का जो सहपाठी थे ऋषिकेश मे। निर्वाणप्रकरण के लगभत तीस श्लोक डायरी से पढे और टंकण पश्चात उनको देखा। आँखों की असुविधा के चलते कार्य में विलंब हुआ।
संस्कृत महाविद्यालय के एक शित्रक से टंकण की बात हुई। उन्होंने कभी समय नहीं दिया। अपने बेरोजगार बेटे द्वारा करवाने का आश्वासन दिया पर वह असफल रहा। एक शास्त्र अध्ययन किए साधु से बात की। पहले उसने हाँ भरी फिर पन्द्रह दिन तक मुँह नहीं दिखाया। एक भंडारे मे वह हाथ धोने के लिए बगल में खडा हुआ इसलिए दिख गया। पुछने पर मुँह बिचकाते हुए इसे फालतु काम बताया। जबकि सबको मानदेय देने की बात तक कही थी। पर कोई तैयार नहीं हुआ। समष्टि योजनानुसार यह कार्य होना था अक्षय चैतन्य द्वारा। धीरे-धीरे ही सही यह सेवा पूरी हुई।
पूरे योगवासिष्ठ को समाज तक पहुँचाने के लिए इसका विश्लेषण जरुरी है। इससे व्यर्थ का खंडन-मंडन नहीं है और न येन केन प्रकारेण अपने-अपने मत को स्थापित करने की चतुराई।
योगवासिष्ठ अवहेलित है सबके द्वारा। यहाँ तक की शिक्षित साधु समाज तक इससे दूरी बनाकर रखता है।
चैनल में इसपर प्लेलिस्ट है और उसमें वीडियो द्वारा यह समझाया गया है।
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२..मुमुक्षुव्यवहार प्रकरण
११ सर्ग
प्रामाणिकस्य पृष्टस्य वक्तुर् उत्तमचेतसा ।
यत्नेन वचनं ग्राह्यम् अंशुकेनेव कुङ्कुमम् ॥४४।।
वास्तविक अनुभूति / बोध जिसे हो चुका है ऐसे शिक्षक की बाते उत्तम अधिकारी को अ
अवश्य सुननी चाहिए। यह श्लोक मननशील श्रोता को उत्तम अधिकारी मानता है और उसके लिए किसी वेशभूषा, भाषा, आहार, स्थान या अन्य इन्द्रिय जनित आचरण जरुरी नहीं। मननशील व्यक्ति सुनी हुई बातो का विश्लेषण करेगा।
अतत्त्वज्ञम् अनादेयवचनं वाग्विदां वर ।
यः पृच्छति नरं तस्मान् नास्ति मूढतरो ऽपरः ॥४५।।
उस व्यक्ति से बडा मूर्ख कोई नही जो तत्वज्ञान की समझ ठीक से न रखनेवाले से प्रश्न करता है। ऐसो के उत्तर (शब्द) स्वीकिरनै नहीं चाहिए। केवल अच्छा वक्ता होने से यह जरूरी नहीं कि वह जानकार हो।
प्रामाणिकस्य तज्ज्ञस्य वक्तुः पृष्टस्य यत्नतः ।
नानुतिष्ठति यो वाक्यं नान्यस् तस्मान् नराधमः ॥४६।।
विषय की वास्तविकता जानने वाले शिक्षक के बारे में सुनिश्चित होने के बाद मिले उत्तर की अवहेलना करने वाले प्रश्नकर्ता से नीच कोई और य नहीं। यहाँ समझ में न आने पर पूछना अलग बात है। पूरा नकारना अनुचित है।
तज्ज्ञतातज्ज्ञते पूर्वं वक्तुर् निर्णीय कार्यतः ।
यः करोति नरः प्रश्नं पृच्छकस् स महामतिः ॥४७।।
जो पहले से उत्तर देनेवाले की योग्यता सुनिश्चित होने के बाद प्रश्न पूछे वह अत्यंत बुद्धिमान प्रश्नकर्ता है। ऐसा करना मर्यादा के अनुकूल है।
अनिर्णीय प्रवक्तारं बालः प्रश्नं करोति यः ।
अधमः पृच्छकस् स स्यान् न महार्थस्य भाजनम् ॥४८।।
उत्तर देनेवाले की विषय पर पकड जाने बिना एक बच्चा किसी से कोई भी प्रश्न करता है। वैसे ही वह मनुष्य उस बच्चे के समान ही है जो ऐसा करता है। यहाँ पूरी गलती प्रश्नकर्ता की है।
पूर्वापरसमाधानक्षमबुद्धाव् अनिन्दिते ।
पृष्टं प्राज्ञेन वक्तव्यं नाधमे पशुधर्मिणि ॥४९।।
अन्तर्मुखी व्यक्ति सूक्ष्म तात्विक विवेचना करने तथा गुरु द्वारा समझाने पर समझने की योग्यता रखे ऐसे प्रश्नकर्ता को उत्तर अवश्य देना चाहिए। वही ध्यानपूर्वक बोली गई बातो को धारण करता है। स्थूल मन - बुद्धि वाला बहिर्मुखी पशुवत आचरण प्रधान होने के कारण अयोग्य है। पशुधर्मिणि से तात्पर्य :-
आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्। धर्मो हि तेषामधिको विशेष: धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥
पशु और मनुष्यों के अधिकतर कर्म (निद्रा, भय, मोथुन, भूख, प्यासादि) एक ही है केवल मनुष्यों मे उससे ऊपर उठने की क्षमता है। उपरोक्त श्लोक में उन पशु धर्म पालन करने वालो के विषय कहा गया है जो अपना स्तर नहीं उठाते।
प्रामाणिकार्थयोग्यत्वं पृच्छकस्याविचार्य वा ।
यो वक्ति तम् इह प्राज्ञाः प्राहुर् मूढतमं नरम् ॥५०।।
जो शिक्षक प्रश्नकर्ता का परीक्षण किए बिना पहले पढ़ाता है उसे समझदार लोग सबसे बडा मूर्ख कहते हैं। तत्वमिमांसा में प्रश्नकर्ता की धारण क्षमता जाेननी जरूरी है समझाने (उत्तर देनेवाले) के लिए। बहुधा यह कमी देखी जाती है जब केवल अपने स्तर के अनुसार बोलता है। इससे जो संवाद होना चाहिए वह नहीं होता।
त्वम् अतीव गुणाधारः पृच्छको रघुनन्दन ।
अहं च वक्तुं जानामि स च योगो ऽयम् आवयोः ॥५१।।
राघव राजकुल के वंशज द्वारा राम को संबोधित करते हुए उनके गुरु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उन सभी प्रश्नों की उत्तम तथा असाधारण माना। ऐसे प्रश्नों को समझा पाने में वे सक्षम थे। भरी सभा में सारे प्रश्न सुनाए गए थे जहाँ कई ऋषि मुनी बैठे थे। चूँकि गुरु के वचनों पर शिष्य की श्रद्धा अधिक होती है इसीलिए महर्षि विश्वामित्र ने यह दायित्व उनको दिया। कई बार उत्तर मालूम नहीं होता या समझाने की योग्यता नहीं होती जबकि इनके पास वैसी समस्या नहीं थी। प्रश्न - उत्तर अन्योन्याश्रित / संपूरक होने चाहिए और सभा में ऐसे ही गुरु - शिष्य की जोडी बैठी थी।
सर्ग १३
इस ग्रंथ में ऐसे कई श्लोक हैं जिनका सतही और शाब्दिक अनुवाद भ्रम पैदा करते हैं। अतः सावधान रहे।
न तथा शोभते राजा अप्यन्तःपुरसंस्थितः ।
समया स्वच्छया बुद्ध्या यथोपशमशीलया ॥६८॥
अपने राजभवन में रहनेवाला राजा देखने में उतना शोभायमान नहीं होता, जितना कि शांत स्वभाव वाला व्यक्ति अपनी समता और स्पष्ट समझ के चलते दिखता है।
समया शमशालिन्या वृत्त्या यः साधु वर्तते ।
अभिनन्दितया लोके जीवतीह स नेतरः ॥ ७० ॥
जो अपने सौम्य और शांतिपूर्ण आचरण के साथ पवित्र जीवन जीता है, वही सही में इसी संसार में रहता है और कोई नहीं। यह अंदरूनी समझ वाले व्यक्ति के सांसारिक जीवन को सार्थक बतला रहा है। यह समझ जिनके पास नहीं उनका जीना अन्य प्राणियों की भाँति है।
अनुद्धतमनाः शान्तः साधुः कर्म करोति यत् ।
तत्सर्वमभिनन्दन्ति तस्येमा भूतजातयः ॥ ७१ ॥
एक बुद्धिमान, नम्र, खरा, सत्यनिष्ठ व्यक्ति अपने सभी कार्यों से औरों को प्रसन्न करता है, और सभी प्राणियों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। उसकी आध्यात्मिक यात्रा से उत्पन्न तेज स्वाभाविक रूप से औरों को आकर्षित करते हैं। यह श्लोक उनके लिए नहीं जो इसके लिए प्रयास करते हुए अपने तेज को नष्ट भ्रष्ट करते हैं।
सर्ग १७
अन्यसंकल्पचित्तस्था नगरश्रीरिवासती ।
अलभ्यवस्तुपार्श्वस्थस्वप्नयुद्धचिरारवा ॥ ३५ ॥
किसी दूसरे व्यक्ति की वस्तु पर दृष्टि रखना उतना ही व्यर्थ है जितना किसी काल्पनिक शहर की सुंदरता पर
टकटकी लगाना और किसी अप्राप्य वस्तु की आशा में बैठे रहना। यह नींद (स्वप्नावस्था) में किसी वस्तु के लिए शोरगुल मचाने जैसा है। ऐसी आशा में समय नष्ट होने के साथ जो वस्तु सहजता से प्राप्त है वह तक छूट जाती है। यहाँ प्रयास या प्रबल पुरुषार्थ का खंडन नहीं हो रहा। उस वृत्ति पर चोट है जो मृग मरीचिका के सिवाय कुछ और नहीं।
शान्तसंकल्पमत्ताभ्रभीषणाशनिशब्दवत् ।
विस्मृतस्वप्नसंकल्पनिर्माणनगरोपमा ॥३६।।
यह उतना ही व्यर्थ है, जितना कि अनियंत्रित इच्छाओं वाला व्यक्ति, जो जोर से भयंकर गड़गड़ाहट के समान दहाड़ता है, तथा जैसे कि स्वप्न में अपने संस्कारों के आधार पर नगर निर्माण करना। इसमें मन की भीतरी पर्तों में छिपे संस्कारों की बात है। ऐसे काल्पनिक निर्माण अपने स्वरूप से अलग होने से बनते हैं।
भविष्यन्नगरोद्यानप्रसूवन्ध्यामलाङ्गिका ।
तस्या जिह्वोच्यमानोग्रकथार्थानुभवोपमा ॥ ३७ ॥
यह एक भावी नगर के समान व्यर्थ है, जिसमें बगीचा, फूल और फल उग रहे हैं तथा एक बांझ स्त्री के समान जो अपने अजन्मे और होने वाले पुत्रों के वीरतापूर्ण कार्यों की प्रशंसा कर रही है।
अनुल्लिखितचित्रस्य चित्रव्याप्तेव भित्तिभूः ।
परिविस्मर्यमाणार्थकल्पनानगरीनिभा ॥ ३८ ॥
या जब कोई चित्रकार नक्शे के आधार पर किसी काल्पनिक शहर का चित्र बनाने जा रहा हो और वह पहले से उसकी योजना बनाना भूल जाए।
सर्वर्तुमदनुत्पन्नवनस्पन्दास्फुटाकृतिः ।
भाविपुष्पवनाकारवसन्तरसरञ्जना ॥३९॥
यह उतना ही व्यर्थ है जितना कि सभी मौसमों में सदाबहार घास और फल तथा एक बिना उगे हुए कुंज की हवा की कल्पना या फिर भविष्य में वसंत की मधुरता से सराबोर फूलों से भरे एक बगीचे की आशा करना।
आत्माभ्यास कई तरह से इस ग्रंथ में समझाया गया है जिससे दृढ प्रमा बने। शास्त्रविहित या शास्त्रीय उदाहरणों में मृग मरीचिका, आकाश कुसुम, खरगोश के सींग, वन्ध्यापुत्र काम में लाए जाते हैं। स्वप्न या संकल्प-विकल्प वश मनोराज्य बनने के साथ उसमें नाना कृत्य होते हैं। उपरोक्त श्लोकों में वन्ध्यापुत्र तथा मृग मरीचिका का उल्लेख है। उपरोक्त श्लोकों में पुरुषार्थ विरोधी तथा मृग मरीचिका वाली वृत्तियों का विरोध है। ऐसी वृत्तियाँ स्वरूप से अलग रखने, प्रमादी बनाने तथा दैव भरोसे रहने के लिए फँसाती रहती है।
