Sunday, 28 March 2021
साहित्य : वैचारिकता तथा बौद्धिकता
Friday, 26 March 2021
दृष्टि, दर्शन और धर्म
स्थापित भारतीय दर्शनों की अर्थवत्ता
शिक्षा विषय विशेष की जानकारी का अभाव दूर कर मनुष्य में उसके प्रति सजगता उत्पन्न करती है। मुश्किल तब होती है जब जानकारी देनेवाले (शिक्षक, प्राध्यापक, प्रकाशित साहित्य, पाठ्यक्रम, पत्र - पत्रिकाएँ, संचार माध्यम, सरकार, मार्गदर्शक, परिजन, सम्बन्धी, मित्रादि) वैमनस्यता, ईष्या, विद्वेष, अव्यक्त अभिप्राय, बदला, दबाके रखना, जीते जी औरों को आगे न बढने देना, भाई - भतीजावाद, क्षेत्र - जाति - वर्ण - भाषा को हथियार रुप में प्रयोग जैसी ओछी हरकते मुखौटे लगाकर या मजे लेने के लिए (बिना मुखौटे) प्रेम स पथभ्रमित या कुपथगामी या दोनों बना देते हैं उस व्यक्ति विशेष को जो किसी विषय के बारे में जानने आया था। यह मानसिकता भी अन्य परंपराओं की भाँति प्राचीन है। तब दर्शन का पठन-पाठन अछूता नहीं रह सकता। स्वयंभू दार्शनिकों की सुनामी में स्वघोषित, प्रायोजित, आयोजित तथा भक्तों के चलते बने चार तरह के मार्गदर्शक है। तभी कहा जाता है कि ऐसे दस को एक जगह बन्द कर दो तो ग्यारहवाँ दर्शन तैयार हो जाएगा। यहाँ नासमझी विचार और दर्शन को एक मानने के चलते पैदा हुई है। इसीलिए यहाँ दर्शन पूर्व 'स्थापित' शब्द प्रयुक्त हुआ है।
अर्थवत्ता यानि अर्थवान वाली स्थिति जहाँ संदर्भानुसार संपन्नता संप्रेषित होती है। यहाँ दर्शन के साथ जुडकर वह विशिष्ट आशय रूपी संपन्नता दर्शा रही है जो सुत्रात्मक शैली में उसमें छिपी है। दर्शन दृष्टि देता है द्रष्टा, दृश्य और देखने की क्रिया (दर्शन करना या देखना) के विभिन्न धरातलों को परखते हुए विवेक जगाने की। इसीके चलते एक वस्तु, स्थान, घटना की नाना व्याख्याएँ सामने आती हैं जैसे एक ही पुष्प को वनस्पती वैज्ञानिक, कवि, भक्त, विचारक, विक्रेता, प्रेमी अपनी तरीके से देखे और परखेगा। अवसाद या विच्छेद के चलते प्रिय लगने वाला पुष्प आकर्षित कम करता है क्योंकि अब उसके साथ उपहार देने वाला भाव का संयोग नहीं हुआ। इसके साथ भारतीय शब्द का प्रयोग दर्शन को व्यक्तिगत अवधारणा से परे रखता है जो स्थान, समय, संस्कार, लालन - पालन, परिवेश, परिपक्वता, प्रायोजक (संस्थाएं-- राजनैतिक, संप्रदाय या पंथ आधारित, आदि) का प्रभाव, अतृप्त एषणा पर केवल आधारित ही नहीं होती वरन येन केन प्रकारेण समाज तथा संसाधनों को वश में करने में जुटती है। भारतीय दर्शन हेतु फिलासाॅफी शब्द का प्रयोग आम व्यवहार निमित्त है क्योंकि वह एक हदतक ज्ञानासक्ति दर्शाती जहाँ श्रुति (श्रवण, मनन, निदिध्यासन रूपी अध्ययन), युक्ति तथा अनुभूति का संगम नहीं है। व्यक्ति केवल एक या दो के पीछे दौडते हुए आवश्यक संगति से परे रहता है जो आत्यंतिक समाधान पथ पर आनेवाली बाधाओं से बच सके। वह तत्वदर्शी आलोचना से परे रह स्वसम्मोहित हो अपने बुने शाब्दिक जाल में फँसा रहता है।
