्यम से कही गई बातें विद्वानों को विश्राम यानि बौद्धिक शान्ति तथा आम जनता को प्रसन्न करने वाली है क्योंकि उन्हें लक्ष्यार्थ से मतलब नहीं केवल कथा सुनकर खुश होना है। अधिकांश मनुष्य मानसिक भावनात्मक तथा बौद्धिक शांति हेतु साहित्य के पास जाता है। भले ही समय बिताने के लिए जाए पर वह तनावमुक्त होना चाहता है। उसके अनुसार सबको जाँचना, शक करना, व्यक्त भावनानुसार बहना मनोरोग पैदा करता है। कुकर्मों के भरोसे जी रही विधाएँ कार्यालयों में भरपूर चर्चित होने के कारण एक वर्ग उससे आतंकित होकर अपने बच्चों को पढने या खेलकूद का प्रशिक्षण प्राप्त करने हेतु अन्य शहर में जाने नहीं देते। यूँ तो सुरक्षित घर परिवार तक नहीं पर शक औरों पर अधिक होता है। यह आधुनिकीकरण का परिणाम हो ऐसा नहीं क्योंकि नाना रुपों में दरिन्दें हमेशा से समाज में थे और सबने धर्म या आयातित वाद का खुलकर दोहन किया। केवल तकनीकी विकास के चलते समाचारों की बहुलता है। यहाँ संवेदना अपने-अपने जीवन में न उतर कर रचनात्मकता तक सिमटी रहती है। 
यहाँ जिन समस्याओं के बलपर घर का चूल्हा जलता है वे विदेशों में होने के बावजूद उसपर ध्यान नहीं जाता। पचास से लेकर सत्तर के दशक तक नाना तरीकों से पुरस्कृत किये गये सैकडों रचनाकारों तथा पत्रकारों को विदेशों की भुखमरी, बेरोजगारी, घरेलू तथा बाहरी हिंसा, प्लेटफार्म तथा मैदानों पर सोते लोग, शीतलहरी में ठिठुरते बेघर लोग आदि के बारे में मौन रहे। विदेशी मतलब पैसेवाला हो यह जरूरी नहीं। विकसित देशों के कई छोटे दुकानदार यात्रा के पैसे जोडकर महंगाई के चलते यूरोप की यात्रा न कर भारत आते हैं क्योंकि मुद्रा विनिमय दर उनको अनुकूल पडती है। जर्मनी के एक बुद्धिजीवी ने बताया कि जब उनके यहाँ शीत काल के दौरान मैदानों में सोये लोगों की बेहाली पर शोर मचने के बाद कुछ सरकारी कदम उठते हैं फिर वही ढाक के तीन पात। सरकारी विभागों की थोडी लापरवाही अमरीका, इग्लैंड आदि देशों के अन्दरूनी इलाकों में दिखती है। कई जगह सडकों पर पडा कचरा, कुडेदान से बेचने लायक सामान निकालते लोग, मेट्रो रेल में यात्रियों के शरीर से आनेवाली नाना तरह की बदबू, बात - बात पर होती हिंसा जैसे दृश्य उस लुभावनी तस्वीर को खंडित करते हैं जो भारत में दिखाई जाती है। दूसरी ओर यहाँ वाले सबसे अधिक उसीपर लिखते या चलचित्र बनाकर यश कमाते हैं पर वहाँ के अधिकतर रचनाकारों ने उस पक्ष को प्रधानता नहीं दी और बहुतों ने अनदेखा कर दिया। उनकी संवेदना भारतीयों से कम नहीं थी पर उसके बलपर घिनौना खेल नहीं खेला। अपनी समकालीन व्यथा की अभिव्यक्ति में यथेष्ट शालीनता रखते हुए आशावादी तथा दार्शनिक पुट दिया। इसमें अपवाद हैं पर भारतीयों के मुकाबले कम। यहाँ आँसुओं को भुनाने वाले अधिक हैं। इग्लैंड के एक साहित्यिक दंपति ने कहा था की उनके यहाँ जब दंगेफसाद होते हैं तब लौटने का मन करता है और कई बार संचार माध्यमों में समाचार तक ठीक से नहीं रहते। वहाँ मजबूरी वश अलग - अलग राज्यों से आए लोग मिलकर रहते हैं। अमरीका में भारतीय विद्यार्थीयों की हत्याओं पर लिखना याद नहीं रहता। कई देशों में रचनाकारों के संगठन किसी नेता को अपने कार्यक्रम में आमंत्रित कर ले तब वह स्वयं को भाग्यशाली मानता है और यहाँ नेता किसी रचनाकार को बुलाए या दोस्ती कर ले तब वह स्वयं को भाग्यशाली मानते हुए साहित्यिक समाज में ढिंढोरा पीटता है। विदेश में जहाँ कहीं राजतंत्र के विरोध में क्रांति हुई वहाँ उसे सफल बनाने के लिए जो साहित्य लिखा गया उसमें अवश्य अतिश्योक्ति का मसाला मिलाया गया था। वहाँ अधिकार केन्द्रित लडाई समय विशेष की माँग थी जिसका भारतीय संस्करण विकृत किया गया। मुनाफे में दो भाग श्रमिक और एक मालिक की बात से लेकर अराजकता फैलाने वाली रचनाएँ सामने आई। अनुशासन तथा कर्तव्य को पाखंड, दकियानूसी, तानाशाही घुमा-फिराकर या कहीं-कहीं स्पष्ट रूप से कहा गया। नैतिक पतन पर भाषण देनेवाले रचनाकारों ने चरित्र निर्माण की कला का विस्तार नहीं किया। दूसरी ओर ऐसे पोंगापंथी रचनाकार हुए जो केवल कर्तव्य की वकालत करके अधिकारों को भूल गए।(७) प्रायः लोगों को केवल अपनी मक्खन मलाई से मतलब इसीलिए चरित्रादि के पक्षधर चार्वाक दर्शन को बदनाम कर दिया। इसके घोषित समर्थक तक सुत्रों से दूर रहते हैं। साहित्य के नामपर खेल उचित या अनुचित है की नहीं इसपर विचार कर लेना चाहिए शरीर छोडने से पहले। साँसों का क्या भरोसा कब थम जाए। केवल अपने-अपने जैसे पाँच दस इकट्ठे करके साहित्यिक कबड्डी खेलना शोभा नहीं देता। यह तो वही बात हुई :-
उष्ट्राणां विवाहेषु , गीतं गायन्ति गर्दभाः ।
परस्परं प्रशंसन्ति , अहो रूपं अहो ध्वनिः ।
ऊँटों के विवाह में गधे गीत गाते हुए एक-दूसरे की प्रशंसा कर रहे हैं , अहा ! क्या रूप है? अहा ! क्या आवाज है ? 
ऐसा रचनाकर्म अपना अपमान है जिसपर ध्यान जाना चाहिए। 

स्वामी अक्षय चैतन्य 
सन्दर्भ :-
१ साध्वी मीराबाई की मर्दानगी (शोध सृजन, जनवरी अंक पृष्ठ ४०) 
२.साहित्य का उपयोग 
https://youtu.be/2xrmh1Q1V_Y
साहित्य में रचनाधर्मिता 
https://youtu.be/9x1eZXZ0DkQ
महादेवी वर्मा - गौरा 
https://youtu.be/9phTfeTjyZE
आलोचना, समालोचना और समीक्षा 
 https://youtu.be/e6LwQwIRI3o
३.स्वरचित कविताओं द्वारा संवाद 
https://youtu.be/0yuoOHThHGM
 ४. स्वरचित कविताओं द्वारा संवाद 
https://youtu.be/0yuoOHThHGM

५. साकेत - दो राहा (कहानी संग्रह) कोलकाता से प्रकाशित
६. साकेत - दो राहा (कहानी संग्रह) कोलकाता से प्रकाशित
७. अधिकार और कर्तव्य 
https://youtu.be/h7Z_6w0Csdw


Friday, 26 March 2021

दृष्टि, दर्शन और धर्म


शोध सृजन के फरवरी अंक में प्रकाशित (दृष्टि और दर्शन पृष्ठ ३३) विषय पर तत्वदर्शी समालोचना का एक अंश यहाँ से भेजा गया ।


        

दर्शन का तनिक निकटता से दर्शन करते हुए उनका दृष्टि से भेद जानना जरूरी है। क्या है दर्शन? क्यों पढे हम दर्शन? दृष्टि ही बहुत है। क्या दोनों एक नहीं? क्या दृष्टि, दर्शन और धर्म अलग-अलग है? 