अन्तर्लीनतरङ्गौघसौम्यवारिसरित्समा ।
निर्वाणाख्यं प्रकरणं ततः षष्ठमुदाहृतम् ॥ ४० ॥
शिष्टो ग्रन्थः परीमाणं तस्य ज्ञानमहार्थदः ।
बुद्धे तस्मिन्भवेच्छ्रेयो निर्वाणं शान्तकल्पनम् ॥ ४१ ॥
इसके बाद छठी पुस्तक निर्वाणप्रकरण आती है, जो उतनी ही स्पष्ट है जितना की नदी का जल, जो उसकी भीतरी हलचल के थम जाने के बाद दिखता है। उसके साथ बहनेवाली मिट्टी, रेत, आदि के चलते जल की स्वच्छता बाधित होती है अतः वह तथा अन्य बाधक तत्व के नीचे बैठ जाने से जल साफ दिखता है। यहाँ संगति (सर्ग, प्रकरण तथा पूरे ग्रंथ के साथ) लगाए बिना अर्थ तथा शब्द दोषों पर ध्यान न देना ही अंदरुनी हलचल है जिसके चलते श्लोक का उद्देश्य साफ नहीं होता। कहीं न कहीं फँसा हुआ अंतःकरण कुछ का कुछ अर्थ बतलाता है।
शेष श्लोकों की संख्या (अर्थात् सम्पूर्ण ग्रन्थ के ३२,000 श्लोकों में से १४,५00 श्लोक) को इसमें समाहित किया गया है, इनका ज्ञान गहन अर्थों से परिपूर्ण है, तथा इन्हें समझने से इच्छाओं के साथ न बहते रहने तथा उससै शांति का मुख्य लाभ प्राप्त होता है।
इन दो श्लोकों को यहाँ इसलिए दिया गया है क्योंकि कईयों ने निर्वाणप्रकरण के दो भाग (पूर्वार्ध - उत्तरार्ध) में दूसरे भाग को ६/२ न लिखकर ‘७’ लिखा। और तो और उसे अलग से जोडा हुआ कहा गया। क्षेपक किसी भी प्रकरण में जोडे जा सकते हैं। उसके लिए ग्रंथ के अंत तक रुकने की आवश्यकता नहीं। अपने यहाँ सबको पूरी छूट है जिसका दुष्परिणाम वैदिक वाङमय को झेलना पडता है। जो ऐसे महानुभावों के समर्थक इसे कलान्तर में प्रमाण मानेंगे।
अचेत्यचित्प्रकाशात्मा विज्ञानात्मा निरामयः ।
परमाकाशकोशाच्छः शान्तसर्वभवभ्रमः ॥ ४२ ॥
बुद्धि अपने सभी सांसारिक विषयों से विमुख होने लगती है और शुद्धता की ओर बढती है। वे तत्व (प्रकाश) से ही प्रकाशित होते या जाने जाते हैं। चूँकि उनका आधिपत्य शेष होने लगता है या यूँ कहे कि वे अपने वश में नहीं रख पाते अतः बुद्धि अधिक प्रकाशवान होती हे। श्लोक में प्रकाशात्मा शब्द यही समझा रहा है और विज्ञानात्मा शब्द विज्ञानमय कोष से संबंधित जिसमें बुद्धि या बौद्धिक क्षमता (निदिध्यासन, लक्ष्यार्थ समझने लायक तीक्ष्णता, क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर विश्लेषण) आती है। आत्मा शब्द समझाने के लिए गढा गया है और इसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं इसलिए प्रकाशात्मा तथा विज्ञानात्मा को उसका भेद न समझें और न अलग से प्रकटीकरण अर्थ ले। ऐसी तीक्ष्ण, निर्मल बुद्धि अनंत शून्यता के आवरण में आवृत तथा पूर्णतः शुद्ध और सांसारिक त्रुटियों से रहित है।
निर्वापितजगद्यात्रः कृतकर्तव्यसुस्थितः ।
समस्तजनतारम्भवज्रस्तम्भो नभोनिभः ॥४३॥
प्रथम पंक्ति आत्यन्तिक समाधान तथा अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करने की बात कर रही है। आकाश के अदम्य स्तंभ के समान शांति प्राप्त होती है आत्मा को जो अशांत संसार की छवियों को प्रतिबिंबित कर रही थी। द्वितीय पंक्ति अलंकारिक प्रयोग से शुरु हुई है अतः यहाँ शब्दार्थ केवल लक्ष्यार्थ की ओर इंगित करने के लिए है। आकाश वह है जो अवकाश या स्थान दे। आंतरिक समझदारी से आई शांति अपने मूल स्वरूप या स्वभाव को दर्शा रही है।
विनिगीर्णयथासंख्यजगज्जालातितृप्तिमान् ।
आकाशीभूतनिःशेषरूपालोकमनस्कृतिः ॥४४।।
सांसारिक या व्यवहारिक जाल-जंजाल की सारहीनता पक्की होने के साथ विषयासक्ति का बंधन ढीला होने लगे तब आंतरिक (मानसिक - बौद्धिक) बोझ कम होने लगता है। इसके चलते वायु समान हल्केपन का अनुभव होता है। व्यक्ति स्वयं से प्रसन्न रहना सीख लेता है। आकाश में सारी घटनाएँ घटित होती हैं। धुंध, मेघ, आँधी तथा प्रकाश के प्रकीर्णन के चलते आकाश का रंग लाल, पीला, नीला, श्वेत लगता है। सही में उसका अपना कोई रंग नहीं। यही स्थिति उस अभ्यासी की होने लगती है।
कार्यकारणकर्तृत्वहेयादेयदृशोज्झितः ।
सदेह इव निर्देहः ससंसारोऽप्यसंसृतिः ॥ ४५ ॥
तत्पश्चात आत्मा कार्यकारण, प्रभाव या कर्तृत्व पर ध्यान नहीं देती, जो टालने योग्य है या स्वीकार करने योग्य है, उस पर भी ध्यान नहीं देती, वह शरीर से आबद्ध होने पर भी देहरहित कहलाती है। वह अपनी सांसारिक अवस्था में असांसारिक कहलाती है। नासमझी के चलते कल्पित शब्द आत्मा पर कर्ता या भोक्ता या दोनों आरोपित करने तथा उसे सत्य मानने वालों को ठीक से यह संवाद समझना चाहिए।
चिन्मयो घनपाषाणजठरापीवरोपमः ।
चिदादित्यस्तपँल्लोकानन्धकारोपरोपमम् ॥ ४६ ॥
देह की उपाधि के चलते चिन्मय सत्ता का संसर्गाध्यास सर्वविदित है। इसकी तुलना एक ठोस सघन चट्टान से की गई जिसमें कोई दरार नहीं। यह बुद्धि का प्रकाशक है जो सभी लोगों को ज्ञान प्रदान कर, अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।
परप्रकाशरूपोऽपि परमान्ध्यमिवाsगतः ।
रुद्धसंसृतिदुर्लीलः प्रक्षीणाशाविषूचिकः ॥ ४७ ॥
यद्यपि चिन्मय सत्ता अत्यन्त प्रकाशमान है, फिर भी यह अध्यास के चलते, माने हुए बंधन से उपजी तृष्णाओं के रोग से नष्ट हो, घोर अंधकारमय हो गई।
नष्टाहंकारवेतालो देहवानकलेवरः ।
कस्मिंश्चिद्रोमकोट्यग्रे तस्येयमवतिष्ठते ।
जगल्लक्ष्मीर्महामेरोः पुष्पे क्वचिदिवाsलिनी ॥४८॥
जब व्यक्ति मलिन अहंकार (सात्त्विक, राजसी, तामसिक) के भ्रम से मुक्त हो जाता है, तब वह देहधारी अवस्था में भी निराकारवत होता है। सम्पूर्ण जगत् को उसी प्रकार देखता है, जैसे वह अपने शरीर के असंख्य रोमों में से किसी एक के शीर्ष पर स्थित हो या सुमेर पर्वत के पुष्प पर बैठी हुई मधुमक्खी के समान हो। अतिशयोक्ति अलंकार के द्वारा आत्माभ्यासी की दृष्टि समझाई गई है। इसमें अस्तित्व (जीवित रहने) के लिए जरुरी अहं (अहंकार) की बात नहीं हो रही। देखा जाए तो देहाभियान से ही सारे कार्य होते हैं। यह श्लोक इस वृत्ति के साथ लगातार न बहने की ओर संकेत कर रहा है। संक्षेप में देखे तो व्यवहारिकता में महत् बुद्धि नहीं रहती। इस श्लोक का अनुवाद ‘अहंकार का विनाश मा नष्ट होना’ करने से देहपात की बात सामने आती है जो इस ग्रंथ का उद्देश्य नहीं है।
विततता हृदयस्य महामतेर्हरिहराञ्जजलक्षशतैरपि ।
तुलनमेति न मुक्तिमतो यतः प्रविततास्ति निरुत्तमवस्तुनः ॥ ५० ॥
हजारों हरि, हर और ब्रह्मा के लिए भी यह संभव नहीं कि वे उस महान् बुद्धि वाले ऋषि की व्यापक आत्मा के बराबर पहुंच सकें क्योंकि मुक्त पुरुषों का मुख्य कल्याण (आंतरिक आनन्द) किसी भी अन्य की अपेक्षा कहीं अधिक विस्तृत होता है। इसमें उनका खंडन या हेय प्रमाणित नहीं किया गया बल्कि मायिक रूप को अलग रखा गया है। भक्ति के नामपर मायिक रूप मनभावन तथा सच्चा लगता है। इससे रूप विशेष का कार्यक्षेत्र संकुचित होता है जो तथाकथित भक्त समझ नहीं पाता। वह रूपों की तुलना तथा श्रेष्ठता में उलझ कर मनगढंत रचनाओं से उसका प्रतिपादन करता है। यहाँ तक कि नए रूपों की स्थापना के लिए वह वैदिक देवी-देवताओं का विरोध खुलकर करता है। इसी कलुषित परंपरा ने ब्रह्मा, देवराज इन्द्र, चन्द्रादि की पदवियों को कलंकित किया। हाल यह है उन कहानियों का प्रकाशन रोका नहीं गया। यह अप्रमाणित सिद्धांत और व्यक्तिगत दृष्टिकोण नहीं वरन् आवश्यक विवेचना है। लोग इसे विकास से जोडते हुए पुरानों का महत्व कम होने को सामान्य घटना मानते हैं पर उसके लिए अशालीन कहानियों का सहारा लिए जाने का खुलकर विरोध नहीं करते। इसी ग्रंथ के कुछ संस्करणों में विष्णु के नाभि कमल से ब्रह्मा की उत्पत्ति का उल्लेख हुआ जो पौराणिक उदाहरण है वैदिक नहीं। ऊपर से पुराण परतः सिद्ध है स्वतः नहीं। इनकी बातों की प्रामाणिकता को जाँचेपरखे बिना मानना अनुचित है। अपनी हठधर्मिता के चलते लोगों ने योगवासिष्ठ तक को नहीं छोडा। यह सौभाग्य की बात है कि इस ग्रंथ का संवाद इस तरह हुआ जिससे क्षेपकों की दाल नहीं गली।
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३.उत्पत्ति प्रकरण
6 टा सर्ग, 11 वाँ श्लोक -
दान के फल का अधिकारी
रागाद्युपहते चित्ते वञ्चयित्वा परं धनम् ।
यद् अर्ज्यते ततो दानाद् यस्यार्थस् तस्य तत्फलम् ॥11॥
राग से युक्त चित्त में धोखे से कमाया हुआ धन उससे किया हुआ दान उसे जाता है जिनका वह धन होता है।
भ्रष्ट तरीको से अर्जित धन अच्छा लगता है भ्रष्टाचारियों को। सबको भ्रष्ट व्यवस्था कघोटती है। उसका प्रचार-प्रसार होते देख पीड़ा होती है। राजनीतिक परिवर्तन तक इसे हर स्तर पर बदल नहीं पाता वरन अनैतिकता नित नूतन शेली में सायने आती है। इसका एक बडा कारण इस उपरोक्त श्लोक में समझाया गया। दान के मामले में काला धन का उपयोग होने से उसका फल का अधिकांश भाग दानदाता को नहीं मिलता। परोक्ष रूप में उन विभागों को मिलता है या उन लोगों को जिनका उस धन पर अधिकार था। जैसे करो की चोरी, नकली सामान बनाना, मिलावट, कम तौलना - मापना, धोखाधड़ी, संपत्ति हडपनाधि आदि कार्य से अर्जित धन की यही गति होती है।
ऐसे दानदाता को फल के नामपर क्या मिलता है?