भारतीय दर्शन में वैदिक वाड्मय समर्थित नौ नाम सामने आते हैं - चार्वाक, जैन, बौद्ध, न्याय (महर्षि गौतम), वैशेषिक (महर्षि कणाद), सांख्य(महर्षि कपिल), योग महर्षि पतंजली), पूर्व मिमांसा (महर्षि जैमिनी) तथा उत्तर मीमांसा (महर्षि बादरायण) तथा जिनके अधिकांश प्रामाणिक सिद्धांत प्रत्यक्ष या सुत्रात्मक शैली में प्राचीन उपनिषदों तथा अन्य ग्रन्थों में दिखते हैं जिन्हें पठन-पाठन हेतु अलग किया गया। इसीलिए उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता आदि में स्पष्ट रूप से नाम का उल्लेख नहीं है। अध्ययन व्यसनी इसको सरलता से पकडता है। उपरोक्त स्थापित नौ दर्शनों में अन्दरूनी सामंजस्यता है प्रतिस्पर्धा नहीं। भारतीय दर्शन उन शाश्वत प्रश्नों की ओर मन को ले जाता है जिनपर अनियंत्रित बहिर्मुखता या पाशविक वृत्तियों की प्रधानता वश ध्यान टिक नहीं पाता। जिजीविषा से जूझता हुआ व्यक्ति ऊहापोह से त्रस्त - पस्त हो विलोडित मनःस्थिति में उन शाश्वत प्रश्नों में समाधान तलाशता है जो आवागमन, एक से कर्म का भिन्न कर्मफल और उसे देनेवाला, उस नियामक सत्ता की खोज जिसके चलते प्रकृति अनुशासित शैली में कार्यरत है, भवितव्यता, संतुलन, प्रारब्ध, मोक्ष, बंधन, जीव, ईश्वर, आदि और ऐसी दशा में 'दर्शन सुरसरी' की ओर ताकता है जो वात्सल्यपूर्ण शैली में समझाने का प्रयास करते हुये स्वयं को न थोपकर विवेकवान बना आत्यंतिक समाधान ओर ले जाती है उस नदी की भाँति जो बाधाओं से जूझते हुए सागर की ओर बढती रहती है। यहाँ राह में आनेवाले मनोहारी दृश्य, मान - सम्मान तक बाधा है जो लक्ष्य (सागर मिलन) के पूर्व रोकने का प्रयास करते हैं।
वैदिक वाड्मय 'अस्ति' पर आधारित है 'नास्ति' पर नहीं। जैसे अभी आप यहाँ हैं कहीं और नहीं (दैहिक रूपेण) पर आप 'हैं' कहीं खोए नहीं, पुस्तक वहाँ नहीं यहाँ रखी हुई है में 'पुस्तक' अस्तित्व बोधक है। यहाँ शून्यवाद की बात उठाई जाय तब मताग्रही समर्थित व्याख्या (कुछ नहीं है पर उसे जानने वाला तो है) नहीं ठहरती क्योंकि वह प्रपंच और उससे ऊपर उठने के मध्य की ओर संकेत करनेवाला शब्द है। सोची-समझी कूटनीति तहत दर्शनों को आस्तिक - नास्तिक खेमें में बाँटा तथा चार्वाक, जैन, बौद्ध पर नास्तिक का ठप्पा लगाया गया। जैन तथा बौद्ध को पनपने का अवसर मिला फिर चाहे वह धर्म के रूप में हो पर चार्वाक हाशिये पर रखा गया। पाश्चात्य 'एथीइएस्म' को आँख मूँद कर अपना लिया गया जो दर्शनों के साथ मेल नहीं खाता।नास्तिक शब्द की नमुने के तौर पर चर्चित बचकानी व्याख्याओं को तनिक देखा जाए :-