दृष्टि व्यक्तिगत धारणा, अनुभव, योग्यता, समझ, अभिप्राय से उपजती है। यह प्रायः एकसी नहीं रहती। दर्शन वह माध्यम या विधा है जो हमे दर्शन करवाती है स्वयं का स्वयं से। जानने समझने गुनने का अवसर देती है की हम शरीर, मन, बुद्धि के रुप में क्या हैं। परिवार, समाज, देश, प्रकृत्ति आदि के साथ हमारा संबंध क्या है। यह सारी बातें दृष्टि के माध्यम से समझाई जा सकती है फिर अलग से दर्शन की जरुरत क्यो। आखिरकार दोनों धर्म के आधार है तो क्या इनमे भेद है या नहीं। संक्षेप में देखें तब धर्म में दर्शन के बदले दृष्टि प्रधान हो तब वह दर्शन से दूर हो जाता है। ऊपर से दर्शन विशेष की आचार्य परंपरा अतृप्त एषणा में बहकर अपने-अपने दर्शन की गुणवत्ता कम कर देती है। 

मत स्वातंत्रयता नाना दृष्टियाँ पैदा कर विचार - विमर्श का पोषण करते हुए स्वस्थ संवाद की ओर समाज को ले जाती है। जब किसी विषय, व्यक्ति, स्थानादि को जानने की इच्छा पूरी होती है तब उससे होने वाला अनुभव विचार या दृष्टि या समझ पैदा करता है। वह मन में रहे या अभिव्यक्त हो यह व्यक्तिगत स्थितियों पर निर्भर है। समाज में बिना विशेष कारण के जानकारी एकत्रित करते हुए लोग दिखते हैं फिर चाहे समय व्यतीत या मनोरंजन हेतु हो। कई बार जानकारी स्वतः नाना माध्यमों से आती है। प्राकृतिक व्यवस्थानुसार सारी इन्द्रियाँ बहिर्मुखी है इसीलिए मन भागमभाग में लगकर व्यक्ति विशेष के दृष्टिकोण में विविधता लाता है तब समाज का कहना ही क्या। यह विविधता आती है विवेक, विश्लेषण, संयम, निदिध्यासन, क्रियार्जित अनुभव, उम्र जनित बदलाव, जमीनी सच्चाई जैसे कारणों से। इसके साथ शासन का प्रभाव दृष्टिकोण पर पडता है फिर चाहे वह राजतंत्र, लोकतंत्र या अन्य कोई। व्यवस्था चाहे जैसी या जहाँ कहीं की हो अपनी वेचारिकता समाज पर लादने का प्रयास करती है। इसके लिये वह मनचाहे पाठ्यक्रम से लेकर मनोरंजन के साधनों तक का उपयोग अपने प्रचार-प्रसार हेतु करती है। यहाँ तक की प्रश्नपत्र उस आधार पर तैयार होते हैं ताकि विद्यार्थियों को वह विचारधारा रटनी पडे और वे धीरे-धीरे बौद्धिक बंधुआ मजदूर बने। अतः आज नहीं तो कल हर दृष्टि को परस्पर विरोधी विचार से जुझना पडता है जहाँ व्यक्तिगत अनुभव को बिना विश्लेषण के औरों से मनवाया जाता है। अंतर्मुखता के अभाव में व्यक्ति बहुधा इधर-उधर डोलते - डोलते जीवन यात्रा पूरी कर लेता है। इस कशमकश से जुझते हुए कोई एकाध ही सत्यान्वेषी बनता है। यह शुरुआत है पशुवत जीवन से ऊपर उठने की। इस मोड पर 'दर्शन' शब्द अपने तामझाम सहित सामने आता है और जिसका इस चर्चा में 'साक्षात्कार' अर्थ लिया गया है। यह अर्थ व्यक्ति विशेष के अपने वास्तविक रूप तथा व्यवहार में सामंजस्य बिठाता है ताकि सत्य की खोज पूरी हो सके। इसमें वह अन्वेषक 'श्रोतव्य, मन्तव्य, निदिध्यासितव्य' के साथ 'द्रष्टव्य' संग युक्त होता है उस तत्व को जानने की प्रक्रिया में । 


सबको अपनी-अपनी दृष्टि सही लगती है। ऊपर से व्यक्ति का लालन-पालन जिस वातावरण में हुआ उसका प्रभाव मानसिक तथा बौद्धिक स्तर पर पडता है। किसी भी वस्तु, व्यक्ति, मान्यता, आदि पर बचपन से सुनी बातें आगे चलकर सुनने को मिलती रहे तब उनका त्रि-आयामी प्रक्षेपण दर्शन रूपेण, मनमुकुर में होने लगता है। यहाँ उसकी अनियंत्रित भोगेच्छा या अतृप्त एषणा से उत्पन्न भावना लगातार भ्रमित करती है और वह अतीन्द्रिय वस्तु आदि तक के दर्शन का दावा करता है। इस मनोवैज्ञानिक खेल में तन्त्रिका तन्त्र (नर्वस सिस्टम) तथा ग्रन्थिरस (हार्मोन) की भूमिका महत्वपूर्ण है। विशेषतः स्वप्नावस्था इसका माध्यम बनती है। वह व्यक्ति समझ नहीं पाता कि स्वप्न में वही नाना रूपों में था और धीरे-धीरे वह व्यक्ति विशेष स्वसम्मोहन में जीने लगता है। उससे प्रभावित हो कर मनोराज्य को सही मानता है और ऐसे में अनुभव की प्रामाणिकता संदिग्ध हो जाती है। आधुनिक विज्ञान में नवीन प्रयोगों के निष्कर्ष जाँचने की अपनी-अपनी शैली है। साधारण नियमानुसार उस प्रयोग से संबंधित विधा के अन्य विशेषज्ञ वही उसे दोहराते हैं और बहुधा उन्हीं मापदंडों के अनुसार जाँच करते हैं। जब निष्कर्ष एक निकलता है तब उसपर आगे कार्य होता है। नहीं तो आपसी विचार - विमर्श द्वारा प्रयोग पुनः होने की संभावना बनती है। साक्षात्कार की राह में होनेवाले अनुभव जाँच से परे नहीं है। यहाँ बारी आती है उन मनीषियों की जो पहले चल चुके हैं या फिलहाल चल रहे हैं। वैदिक वाड्मय के प्राचीन तथा प्रामाणिक उपनिषदों में पूरी राह इस तरह प्रत्यक्ष तथा सुत्रात्मक शैली द्वारा समझायी गयी है कि कोई केवल अपनी दाल नहीं गला सकता। इस राह में आने वाले पडाव ही सही मायने में दर्शन है। 


 यहाँ शंका उठती है पौराणिक साहित्य पर आधारित दृष्टियों की जिनके लिए 'दर्शन' शब्द का प्रयोग होता है और इसीके चलते मध्ययुगीन भक्ति साहित्य में पनपी विचारधाराएँ दर्शन कहलाई। पुराण परतः सिद्ध है यानि उनकी बातों को प्रमाण रूप में लेने से पहले जाँच-पड़ताल जरूरी है। और यही नियम स्मृति, इतिहासादि पर लागू है। उदाहरण हेतु प्यास लगने पर तरल पदार्थ, स्वतः तथा माध्यम जैसे पेयजल, दूध, रस, छाछादि परतः सिद्ध; क्षुधा तृप्ति हेतु भोजन स्वतः तथा माध्यम जैसे दाल-भात, रोटी - सब्जी, पराठादि परतः सिद्ध है। अब कोई भूख - प्यास दोनों पेयजल से तृप्त करले तब सबके लिए वह नियम नहीं बन सकता क्योंकि वेद रूपी ज्ञान सबके लिए है। पुराणादि को इसीलिए वेद के अनुकूल अंश में प्रमाण माना जाता है। वेद कोई पुस्तक मात्र नहीं बल्कि ज्ञान राशि है जो किसी के अच्छे-बुरे लगने पर निर्भर या माध्यमों को अतिरंजित तरीके से महिमामंडित करने के पक्ष में नहीं है। भक्तिकाल की सभी विचारधाराओं ने पुराणादि को स्वतः सिद्ध मानते हुए कईयों ने अपनी दृष्टि श्रीमद्भगवद्गीता पर भाष्य लिखकर, दर्शन के नामपर चलवाई। यहाँ रेखांकित करने वाली बात है कि सबने सारे अध्यायों पर खुलकर चर्चा नहीं की। यहाँ तक की आहार-विहार व्यवहारादि पर दृष्टि देनेवाले श्लोकों को सतही स्तर तक रखा। समाज को समझाया गया की यह अन्त समय सुनने वाला ग्रन्थ है। सारे महानुभावों के लिए पुराणादि प्रेरणा स्रोत बने और उपनिषदों पर जब लेखनी चलाने की सोची तो सबको अपनी दृष्टि खंडित होती नजर आई जो उन्हें अधिक प्रिय थी। समाज में यह प्रचारित करवाना जरूरी हो गया की श्रीमद्भगवद्गीता उपनिषदों का सार है इसलिए उनपर अलग से लिखने की जरूरत नहीं। इसका मतलब गीता पर लिखना बहुत है। इतनी समझ आदि शंकराचार्य में थी फिर भी अलग से उपनिषदों पर भाष्य जमकर लिखा।अगर गीता ही सबकुछ है तब उसे ठीक से समझाना था पर वहाँ संप्रदायवाद हावी हो गया और सब अपने-अपने मत का समर्थन उससे प्राप्त करने के लिए श्लोकों का विचित्र अर्थ बताने लगे। ऊपर से संस्कृत की वर्तमान व्याकरण के लचीलेपन का दुरुपयोग करके मनमाना अर्थ बताने में सहयोग मिला। नहीं तो दो एक श्लोक या उनमें व्यवह्रत शब्द के आधार पर उछलकूद मचाना उचित नहीं। यह ऐसा शास्त्रीय छल था जिसके झाँसे में समाज आ गया। 