इससे भरपूर सामाजिक यश तथा व्यापारिक लाभ मिलता है।
तब क्या ऐसा दान नहीं देना चाहिए?
धन चाहे जिस तरह का हो या जिस विधि से अर्जित
किया गया हो उसकी तीन गति होती है - भोग, दान,
नाश। जिस प्रकार के धन की चर्चा उपरोक्त श्लोक में है
वह सामाजिक कार्यों में काम आता है। हर तरह की
राजनीतिक व्यवस्था में शासक को धन की जरुरत होती
है और विशेषत शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक रुप से
कमजोर लोगो की भलाई जैसे कई कार्यों के लिए काफी धन लगता है। इसके लिए सरकारें व्यापारियों से इन सबके लिए धन लेती है। दूसरी ओर व्यापारियों को कई तरह की छूट मिलती है। उन्हें समाजसेवी के रुप में जान - माना तथा पुरस्कृत किया जाता है। ऐसे ही चार पाँच समाजसेवियों ने को भारतीय मिठाईयों के लिए उपयुक्त बताया था
जब बडे स्तर पर पॉम आयल का आयात आरम्भ हुआ तब उसके व्यापक उपयोग के लिए ऐसे कुछ समाजसेवियों ने इसे भारतीय मिठाईयों और नमकीन हेतु उपयुक्त बताते हुए दैनिक समाचार पत्रों - पत्रिकाओं में भिन्न-भिन्न शैली में दर्जनों लेख लिख सरकारी योजना में सहयोग दिया। अब तो कहीं-कहीं कॉटन सीड आयल तक साथ में मिलने लगा है। यूँ भी अपने यहाँ खाद्यपदार्थ के उत्पादन में सभी सामग्रियों की जानकारी ग्राहक को नहीं दी जाती अथवा वैज्ञानिक नाम और गुढार्थ शब्द लिखै जाते हैं ताकि लेने वाला सरलता से हानिकारक चीज पकड न सके। ऐसो को दण्डित करने की माँग करने वाले समाजसेवा वाली बात भूल जाते हैं। दूसरी मुफ्तखोरी राष्ट्रीय रोग होने कारण लोग उलाहना, समय को कोसना मे कुशलता दिखाते हुए भूल जाते हैं कि इसके लिए धन की आपूर्ति कहाँ से लगातार होती रहेगी जिससे उस विभाग विशेष की देख रेख हो।
पाठ्यक्रम से लेकर अभिप्रेरणा (motivation) देनेवाले अधिकतम लाभ का उपदेश देते हैं तब मुनाफाखोरी ही बढेगी मुनाफे के बदले। ऐसा करनेवाले प्रायः दान बहुत करते हैं पर जो पुण्य मिलना चाहिए वह कभी नहीं मिलता।
सर्ग २२
सर्गादावेव नोत्पन्नं दृश्यं नास्त्येव तत्सदा ।
इदं जगदहं चेति बोधाभ्यास उदाहृतः ।। २८।।
यह संसार नाम रुपात्मक तथ मैं (अस्तित्व को दर्शाने वाला और त्रिगुणात्मक अहं) हर समय अस्तित्व में नहीं रहते। इस प्रकार ज्ञान के अभ्यास की घोषणा की जाती है। अतः उत्पत्ति को लेकर काल्पनिक जाल बुनकर उसमे उलझना - उलझाना तथा सुलझाने का दंभ उदरनिमित्तं बहुकृत वेष तथा समाज, राज्य, देश की अर्थ व्यवस्था सुधारने का उदाहरण मात्र है।
यह प्रसंग अभ्यास के बारे में भ्रांत अवधारणाओं का निर्मूलन कर रहा है। यह श्लोक उसे संत्रेप में व्यक्त करते हुए अभ्यासी की आँखे खोलती है। अन्य साधनो को अतिरंजित शैली से तत्वज्ञान हेतु प्रधान कारण प्रचारित करना उचित नहीं।
सर्ग ५७
यथा स्वप्नस्तथा जाग्रदिदं नास्त्यत्र संशयः ।
स्वप्ने पुरमसद्भाति सर्गादौ भात्यसज्जगत् ।।५०।।
जैसा स्वप्न है वैसा ही जाग्रत् भी इसमें कोई संशय नहीं। स्वप्न में असत् नगरादि दिखते हैं और जाग्रत में असत् जगत्। तभी इसके साधनों का तत्वज्ञान का दृढ़तापूर्वक
प्रधान कारण मानना - मनवाना उचित नहीं। ऐसे साधनों कै अभ्यास का समर्थन योगवासिष्ठ में नहीं है।
बाइसवें सर्ग में अभ्यास की बात स्पष्ट की गई है।
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४.स्थिति प्रकरण
सर्ग १८
स्वप्नोऽपि स्वप्नसमये स्थैर्याज्जाग्रत्वमृच्छति ।
अस्थैर्याज्जाग्रदेवास्ते स्वप्नस्तादृशबोधतः ।। १२।।
स्वप्न भी स्वप्न के समये स्थिरता के कारण जाग्रत् ही बन जाता है और अस्थिरता के कारण जाग्रत् स्वप्न ।
सर्ग १९
स्थिरप्रत्यययुक्तं यत्तजाग्रदिति कथ्यते ।
अस्थिरप्रत्ययं सत्स्यात्तत्स्वप्नः समुदाहृतः ।।९।। स्थिरता का जहाँ आभास हो वह जाग्रत् कहा जाता है और अस्थिरता का जहाँ हो वह स्वप्न ।
जाग्रत्स्वप्नदशाभेदो न स्थिरास्थिरते विना ।
समः सदैव सर्वत्र समस्तोेेऽनुभवोऽनयोः ।।११।।
स्थिरता और अस्थिरता को छोड कर जाग्रत् और स्वप्न में कोई अन्तर नहीं । हर प्रकार से इन दोनों का अनुभव एक समान ही है ।
इन सर्गों में क्या समझाया गयि?
नाना तरह के स्वप्नों के आने-जाने का कारण चाहे जो हो उसे देखते हुए वह सच, स्थिर, स्थाई लगता है। उस समय अधिकतर लोग उसे असत्य और भ्रम नहीं जाग्रत मानते हैं और जाग्रत को स्वप्न। व्यवहार में प्रसिद्ध जाग्रतास्था में आने पर स्वप्न की अस्थिरता प्रमाणित होती है। शरीर अपनी-अपनी बाल्यावस्था, युवावस्था, प्रौढावस्था तथा वृद्धावस्था में रहते हुए जिस स्थिरता का अनुभव करता है वह अवस्था विशेष व्यतीत होने पर स्वप्नवत लगती है। उसकी अधिकांश बाते केवल स्मृति पट पर ही नहीं रहती वरन भोग चुके व्यक्ति को अविश्वसनीय लगती है। अपरिचित व्यक्ति केवल श्रद्धा या अपने-अपने प्रयोजनवश उन बातो को सुनकर भले ही हाँ भरे प्रायः मन से नहीं मानता। व्यकि विशेष के लिए भोगी हुई अवस्था की अधिकांश बाते कुछ क्षणो में मानस पटल पर आ जाती है। अढाई तीन घंटे वाले चलचित्र में सारी अवस्थाओं से भरी कहानी दिखती है। स्थिरता की यही कहानी सपने में दिखती है।
श्लोक मे अस्थिरता बाद का प्रयोग क्रम से समझाने के लिए हुआ है। चूंकि जाग्रत के प्रति अवधारणा मन में जमी रहने के कारण वह स्वप्न से अलग ही दिखती है इसीलिए इसे क्रम से समझाना जरूरी है। जाग्रत का मिथ्याताव सरलता से स्थापित नहीं होता। इसीलिए बार - बार-बार अभ्यास करने का उपदेश दिया गया योगवासिष्ठ में।
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स्वयं का निरन्तर प्रयास या आत्माभ्यास
५. उपशम प्रकरण, सर्ग ४३ :-
आत्मा नारायणश्चैव न भिन्नौ तिलतैलवत्
तथैव शौक्ल्यपटवत् कुसुमामोदवत् तथा ॥५।।
शरीर दिखने में ठोस पदार्थों का बना हुआ लगता है। ध्यान से समझने पर यह बात पकड में आती है की इसमे ठोसपन नहीं केवल तरंगे है। प्रचलित मान्यतानुसार ऐसे तरंग रुपी शरीर में आत्मा के वास को नारायण शब्द से लक्षित किया गया है। जिस तरह तिल में तेल, वस्त्र में तन्तु, पुष्प में सुगंध ( खुश करने की वृत्ति) है वैसे ही आतमतत्व तथा शरीर का संबंध है।
यो हि विष्णुस् स एवात्मा यो ह्य् आत्मा स जनार्दनः ।
विष्ण्वात्मशब्दौ पर्यायौ यथा विटपिपादपौ ॥६।।
प्रह्लादनाम्ना प्रथमम् आत्मैव स्वयम् आत्मना ।
स्वयैव शक्त्या परया विष्णुभक्तौ नियोजितः ॥७।।
प्रह्लादो ह्य् आत्मनैवैतं वरम् अर्जितवान् स्वयम् ।
स्वयं विचारं कृतवान् स्वयं विजितवान् मनः ॥८।।
कदाचिद् आत्मनैवात्मा स्वयं शक्त्या विबोध्यते ।
कदाचिद् विष्णुदेहेन भक्तिलभ्येन बोध्यते ॥९।।
विष्णु शब्द को नाम रुप में बाँधने के बदले उसके लक्ष्यार्थ को देखना चाहिए जिसके आनुसार वह संचालन भाव से सबमे व्याप्त है। ज्ञानी भक्त प्रह्लाद ने अपने विवेक के चलते विचारवान बन स्वयं में स्थित होकर विष्णु भक्त कहलाए। कभी कभी स्वयं ही अपनी ही शक्ति से अपना बोध हो जाता है और कभी कभी विष्णुदेह की भक्ति से बोध की ओर बढता है पर वहाँ स्वयं का आत्माभ्यास ही सफल होता है। (६,७,८,९)
चिरम् आराधितोऽप्य् एष परमप्रीतिमान् अपि ।
नाविचारवतो ज्ञानं दातुं शक्नोति माधवः ॥१०।।
विचारहीन व्यक्ति भले ही जितनी पूजा -पाठ - अर्चना कर ले उसे माधव तक ज्ञान नहीं दे सकते। बाहरी क्रियाएँ सहायक कारण है पर वे स्वयं ज्ञान कराने में स अक्षम है।
मुख्यः पुरुषयत्नोत्थो विचारस् स्वात्मदर्शने ।
गौणो वरादिको हेतुर् मुख्यहेतुपरो भव ॥ ११।।
आत्मज्ञान या आत्मदर्शन के जिज्ञासु को यहाँ मुख्य पुरुष कहा गया है। आवश्यकता जिसको है वही मुख्य। पुरुष शब्द में स्त्री-पुरुष दोनों है। आत्मज्ञान या आत्मदर्शन में ईश्वर से प्राप्त वरादि गौण हेतु है अतः मुख्य हेतु का सेवन (अभ्यास) करना चाहिए। गौण हेतु (कारण / उपाय) पर निर्भर न रहे।
पूर्वम् एव बलात् तस्माद् आक्रम्येन्द्रियपञ्चकम् ।
अभ्यासात् सर्वयत्नेन चित्तं कुरु विचारवत् ॥१२।।
इसलिए पहले बल रुपी लगातार अभ्यास से पञ्च ज्ञानेन्द्रियों को अन्तर्मुखी करते हुए मन को विचारशील बनाना चाहिए। यहाँ विचार शब्द विवेकशील बनने के लिए आया है।
यद् यद् आसाद्यते किञ्चित् केनचित् क्वचिद् एव हि ।
स्वशक्तिसम्प्रवृत्त्या तल् लभ्यते नान्यतः क्वचित् ॥१३।।
कभी भी किसी के द्वारा कहीं भी (आत्मज्ञान) प्राप्त होता है वह उसके स्वयं के प्रयत्न से ही प्राप्त होता है अन्यथा नहीं । इसीलिए योगवासिष्ठ में प्रबल पुरुषार्थ और प्रयास की बात कई बार कही गई है।
पौरुषं यत्नम् आश्रित्य प्रोल्लङ्घ्येन्द्रियपर्वतम् ।
संसारजलधिं तीर्त्वा पारं गच्छ परं पदम् ॥१४।।
प्रयत्न का आश्रय लेकर इन्द्रियों के पर्वत (अनन्त इच्छाओं का अंबार) को लाङ्घ (अन्तर्मुखी) कर संसार रूपि सागर को तार कर परम पद को प्राप्त हो जाओ । पञ्च ज्ञानेन्द्रियों एवं मन की बहिर्मुखता को पर्वत शब्द से समझाया गया है। परम पद कोई लोक विशेष नहीं वरन आत्मसाक्षात्कार या आत्मदर्शन या उपाधि रहित आत्मज्ञान है। जिस तरह पर्वत लाँघने हेतु प्रबल प्रयास जरुरी है वैसे ही आत्मदर्शन हेतु लगातार प्रयासरत रहना चाहिए।
विना पुरुषयत्नेन दृश्यते चेज् जनार्दनः ।
मृगपक्षिगणं कस्मात् तद् असौ नोद्धरत्य् अजः ॥१५।।