१. नास्तिक वेद को प्रमाण और अपौरुषेय नहीं मानते -
वेद शब्द विद् धातु से बना है जिसका अर्थ ज्ञान से है। अब इसे जानकारी या 'ग्यान' के रूप में लेने की बात अलग है। यह जानकारी देती है नाना विषयों की जो सबके सब स्वाभाविक रूप से एक व्यक्ति या समूह विशेष को ग्राह्य नहीं होते पर इसका अर्थ यह नहीं कि वे वेद से परे या अवैदिक है। सबकी अपनी पसंद, प्राथमिकता तथा प्रयोजनियता है। ऊपर से भौगोलिक परिस्थिति का प्रभाव विषयों पर पडता है। रही पौरुषेय - अपौरुषेय वाली बात तो पिपासा शान्त होती है तरल पदार्थ से - यह हुआ मूल सिद्धांत या अपौरुषेय। उसके लिये जल, रस, दूध तथा पीने हेतु नाना पात्र में से चुनाव की स्वाधीनता पौरुषेय या पुरुष कृत या वे नियम जो बनते-बिगड़ते-बदलते हैं। वस्तु को यथावत लेना ही अपौरुषेयता है जैसे पुष्प वाले उदाहरण में नाना तरह की समझ 'पुरुष कृत'। अनजान वस्तु हेतु परिचय जरूरी है पर वहीं तक जहाँ वह उसके रूप के साथ खिलवाड न करे। जब वेद समझ उत्पन्न करने का माध्यम है तब उसे प्रमाण न मानने की बात कहना 'बाल रोदन' के सिवाय कुछ और नहीं। वह किसी पुस्तक का नाम नहीं जिसे मानने - न मानने का प्रसंग उपस्थित हो। विभिन्न दरबारों द्वारा प्रायोजित पूर्व मिमांसा के कट्टर समर्थकों ने वेद पर अपौरुषेयता और उपलब्ध सामग्री पर अपरिवर्तशीलता की छाप लगा दी।
२. नास्तिक परलोक नहीं मानते
परलोक के अस्तित्व का निषेध नहीं किया गया। उसे 'न मानने' वाली बात का लक्ष्यार्थ देखना चाहिये। उनकी प्राप्ति हेतु नाना उपाय किए जाते हैं पर वे प्रपंच में फँसाये रखते हैं - श्रीमद्भगवद्गीता में कर्मकांड वाले इस पक्ष को स्वरूपावसंधान में बाधारूप मानते हुए इनसे परे रहने की सलाह दी है (अ.२ - श्लोक ४१-४४,अ.९ - श्लोक २० - २१)। ऐसे उदाहरण अन्य ग्रन्थों में भी है जहाँ इनसे दूर रहने की सलाह दी गई है। यूँ तो अद्वैत भी परलोक के पीछे भागने की बात नहीं करता पर उसे खुलकर नास्तिक नहीं कहा जाता। भक्ति संप्रदायों में परलोक प्रधान है अतः इनके विद्वानों ने इस आरोप को अधिक प्रचारित किया।
३. नास्तिक भगवान / ईश्वर नहीं मानते
भगवान तथा ईश्वर शब्द में काफी अन्तर है। ऊपर से उनका अनुवाद गॉड करके गुडगुडाना अनुचित है। सबने तत्व या अहं या मूल नियामक को माना है। संप्रेषण की भिन्नता से उसका निषेध सिद्ध नहीं होता। भगवान तथा ईश्वर पर अधिक जानकारी हेतु यूट्यूब में अक्षय चैतन्य नामक चैनल अन्तर्गत चार्वाक दर्शन प्लेलिस्ट में विडियो सुन लें।
ईश्वर किसे कहें?