पौराणिक साहित्य को परतः सिद्ध कहने का कारण जानना जरूरी है :-
उनकी रचना साहित्य सम्मत शैली में हुई। लम्बे समय तक चलने वाले ज्ञान सत्र या अन्य अनुष्ठान में खाली समय मनोरंजन हेतु इनका उपयोग होता था। अतिश्योक्ति अलंकार से भरी कहानियाँ एक तरह की शांति पहुँचाती जो मन को तरोताजा करती और इसीलिए भिन्न पुराणों में एक ही पात्र से संबंधित परस्पर विरोधी बातें मिलती हैं। कई जगह एक ही पुराण में विरोध मिलता है। दसियों चीजें मनगढन्त तरीके से कहानी के रूप में परोसी गई। तक्षशिला तथा नालन्दा शिक्षा केन्द्र तहस नहस करने से वहाँ रखा प्राचीन साहित्य नष्ट हुआ। बाद में अन्य स्रोतों से सामग्री इकट्ठी की गई। उनके रखरखाव में वातावरण का प्रभाव तथा पशुओं के चरे जाने से कई पाण्डुलिपियों के पृष्ठ नष्ट हुए और वे पूरी नहीं मिली। इसके साथ संप्रदायों ने अपनी बात मनवाने के लिए प्रसंग जोडे। ऐसी स्थिति में उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध होती है। प्रायः बडे प्रकाशक एक सर्वमान्य संस्करण निकालते हैं फिर भी पाठ भेद रहता है। जब हम १८ उप पुराणों की ओर देखते हैं तब पता चलता है कि पुराणों में से प्रसंग निकालकर उनकी रचना हुई। जैसे स्कन्द पुराण के रेवा खण्ड के आधार नर्मदा पुराण लिखा गया। रेवा का दूसरा नाम नर्मदा है। स्कन्दपुराण के रेवा खण्ड में सत्यनारायण पर कुछ श्लोक है जिनका विस्तारित रूप सत्यनारायण कथा है। अब आम व्यक्ति के बोलने (उवाच) से विश्वसनीयता नहीं बनेगी इसलिए ऐसी चीजों को प्रामाणिक बनाने हेतु 'ईश्वर उवाच, देव्युवाच, नारद उवाच' आदि के साथ श्लोक जोडे गए। उपनिषदों में आई कहानियों को बढ़ा-चढ़ाकर बतलाया गया। 
भारत में राजतंत्र वाले युग के दौरान जिस शासक का प्रभाव बढा जनता ने उसकी विचारधारा न्यूनाधिक अपनाई। इसके चलते नवीन ग्रन्थ रचे गए और पुरानों में फेरबदल किया गया। जब शाक्त संप्रदाय का प्रभाव बढा तब देवी भागवत लिखा गया। स्वामी राजाश्रम ने इसे पुराण प्रमाणित करने के लिए दुर्जनमुखचपेटिका की रचना की। काशीनाथ भट ने विरोध में दुराजनमुखमहाचपेटिका की रचना की। तीसरे महानुभाव ने भट का खंडन करते हुए दुर्जनमुखपद्यपादुका की रचना की। यह सारा खेल प्रधानता यानि कौन बडा कौन छोटा वाले भाव से खेला गया। ऐसी भक्ति किस काम की। ऐसे साहित्य में अभद्रता, अशालिनतादि काफी है। इसके समर्थन हेतु अन्य विधाओं के ग्रन्थों से छेडछाड हुई। यहाँ तक की भक्तों द्वारा रचित साहित्य प्रमाण माना गया बडे ग्रन्थों की तुलना में। 

उपरोक्त कार्य की परंपरा आजतक कायम है। उसके साथ अंग्रेजों के शासनकाल से व्यक्तिगत दृष्टि को दर्शन कहा जाने लगा और उस आधार पर पुस्तकें लिखी गई। यह बाहरी परंपरा का अंधानुकरण है जहाँ ऐसा ठोस साहित्य नहीं जो शंका निवारण करते हुए राह बताए और निजी अनुभवों की जाँच कर सके। इसलिए निष्पक्ष साहित्य के अभाव में जब जो भावना फैली उसपर पुस्तकें आ गई और किसी ने संगति या अलग - अलग विचारों की अन्दरूनी एकता को महत्व नहीं दिया। एक तरह की प्रतिस्पर्धा ने बौद्धिक समाज को ढक लिया। तर्क प्रधान मानसिकता ने कुतर्क, वितण्डा तथा जल्प को बात - बात पर महत्व दिया। जैसे डार्विन का विकासवाद दर्शन से अधिक ईसाई धर्म की मान्यताओं पर टिका है जिसपर विज्ञान का आवरण लगा दिया गया। भारतीय तथा बाहर के कुछ रचनाकार जिस विकासवाद की बात करते हैं उसकी नींव में ईसाई धर्म ही है। यहाँ वाले वैसे महानुभाव विदेशी 'फिलासफी' के भारवाही हैं भारतीय परंपरा के नहीं। भले ही किसीने गीतादि पर लिखा हो वे स्थापित भारतीय दर्शनों के प्रतिनिधि नहीं बनते और न यहाँ के साहित्य पर लिखते समय न्याय कर पाते हैं। ये और इनके समर्थक परदेसी छाप विचारकों का जीभर उल्लेख करेगें भारतीय दर्शन में अहं शीर्षक कार्यक्रम में पर चार्वाक को नकार देंगे। इसके कारणों में एक है उन विचारकों तथा वैज्ञानिकों की पृष्ठभूमि जहाँ येन केन प्रकारेण पूरा परिवेश उन मान्यताओं को दोहराता रहा। अवचेतन मन में उसकी परत पर परत जमती चली गई और मौका आने पर वे हावी हो गईं। इसके साथ जुडा विदेश संस्कृति का वह आकर्षण जो एक हदतक रूढिवादिता से ऊब चुका था और समाधान का मार्ग बाहर खोजने लगा। बाहरी साज सफाई अधिक भा गई। ऐसे लोग यह खोजना भूल गए की क्या सही में बडे ग्रन्थों में भेदभावादि का समर्थन है की नहीं। अपने घर की सफाई करते तो और बात थी, वह न करके गोरी चमडी मनभावन लगी। वहाँ की शिक्षा आधुनिक, प्रगतिशील तथा प्रयोगवादी लगी। 