बिना पुरुषयत्न यानि प्रबल पुरुषार्थ के यदि जनार्दन (भगवान्) तारते हैं तो पशुपक्षियों को क्यों नहीं तारते। समाज को दैव या ईश्वर भरोसे रहने की कुशिक्षा ने आलस्य और प्रमाद को बढाया। जब आजीविका हेतु परिश्रम जरुरी है तब यहाँ प्रश्न आत्मदर्शन का है जिसके लिए स्वयं का प्रयास ही काम आता है।
गुरुश् चेद् उद्धरत्य् अज्ञम् आत्मीयात् पौरुषाद् ऋते ।
उष्ट्रदान्तबलीवर्दांस् तत् कस्मान् नोद्धरत्य् असौ ॥१६।।
उस समय भी समाज में गुरु के नाम से भ्रमित किया जाता था। तभी कहा गया कि यदि कोई गुरू प्रयत्न विहीन अज्ञानियों को तारने में सक्षम है तो वह गुरु ऊँठ, हाथी, बैल आदि को क्यों नहीं तारता। कम से कम आत्मज्ञान, आत्मदर्शन में सक्षम गुरु तक केवल मार्ग बता सकता है और कुछ नहीं। उसका तथाकथित शक्तिपात तक काम नहीं आता इसमे । पथ पर चलना (प्रयास) शिष्यवर्ग को करना पडता है।
न हरेर् न गुरोर् नार्थात् किञ्चिद् आसाद्यते महत् आक्रान्तमनसस् स्वस्माद् यन् नासादितम् आत्मनः
।। १७।।
अगर अपने मन पर नियन्त्रित करके अपनी ही आत्मा नहीं पाई जा सकती तब न ही गुरु से न ही हरि से न ही अर्थ (धनादि) से वह महत् वस्तु पाई जा सकती है। यहाँ उन उपायों का खोखलापन दर्शाया गया जिन्हें सदा महिमामंडित किया जाता है।
अभ्यासवैराग्ययुताद् आक्रान्तेन्द्रियपन्नगात् ।
आत्मनः प्राप्यते यत् तत् प्राप्यते न जगत्त्रयात् ॥१८।।
जो वस्तु अभ्यास और वैराग्य से, इन्द्रियरूपी साँपों को आक्रान्त (नियन्त्रित) करके पाई जाति है वह तीनों जगत् में अन्य किसी उपाय नहीं पाई जा सकती। इनको धीरे-धीरे लगातार अभ्यास द्वारा अन्तर्मुखी करने की बात कही गई है। जिस तरह पाँव हीन सर्प पार्श्व-घुमावदार, सीधी और टेढी मेढी चाल में चलता है वैसे ही प्राकृतिक रुप से बनी बहिर्मुखी इन्द्रियाँ अपनी-अपनी चाल चलती है। इन्द्रियों की चाल अधिक वक्र है अपने तीनों गुण (सत्व, रज, तम) के चलते।
आराधयात्मनात्मानम् आत्मनात्मानम् अर्चय ।
आत्मनात्मानम् आलोक्य सन्तिष्ठ स्वात्मनात्मनि ॥ १९।। अपने से ही अपनी आराधना करें अपने से ही स्वयं की अर्चना करें। अपने को देख कर अपने में स्थित हो जाएं। इसम स्वयं के मूल स्वरुप को जानने की बात है कोई अलग से पूजा-अर्चना करने की नहीं। आहार-विहार व्यवहार पर नियंत्रण की बात आराधना तथा अर्चना द्वारा समझाई गई है। ऐसे अभ्यासी अपने आप से खुश रहना जानते हैं। वे औरो की उन्नति से ईर्ष्या नहीं करते और न हिंसात्मक, अनियंज्ञित, असंयमित नििरर्थक प्रतिस्पर्धा।
शास्त्रयत्नविचारेभ्यो मूर्खाणां प्रपलायताम् ।
कल्पिता वैष्णवी भक्तिः प्रवृत्त्यर्थं शुभस्थितौ ॥२०।।
यो मूर्ख शास्त्र, यत्न और विचारे से भागते हैं उसके लिए ही वैष्णवी भक्ति का आविष्कार हुआ शुभस्थिति में प्रवृत्त करवाने के लिए। शास्त्र शब्द किन ग्रंथों के लिए आया है? जो ग्रन्थ स्वशासन तथा अनुशासन की बात संगति लगाते हुए सरलता से तात्विक विवेचना करे वही यहाँ शास्त्र शब्द से कला गया है। उसीके अनुसार प्रयास (श्रवण, मनन, निदिध्यासन) ही प्रयत्न तथा अन्दरूनी जागरूक विवेक ही विचार करना है। प्रवृत्त्यर्थं शुभस्थितौ पुर्णतः बहिर्मुखी लोगों के लिए कहा गया जो आत्मज्ञान से विमुख है तथा आत्माभ्यासी बनने की बात पसंद नहीं। ऊपर से जीवन में संयमहीन आचरण का बोलबाला रहता है।
अभ्यासयत्नौ प्रथमं मुख्यो विधिर् उदाहृतः ।
तदभावे तु गौणस् स्यात् पूज्यपूजामयः क्रमः ॥२१।।
अभ्यास और यत्न ही पहली और मुख्य विधि है । उसके अभाव में पूजनादि क्रम गौण हैं ।
अस्ति चेद् इन्द्रियाक्रान्तिः किं पूजापूज्यपूजनैः ।
नास्ति चेद् इन्द्रियाक्रान्तिः किं पूजापूज्यपूजनैः ॥ २२।।
यदि इन्द्रियविजय सिद्ध है तो पूजापूज्यादि से क्या लाभ। यदि इन्द्रियविजय सिद्ध नहीं तो पूजापूज्यादि से क्या लाभ। इसे पूजा-पाठ - अर्चना का खंडन न समझा जाए। यह सब गौण साधन है जिनकी क्षमता संसार तक है। यह सब पूर्ण बहिर्मुखी समाज तक बडे तामझाम सहित करता और करवाता है। दैहिक तथा बौद्धिक आतंकवादी, मुनाफाखोरी करनेवाले तक प्रेम से पूजा-अर्चना करते है। विस्तार। हेतु उत्पत्तिप्रकरण सर्ग
6 श्लोक 11 वे की विवेचना अवश्य पढे।
विचारोपशमाभ्यां हि विना नासाद्यते हरिः ।
विचारोपशमाभ्यां च युक्तस्याब्जकरेण किम् ॥ २३।।
विचार और उपशम (मन की शान्ति) के विना हरि साधे नहीं जा सकते। शुद्ध अन्तःकरण में उनका अनुभव होता है बाकी सब कलुषित मन की कल्पना है। इसके चलते भगवान के दर्शन और उनसे संवाद की कल्पित बात बताई जाती है।
विचारोपशमोपेतं चित्तम् आराधयात्मनः ।
तस्मिन् सिद्धे भवान् सिद्धो नो चेत् त्वं वनगर्दभः ॥२४।।
विचार और उपशम से युक्त अपने चित्त की आराधना करे । उसके सिद्ध होने पर (तुम) सिद्ध हो अन्यथा (तुम) वन के गधे हो। संयमित आहार, विहार तथा व्यवहार ही चित्त की आराधना है।
क्रियते माधवादीनां प्रणयः प्रार्थनाय यत् ।
स चैव कस्मात् क्रियते न स्वकस्यैव चेतसः ॥२५।।
जो माधव (विष्णु) आदि की प्रार्थना के लिए विनम्र बनते हो तो वही अपने मन के लिए क्यों नहीं करते। मन की उग्रता को विनम्रता में बदलनै की ओर संकेत किया गया है। अधिकतर बाहरी विनम्रता का प्रचार-प्रसार होने से मन की अन्दरूनी पर्तों का मैल जमा रह गया। यह स्पष्ट दिखता है व्यवहार के समय जब ऐसे लोग समय तथा साधन यन की सफाई हेतु लगातार उपयोग बिल्कुल नहीं करते।
सर्वस्यैव जनस्यास्य विष्णुर् अभ्यन्तरे स्थितः ।
तं परित्यज्य ये यान्ति बहिर् विष्णुं न ते बुधाः ॥२६।।
सभी जनों के अन्दर विष्णु स्थित है। उसे छोडकर जो बाहर विष्णु को ढूँढते हैं वे बुद्धिमान् नहीं है। यह बोलने वाले भी बाहर अधिक ढूढते और उसे रीति रिवाज में बाँध कर संकुचित करते हैं विष्णु शब्द संचलन तथा देखरेख से संबंधित है न की वेशभूषा, धर्म, संप्रदाय, पंथ विशेष से। यहाँ हाल है कि प्रायः वैष्णव व्यवहार में अन्य पंथो के साधुओ के साथ बहुत भेदभावपूर्ण व्यवहार करते हैं।
हृद्गुहावासि चित्तत्त्वं मुख्यं सानातनं वपुः ।
शङ्खचक्रगदाहस्तो गौण आकार आत्मनः ॥२७।।
हृदय की गुहा में स्थित जो चित् तत्त्व है वही आत्मा का सनातन रूप है। शङ्खचक्रगदा हस्त वाला
रूप गौण है। यहाँ शुद्ध अन्तःकरण में होने वाले अनुभव या बोध का उल्लेख है किसी वास्तविक और काल्पनिक गुहा (गुफा) का नहीं। क्रम से श्लोक और अर्थ पढने से बात ठीक-ठीक सयझ आएगी।
यो हि मुख्यं परित्यज्य गौणं समनुधावति ।
त्यक्त्वा रसायनं सिद्धं साध्यं संसाधयत्य् असौ ॥ २८।।
जो मुख्य साधन का परित्याग कर गौण के पीछे दौडता है वह स्वतः सिद्ध रसायन का त्याग कर साध्य के पीछे दौडता है। गौण साधनों को प्रधानता देना अनुचित है। वे स्वतः सिद्ध और विश्वसनीय नहीं। आत्मज्ञान, आत्मनिष्ठ हेतु आत्माभ्यास ही प्रमुख है। उसके सहायक साधन को सबकुछ समझने से जिसके लिए अभ्यास होना चाहिए वह नहीं होता।
यस् तु वा स्थितिम् एवास्याम् आत्मज्ञानचमत्कृतौ ।
नासादयति सम्मत्तमनास् स रघुनन्दन ॥२९।।
अप्राप्तात्मविवेको ऽन्तर् अज्ञश् चित्तवशीकृतः ।
शङ्खचक्रगदापाणिम् अर्चयत्य् अमरेश्वरम् ॥३०।।
तत्पूजनेन कष्टेन तपसा तस्य राघव ।
काले निर्मलताम् एति चित्तं वैराग्यवारिणा ॥३१।।
मुख्य साधन में स्थित व्यक्ति के लिए आत्मज्ञान चमत्कार जैसा है क्योंकि इसीसे सरलता से पाया जाता है। गौण साधनो को महत्व देने से उलझन पैदा होने के साथ निष्ठा नहीं बन पाती। आत्माभ्यास से दूर विवेकहीन का चित्त (मन) अज्ञान के वश रहकर शङ्खचक्रगदा हस्त वाले रूप की अर्चना को ईश्वरीय समझता है। लम्बे समय तक उसकी पूजा करने, कष्ट सहने, तपस्मा करने जो निर्मलता संभवतः प्राप्त होती है वह वैराग्य के जल से पूरी सरलता से मिलती है।
सर्ग ५०
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
निरस्तमननानन्तसंविन्मात्रपरो भव ॥ २९ ॥
बोलने, विसर्जन,ग्रहण, पलक उठाने - गिराने, देखते, सुनने, स्पर्श, सूंघने,, श्वास-प्रश्वास, स्वप्न जैसी सभी क्रियाओं में इन्द्रियों अपने-अपने गुण (धर्म) का पालन करने की बात मानते हुए इनसे स्वयं को अलग करने की शिक्षा दी गई है। आत्माभ्यासी हेतु ऐसा आवश्यक अभ्यास व्यवहार द्वारा करते रहना चाहिए।
निर्वाणप्रकरण इस श्लोक की प्रथम पंक्ति आई है। वहाँ अभ्यास करने तथा उसके बाद की स्थिति का उल्लेख है।
सर्ग ५०
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
निरस्तमननानन्तसंविन्मात्रपरो भव ॥ २९ ॥
बोलने, विसर्जन,ग्रहण, पलक उठाने - गिराने, देखते, सुनने, स्पर्श, सूंघने,, श्वास-प्रश्वास, स्वप्न जैसी सभी क्रियाओं में इन्द्रियों अपने-अपने गुण (धर्म) का पालन करने की बात मानते हुए इनसे स्वयं को अलग करने की शिक्षा दी गई है। आत्माभ्यासी हेतु ऐसा आवश्यक अभ्यास व्यवहार द्वारा करते रहना चाहिए।
निर्वाणप्रकरण इस श्लोक की प्रथम पंक्ति आई है। वहाँ अभ्यास करने तथा उसके बाद की स्थिति का उल्लेख है।
तेजोबिन्दूपनिषत् अ० ४ श्लोक ३०
स्वयमेव स्वयं हंसः स्वयमेव स्वयं स्थितः ।
स्वयमेव स्वयं पश्येत्स्वात्मराज्ये सुखं वसेत् ॥३१॥
इसमे उन्नीसवे श्लोक का तनिक विस्तार है। हंस शब्द का प्रयोग संस्कृत साहित्य में विवेकवान पक्षी के रुप में हुआ है। इसपर चर्चित श्लोक है :-
नीर-क्षीर-विवेके हंसालस्य त्वमेव तनुषे चेत् । विश्वस्मिन्नधुनान्यः कुलव्रतं पालयिष्यति कः?