https://youtu.be/IH6KiJ0CVcY
भगवान शब्द का अर्थ तथा प्रयोग
https://youtu.be/Zf-SFAbjKAE
न्यूनाधिक नास्तिक सभी हैं
https://youtu.be/jHgh2OTF7FY
Concept of God
https://youtu.be/YnUsEzPZK6k
ऐसी बचकाने आरोपों के साथ भारतीय दर्शन को पाठ्यक्रम के द्वारा त्रासदी झेलनी पडी। उन्हें इस चित्र - विचित्र शैली से पढाया गया जिससे उनका आशय छिपा रह गया और वे दैनन्दिन जीवन से जुड नहीं पाए जिसके फलस्वरूप समाज उनसे उदासीन हो गया जबकि दैनिक व्यवहार में कमोवेश वे सब काम आते हैं। तथाकथित बुद्धिजीवियों ने भी बहती गंगा में हाथ धोने की परंपरा का पालन किया। कैसेे? इस तरह - - ->
विभिन्न मानसिकता वाले शासकों में बँटा हुआ यह देश दर्शनों को अपनी-अपनी पसंद-नापसंद के अनुसार समर्थन करता गया। जब जिस शासक का प्रभाव विस्तार हुआ उसने अपनी पसंदानुसार औरों को ढालना शुरू किया। राजतंत्र द्वारा प्रायोजित दरबारी विद्वानों ने ठकुरसुहाती करते हुए अपने 'अन्नदाता' की रुचि का ख्याल रखा और तदनुसार दर्शनों को आगे बढाया। इस मण्डली ने पूर्व मिमांसा की आड में समाज को उसका दास बना दिया। चूँकि वैदिक वाड्मय संस्कृत में था और शिक्षा या आम बोलचाल से वह दूर चली गयी तब समाज को शास्त्रों के नामपर भ्रमित तथा शोषण करना सरल हो गया। उसके लिये नाना ग्रन्थ लिखे गये ताकि शोषण में सुविधा रहे। दूसरी ओर दर्शन के नाम पर रटवाना और विवाद या शास्त्रार्थ से एक दूसरे को पराजित करने को महान उपलब्धि माना - मनवाया। समाज इसीसे प्रसन्न रह ऐसों पर अपनी संपदा तथा आस्था लुटाता रहा। इसमें अधिकतम नुकसान चार्वाक दर्शन का हुआ जो पीढ़ीगत परंपरा से शासन व्यवस्था का समर्थक नहीं था और शास्त्रों के नामपर दोहन का विरोधी था। विलासी राजाओं वह रास नहीं आया। इस तरह उस दर्शन की आच्छाईयाँ छिपी रह गई। इसपर चर्चा अलग से होगी। यहाँ इतना कहना है कि शिक्षण जगत से जुडे लोग तक अपने-अपने प्रायोजक की मंशानुसार दर्शनों का दर्शन करते हैं। किसी मत या पंथ के प्रति व्यक्तिगत लगाव को स्थापित दर्शनों के साथ मिलाना या उनकी व्याख्या अपनी आस्थानुसार करना विद्वता कदापि नहीं। जो लोग केवल वामपंथी विचारकों को दोष देते हैंं उनमें से कई स्वयं भी कम नहीं। यह अनुभव बहुतों का है और कई बार हो चुका। ये भी पाठ्यक्रम बदलने की बात नहीं करते। जबकि सब जानतेे हैं :- भारतीय दर्शन जीवन्त है।
https://youtu.be/lDtGgp40xU8
इसकी जानकारी होने के उपरान्त तालमेल नहीं बैठ पाता जो कि शैक्षणिक पद्धति की कमी उजागर करता है। दर्शन ज्ञान बघारने, रहस्यवाद, ख्याली पुलाव, हवामहल बनाने का पक्षधर नहीं है। वह व्यवहार विरोधी नहीं वरन उसे संतुलित ढंग से सम्पादन की वकालत करता है। मुश्किल यह है कि बहुतों को वह पसंद नहीं और वे केवल उस ज्ञानचर्चा में डुबकी लगाते हैं जिसके लिये उनका अन्तःकरण तैयार नहीं :-
ब्रह्मग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरी बात। कौडि लागि लोभबस करहिं बिप्र गुर घात।। रामचरितमानस - उतातरकांड दोहा ९९ (क)