भक्तिकाल तथा अंग्रेजों के युग से पनपी मान्यताओं का मिश्रण काफी हुआ। सहूलियत हेतु दर्शन के बदले फिलासफी शब्द का प्रयोग एक बात है पर उसे पाश्चात्य फिलासफी समान समझना उचित नहीं पर हो वही रहा है। आए दिन गोरखनाथ का दर्शन, मीराबाई का दर्शन, तुलसीदास का दर्शन, कबीरदास का दर्शन, श्रीमद्भगवद्गीता का दर्शन, अष्टावक्र गीता का दर्शन, रामायण का दर्शन, महाभारत का दर्शन, योगवासिष्ठ का दर्शन, इत्यादि सुनने को मिलता है। और तो और दर्शन शास्त्र के लेखकों के नाम से सिलसिला चल पडा। चर्चित विभूतियाँ में स्वामी रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानन्द की दृष्टि को नव-वेदांत माना जाता है। जबकि परमहंस ने उपनिषदों के अनुसार समझाया बिना उनका नाम लिए। उन्होंने विपरीत या विशेष या अलग से कुछ नया नहीं कहा। स्वामी विवेकानंद के नव-वेदांत दर्शन में जिस कर्मयोग की बात है वह पहले से ही योगवासिष्ठ तथा गीति में है। अस्ल में गीता की आड में अपनी-अपनी दाल गलाने की भावना ने इसके लक्ष्यार्थ को धुंधला कर दिया। दोनों ग्रंथ आत्मज्ञान के बाद कर्तव्यनिष्ठ या कर्तव्यपरायण हो कर जीवनयात्रा करने की बात समझाते है। वाल्मीकि रामायण तो प्रबंधन परर आधारित ग्रंथ है। भ्रामक प्रचार-प्रसार के चलते कुछ का कुछ समझाया गया। दुषित शिक्षा पद्धति हेतु केवल विदेशियों को कोसने वाले स्वयं दर्शन, भोजन प्रणाली पर धार्मिक राजनीति, औपनिषदिक साहित्य में छिपे मुल्यों, परिवर्तनशील धर्मशास्त्रों पर अपरिवर्तनशील की ठप्पा लगाने, जैसे विषयों पर मौन रहते हैं। यह वैसा ही है जैसे वेदान्त के साथ नाना शब्द जोडकर अपनी अलग विशिष्ट पहचान बनाना (विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, शुद्धाद्वैत, अचिंत्य भेदाभेद)। 
यह जानना विचारोत्तेजक है कि ऐसी शाखा तत्पश्चात प्रशाखा बनाने वालों ने उपनिषदों पर भाष्य नहीं लिखा और अपना-अपना चिंतन एक दुजे के खंडन, पौराणिक साहित्य तथा स्मृतियों तक रखा। कई जगह सुनने पढने को मिला की चूँकि गीता उपनिषदों का सार है इसलिए उसपर लिखना ही उपनिषदों पर लिखना है। यह बचकना शिशुवत तर्क है क्योंकि गीता उनका स्थान नहीं ले सकती। बाद के विद्वानों ने उसे सार माना है प्रधान वक्ता (कृष्ण) तथा रचनाकार (वैदवायास) ने नहीं। ऐसी शाखावावों को अपने-अपने संकुचित दृष्टिकोण का औपनिषदिक (प्राचीन तथा प्रामाणिक) साहित्य द्वारा समर्थन न मिलने पर उसकी अवहेलना कर दी। शाखाओं की उपज का प्रमुख कारण था आदि शंकराचार्य के योगदान का अवमूल्यन करना जबकि उनके द्वारा व्यवह्रत शब्द 'माया, अद्वैत' आदि पहले से प्रामाणिक उपनिषदों में थे। जब वे जगत के मिथ्यात्व का उद्घोष करते हैं तब वहाँ लक्ष्यार्थ का अनुभव किये बिना विरोध कहना शोभा नहीं देता। जिस घर में सब मालिक बनना चाहते हों वहाँ स्वस्थ वैचारिकता के बदले बोझिलता रहेगी। सर्व दर्शन संग्रह में संप्रदायों की विचारधाराओं को दर्शन माना गया। मानस में कहा गया - 'श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक। तेहिं न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक।।' 
वेद समर्थित तथा ज्ञान एवं वैराग्य से परिपूर्ण हरि भक्ति के मुताबिक लोग नहीं चल रहे। कल्पना- जल्पना सहारे पंथ बनाने में लगे हैं। (१)
 शिक्षा जगत ने सबको स्वीकार लिया। यह नहीं की उसका दिल बडा था वरन कारण कई थे। चूँकि बहिर्मुखी समाज को बाहरी श्रृंगारिक छाप भक्ति अधिक रूचिकर लगी और वे किसी न किसी संप्रदाय से जुडे रहे अतः उसके प्रचार प्रसार हेतु अपने पद का दुरुपयोग करते हुए पाठ्यक्रम में फेरबदल किया। स्थापित भारतीय दर्शनों के प्रति उदासीनता ने ऐसी चित्र - विचित्र स्थिति पैदा कर दी जिससे दर्शन का पाठ्यक्रम दिन पर दिन बोझिल हो गया। हँसी तब आती है जब तुलसीदास को कबीर विरोधी या असहिष्णु कहा जाता है। कबीरदास को केवल ब्राह्मण विरोधी कहकर अपनी मलिन मानसिकता का ढोल बजाया जाता है। आजीविका हेतु पाखंड का सहारा न्युनाधधिक हर वर्ग नाना तरीके से लेता है भले ही कुछ लोग उसे अपने-अपने परिवार - परिजनों तक सीमित रखे। ब्राह्मण शब्द की जाँच हेतु स्वाध्याय जरूरी पर वहाँ संस्कृत आ जाती है और ऐसो को उससे सख्त परहेज। आखिर परदेसी चिकित्सक की सलाह सर्वोपरि। कहीं कुछ हो गया तो कौन संभालेगा। उसके लिए दुसरा धर्म अपनाना मंजूर और वहाँ के रीति-रिवाज में पाखंड नजर नहीं आता। यह अद्भुत 'अपनी भाषा' प्रेम है जो सुविधानुसार समझाया जाता है। यहाँ के पुराने साहित्य की भाषा अन्य ग्रह की लगती है और दर्शन के सुत्र उसमें लिखे हुए। अब इसमें ऐसों का क्या दोष। इस बाहरी व्यक्तिवादी लगाव से हिन्दी साहित्य में तुलनाओं का युग शुरु हुआ। यह समीक्षात्मक या सारग्राही भाव से कम एक रचनाकार को दुसरे से महान बताने के लिए अधिक हुआ। कईयों के अनुसार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कबीरदास को महत्व नहीं दिया और वह द्विवेदी युग में मिला। इससे कोई छोटा बडा नहीं बनता पर झगड़ालु व्यक्ति समय बिताने के लिए और क्या करे। ऐसों को रचनाधर्मिता से मतलब नहीं होता। गोस्वामी ने पंद्रह वर्ष अध्ययन पश्चात लेखनी उठाई और उनके साहित्य को पढे बिना नकारने में पंद्रह दिन तक नहीं लगते। उनके द्वारा किया गया पाखंड का विरोध पल्ले नहीं पडता। 
दुनिया कहाँ से कहाँ चली गई पर बहुतों की यह सोच वैसी ही है। अब जिन आधुनिक रचनाकारों ने दर्शकों की दार्शनिकता समझ कर लेखनी उठाई उनपर आयातित वाद (दृष्टि) थोपने पर बहुधा हास्यास्पद स्थिति बन जाती है क्योंकि उनकी अधिकतर रचनाएँ उसपर खरी नहीं उतरती। वे शोषणकारी तत्वों को निरवंश करने की बात ज्यादातर नहीं करती। उनके पात्रों में ईश्वर तत्व पर भरोसा नजर आता है भले ही उसे कोसे। ऐसे रचनाकारों में बहुतों ने अलग से अध्ययन नहीं किया दर्शनों का पर यह कोई सिद्धांत नहीं कि व्यक्ति विशेष उन्हें पढकर ही समझे। मुंशी प्रेमचन्द की लेखनी से तभी बडे घर की बेटी जैसी रचना निकलती है। यह अकेला उदाहरण नहीं है उनके साहित्य का और न वे एकमात्र रचनाकार। इसका मतलब यहाँ शोषण कम हुआ यह बात नहीं वहाँ (विदेशों में) सत्ता परिवर्तन लक्ष्य था। फ्रांस में जनता को भड़काने के लिए एक वाक्य रानी के नाम से प्रचारित करवाया (रोटी नहीं है तो केक खाये)। प्रायः आंदोलनों में ऐसी चाल चली जाती है उसे सफल बनाने के लिए। भारतीय दर्शनों में तो दूर यहाँ की जलवायु तक में ऐसी भावना नहीं थी। यह और बात है कि परदेसी रंग में सराबोर लोगों ने उकसा कर मालिकों को मरवाया तो दूसरी ओर वे भी क्रूरता के शिकार हुए। साहित्य में यह भेद स्पष्ट दिखता है जहाँ भारतीय चिन्तन शैली अपनाने वाले रचनाकार भीड में अलग खडे दिखाई देते हैं। उनपर छाप चाहे जैसी लगवा दी जाए पर समझने वाले समझते हैं। एक प्राध्यापक का विश्वविद्यालय में अन्तिम दिन था और वे आखिरी कक्षा लेने गए जो खाली दिखी। दो एक जने इधर-उधर टहल रहे थे। पूछने पर पता चला कि विभागाध्यक्ष ने सबको एक निजी संस्था की गोष्ठी में जाने को कहा था। इनको छोडकर बाकी चले गए। इसमें प्रयोग या प्रगतिवाद या आधुनिकता देख कर खुश होना था पर उन्हें मार्मिक वेदना हुई। सहनशीलता, संतोष, धीरज या शिष्टाचार ढकोसला लगता था और वही याद आने लगे। अपनी पीडा सार्वजनिक मंचों पर परोसी ताकि भक्तगण तसल्ली दें। इसे भी प्रचार का माध्यम बना लिया। जो दो-एक विद्यार्थी रह गए थे उन्हें कक्षा में बुलाकर तस्वीर ली और समाचार सहित साँझा किया। ऐसी मंडली केवल अपनों को हर जगह छपते देखना चाहती और पुरानी पत्रिकाओं के बन्द होने का रोना तभी रोती है क्योंकि उन्हें भाव मिलना बन्द हो गया। पर वे समाज को नहीं बताते की उनके चलते दसियों लघु पत्रिकाएं बन्द हुई। समय का घुमता पहिया ऊपर नीचे होते रहता है। काली कमाई भरोसे टिकने वाली पत्रिका अक्सर स्वस्थ सदेश नहीं देती, केवल छपास रोग पर मलहम लगाती है। ऐसी हल्की सोचवाले रचनाकारों के तार दर्शनों के साथ नहीं जोड पाते। ये भले समाज की बात करें रहते हैं मलिन मन के घोर व्यक्तिवादी। 
इस विकट स्थिति में स्वस्थ विकल्प तलाशना और क्रियान्वयन करना जरूरी है। इससे साहित्यिक सेवा तक होगी। साहित्य दर्शन से दृष्टि पाता है और उसे गति देता है। इसे ही संसरण या संचारित कहते हैं क्योंकि उनमें छिपे मूल्यों को साहित्यिक विधाओं द्वारा फैलाया जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि जैसे - तैसे रचना का संबंध दर्शन से जोडकर काम चलाया जाय। जरूरत पहले यह है की स्थापित दर्शनों को समझकर भक्तिकाल में पनपी विचारधाराओं को दर्शन न कहा जाय। उनमें प्रतिस्पर्धा, प्रभुत्व, महामंडित काल्पनिकता, ईश्वरोन्मुखी करने के नाम भ्रमित करना, भक्ति की आड में भोग विलास को उचित ठहराना, नारी समाज को 'वस्तु' के रूप में चित्रित करना, भाषाई अशिष्टता, उपनिषदों का खंडन प्रचुर मात्रा में है। यौनाचार को गुरुसेवा के नामपर बढाया गया। इनकी भोगवाद वृत्ति के चलते १८८५ में मुंबई में एक संप्रदाय पर मुकदमा चला। यह वृत्ति आजतक कायम है नाना प्रकार से। अविभाजित भारत के लाहोर में से वहाँ के अधिकारियों ने १९४० में एक तथाकथित कृष्ण को भगा दिया था रासलीला के चलते। भारत पाक और भारत चीन युद्ध के समय तीन स्वघोषित कृष्ण रासलीला में व्यस्त थे। ऐसों को सामाजिक समर्थन मिलते रहा और जहाँ अनबन हुई या स्थानीय प्रशासन को खुश नहीं किया गया वहाँ पोल खुल गई। यहाँ इनके 'गुरु' ही नहीं पर समर्थक तक वैसे ही थे तभी दसियों जगह केन्द्र खोल भगवद्प्रेम के नामपर पापाचार किया। अधिकांश जगह सत्संग या कीर्तन का नाम रखा जाता। पचास - साठ के दशक में कई जगह केवल महिलायें केन्द्र चलाती थीं। किसी दुखियारी के बारे में सुनते ही उसे भगवद्चर्चा के लिए बुलाती। उसके लिए आसान रास्ता था मन्दिर आते-जाते पकडना। कोई एकाध ही इनके चंगुल से बच पाती। यह कार्य घरों या अलग से ली गई जगह पर होता आश्रम में प्रायः नहीं। वैसे भी उस समय अधिक आक्रम नहीं थे सब जगह क्योंकि इनसे कमाने की कला अपनी शिशुवस्था में थी। भारतीय समाज में संतानहीनता को पाप समझा जाता है और उसके लिए सारे उपाय करने की छूट दी गई जिसका दुरुपयोग भरपूर हुआ। ऐसा करने वालों ने दैहिक रुप से गुरुसेवा को महिमामंडित कर दिया और लोगों के दिलो-दिमाग में बात जम गई की इससे महिलाओं का जीवन सफल हो जाएगा। आज भी इसे सच माननेवाले बहुत हैं। इसमें केवल एक वर्ग दोषी नहीं। आखिर हर तरह के लोगों से समाज बना। दूसरी ओर आम आदमी का भोजन रोटी, मिर्चा, नमक और प्याज पर आघात किया गया। मनगढन्त किस्सों को पुराण में जोडकर प्याज लहसुन को बदनाम करके समाज को उनके विरुद्ध भड़काया।(२) कईयों ने गीता के सत्रहवें अध्याय में सात्विक राजसिक तथा तामसिक गुण वाले आहार के नामपर इन्हें गलत कहा जबकि ग्रन्थ में किसी खाद्य पदार्थ का नामतक नहीं है। टीकाओं में समझाने के नामपर इनका उदाहरण रहता है जबकि कोई भी वस्तु स्वयं में अच्छी-बुरी नहीं होती। आस्थावान समाज बातों में बह गया। सैकडों घरों में कलह रहने लगी खाने और न खाने के नाम पर। बाद में पनपी कुछ प्रान्तीय विचारधाराओं में गाजर, कटहल, बैंगन, लीची तक वर्जित कहा गया और ग्रन्थ तक लिखे गए। इनको पैसेवालों तथा विदेशी भक्तों का समर्थन अधिक नहीं मिला इसलिये प्रचार प्रसार कम हुआ। प्याज लहसुन से दूर रहने वाले गाजरादि खाते हैं तब उन्हें निषिद्ध समझने वालों की दृष्टि में बाकी लोग बुरे हो गए। सबकी सुनना और सिर पर बिठाना एक बात नहीं है। कोई तथाकथित विचारक जीव, जगत, आत्मा, ईश्वर, ब्रह्म पर विचार व्यक्त करने मात्र से उसके भाव दर्शन नहीं बन जाते। इनलोगों ने भगवान और ईश्वर को एक अर्थ में लेकर अनर्थ कर दिया। आस्तिक नास्तिक तक की मनगढन्त व्याख्या कर भ्रमजाल फैलाया। उपनिषदों में शिखा जनेऊ आदि के स्वरूप को समाज से छिपा अपनी दाल गलाई। इस मामले में पहले के भोग-विलासी राजाओं द्वारा प्रायोजित मान्यताओं का विरोध नहीं किया। वेदाध्ययन के लिये इसकी अनिवार्यता, वर्ग विशेष तथा नारी समाज के शोषण-दमन पर उनके द्वारा लिखवाए साहित्य की जाँच नहीं की। यह नहीं समझाया की वे वैदिक वाड्मय के प्रतिकूल होने के कारण ऐसे ग्रन्थ प्रमाण नहीं है। समाज सुधारक बन वंचित लोगों को वे अधिकार दे कर अपना समर्थक बना लिया। एक ने लूटा शास्त्र के नामपर दूसरे-तीसरे ने मानसिक दास बना लिया। किसी ने सही जानकारी नहीं दी। यानि सबने प्रामाणिक उपनिषदों के तथ्यों तथा उपासनाओं को सामने नहीं आने दिया। ऐसी भावनाएँ तथाकथित आस्तिक या शास्त्रानुरागी की कैसे हो सकती है। मानस में पहले ही संकेत कर दिया - 'हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ। जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सद्ग्रन्थ।।' 
वर्षाकाल में कच्चे रास्ते घास से ढक जाते हैं वैसे ही पाखंडवाद के चलते सद्ग्रन्थ छिप जाते हैं यानि उनका सार दबा रह जाता है। (३)