अगर हंस ही पानी और दूध को अलग करने का काम छोड़ देगा तो यह और कौन कर पाएगा? उसी भाँती समझदार लोग ही अपने विवेक रुपी कर्तव्य को नहीं निभाएंगे तब दूसरा कौन करेगा?
उपनिषद के श्लोक में विवेकशील व्यक्ति ही अपने उपाधि रहित स्वरुप के लिए लगातार आत्माभ्यास करेगा। उसके प्रति सजग रहते हुए उसमे स्थित रहेगा। यह विवेक कोई अन्य नहीं करवा सकता। अपना प्रयास ही काम आता है। इसमे साक्षीभाव बनता है जिसमे व्यक्ति स्थिति के अनुसार बहते नहीं रहता। इस पथ चलने वाले पथिकों का स्तर भले न्यूनाधिक हो अभ्यास का बल सबको संमालता है। उन सबके जीवन में संतोष तथा संयम सिद्ध होते हैं। आन्तरिक सुख - शांति रुपी राज्य में वह रहता है। जिस तरह बाहरी राज्य में नाना तरह के लोगों का आनाजाना लगा रहता और उसके फलस्वरूप नाना स्थितियाँ पैदा होती जिन्हें सुलझाना शासक का धर्म होता है वैसे अन्दरूनी राज्य में नाना तरह की वृत्तियाँ आती है। यह स्वाभाविक तथा प्राकृतिक व्यवस्था है। विवेक या आत्माभ्यास रुपी शासक व्यक्ति को संभालता है। तभी कहा जाता है कि आदत अपनी सुधार लो बस हो गया भजन।
जाबालदय्शनोपनिषद
आत्भतीर्थं समुत्सृज्य बहिस्तीर्थानि यो व्रजेत ।
परस्थं सयहारत्नं त्यक्त्वाकाचं विमार्गते।।खंड ४ मन्त्र ५०।।
आत्मज्ञान रूपी तीर्थ को छोडकर बाहर के तीर्थों के पीछे-पीछे दौडने का कार्य हाथ में प्राप्त महारत्न के विकल्प में काँच को पाने की लालसा समान है। आत्माभ्यासी हेतु ही नहीं वरन सबके लिए आत्मा पहले से प्राप्त है। बस उसे निरुपाधिक जानता है केवल मानना नहीं।
तीर्थानि तोयपूर्णानि देवान्काष्टादि निर्मितान ।
योगिनो न प्रपूज्यते स्वात्म प्रत्ययकारणात्।। ५२।।
सब तीर्थों मे जल स्रोत (झरना, नदी, सरोवर, समुद्र तट - स्थान के अनुसार) है तथा देव विग्रह काष्ट, पत्थर, धातु आदि से बने हुए हैं
बहिस्तीर्थंपरंतीर्थं मंतस्तीर्थं महामुने।
आत्मतीर्थ महातीर्थममन्यतीर्थं निरर्थकम्।। ५३।।
आत्मा रुपी तीर्थ सही रुप में पवित्र पावन तीर्थ है इस महातीर्थ से भिन्न बाकी तीर्थ निरर्थक है। पूर्व पक्ष उठाते हुए प्रश्न आया की क्मा यह एक की महिमा बढाने के लिए औरो को हेय प्रमाणित करने जैसा है? क्या पुराणो तथा उप पुराणो में ऐसा नहीं किया गया? सभी संप्रदाय, पंथ तथा संस्था अपने-अपने तीर्थ को ही श्रेष्ठ कहते हैं और श्लोक में बाह्य तीर्थो, मंत्र रुपी तीर्थ को परंतीर्थ कहा गया।
श्लोक में उदाहरण के लिए दो नाम लिए पर समझना सबके लिए है। अपने प्रचार-प्रसार हेतु बाह्य तीर्थो के समर्थक एक दुजे को नीचा दिखाते हैं जोकि एक साधारण नियम है। उन सबके लिए जो प्रशंसासूक शब्द का प्रयोग हुआ वह व्यंग्य होने के साथ-साथ उनके लिए है जो बाह्य साधनो को सबकुछ समझते - समझाते है। सरल, सहज, सुगम आत्मज्ञान को अपनाना तथा आत्माभ्यासी बनना ही उचित है। तीर्थ शब्द का अर्थ ही होता है पार करना और अज्ञान अविद्या से पार पाने के लिए आत्मा रुपी तीर्थ बहुत है। यहाँ एक आक्षेप उठता है की नदी पार करने के लिए नाव तीर्त है तब आत्मतीर्थ बडा कैसे हुआ? जो पार या गन्तल्य तक पहुँचाए वही तीर्थ और जाना हैं धाम (उत्तराखंड और अन्य राज्यों के अपने-अपने धाम -> मुख्य धार्मिक स्थल) तब आत्मतीर्थ महान कैसे हुआ? यह उस स्थिति में ले जाता है जो अन्य किसी माध्यम (तीर्थ) से संभव नहीं। इसके लिए प्रमुख साधन आत्माभ्यासी व्यक्ति का अपना शरीर है। व्यवहार में धाम (गंगोत्री, यमुनोत्री, आदि) हेतु तीर्थ शब्द का प्रयोग होता है। यह सर्वविदित तथ्य है कि आत्मा, शरीर का अपना अलग अस्तीत्व नहीं और सयझानै के लिए इनका प्रयोग किया जाता है। तब क्या प्रमुख साधन के रूप में आत्माभ्यासी का शरीर तीर्थ हुआ? जैसे अन्य साधन ठीक से बने हुए होने चाहिए (आसन, मादा, रास्ता, नाव, जलयान, आदि) वैसे ही अभ्यासी का शरीर होता है। संयमित जीवन शैली को अपनाने वाले आत्माभ्यासी हेतु उसका शरीर तीर्थ है। इससे वह आत्मज्ञान मे समझाई स्थिति तक पहुँचा और फिर सतत अभ्यास द्वारा जान लेना की अलग से कही कुछ नहीं। नाम रुपात्मक जगत केवल शब्द तथा भ्रम जाल है। न आत्मा अलग से कोई तत्व और न वह ब्रह्म से भिन्न है। जब चार्वाक दर्शन में शरीर को महत्व दिया गया तब वहीं संयमित जीवन शैली वाले आत्माभ्यासी के शरीर की बात है। असंयमित व्यक्ति का स्वास्थ्य (अन्दरूनी - बाह्य) ठीक नहीं रहता। देखा यही जाता है कि ऐसे व्यक्ति का आत्मिक बल न्यूनतम रहता है तब वह आत्माभ्यासी कभी नहीं हो सकता।
भागवत महापुराण में इस प्रसंग पर कहा गया -
तपस्तीर्थं तपोदानं पवित्राणि तराणि च ।
नालंकुर्वंति तां सिद्धि या कलया कृत।।११.१९.४।।
जो समाधान आत्मज्ञान के अंश मात्र से होता है वह तप, बाह्य तीर्थ जप (मारा, मानसिक), दान तथा दुसरे चर्चित उपायो बिल्कुल नहीं हो सकता।
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इतनी सरल विधि होते हुए कठीन, श्रमसाध्य, व्यय प्रधान साधन क्यों बताए जाते हैं। बतलाने वाले औरों को अपने-अपने तक रखना चाहते हैं। अब शारीरिक रुप से सक्षम भूखों के लिए रोज भोजन बाँटना अच्छा लगता है पर उन्हे आजीविका की ओर प्रेरित करना ठीक नहीं लगता। अगर लोग समझदार हो गए और अपनी-अपनी रोजी-रोटी की व्यवस्था करने लगे तो तथाकथित दानवीरों का नाम कैसे होगा? रोज खाने वाला दो चार काम तक मुफ्त में करेगा। इसीलिए आत्मज्ञान को या तो छिपाया गया नहीं तो गौण साधनो को महिमामंडित कर औरों को अपने-अपने जाल ये फँसाया गया।
पैंगलोपनिषद
अमृतेन तृप्तस्य पयसा किं प्रयोजनम् ।
एवं स्वात्मानं ज्ञात्वा वेदैः प्रयोजनं किं भवति ।। ९।।
अमृत से तृप्त हुए व्यक्ति को अन्य पेय पदार्थो की आवश्यकता नहीं। वैसे ही आत्मज्ञान पश्चात वेद पढने से क्या होगा?
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योगवासिष्ठ निर्वाणप्रकरण पूर्वार्द्ध के कुछ तथ्य
किसी - किसी प्रकाशक ने विर्वाणप्रकरण को पूर्वार्ध - उत्तरार्ध, दो भाग में बाँट और किसी ने एक साथ प्रकाशित किया। यहाँ दोनों संस्करण के सर्गों की संख्या दी गई है। एकसाथ प्रकाशित होने वाले निर्वाणप्रकरण में सर्ग संख्या कोष्ठ में है।
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६. निर्वाणप्रकरण पूर्वार्द्ध
सर्ग २ श्वोक ३६
भोगेष्वनास्थ मनसा शीतलामल निर्वृतेः।
छिन्वनापाश आलस्य क्षीयते चितत्मविभ्रमः।।
जिसका अंतःकरण भोगों में आस्था नहीं रखता, जिसको सुशीतल निर्मल पद प्राप्त हुआ है उसका चित्तविभ्रम नष्ट हो जाता है।
सर्ग ३
चित्तो न भिन्नोsनुभवो भिन्नो नाsनुभवादहम् ।
न मतो भिद्यते जीवो न जीवाद्भिद्यते मनः।। ७।।
मनसो नेन्द्रियं भिन्नं पृथग्देहश्च नेन्द्रियात्।
न शरीरज्जद्भिन्नं जगतो नाsन्यदस्ति हि ।। ८।।
ब्रह्म से अनुभव (माया वृत्ति में आरुढ चिदात्मा) भिन्न नहीं, अनुभव से अहं (व्यष्टि - समष्टि रुप अहंकार)
भिन्न नहीं, अहं से जीव भिन्न नहीं, जीव से मन भिन्न नहीं, मन से इन्द्रिय, इन्द्रियों से देह, देह से जगत भिन्न नहीं। (७,८)
यदुपादेयबुद्धया च तद् दुःखाय सुखाय ते ।
भावो भावेन नाsभकर्तृ सुखदुःखयोः।। १३।।
उपादेय बुद्धि से ग्रहण विषय सुख - दुःख का कारण है।(३ - १३) सुख पाने की इच्छा का ही अर्थ है दुःख - खलील जिब्रान (सीरिया के लेबनान में बशेरी नामक ग्राम) जब महात्मा बुद्ध ने दुखों की बात कही वह समाज की दृष्टि से कही। जिन बातों से उनका मन विचलित हुआ वह बोधिसत्व की ओर चलने की बात कर रहा है। अब आगे की यात्रा स्वयं को अपने प्रयास से तय करनी पडती है।
राग द्वेषविकाराणां चेन्नं भाव्यते।
ततः सन्तोप्यसद्रूपाः सविता अप्यसेविताः।। १८।।
यस्य नाsहकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न न निबध्यते।। १९।।
राग द्वेष तथा उनके कार्यभूत विकारों के स्वरूप का (तत्व का) यदि विचार नहीं किया जाता तो राग द्वेष शून्य रुप से प्रसिद्ध महात्मा राग द्वेष युक्त है। इनका तत्व जाने बिना मूल का उच्छेद नहीं होता। राग द्वेष की आसक्ति हो सकती है। ऐसो की सेवा व्यर्थ है। (३- १८,१९) श्रीमद्भगवतगीता (१८ - १७) में (३ - १९ वे) श्लोक आया है। अट्ठरहवें श्लोक की संगति लगाते हुए श्रीमद्भगवतगीता (१८ - १६) में कहा गया :-
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः।।18.16।।
तत्व से दूर अविवेकी व्यक्ति आत्मा को कर्ता समझता है। ऐसे व्यक्ति को दुर्मति कहा गया है।
सर्ग ८
ऋषयो मुनयः सिद्धा नागा विद्याधर सुराः।
इति भागं विद्यायाः सात्तविकं विद्धी राघव। । ९।।
सात्त्विकस्याsस्य भागस्य नागविद्याधरास्तमः।
राजस्तु मुनयः सिद्धा सत्वं देवा हरादयः।। १०।।
आत्म सत्ता में संवेदन कलना पूर्ण रुप फुरी है। सो चिन्मात्र संवित का आभास है, सो फुर कर सूक्ष्म, स्थूल, मध्य भाव को प्राप्त हुई है। वही दृढ स्पंद करके मन भाव को प्राप्त हुई है - सात्त्विक, राजस, तामस तीन आकार हुए। अविद्या त्रिगुण प्राकृतधर्मिणी है। नाग, विद्याधर - सात्विक तामस।
सिद्ध, देवता, मुनि - सात्त्विक राजस।
ब्रह्मा विष्णु महेश - सात्विक सात्त्विक।
सर्ग २८
नाsहमस्मि न चाsभूवं भविष्यामि न सोsधुना।
दैहोsयं चित्रदोषोत्थः किमन्यतपरिदेव्यते।। ५९।।
मैं न वर्तमान में हूँ, न वह मैं भूतकिल में था और न भविष्यत् में रहूँगा। कर्म, वासना - अविद्या रूपी दोषों से उत्पन्न - शोक क्यों किया जाए?