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में दर्शन में निहित मुल्य पर सेमिनार के दौरान राजस्थान विश्वविद्यालय से आए प्राध्यापक ने बतलाया कि उनके यहाँ वे ही विद्यार्थी दर्शन पढते हैं जिनके अंक कम है या महंगी पढाई का खर्च उठाने में असमर्थ है। आजीविका की चिन्ता सही चिन्तन करने नहीं देती। दर्शनों की अधिकांश पुस्तकें इस तरीके से तैयार हुई मानो सब एक दूजे के घोर विरोधी हो और उनका मात्र उद्देश्य अन्य को नीचा दिखाना है। आदि शंकराचार्य का उल्लेख करते हुए कहा जाता है कि उन्होंने सबका खंडन किया। उन्होंने वैचारिक संक्रमण किया जिसे दर्शन का खंडन कहा गया। इसे समझने के लिए इतना कहना काफी है की पहली कक्षा में पढी हिन्दी वर्णमाला से बने शब्द काम आते हैं फिर चाहे व्यक्ति हिन्दी विषय में कितना भी महान बन जाए। यह पहली कक्षा का खंडन नहीं हुआ वरन वह आगे बढने में काम आई। भले ही व्यक्ति निठल्ला हो फिर भी उन्हीं वर्णों का प्रयोग करता है।
दर्शनों की दार्शनिकता इतनी बोझिल नहीं है जैसा समाज में प्रचारित है। उनमें बह रही अन्तः सलीला में डुबकी लगाने से उनका पारस्परिक सम्बन्ध समझ में आता है। यह श्रृंखला चार्वाक से प्रारम्भ होकर वेदान्त में शेष होती है। सांसारिकता से उपजी वेदना का अंत वेदांत से होता है। वहाँ आत्यन्तिक समाधान प्राप्त होता है पर नींव की ईंट चार्वाक दर्शन में रखी जाती है। आन्तरिक विकास अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूँ) कहने से नहीं होता बल्कि निरंकुशता या चरित्रहीनता का प्रसंग उपस्थित होता है - मैं ब्रह्म तु ब्रह्म शरीर का क्या चाहे जैसे भोगो। याद रहे कि ऐसी ज्ञान की बातें आतंकवादियों को भी सुनाई जाती है पर उसका प्रयोजन समाजोपयोगी नहीं होता। उन्हें यहाँ कष्ट सहकर पारलौकिक सुखों का सपना दिखाया जाता है। यह दृष्टि प्रायः हठयोग वालों में पाई जाती है जो योग द्वारा ही तत्वदर्शी होने का दावा करते हैं। वे स्थूल तथा सुक्ष्म शरीर का लय मानते हैं पर कारण शरीर का नहीं। उसमें स्थित आनन्दमय कोश या उससे उत्पन्न आनन्द को ही सबकुछ मानत हुए भूल जाते हैं कि वह(आनन्द) सौपाधिक (उपाधि सहित) है निरुपाधिक नहीं। ऐसी नाना असुविधाएँ पैदा होती हैं जब वेदान्त से पूर्व आनेवाले दर्शनों के प्रति अनावश्यक मोह पैदा होता है। समाधान का भ्रम एक हदतक शान्ति देता है पर सजग साधक आगे की यात्रा जारी रखता है। क्यूँ करती है दर्शन की नदिया ऐसा व्यवहार? सीधे-सीधे लक्ष्य की ओर बिना रुके ले जाए? मनुष्यों की प्राथमिकता और प्रयोजनीयता तो क्या ग्रहण क्षमता तक अलग - अलग है। सबको एक लाठी से हाँकना उचित नहीं। केवल देखादेखी योग करने से रोग बढता है वैसे ही दर्शनों के मामले में है। प्रारम्भिक दर्शनों में प्रशिक्षित तथा उन्हें क्रियान्वयन से ही वैचारिकता धारदार होती है। केवल अस्थायी आनन्द देना या अपने से बाँधे रखना दर्शन का उद्देश्य नहीं हो सकता।