 इन बातों पर जल्दी से ध्यान नहीं जाता। जैसे महर्षि पतंजलि का अष्टांग योग बहिर्मुखता को बनाए रखता है क्योंकि वह स्थूल सुक्ष्म शरीर के लय तक सीमित रहकर कारण शरीर को आत्मरूप में लेता है। उसका संबंध आनन्दमय कोश से। होने के कारण उससे प्राप्त आनन्द को सर्वोच्च मानता है। जबकि उस स्तर की तमाम साधनाएं दैहिक है और आत्मज्ञान शरीर रूपी उपाधि संग है। ऐसा सामान्य ज्ञान प्रायः लोगों को रहता है। तभी कबीरदास पुत्र कमाल ने कहा -'इतना जोग कमाय के साधू, क्या तूने फल पाया। जंगल जाके खाक लगाये, फेर चौरासी आया।। राम भजन है अच्छा रे, दिल में रखो सच्चा रे। जोग जुगत की गत है न्यारी, जोग जहर का प्याला।। जीने पावे उने छुपावे, वो ही रहे मतवाला।।' यहाँ भजन स्वभाव या आदत सुधारने का द्योतक है। जोग को जहर का प्याला 'पहले चमत्कार फिर नमस्कार' वाली सामाजिक वृत्ति को लक्षित कर रहा है। यह अशिक्षित - शिक्षित दोनों वर्ग में देखी जा सकती है। इसमें यश कमाने की तीव्र लालसा योग - भोग को एक करती है। विभिन्न प्रदेशों में अलग-थलग मान्यताएँ हैं हमलोगों के बारे में। सामान्य तरीके से रहने वाले साधु को बहुधा हेय समझा जाता है। वह चप्पल जूते न पहने या पैसे न छुए या शीतकालीन वस्त्र न पहने या नशा करे या विचित्र वेष में रहे या केवल एक चीज का सेवन करे जैसे जल, मिर्चा, आलू, चना, आदि या स्नान बंद कर दे या बात करते हुए ढेरो गालियाँ दे इत्यादि। इनमें अधिकांश पूजित होने के लिए ऐसे चित्र विचित्र अभ्यास करते हैं। उस प्रांत विशेष का समाज उसे ही असली साधु मानता जो या तो वैसी (उनकी मान्यतानुसार) हरकत करे या कुछ और अलग से करे। जो एकांतवास करते हुए अलग से नियम पालन करते हैं उनकी बात अलग है, यहाँ संत कमाल उनपर कटाक्ष कर रहे हैं जो इनके चलते समाज में कीर्ति, कंचन, कामिनी के फेर में रहते हैं। उनके महलनुमा आश्रम और दबदबा ही उनकी साधना का फल जो बाद में औरों के काम आता है। ऐसी साधना आगे नहीं बढ़ाती साधक को। आखिर सब है अविद्या का परिवार। (४) व्यक्तिगत विचारों को भी अलग से दर्शन न माना जाए क्योंकि आधुनिक विचारकों ने श्रुति, युक्ति तथा अनुभूति वाले सुत्र का दुरुपयोग करते हुए युक्ति के नामपर वितण्डा का सहारा लिया और अपनी अनुभूति को बिना जँचवाए समाज पर लादी। जिस तरह रसायन शास्त्र में निर्णय लेने के लिए इतिहास या जीव विज्ञान काम नहीं आ सकता वैसे ही भारतीय दर्शन हेतु उनके लिए निर्मित सुत्र काम आएगें। यह लकीर के फकीर बनने या हठधर्मिता नहीं और न स्वतंत्र वैचारिकता को रोकने का प्रयास। अब चिन्तन और निठल्ला चिन्तन एक नहीं है। कई बार व्यक्ति अपने ही अनुभव को त्रुटिपूर्ण पाता है। अतः स्वानुभूत आधारित निर्णय का विश्लेषण न्याय संगत है। यह व्यक्तिवाद या व्यक्ति पूजा की अविद्याजनित अवधारणा को परे करेगा। इससे दृष्टि तथा दर्शन का वह आवश्यक भेद समझ में आएगा जहाँ संस्था, संप्रदाय या व्यक्ति विशेष की दृष्टि एक दुसरे पर हावी होने की जी तोड कोशश करती है वहीं दर्शन मनुष्य को महामना बनाने का सामर्थ्य रखता है बशर्ते वह ह्रदयंगं किया जाए। दृष्टि महामना नहीं बना सकती क्योंकि वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से व्यक्ति पूजा पर आधारित रहती है। 

तब क्या दर्शन और धर्म अलग - अलग है? क्या धर्म दर्शन से नहीं निकला? 