नाsहमस्मि न मे भोगाः सत्या इत्यभिभावेते।
नेदमाडबरं व्यर्थंममनर्थायाsवभासते।। ७०।।
अहमेव हि वा सर्वं चिदित्येवं विभाषते ।
नेदमाडबरं व्यर्थंममनर्थायाsवभासते।। ७१।।
न मैं हूँ, न मेरे भोग सत्य है - ऐसा चिन्तन करने पर यह जगदाडंबर नहीं है किन्तु व्यर्थ ही अनर्थ के लिए भासता है अथवा सबकुछ चित रुप ही हूँ। ऐसा चिन्तन करने पर यह जगदाडंबर कुछ नहीं है किन्तु व्यर्थ ही अनर्थ के लिए भासता है। (७०, ७१)
ये हि प्राज्ञाः स्वनियता विदग्धाः शास्त्रशालिनः ।
राग द्वेष भयास्ते वै जम्बुकास्ते धिगस्तु तान् ।। ७८।।
जो पुरुष शास्त्रों में निष्णात, चतुर, कर्मनिरत एवं प्राज्ञ हो कर भी राग द्वेषादि से परिपूर्ण है वह निश्चय ही अरण्य में प्रसिद्ध श्रृगाल है। उन्हें धिक्कार है।
सर्ग २९
यत्करोति यदादत्ते देहयन्त्रंमिदं चलं ।
वातरज्यु युतं राम तदहड्कार चेष्टितं।। ५९।।
सूत्रात्मा प्राण से संयुक्त यह चंचल देह रुपी यन्त्र जो - जो क्रियाएँ करता है वह सब अहंकार का ही कृत्य है।
बोधः साम्यं शम इति पुष्पाण्यग्राणि तत्र च ।
शिवं घिन्मात्रममलं पूज्यं पूज्यविदो विदुः ।। १२७।।
कौन पूज्य है? इस विषय का तात्विक ज्ञान रखने वाले विद्वान कहते हैं कि एक मात्र चित्स्वरुप निर्मल शिव ही पूज्य है और उनकी पूजन सामग्री में विवेक ज्ञान, सर्व भुतों में आत्म बुद्धि और शम - यह सब श्रेय पुष्प हैं।
शमबोधाभिः पुष्पैर्देव आत्मा यदर्ज्यते।
तत्तु देवार्चनं विद्धि नाssकारर्चनमर्चनम् ।। १२८।।
शम,, बोध, साम्य रुपी पुष्प से उस देव की पूजा होती है। वही वास्तविक पूजा है। आकारों की अर्चना असली अर्चना नहीं है।
सर्ग ३०
चिच्छाययैव सर्वस्य जाड्यं सभ्यगुदेति च ।
सर्वस्याsस्य शरीरस्य गृहस्येव तमस्त्विह।। ५७।।
बुद्धि द्वारा निर्णय लेने की प्रक्रिया में कई तस्वीरें बनती बिगड़ती है। उस स्थान या स्तर को चित कहते है। यह कोई आत्मा का गुण नहीं वरन अन्तःकरण केे चार चरण / भाग में एक है। सभी अभी न कभी निर्णय लेने के मामले में असमंजसता (दुविधा) का अनुभव करते है। जिसे चित की छाया या जडता कहा गया। इस जडता का समस्त शरीरों में उसी तरह उदय होता है जैसे घरों में प्रकाश छाया से अन्धकार का उदय होता है। तात्पर्य यह है कि पञ्चीकरण प्रक्रियानुसार घर (देह) तेज से व्याप्त है क्योंकि उसमें पाँच तत्वों में एक तेज का संमिश्रण हुआ। तब अन्धकार की बात क्यों की? उस प्रकाश (तेज) से ही विषय रुपी अंधकार प्रमाणित है। वह तेज ही मन - बुद्धि को उस ओर ले जाता है। यह उसका सहज स्वभाव है।
सर्ग ३७ - ११ में यही भाव है -
साक्षिणि स्फार आभासे गृहे दीप एव क्रियाः।
सत्यै तस्मिन प्रकाशनन्ते जगच्चित्र परंपराः ।।
दीपक, पूर्णिमा का चन्द्रमा, सूर्यादि के प्रकाश से बाहर की आकृतियाँ सिद्ध है। वैसे ही देह के अन्दर अभिव्यक्त प्रमातृ चैतन्य के चलते नाना आकृतियाँ सिद्ध होती है।
अन्तःकरण और बाहरी जगत के साथ संबंध तीन स्तर पर होता है। पहले में शरीर के अन्दर स्थित, दुसरा देह तथा विषय के मध्य संपर्क (आन्तरिक, बाहरी) तथा तीसरा विषय में स्थित। पहले वाला क्रिया - प्रतिक्रिया का आश्रय (आधार) है। यह कर्ता - भोक्ता दोनों का आश्रय होने के कारण अहंकार तथा प्रमातृ चैतन्य नाम से जाना जाता है। दुसरे भाग में वृत्ति की जानकारी होती है जिसे प्रमाण चैतन्य कहा गया। तीसरे भाग में अभिव्यक्ति जिसे प्रमिति चैतन्य कहा गया। ये तीनों प्रत्यक्ष अनुभव के समय एक होकर संसर्गाध्यास कहलाते हैं।
सर्ग ३० के ३२ वे श्लोक के सन्दर्भ में -
श्री गौडपादाचार्य -
भोगार्थं सृष्टिरित्यथे क्रीडार्थमिति चाsपरे।
देवस्यैष स्वभावोsयं आप्तकामस्य का स्पृहा।।
तब क्या सृष्टि क्रीडा तथा भोग के लिए बनी? इसका निषेध करदे हुए गौडपादाचार्य ने अपनी शैली में समझाया। उनके अनुसार परब्रह्म परमात्मा की स्वभावशून्य अविद्या का विस्तार ही सृष्टि है। परमात्मा कोई शक्ति या नामरुप विशेष नहीं है। यह सृजन, संचालन तथा संहार के संयुक्त या मिलेजुली स्थिति का परिचायक है। उसमे अपनी इच्छा - अनिच्छा का कोई स्थान नहीं।
चिदालोकं विना कस्य रसनाग्रे स्फुरन्न नपि ।
कथं कदा प्रकटतामेति छष्टः क्व वा रसः ।। ६०।।
जीभ की स्वाद कलिकाएँ चित्प्रकाश की सहायता से अलग - अलग स्वाद (रस) का अनुभव कराती है पर केवल वही तक यह संभव है। क्या कलिकाओं के बिना अन्दरूनी प्रकाश (आत्मा) स्वाद का अनुभव करवा पाता? चुँकि वह कर्ता नहीं है अतः उसमें यह गुण मानना अनुचित है। दुसरी ओर बिना उसके कलिकाएँ अपने आप अनुभव नहीं करवा पायी। वस्तु में अपना स्वतंत्र स्वाद नहीं होता। पुराने अभ्यास तथा संस्कार के चलते वस्तुओं पर स्वाद - बेस्वाद आरोपित होते हैं। स्वाद मनोमय मात्र है।
चिदस्ति हि शरीरे ह सर्वभूतमयात्मिक।
चलोन्मुखात्मिकैका तु निर्विकल्प परा स्मृत।। ६७।।
सारभूत चिन्मय सत्ता या चेतन तत्व ही सबकुछ है। वह सबके प्रतिबिंब को धारण करते हुए आधार - आधेय, आश्रय - आश्रित संबंध से अलग है। उसीसे जडता सिद्ध तथा दूर होती है जबकि वह कर्ता - भोक्ता दोनो नहीं। दैहिक दृष्टि से देखे तब यह दो तरह का है - एक सांसारिकता में आसक्त, दूजा स्वरुप की ओर।
सर्ग ३१
मनः पुर्यष्टकं विद्धि सर्वकार्यैकारणम् ।
तदेव भेदैः कथितंन्यैः स्वाशय कल्पितैः ।। ५५।।
समस्त (दैहिक, मानसिक, बौद्धिक) कार्यों का मन ही पुर्यष्टक है जिसे अपने-अपने अनुभव जनित अभिप्राय के चलते शिष्य को सयझाने के लिए कल्पित नाम दिए इसलिए पुर्यष्टक शब्द की परिभाषा में अपनी दाल गलाने के लिए बहुतों ने अलग - अलग बात की। उस व्यर्थ के झगडे में न जाकर इतना समझ लेना चाहिए की सभी इन्द्रियाँ, प्राण, अविद्या, कर्मादि कल्पित शब्द है और इनमे से किसी का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं। इतनी सीधी-सादी बात को परिभाषा द्वारा जटिल बना दिया तथाकथित विद्वानों ने। अतः परिभाषा के नाम पर उछलकूद मचाना व्यर्थ है।
सर्ग ३२
सुचिराभ्यस्तभावं तु वासना खचितं मनः।
यज्ञ तत्र भ्रमत स्वर्गनरकादि प्रपश्यति ।। ३८।।
कर्म फल भोगने के लिए जिस शरीर, स्थान, समय, संगति की आवश्यकता है व्यक्ति विशेष को वे सब मिलते है। इसके चलते ऊपर नीचे की नाना योनियों में आने-जाने का पुराना अभ्यास तथा वासना से परिपूर्ण मन जहाँ-तहाँ विचरण (भ्रमण) करता हुआ स्वर्ग - नर्कादि देखते रहता है। स्वर्ग नियत देश नहीं है तभी श्लोक में यज्ञ तत्र का प्रयोग हुआ है। देखा जाए तो वेदांत में शोभनतम परिस्थिति को स्वर्ग कहते है और उसकी परिभाषा बदलती रहती है एक व्यक्ति तक के लिए फिर सबका कहना क्या। दूसरी ओर मरने के बाद स्वर्गादि लोक की प्राप्ति को पौराणिक साहित्य, भक्ति संप्रदाय तथा कर्मकांड में प्रधानता मिली। ऐसी जगहों को अधिक महिमामंडित किया गया ताकि अधिक से अधिक लोग इनके पीछे-पीछे भागे जबकि इनमें से कोई टिकाऊ नहीं। लोको के निवासी अपने-अपने निर्धारित कर्तव्यों का करते हैं। ऊपर से उनके सारे पद परिवर्तनशील है। दुनियादारी में व्यस्त लोग सेवा के लिए लिए उनके लोको को नहीं पाना चाहते। केवल भोगविलास की भावना हावी रहती है।
आत्माभ्यासी व्यक्ति को इससे दूर रहना चाहिए। इसके और साधना द्वारा यह प्रमाणित है कि स्वर्ग किसी स्थान विशेष का नाम नहीं। ऊपर से यह स्थाई तक नहीं।
कठोफनिषद १.१.२६ - २७
इसमे ब्रह्मविद्या के आचार्य यमराज तथा नचिकेता का संवाद है जिसमे विद्या के बदले सवर्गीय सुखों का प्रलोभन दिया गया नचिकेता को। तब उत्तर में कहा गया –
श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः।
अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्श्म चेत्त्वा।
जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव॥
सुख चाहे जहाँ का हो उससे तृप्ति नहीं होतीं। इसके चलते इन्द्रिय समूह (पाँच ज्ञानेन्द्रिय + पाँच कर्मेन्द्रिय + मन) का तेज नष्ट (जरयन्ति) होता है। इसलिये आप (तव - आचार्य को संबोधन) अपने प्रलोभन (नृत्यगीते) अपने पास रखे। यहाँ नृत्यगीते शब्द सारे सुखो का प्रतीक है।
धनादि से मनुष्य तृप्त नहीं होता। शरीर नाशलान है फिर चाहे जिसका हो। यहाँ नचिकेति ने उसी ओर संकेत करते हुए समझा दिया कि जबतक वे (आचार्य रुपी यमराज) अपने पद पर है तबतक वह (नचिकेता) जीवित रहेगा (उनके जैसा गुरु अपने शिष्य को नहीं मारेगा) और मर्यलोक वापस लौटने पर उसे धन की कमी नहीं रहेगी। नचिकेता को समझ थी की सभी लोक नाशवान। ओने के साथ-साथ उनके निवासी तक स्थाई नहीं।
श्रीमद्भगवतगीता ९.२१ -
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
एव त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते।।
भौतिकवाद के पीछे-पीछे भागने वालो ने ऐसे दिव्य सुखो की कल्पना की जो जरा - रोग से परे हो।
ऐसे भोगी विलासी लोग स्वर्ग के सुखों का आनंद तभीतक लेते हैं जबतक उनके पुण्य इसकी अनुमति दे।