भारतीय दर्शनों पर लिखते, बोलते या पढाते वक्त व्यक्ति विशेष का जुडाव दो - एक दर्शन से होना स्वाभाविक है। ऊपर से सबके सभझाने की शैली अलग। अतः एक ही दर्शन पर विरोधाभास या वैचारिक द्वन्द्व परिलक्षित होता उसपर तैयार साहित्य में। आन्तरिक लगाव बिना अन्य दर्शनों के मामले में ऐसी अजीबोगरीब स्थिति बढ जाती है। ऐसी संभावना को पहले से भाँपकर ऋषियों ने वैदिक वाड्मय, भाष्य, टीकादि की प्रमाणिकता जाँचने हेतु तीन सुत्र दिये और समझा दिया की क्रम में नीचे आनेवाले ग्रन्थ बडे ग्रन्थों के अनुकूल अंश में प्रमाण है। इसीलिए पुराणों को परतः सिद्ध माना गया क्योंकि उनकी रचना विशेषतः समय बिताने के लिए हुई थी। अतः पौराणिक विचार फिलासॉफी है दर्शन नहीं। माध्वाचार्य की रचना सर्व दर्शन संग्रह में नौ दर्शनों के अलावा जितनी सामग्री है कि वह वैदिक दर्शन नहीं क्योंकि उनमें वह एकता नहीं और न वे आत्यंतिक समाधान की ओर ले जाते हैं। यहाँ एक प्रश्न उठता है कि शैव, वैष्णव, शाक्त और योग पर उपनिषद है तब सर्व दर्शन संग्रह में लिखित सारे विचार दर्शन श्रेणी के हैं क्योंकि उन्हें उपनिषदों का समर्थन प्राप्त है। ऐसा नहीं है। सूत्रों की जाँच समक्ष यह प्रश्न शेष हो जाता है। अब अगर कहा जाए कि ये विचार उन शाश्वत प्रश्नों की विवेचना करती है इसलिए ये भी दर्शन है। इस तरह तो कोई भी अपने विचार व्यक्त कर सकता है तब वे भी दर्शन विभाग में आ गए। भले ही पौराणिक, स्मृतिकार, आधुनिक चिन्तक कहें पर उनकी संगति स्थापित दर्शनों से नहीं लगती और स्वयं की श्रेष्ठता, भाषाई चमत्कार, शब्दाडंबर की गन्ध अधिक आती है। यह व्यक्तिगत राय नहीं वरन उन सत्रों की देन है जो जाँचने हेतु दिए गए। उनकी जानकारी हेतु -
https://akshaygroundreality.blogspot.com/2016/10/upanishads-investigation-2.html
अभीतक की संक्षिप्त चर्चा से ऋषियों का गहन चिन्तन मनन निदिध्यासन सामने आता है जो द्रष्टव्य की ओर इंगित करता है यानि हथेली पर रखे आँवले देखने जैसी अवस्था की प्राप्ति। इसतक पहुँचने हेतु चरणबद्ध तरीके से दर्शन तैयार करता है। इसपर पलायनवाद या निष्क्रियता का आरोप लगाया गया। यह मनगढन्त बात है। भारतीय दर्शन जीना ही नहीं मरना तक सिखाता है। वह जीते जी मुक्ति का आनन्द देने में सक्षम है बशर्ते कोई लेनेवाला हो। यह नियंत्रित भोग का पक्षधर है जिससे दैहिक, मानसिक तथा बौद्धिक स्वास्थ्य में संतुलन बना रहता है। अनियंत्रित भोग से आहार-विहार व्यवहार नहीं चलता। ऐसा मनुष्य सपने को लक्ष्य बनाकर तडपते रहता है जबकि दर्शन लक्ष्य को सपना मानने को कहते हैं। यहाँ मूल लक्ष्य स्वयं को जानना तथा उसमें स्थित होते हुए महामना बनना है जहाँ अन्तःकरण का तादात्म्य सृष्टि संविधान के साथ होने लगता है। जीवन के विभिन्न आयामों का प्रबंधन संतुलित शैली में समझाना भारतीय दर्शन की अनमोल देन है।
स्थापित दर्शनों के प्रति उदासीनता का दुष्परिणाम साहित्य को उठाना पडा जहाँ छायावाद, रहस्यवाद, आयातित वाद की मुहर उन रचनाकारों पर लगा दी जिन्होंने इन दर्शनों की अन्तरूनी एकता ह्रदयं करके लेखनी उठाई जैसे प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुमित्रानन्दन पन्त, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, रामधारी सिंह दिनकर, शिवानी, फैज, आदि।
स्वामी अक्षय चैतन्य