जैन दर्शन और जैन धर्म अलग हे। वैसे ही बौद्ध दर्शन तथा बौद्ध धर्म। जब किसी दर्शन विशेष का विस्तार या रुपांतरण धर्म के रुप में होता है तब उसमें कई बातें जोडी जाती है उसे औरों से विशेष प्रमाणित करने की जी तोड चेष्टा की जाती है। भारत के नौ स्थापित दर्शनों की अन्दरूनी एकता भंग होती है और संगति लगने का प्रश्न पैदा नहीं होता। नौ दर्शनों का सार उपनिषदों की वाणी सुनाता है संक्षेप में। वहीं दृष्टि केन्द्रित धर्म समाज में विघटन पैदा करता है जैसे प्याज लहसून की धार्मिक राजनीति, शिखा सूत्र की केवल कर्मकांड वाली व्याख्या को अतिरंजित ढंग से बतलाना, इत्यादि कार्य दर्शन विरोधी हैं। यह बातें दृष्टि या विचार अन्तर्गत है जिन्हें मध्ययुगीन संप्रदायों ने दर्शन का नाम देकर फैलाया। इनके प्रचार-प्रसार में उन राजघरानों का योगदान रहा जो उपनिषदों में समझाए धर्म के समानान्तर धार्मिक प्रणाली खडी करना चाहते थे। इसलिए जरुरी था की पौराणिक साहित्य तथा धर्मशास्त्रों में फेरबदल किया जाए और मनमाने ग्रन्थ रचकर उन्हें वैदिक साहित्य का हिस्सा बताया जाए। चूंकि संस्कृत पठन-पाठन की भाषा नहीं रही अतः उसके आधार पर अनर्गल बातें फैली जैसे संस्कृत पर वर्ग विशेष का अनाधिकार, आदि। एसो की दृष्टि को दर्शन कहना उचित नहीं। 
 इसीलिए चार्वाक, जैन, बौद्ध को नास्तिक कह अलग कर दिया गया। जमीनी सच्चाई से अनजान लोग तभी कहते हैं कि भारतीय दर्शनों में सामुदायिक जीवन (community living) की शिक्षा नहीं है। जबकि चार्वाक दर्शन यही समझाते हुए वेदांत की ओर ले जाता है। इन दोनों के बीच के दर्शन क्रमबद्ध तरीके से अध्यात्म तथा व्यवहार में संतुलन बनाते हुए जीना सिखाते हैं और मरना भी। 
अतः दृष्टि आधारित धर्म सही में जोडते नहीं। जब स्थापित दर्शनों के सार के क्रियान्वन में धीरे-धीरे विकृति आती हे और उसपर आधारित धर्म की मनमानी व्याख्या हो तब दृष्टि से निकले धर्म का कहना ही क्या। दर्शनों के मामले में समाधान उसी ए निकलता है। यह भी एक अन्तर है दर्शन और दृष्टि का। दृष्टि आधारिक धर्म स्मृति पुराण को अतिरंजित तरीके से महिमामंडित करता है और धर्मशासाज्ञों को अपरिवर्तनशील मानता तथा मनवाता है जिसके चलते समाज में वैमनस्यता बढती रहती है। (५)


स्वामी अक्षय चैतन्य 
संदर्भ :-
(१) कैसे उतरे मानस गहरे - स्वामी अक्षय चैतन्य विक्रम संवत २०७४ कोलकाता से प्रकाशित। 
(२) प्याज लहसुन के नामपर धार्मिक राजनीति आयोजित तथा प्रायोजित है।
https://youtu.be/HdvB57e9j-c
(३) कैसे उतरे मानस गहरे - स्वामी अक्षय चैतन्य विक्रम संवत २०७४ कोलकाता से प्रकाशित।
(४) संत वाणी - भाग २.
   https://youtu.be/xi2PyPVGo5s

(५) स्थापित भारतीय दर्शनों की अर्थवत्ता 
http://akshayaharshudou.blogspot.com/2020/10/blog-post_29.html

सनातन और वैदिक धर्म 
https://youtu.be/4xtQQuLbKAk
Before teaching sanatan e
https://youtu.be/KehVUf6v0J4


स्थापित भारतीय दर्शनों की अर्थवत्ता

  

 में प्रकाशित भारतीय दर्शन की अर्थवत्ता (पृष्ठ ३३) विषय पर प्रकाशित रचना ब्लॉग से भेजी गयी थी। पूरी रचना यहाँ उपलब्ध है। 


शिक्षा विषय विशेष की जानकारी का अभाव दूर कर मनुष्य में उसके प्रति सजगता उत्पन्न करती है। मुश्किल तब होती है जब जानकारी देनेवाले (शिक्षक, प्राध्यापक, प्रकाशित साहित्य, पाठ्यक्रम, पत्र - पत्रिकाएँ, संचार माध्यम, सरकार, मार्गदर्शक, परिजन, सम्बन्धी, मित्रादि)  वैमनस्यता, ईष्या, विद्वेष, अव्यक्त अभिप्राय, बदला, दबाके रखना, जीते जी औरों को आगे न बढने देना, भाई - भतीजावाद, क्षेत्र - जाति - वर्ण - भाषा को हथियार रुप में प्रयोग जैसी ओछी हरकते मुखौटे लगाकर या मजे लेने के लिए (बिना मुखौटे) प्रेम स पथभ्रमित या कुपथगामी या दोनों बना देते हैं उस व्यक्ति विशेष को जो किसी विषय के बारे में जानने आया था। यह मानसिकता भी अन्य परंपराओं की भाँति प्राचीन है। तब दर्शन का पठन-पाठन अछूता नहीं रह सकता। स्वयंभू दार्शनिकों की सुनामी में  स्वघोषित, प्रायोजित, आयोजित तथा भक्तों के चलते बने चार तरह के मार्गदर्शक है। तभी कहा जाता है कि ऐसे दस को एक जगह बन्द कर दो तो ग्यारहवाँ दर्शन तैयार हो जाएगा। यहाँ नासमझी विचार और दर्शन को एक मानने के चलते पैदा हुई है। इसीलिए यहाँ दर्शन पूर्व 'स्थापित' शब्द प्रयुक्त हुआ है। 

 अर्थवत्ता यानि अर्थवान वाली स्थिति जहाँ संदर्भानुसार संपन्नता संप्रेषित होती है। यहाँ दर्शन के साथ जुडकर वह विशिष्ट आशय रूपी संपन्नता दर्शा रही है जो सुत्रात्मक शैली में उसमें छिपी है। दर्शन दृष्टि देता है द्रष्टा, दृश्य और देखने की क्रिया (दर्शन करना या देखना) के विभिन्न धरातलों को परखते हुए विवेक जगाने की। इसीके चलते एक वस्तु, स्थान, घटना की नाना व्याख्याएँ सामने आती हैं जैसे एक ही पुष्प को वनस्पती वैज्ञानिक, कवि, भक्त, विचारक, विक्रेता, प्रेमी अपनी तरीके से देखे और परखेगा। अवसाद या विच्छेद के चलते प्रिय लगने वाला पुष्प आकर्षित कम करता है क्योंकि अब उसके साथ उपहार देने वाला भाव का संयोग नहीं हुआ। इसके साथ भारतीय शब्द का प्रयोग दर्शन को व्यक्तिगत अवधारणा से परे रखता है जो स्थान, समय, संस्कार, लालन - पालन, परिवेश, परिपक्वता, प्रायोजक (संस्थाएं-- राजनैतिक, संप्रदाय या पंथ आधारित, आदि) का प्रभाव, अतृप्त एषणा पर केवल आधारित ही नहीं होती वरन येन केन प्रकारेण समाज तथा संसाधनों को वश में करने में जुटती है। भारतीय दर्शन हेतु फिलासाॅफी शब्द का प्रयोग आम व्यवहार निमित्त है क्योंकि वह एक हदतक ज्ञानासक्ति दर्शाती जहाँ श्रुति (श्रवण, मनन, निदिध्यासन रूपी अध्ययन), युक्ति तथा अनुभूति का संगम नहीं है। व्यक्ति केवल एक या दो के पीछे दौडते हुए आवश्यक संगति से परे रहता है जो आत्यंतिक समाधान पथ पर आनेवाली बाधाओं से बच सके। वह तत्वदर्शी आलोचना से परे रह स्वसम्मोहित हो अपने बुने शाब्दिक जाल में फँसा रहता है। 

भारतीय दर्शन में वैदिक वाड्मय समर्थित नौ नाम सामने आते हैं - चार्वाक, जैन, बौद्ध, न्याय (महर्षि गौतम), वैशेषिक (महर्षि कणाद), सांख्य(महर्षि कपिल), योग महर्षि पतंजली), पूर्व मिमांसा (महर्षि जैमिनी) तथा उत्तर मीमांसा (महर्षि बादरायण) तथा जिनके अधिकांश प्रामाणिक सिद्धांत प्रत्यक्ष या सुत्रात्मक शैली में प्राचीन उपनिषदों तथा अन्य ग्रन्थों में दिखते हैं जिन्हें पठन-पाठन हेतु अलग किया गया। इसीलिए उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता आदि में स्पष्ट रूप से नाम का उल्लेख नहीं है। अध्ययन व्यसनी इसको सरलता से पकडता है। उपरोक्त स्थापित नौ दर्शनों में अन्दरूनी सामंजस्यता है प्रतिस्पर्धा नहीं। भारतीय दर्शन उन शाश्वत प्रश्नों की ओर मन को ले जाता है जिनपर अनियंत्रित बहिर्मुखता या पाशविक वृत्तियों की प्रधानता वश ध्यान टिक नहीं पाता। जिजीविषा से जूझता हुआ व्यक्ति ऊहापोह से त्रस्त - पस्त हो विलोडित मनःस्थिति में उन शाश्वत प्रश्नों में समाधान तलाशता है जो आवागमन, एक से कर्म का भिन्न कर्मफल और उसे देनेवाला, उस नियामक सत्ता की खोज जिसके चलते प्रकृति अनुशासित शैली में कार्यरत है, भवितव्यता, संतुलन, प्रारब्ध, मोक्ष, बंधन, जीव, ईश्वर, आदि और ऐसी दशा में 'दर्शन सुरसरी' की ओर ताकता है जो वात्सल्यपूर्ण शैली में समझाने का प्रयास करते हुये स्वयं को न थोपकर विवेकवान बना आत्यंतिक समाधान ओर ले जाती है उस नदी की भाँति जो बाधाओं से जूझते हुए सागर की ओर बढती रहती है। यहाँ राह में आनेवाले मनोहारी दृश्य, मान - सम्मान तक बाधा है जो लक्ष्य (सागर मिलन) के पूर्व रोकने का प्रयास करते हैं। 