पुण्य राशि समाप्त होते ही पृथ्वी पर लौटना पडता है। इसलिए वैदिक अनुष्ठानों का पालन करने वाले बार-बार आते-जाते है। ऐसे लोग उपनिषदों से दूर रहते हैं और श्रीमद्भगवतगीता, आष्टावक्र गीता, रामचरितमानस तक समझना पसंद नहीं करते। इसीलिए भक्ति संप्रदायों ने आत्मज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन को अपने-अपने मथानुसार समझाया।
रामचरितमानस ७.४३.१-२
एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥ नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥
मनुष्य जन्म लौकिक - पारलौकिक भोगो के पीछे-पीछे भागना उचित नहीं। इनका अंत दुःखदाई होता है क्योकि मन को विषय भोग का अभ्यास होने के कारण
उससे अलग होने की पीडा सही नहीं जाती। उन सुखो को पाने हेतु वैसा मनुष्य नाना चेष्टाएं करते हुए दुःखों को बुलाता रहता है। मानसिक रोघो में बढोतरी के पीछे यह एक महत्वपूण्र कारण है।
स्वर्ग से संबंधित जितनी बाते चार्वाक दर्शन से जोडी गई वे कितनी उसकी और कितनी आरोपित की गई इसकी पडताल कोई न करे यह और बात है। इस दर्शन का लक्ष्य संयमित जीवन की ओर था। उम्र भर सुखी तथा स्वस्थ रहने हेतु विषयो के पीछे-पीछे भागना अनुचित है।
सर्ग ३३
तथा संकल्पने क्लेशो न संकल्पविनाशने।
संकल्पयक्षो गन्धर्वपुर्याः सृष्टौ न तु क्षयै ।। ३३।।
पुष्टसंकल्पमात्रेण यदिदं दुखागतम्।
तदसंकल्पमात्रेण क्षयि काsत्र कदर्थना ।। ३४।।
संकल्प के जाल - जंजाल फँसना सरल है। ऊपर से वैसे साहित्य और समझाने वालों की कमी नहीं। संकल्प की दृढ़ता से दुःख (क्लेश) प्राप्त होता है परिस्तिथियों या उसके (संकल्प) चलते मिलने वाले फल से। संकल्प के अभाव में दुःख नहीं रहता। यहाँ काम-काज हेतु चेष्टा, चिंतन का निषेध नहीं किया गया वरन उस वृत्ति का विरोध है जो कर्ता - भोक्ता भाव जगाकर उसमें बहाने लगती है। मनुष्य लाभ के बदले मुनाफाखोरी और सट्टेबाजी में बँधता है। ऐसे संकल्प को छोडने में कैसा क्लेश?
सर्ग ३५
ब्रह्मविष्णुहरादी नामतोsयं परमः पिता।
मूलबीजं महादेवः पल्लवानमिव द्रुमाः ।। २१।।
देह की अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं है सभी दैहिक रुप अविद्या के उदाहरण है फिर चाहे वह देवों का ही हो। सारे नाम - रूप इसीमे समाए हूए है। चैतन्यस्वरुप महादेव उनका परम पिता है। पत्तो का मूल वृक्ष है। पेडों पर पत्तों की संख्या अधिक होती है इसीलिए फल - फूल का उल्लेख नहीं हुआ। देखा जाए तो वे सारे पेडों पर नहीं होते और प्रसंगानुसार तुलना के लिए पल्लव शब्द का प्रयोग उचित है।
चैतन्यात्मा मरादेव उनका मूल बीज है। सृष्टि संरचना तथा प्रबंधन समझने - समझाने के लिए चिन्मय सत्ता का मानवीकरण किया गया। इस श्लोक में महादेव शब्द उस नाम- रुप हीन सत्ता के लिए प्रयुक्त हुआ है। यहाँ ब्रह्मा, विष्णु, महेश की त्रिपुटी को हेय नहीं बताया जा रहा और न अवहेलना की गई। उनमे केवल विभाग तथा कार्य का दिखावटी भेद है वास्तविक नहीं। व्यवहार में मनुष्य न्यूनाधिक उन तीनों भूमिकाओं में रहता है जो देवों की बताई गई। अलग - अलग भूमिका निभाते हुए एक व्यकि का तदनुरूप परिचय, वेष, व्यवहार सबको दिखता है। यह भेद होते हुए वह एक ही रहता है।
सर्ग ३८
यदनारतमन्तस्थशुद्धचिन्मात्रवेदनम् ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ २६ ॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्शुद्धसंविन्मयो भवेत् ।
ध्यानामृतेन संपूज्य स्वयमात्मानमीश्वरम् ॥ २७ ॥
बोलने, विसर्जन,ग्रहण, पलक उठाने - गिराने, देखते, सुनने, स्पर्श, सूंघने,, श्वास-प्रश्वास, स्वप्न जैसी सभी क्रियाओं में इन्द्रियों अपने-अपने गुण (धर्म) का पालन करती है। आत्माभ्यासी व्यकि विवेक द्वारा इनमें कर्तापन आरोपित नहीं करता। यही अभ्यास उसके जीवन में संयम तथा संतोष लाता है।
समाज उसे उपरोक्त तथा बाकी शरीर निर्वाहादिक क्रियाएँ अन्य लोगो की तरह करते हुए देखता है। केवल औरों की शारीरिक चेष्टाओं में कर्ता-भोक्ता भाव रहता है आत्माभ्यासी के नहीं।
आत्माभ्यासी व्यक्ति शरीर को उपासना गृह समझ कर उसकी देखभाल करता है। उसकी दैहिक क्रियाएँ लोकदिखावे, यशस्वी बनने, औरों को वशीभूत या उनपर शासन करने हेतु नहीं अपितु अपने आध्यात्मिक के लिए होती है। यह सर्वमान्य तथ्य है कि ऐसी उन्नति सयमित आहार, विहार तथा व्यवहार से ही संभव है। इसीलिए दैहिक क्रियाओं का उल्लेख हुआ क्योंकि सभी से होती है पर अन्दरूनी भाव एक जैसा नहीं रहता। जब शरीर को अशोभनीय वस्तुओं का थैला कहते हैं तब वहाँ उसके बाहरी आकर्षण को नष्ट करने के लिए।
श्रीमद्भगवतगीत में :-
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्।।५.९।।
सर्ग ४०
देषकालपरिच्छन्नो येशां स्यात् परमेश्वर।
अस्माकमुपदेश्यास्ते न विपश्चिद्विपश्चिताम्।।१२।।
परयेश्वर की परिभाषा देश (स्थान) काल से परिच्छिन्न मानने वाले विद्वान इस तत्वोपदेश के योग्य अधिकारी नहीं है। हर युग में ऐसे विद्वान थे, है और रहेंगे जो ईश्वर - परमेश्वर शब्दों की परिभाषा मनमानी शैली में करेंगे। अपनी-अपनी पूजा-अर्चना करवाने वालों को भेद पसंद और समाज को चाहिए नित नूतन। फिर चाहे नई परिभाषा हो या कोई नया नामरुप धारी। परमेश्वर यानि ईश्वरों में सबसे ऊँचा। जब ईश्वर की परिभाषा संकुचीत होगी तब परमेश्वर शब्द कैसे खुलैगा?
सर्ग ४२
अनुभवकलनामृतेsस्य माता भवति न सर्व कल्पनेष्वसत्सु।
फलदुरुविभवा प्रमाण माला स्थितिमुपयाति न वारिणीव वह्निः।। २९।।
आत्माभ्यासी का अपना अनुभव ही एकमात्र प्रमाण है आत्मज्ञान में। इसका सत्यापन, प्रमाणीकरण औरों के द्वारा नहीं नहीं होता। बाह्य प्रमाण, प्रमेय,कृपा, जप आदि की पहुँघ नहीं है इसमे। जब सारे उपाय असफल है तब एकमात्र आत्माभ्यासी ही आत्मतत्व का अनुभव कर सकता है। इस आत्मतत्व (परमतत्व) में सारे व्यावहारिक प्रमाषो की माला उसी प्रकार टिक नहीं सकती जैसे जल में अग्नि। यहाँ अग्नि तत्व की बात नहीं हो रही वरन उस अग्नि की जो जल से शांत होती है। सारे प्रमाण अग्न के समान पीडा पहुँचाते है भले ही वह सात्विक ही क्यों न हो।
सर्ग ५०
पूर्णात् पूर्णमिदं पूर्णं पूर्णात्पूर्ण प्रसूयते ।
पूर्णाssपूरितं पूरणं स्थिता पूर्णे च पूर्णता।। २।।
ईशावास्य उपनिषद में मंगलाचरण के रुप में
तथा बृहदारण्यक उपनिषद में यह इस प्रकार कहा गया:-
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
संदर्भ तनिक भिन्न हो पर इस वस्तु निर्देशात्मक श्लोक में उपनिषद जनित प्रज्ञा का उल्लेख है। शब्दार्थ में ही लक्ष्यार्थ छिपे होने से मनमाना अर्थ आम नहीं आएगा। इसपर सृष्टि निर्माता के रूप में परमात्मा या ईश्वर का कोई उल्लेख नहीं है। मनमानी शैली में समझाकर अपने-अपने मत को औपनिषदिक प्रमाणित करने की अतृप्त एषणा हडधर्मिता है। योगवासिष्ठ तथा उपनिषद में यह अलग - अलग रुप में लिखा है। दोनों स्थान में अर्थ एक ही है।
ब्रह्मांड के जितने भाग को अभीतक देखा गया उसे दृश्यमान ब्रह्मांड कहते हैं। इस दृश्यमान ब्रह्मांड को ठीक-ठीक जानने में समय लगेगा। इसमें जानी गई हर वस्तु स्वयं में पूर्ण है। होने को सब विराट (पूर्ण) के भाग है पर स्वयं में अपूर्ण नहीं। अपनी-अपनी जगह सब पूर्ण है। जिस तरह वाहन के कलपुर्जे या व्यंजन की सामग्रियाँ संघटक भाग (अंग) होते हुए स्वयं में पूर्ण है।
निकाले लायक घटक को अलग करने से यह प्रमाणित नहीं होता की यह उससे (जिससे निकला गया) पैदा हुआ है।
इन श्लोकों को सृष्टिवाद, रहस्यवाद, कोरी बाहरी भक्ति की आड में एक सृष्टिकर्ता को खडा किया गया जिसकी संगति इनके संदर्भ के साथ नहीं लगती। इसकी चिन्ता न कर श्लोक का अवमूल्यन कर दिया गया। अपनी-अपनी मान्यको स्थापित तथा पुरातन बतलाने के लिए इन्हें तक नहीं छोडा।
सर्ग ६८
नाsहमस्मि न चाsन्योsस्ति न मनो न च मानसं।
इति संविदसंवित्तिर विच्छिन्नाsति मौनिता ।। ३५।।
न मैं (त्रिगुणात्मक अहं) हूँ, न अन्य है, न मन, न मन का विकल्प - ऐसे तत्वज्ञान में जो स्थित है या इस समझ से जिसका शुद्ध चित्त का निरंतर संपर्क बना रहे उसे अतिमौनिता या उत्तम मौनिता कहते हैं।
सर्ग ८७
रानी चुडाला प्रसंग
सवासनं मनो ज्ञेयं ज्ञानं निर्वासनं मनः।
ज्ञानेन ज्ञेयमभ्येत्य पुनर्जीवो न जायते।। २७।।
वासना युक्त मन ज्ञेय है वासना शून्य मन ज्ञान है। ज्ञान (अनुभव जनित) द्वारा ज्ञातव्य ब्रह्म (उपाधि रहित) वस्तु प्राप्त हो जाती है तब जीव दूसरी बार जन्म नहीं लेता। वापस न आने का तात्पर्य है कि इच्छाओं के चलते आना जाना बंद होता है।
सर्ग ९२
रानी चुडाला प्रसंग
धनं दारा गृहं राज्यं भूमिश्चछत्रं च बान्धवाः ।
इति सर्वं न ते राजन् सर्वत्यागो हि कस्तव ।। ५।।
धन, पत्नी, घर, राज्य, देश, छत्र (राजसी चिह्न), बन्धु - बान्धव का त्याग नाटक मात्र है असली त्याग नहीं। ये आपके है नहीं। यह सब पहले थे तथा बाद में भी रहेगे। मेरा समझ कर त्याग का अभिनय किया गया।