वैदिक वाड्मय 'अस्ति' पर आधारित है 'नास्ति' पर नहीं। जैसे अभी आप यहाँ हैं कहीं और नहीं (दैहिक रूपेण) पर आप 'हैं' कहीं खोए नहीं, पुस्तक वहाँ नहीं यहाँ रखी हुई है में 'पुस्तक' अस्तित्व बोधक है। यहाँ शून्यवाद की बात उठाई जाय तब मताग्रही समर्थित व्याख्या (कुछ नहीं है पर उसे जानने वाला तो है) नहीं ठहरती क्योंकि वह प्रपंच और उससे ऊपर उठने के मध्य की ओर संकेत करनेवाला शब्द है। सोची-समझी कूटनीति तहत दर्शनों को आस्तिक - नास्तिक खेमें में बाँटा तथा चार्वाक, जैन, बौद्ध पर नास्तिक का ठप्पा लगाया गया। जैन तथा बौद्ध को पनपने का अवसर मिला फिर चाहे वह धर्म के रूप में हो पर चार्वाक हाशिये पर रखा गया। पाश्चात्य 'एथीइएस्म' को आँख मूँद कर अपना लिया गया जो दर्शनों के साथ मेल नहीं खाता।नास्तिक शब्द की नमुने के तौर पर चर्चित बचकानी व्याख्याओं को तनिक देखा जाए :-

१. नास्तिक वेद को प्रमाण और अपौरुषेय नहीं मानते

वेद शब्द विद् धातु से बना है जिसका अर्थ ज्ञान से है। अब इसे जानकारी या 'ग्यान' के रूप में लेने की बात अलग है। यह जानकारी देती है नाना विषयों की जो सबके सब स्वाभाविक रूप से एक व्यक्ति या समूह विशेष को ग्राह्य नहीं होते पर इसका अर्थ यह नहीं कि वे वेद से परे या अवैदिक है। सबकी अपनी पसंद, प्राथमिकता तथा प्रयोजनियता है। ऊपर से भौगोलिक परिस्थिति का प्रभाव विषयों पर पडता है। रही पौरुषेय - अपौरुषेय वाली बात तो पिपासा शान्त होती है तरल पदार्थ से - यह हुआ मूल सिद्धांत या अपौरुषेय। उसके लिये जल, रस, दूध तथा पीने हेतु नाना पात्र में से चुनाव की स्वाधीनता पौरुषेय या पुरुष कृत या वे नियम जो बनते-बिगड़ते-बदलते हैं। वस्तु को यथावत लेना ही अपौरुषेयता है जैसे पुष्प वाले उदाहरण में नाना तरह की समझ 'पुरुष कृत'। अनजान वस्तु हेतु परिचय जरूरी है पर वहीं तक जहाँ वह उसके रूप के साथ खिलवाड न करे। जब वेद समझ उत्पन्न करने का माध्यम है तब उसे प्रमाण न मानने की बात कहना 'बाल रोदन' के सिवाय कुछ और नहीं। वह किसी पुस्तक का नाम नहीं जिसे मानने - न मानने का प्रसंग उपस्थित हो। विभिन्न दरबारों द्वारा प्रायोजित पूर्व मिमांसा के कट्टर समर्थकों ने वेद पर अपौरुषेयता और उपलब्ध सामग्री पर अपरिवर्तशीलता की छाप लगा दी। 

२. नास्तिक परलोक नहीं मानते 

परलोक के अस्तित्व का निषेध नहीं किया गया। उसे 'न मानने' वाली बात का लक्ष्यार्थ देखना चाहिये। उनकी प्राप्ति हेतु नाना उपाय किए जाते हैं पर वे प्रपंच में फँसाये रखते हैं - श्रीमद्भगवद्गीता में कर्मकांड वाले इस पक्ष को स्वरूपावसंधान में बाधारूप मानते हुए इनसे परे रहने की सलाह दी है (अ.२ - श्लोक ४१-४४,अ.९ - श्लोक २० - २१)। ऐसे उदाहरण अन्य ग्रन्थों में भी है जहाँ इनसे दूर रहने की सलाह दी गई है। यूँ तो अद्वैत भी परलोक के पीछे भागने की बात नहीं करता पर उसे खुलकर नास्तिक नहीं कहा जाता। भक्ति संप्रदायों में परलोक प्रधान है अतः इनके विद्वानों ने इस आरोप को अधिक प्रचारित किया।

३. नास्तिक भगवान / ईश्वर नहीं मानते 

भगवान तथा ईश्वर शब्द में काफी अन्तर है। ऊपर से उनका अनुवाद गॉड करके गुडगुडाना अनुचित है। सबने तत्व या अहं या मूल नियामक को माना है। संप्रेषण की भिन्नता से उसका निषेध सिद्ध नहीं होता। भगवान तथा ईश्वर पर अधिक जानकारी हेतु यूट्यूब में अक्षय चैतन्य नामक चैनल अन्तर्गत चार्वाक दर्शन प्लेलिस्ट में विडियो सुन लें। 

ईश्वर किसे कहें? 

https://youtu.be/IH6KiJ0CVcY

भगवान शब्द का अर्थ तथा प्रयोग 

https://youtu.be/Zf-SFAbjKAE

न्यूनाधिक नास्तिक सभी हैं

https://youtu.be/jHgh2OTF7FY

Concept of God 

https://youtu.be/YnUsEzPZK6k

ऐसी बचकाने आरोपों के साथ भारतीय दर्शन को पाठ्यक्रम के द्वारा त्रासदी झेलनी पडी। उन्हें इस चित्र - विचित्र शैली से पढाया गया जिससे उनका आशय छिपा रह गया और वे दैनन्दिन जीवन से जुड नहीं पाए जिसके फलस्वरूप समाज उनसे उदासीन हो गया जबकि दैनिक व्यवहार में कमोवेश वे सब काम आते हैं। तथाकथित बुद्धिजीवियों ने भी बहती गंगा में हाथ धोने की परंपरा का पालन किया। कैसेे? इस तरह - - ->

विभिन्न मानसिकता वाले शासकों में बँटा हुआ यह देश दर्शनों को अपनी-अपनी पसंद-नापसंद के अनुसार समर्थन करता गया। जब जिस शासक का प्रभाव विस्तार हुआ उसने अपनी पसंदानुसार औरों को ढालना शुरू किया। राजतंत्र द्वारा प्रायोजित दरबारी विद्वानों ने ठकुरसुहाती करते हुए अपने 'अन्नदाता' की रुचि का ख्याल रखा और तदनुसार दर्शनों को आगे बढाया। इस मण्डली ने पूर्व मिमांसा की आड में समाज को उसका दास बना दिया। चूँकि वैदिक वाड्मय संस्कृत में था और शिक्षा या आम बोलचाल से वह दूर चली गयी तब समाज को शास्त्रों के नामपर भ्रमित तथा शोषण करना सरल हो गया। उसके लिये नाना ग्रन्थ लिखे गये ताकि शोषण में सुविधा रहे। दूसरी ओर दर्शन के नाम पर रटवाना और विवाद या शास्त्रार्थ से एक दूसरे को पराजित करने को महान उपलब्धि माना - मनवाया। समाज इसीसे प्रसन्न रह ऐसों पर अपनी संपदा तथा आस्था लुटाता रहा। इसमें अधिकतम नुकसान चार्वाक दर्शन का हुआ जो पीढ़ीगत परंपरा से शासन व्यवस्था का समर्थक नहीं था और शास्त्रों के नामपर दोहन का विरोधी था। विलासी राजाओं वह रास नहीं आया। इस तरह उस दर्शन की आच्छाईयाँ छिपी रह गई। इसपर चर्चा अलग से होगी। यहाँ इतना कहना है कि शिक्षण जगत से जुडे लोग तक अपने-अपने प्रायोजक की मंशानुसार दर्शनों का दर्शन करते हैं। किसी मत या पंथ के प्रति व्यक्तिगत लगाव को स्थापित दर्शनों के साथ मिलाना या उनकी व्याख्या अपनी आस्थानुसार करना विद्वता कदापि नहीं। जो लोग केवल वामपंथी विचारकों को दोष देते हैंं उनमें से कई स्वयं भी कम नहीं। यह अनुभव बहुतों का है और कई बार हो चुका। ये भी पाठ्यक्रम बदलने की बात नहीं करते। जबकि सब जानतेे हैं  :-  भारतीय दर्शन जीवन्त है। 

https://youtu.be/lDtGgp40xU8

इसकी जानकारी होने के उपरान्त तालमेल नहीं बैठ पाता जो कि शैक्षणिक पद्धति की कमी उजागर करता है। दर्शन ज्ञान बघारने, रहस्यवाद, ख्याली पुलाव, हवामहल बनाने का पक्षधर नहीं है। वह व्यवहार विरोधी नहीं वरन उसे संतुलित ढंग से सम्पादन की वकालत करता है। मुश्किल यह है कि बहुतों को वह पसंद नहीं और वे केवल उस ज्ञानचर्चा में डुबकी लगाते हैं जिसके लिये उनका अन्तःकरण तैयार नहीं :-

ब्रह्मग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरी बात। कौडि लागि लोभबस करहिं बिप्र गुर घात।। रामचरितमानस - उतातरकांड दोहा ९९ (क) 

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में दर्शन में निहित मुल्य पर सेमिनार के दौरान राजस्थान विश्वविद्यालय से आए प्राध्यापक ने बतलाया कि उनके यहाँ वे ही विद्यार्थी दर्शन पढते हैं जिनके अंक कम है या महंगी पढाई का खर्च उठाने में असमर्थ है। आजीविका की चिन्ता सही चिन्तन करने नहीं देती। दर्शनों की अधिकांश पुस्तकें इस तरीके से तैयार हुई मानो सब एक दूजे के घोर विरोधी हो और उनका मात्र उद्देश्य अन्य को नीचा दिखाना है। आदि शंकराचार्य का उल्लेख करते हुए कहा जाता है कि उन्होंने सबका खंडन किया। उन्होंने वैचारिक संक्रमण किया जिसे दर्शन का खंडन कहा गया। इसे समझने के लिए इतना कहना काफी है की पहली कक्षा में पढी हिन्दी वर्णमाला से बने शब्द काम आते हैं फिर चाहे व्यक्ति हिन्दी विषय में कितना भी महान बन जाए। यह पहली कक्षा का खंडन नहीं हुआ वरन वह आगे बढने में काम आई। भले ही व्यक्ति निठल्ला हो फिर भी उन्हीं वर्णों का प्रयोग करता है। 

दर्शनों की दार्शनिकता इतनी बोझिल नहीं है जैसा समाज में प्रचारित है। उनमें बह रही अन्तः सलीला में डुबकी लगाने से उनका पारस्परिक सम्बन्ध समझ में आता है। यह श्रृंखला चार्वाक से प्रारम्भ होकर वेदान्त में शेष होती है। सांसारिकता से उपजी वेदना का अंत वेदांत से होता है। वहाँ आत्यन्तिक समाधान प्राप्त होता है पर नींव की ईंट चार्वाक दर्शन में रखी जाती है। आन्तरिक विकास अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूँ) कहने से नहीं होता बल्कि निरंकुशता या चरित्रहीनता का प्रसंग उपस्थित होता है - मैं ब्रह्म तु ब्रह्म शरीर का क्या चाहे जैसे भोगो। याद रहे कि ऐसी ज्ञान की बातें आतंकवादियों को भी सुनाई जाती है पर उसका प्रयोजन समाजोपयोगी नहीं होता। उन्हें यहाँ कष्ट सहकर पारलौकिक सुखों का सपना दिखाया जाता है। यह दृष्टि प्रायः हठयोग वालों में पाई जाती है जो योग द्वारा ही तत्वदर्शी होने का दावा करते हैं। वे स्थूल तथा सुक्ष्म शरीर का लय मानते हैं पर कारण शरीर का नहीं। उसमें स्थित आनन्दमय कोश या उससे उत्पन्न आनन्द को ही सबकुछ मानत हुए भूल जाते हैं कि वह(आनन्द) सौपाधिक (उपाधि सहित) है निरुपाधिक नहीं। ऐसी नाना असुविधाएँ पैदा होती हैं जब वेदान्त से पूर्व आनेवाले दर्शनों के प्रति अनावश्यक मोह पैदा होता है। समाधान का भ्रम एक हदतक शान्ति देता है पर सजग साधक आगे की यात्रा जारी रखता है। क्यूँ करती है दर्शन की नदिया ऐसा व्यवहार? सीधे-सीधे लक्ष्य की ओर बिना रुके ले जाए? मनुष्यों की प्राथमिकता और प्रयोजनीयता तो क्या ग्रहण क्षमता तक अलग - अलग है। सबको एक लाठी से हाँकना उचित नहीं। केवल देखादेखी योग करने से रोग बढता है वैसे ही दर्शनों के मामले में है। प्रारम्भिक दर्शनों में प्रशिक्षित तथा उन्हें क्रियान्वयन से ही वैचारिकता धारदार होती है। केवल अस्थायी आनन्द देना या अपने से बाँधे रखना दर्शन का उद्देश्य नहीं हो सकता। 

भारतीय दर्शनों पर लिखते, बोलते या पढाते वक्त व्यक्ति विशेष का जुडाव दो - एक दर्शन से होना स्वाभाविक है। ऊपर से सबके सभझाने की शैली अलग। अतः एक ही दर्शन पर विरोधाभास या वैचारिक द्वन्द्व परिलक्षित होता उसपर तैयार साहित्य में। आन्तरिक लगाव बिना अन्य दर्शनों के मामले में ऐसी अजीबोगरीब स्थिति बढ जाती है। ऐसी संभावना को पहले से भाँपकर ऋषियों ने वैदिक वाड्मय, भाष्य, टीकादि की प्रमाणिकता जाँचने हेतु तीन सुत्र दिये और समझा दिया की क्रम में नीचे आनेवाले ग्रन्थ बडे ग्रन्थों के अनुकूल अंश में प्रमाण है। इसीलिए पुराणों को परतः सिद्ध माना गया क्योंकि उनकी रचना विशेषतः समय बिताने के लिए हुई थी। अतः पौराणिक विचार फिलासॉफी है दर्शन नहीं। माध्वाचार्य की रचना सर्व दर्शन संग्रह में नौ दर्शनों के अलावा जितनी सामग्री है कि वह वैदिक दर्शन नहीं क्योंकि उनमें वह एकता नहीं और न वे आत्यंतिक समाधान की ओर ले जाते हैं। यहाँ एक प्रश्न उठता है कि शैव, वैष्णव, शाक्त और योग पर उपनिषद है तब सर्व दर्शन संग्रह में लिखित सारे विचार दर्शन श्रेणी के हैं क्योंकि उन्हें उपनिषदों का समर्थन प्राप्त है। ऐसा नहीं है। सूत्रों की जाँच समक्ष यह प्रश्न शेष हो जाता है। अब अगर कहा जाए कि ये विचार उन शाश्वत प्रश्नों की विवेचना करती है इसलिए ये भी दर्शन है। इस तरह तो कोई भी अपने विचार व्यक्त कर सकता है तब वे भी दर्शन विभाग में आ गए। भले ही पौराणिक, स्मृतिकार, आधुनिक चिन्तक कहें पर उनकी संगति स्थापित दर्शनों से नहीं लगती और स्वयं की श्रेष्ठता, भाषाई चमत्कार, शब्दाडंबर की गन्ध अधिक आती है। यह व्यक्तिगत राय नहीं वरन उन सत्रों की देन है जो जाँचने हेतु दिए गए। उनकी जानकारी हेतु - 

https://akshaygroundreality.blogspot.com/2016/10/upanishads-investigation-2.html

अभीतक की संक्षिप्त चर्चा से ऋषियों का गहन चिन्तन मनन निदिध्यासन सामने आता है जो द्रष्टव्य की ओर इंगित करता है यानि हथेली पर रखे आँवले देखने जैसी अवस्था की प्राप्ति। इसतक पहुँचने हेतु चरणबद्ध तरीके से दर्शन तैयार करता है। इसपर पलायनवाद या निष्क्रियता का आरोप लगाया गया। यह मनगढन्त बात है। भारतीय दर्शन जीना ही नहीं मरना तक सिखाता है। वह जीते जी मुक्ति का आनन्द देने में सक्षम है बशर्ते कोई लेनेवाला हो। यह नियंत्रित भोग का पक्षधर है जिससे दैहिक, मानसिक तथा बौद्धिक स्वास्थ्य में संतुलन बना रहता है। अनियंत्रित भोग से आहार-विहार व्यवहार नहीं चलता। ऐसा मनुष्य सपने को लक्ष्य बनाकर तडपते रहता है जबकि दर्शन लक्ष्य को सपना मानने को कहते हैं। यहाँ मूल लक्ष्य स्वयं को जानना तथा उसमें स्थित होते हुए महामना बनना है जहाँ अन्तःकरण का तादात्म्य सृष्टि संविधान के साथ होने लगता है। जीवन के विभिन्न आयामों का प्रबंधन संतुलित शैली में समझाना भारतीय दर्शन की अनमोल देन है। 

स्थापित दर्शनों के प्रति उदासीनता का दुष्परिणाम साहित्य को उठाना पडा जहाँ छायावाद, रहस्यवाद, आयातित वाद की मुहर उन रचनाकारों पर लगा दी जिन्होंने इन दर्शनों की अन्तरूनी एकता  ह्रदयं करके लेखनी उठाई जैसे प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुमित्रानन्दन पन्त, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, रामधारी सिंह दिनकर, शिवानी, फैज, आदि। 

स्वामी अक्षय चैतन्य