तवाsस्त्येवाsपरिव्यक्तः सर्वस्माद्भाग उत्तम।
तं परित्यज्य निःशेषमायास्यसि विशोकताम्।। ६।।
सबसे उत्तम भाग जो आपका कर्ता - भोक्ता भाव वाला मन अभीतक अपरित्यक्त है। उसका पूर्णरूपेण परित्याग कर आप शोकशून्य होगे।
सर्ग ९३
रानी चुडाला प्रसंग
राज्यादेरथ देहादेराश्रमादेर्महीपते ।
सर्वस्यैव मनो बीजं तरूबीजं तरोरिव ।। ३४।।
सर्वस्य बीजे सन्त्यक्ते सर्वं त्यक्तं भवत्यलम् ।
सम्भवासंभावद्भूप सर्वत्यागो भवेदिति ।। ३५।।
सर्वधर्मा अधर्मा वा राज्यादि विपिनादि वा ।
सचित्तस्य परं दुःखं निश्चित्तस्य परं सुखम् ।। ३६।।
वृक्ष का बीज वृक्ष है। नन्हा सा दिखने वाला बीज अपने में विशालकाय वृक्ष को छिपाए रखता है। बीज के अनुसार स्थान, खाद, जल, नमी, तापमान, हवा, प्रकाश, संभाल होने से वह अंकुरित हो कर धीरे-धीरे पौधे तथा वृक्ष में परिणत होता है। भले ही उसे बीज शब्द से संबोधित करे है वह वृक्ष की भावना से ओतप्रोत। उसी तरह मन - राज्य आदि (देश, भूमि, क्षेत्र), देहादि {सभी के शरीर (जलचर, नभचर, थलघर, स्थावर! - पेड - पौधै, दृश्यमान, दृश्यमान और आकार - पत्थर, पर्वत)}, आश्रमादि (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास) का बीज है राजन। बीजभूत मन का त्याग ही सर्वत्याग है। उसके बिना सर्वत्याग संभव नहीं। कर्तृत्वाभिमान - भोक्तृत्वाभिमान में फँसा हुआ चित्त दुःखी रहता है फिर चाहे राज्य मे रहे या वन में। इसे महात्मा गौतमबुद्ध के उदाहरण से जोड कर न देखा जाए जिन्होनें सांसाारक कष्टों का कारण जानने के लिए घर छोडा था न कि संंन्या आश्रम की दिखावटी महिमा सुनकर।
इदं प्रर्वतते सर्वं चित्तमेव जगत्या ।
देहाद्याकार जालेन चित्त जीवो मनोमयं। ४०।।
चित ही मनोमय जीव है। नाना प्रकारों के द्वारा चित ही परिणत हो रहा है।
बुद्धिमहदङ्कार प्राणाश्चेत्यादिर्भिमुने।
क्रियानुरुपैरभिधा व्यापारेः शान्तमुच्यते ।। ४१।।
अलग अलग क्रियाओं के चलते अन्तःकरण के भिन्न भिन्न नाम प्रसिद्ध होते हैं जैसे बुद्धि, महत्, अहं (कर्ताभाव - भोक्ताभाव), प्राण आदि।
उस त्रिगुण जनित अभिमान को त्यागने से ही जो सुख मिलना चाहिए वह मिलता है। अन्तःकरण तथा दैहिक क्रियाओं (प्राणादि) के व्यापार से अलग होने से वह शान्ति मिलती है जिसके लिए राजा ने राजपाट त्यागा।
रानी चुडाला का प्रसंग योगवासिष्ठ की अवहेलना के नाना कारणों में एक है। इसके अनुसार राजा - रानी दोनों साधना वृत्ति वाले थे। राजा ने त्याग का अभिनय करते हुए बिना किसी को बताए वन में कुटिया बनाकर रहना शुरु किया। रानी चुडाला को अपनी शक्ति से इसका पता चला और वह वेष बदल कर राजा को समझाने लगी। उधर राजा अपनी वस्तुओ (कमंडल आदि) को आग में दछोडने लगा ताकि उसका त्याग सिद्ध हो। सामाजिक प्रतिष्ठा बढाने और बनाए रखने के लिए ऐसे नाटक करनेवाले हर युग में थे, है, रहेगे। तभी पूरी श्रीमद्भगवतगीता में सन्यास के विषय में बार बार घुमा-फिराकर पुछा गया अर्जुन द्वारा। सन्यास लेने की व्यग्रता अत्यधिक है। नादानी वश इसे अन्तिम जन्म समझा जाता है।
सर्ग ९८
रानी चुडाला प्रसंग
चेतोहि वासनामात्र वास्ये तु सति वासना।
वास्यं जगत्तदेवासदतश्चित्तास्तिता कुतः ।। ११।।
यह सर्ग त्माग पर चर्चा को आगे बढाते हुए उसके नाटकीय पक्ष को उजागर करता है। एक व्यकि किसी वस्तु, स्थान आदि को त्यागता है तब वह स्वयं उन सभी त्यक्त की दृष्टि से त्याग का विषय है। जब एक ने दुसरे को त्यागा तब वह दुसरे के त्याग का विषय बना। दोनों अपनी-अपनी दृष्टि में त्यागी हुए। यह पक्ष अनदेखा रहने के कारण केवल एक का त्याग महिमामंडित होता है। सही में त्याग सिद्ध होना तो दूर वह उस तथाकथित त्यागी व्यक्ति के परिचय के साथ-साथ घिपक जाता है। केवल बोध निमित्त चित शब्द का प्रयोग होता है क्योंकि वह स्वयं कुछ नहीं। व्यवहार में 'चित से त्यागा, घित में भ नहीं' का प्रयोग वाणी विलास मात्र है। चित वासनामात्र रुप है। वासना (इच्छा, भावना अज्ञान) का कारण जगत असत है तब चित का अस्तित्व कहाँ। मन में विचार आते-जाते हुए उसे ही नाना रुपों में ढालते है।
इस प्रसंग में असत शब्द प्रयुक्त हुआ जो सामने आते ही सत की याद दिलाता है। यहाँ सत - असत को समझना जरूरी है त्याग के लिए। एक स्थान पर उपस्थित व्यकि का अभाव है दुसरे स्थान पर। काम-काज करते हुए सबके साथ यही होता है। किसी स्थान या कार्य विशेष की दृष्टि से से सत / भाव तथा दुसरे स्थान और कार्य की दृष्टि से असत / अभाव। जब वह कार्य विशेष पूरा होता है तब स्थिति पलटती है। दोनो ( स्थान, कार्य) एक दूजे के के लिए त्याज्य हुए। जब किसी का अपना स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं तब सत - असत, भाव - अभाव की आड में शाब्दिक खेल शोभा नहीं देता।
अनहंवेदनं सिद्धिरहंवेदनमापदः ।
सोऽहमेवारऽनहमिति शुद्धबोधो भावाऽऽत्मवान्।।१३।।
वैदिक वाङमय जीते जी मोक्ष की बात करता है जो उपनिषदों तथा योगवासिष्ठ में प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से समझाई गई। त्रिगुणात्मक अहंकार का अभाव ही मोक्ष तथा उसका भाव (उसके अनुरूप बहना) ही बंधन है। इसलिए ' मैं पदार्थ नहीं वरन् (नाम रुप हीन) ब्रह्य हूँ - इस तरह के बोध से आत्मवान बनना चाहिए। यह बोध आत्माभ्यास से सिद्ध होता है। यूँ तो देहाभिमान के बिना यह संवाद तक नहीं हुआ तब अहं का अभाव की बाम कैसे आई? शरीर के प्रति दो दृष्टि मानी गई - देहो देवालय तथा दूसरी बोझ मात्र। पहले में जीने के लिए खाना और दूसरे में खाने के लिए जीना। श्रीमद्भगवतगीता के चतुर्थ अध्याय नाना यज्ञों के माध्यम से यह बात विस्तार से समझाई गई है।
सर्ग ९९
रानी चुडाला प्रसंग
नष्टो मोह स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्महामुने।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहो विश्रान्तमतिरात्मवान्।। १।।
श्रीमद्भगवतगीत
नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत |
स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव || १८. ७३।।
योगवासिष्ठ तथा श्रीमद्भगवतगीता में एक ही बात कही है। दोनों के प्रधान श्रोता का धरातल अलग है। अर्जुन को कर्ता - भोक्ता भाव से ऊपर उठने की शिक्षा दी गई आत्मज्ञान के उपदेश से। यही उपलब्धि रही जिसे 'लब्धा' शब्द द्वारा कहा गया। दोनों जगह स्मृति शब्द आया। अर्जुन शिक्षित होने के साथ कर्ता - भोक्ता भाव से ग्रस्त होने के कारण आत्मज्ञान से रहित था। जबकि योगवासिष्ठ के प्रमुख श्रोता को बोध हो चुका था और वहाँ मात्र शंकानिवारण की गई। दोनों को उनका स्वरुप याद करवाया गया। उधर राम को शांति यिली और इधर निदिध्यासन के अभाव में अर्जुन का उत्तर अन्दरूनी शान्ति से दूर, कृष्ण के उपदेश से मात्र प्रभावित लग यहा था।
सर्ग १०१
रानी चुडाला प्रसंग
तत्किमर्थ मनर्थेऽस्मिन्निमग्नस्त्वं तपोमये।
आश्रमादि विकल्पांशसाध्यस्याऽघ कुकर्मणः।।४१।।
यानि यानीह दुःखानि प्रस्फुरन्ति जगत्रये।
चेतश्चापलजान्येव तानि तानि महीपते ।।५०।।
यूँ तो बिना देहाभियान के योगवासिष्ठ का पठन-पाठन श्रवण यनन, निदिध्यासन तक संभव नहीं तब यह प्रसंग क्या कहना चाह रहा है। पहले श्लोको को देखने पर रानी की शिक्षा सामने आती है जिसके अनुसार, 'राजन (महीपते) आप क्यों दुःख दायी कर्मों में अभीतक डुबे हुए है। ऊपर से सारी क्रियाएँ अपने-अपने आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास) के अभिमान तथा अन्य तरह की उपाधियों के दंभ से ग्रसित कुत्सित कर्म का ही अंग है। ऐसी तपस्याओं का प्रारम्भ, मध्य तथा अन्त तीनों दुःखी करते हैं। करते हुए तथा उसकी सफलता भोगने के बाद दोनों स्थिति में कष्ट होता है।
देहाभियान और संबंधों में ममत्व रहना स्वाभाविक है। जब यह भाव कर्तापन - भोक्तापन से जुडकर आत्माभ्यास से विमुख होता है तब अपनी स्वाभाविक अवस्था खोता है। इससे फलासक्ति इतनी बढती है कि
अनुरूप फल मिलने पर दंभ, न मिलने पर विषाद, औरो को उनके कर्मों का अच्छा फल मिलते देख ईर्ष्या जैसी नाना तरह की मानसिक उथल-पुथल होती है। ऐसी भावना के साथ किया हुआ कर्म, त्याग, दान, तीर्थयात्रा, तपस्या, हठयोग, वैराग्य, संकल्प, कल्पवास उचित नहीं। देखने सुनने में भले सात्विक शास्त्रसम्मत लगे पर वे पतन का कारण बनते हैं।
श्रीमद्भगवतगीत के अनुसार -
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।।२.४१।।
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः।।२.४२।।
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति।।२.४३।।
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते।।२.४४।।
उपरोक्त श्लोकों में यही समझाया गया है कि भोग-विलास प्रधान अज्ञानी की बुद्धि ऐसे कर्मों को सबकुछ समझती है जिनका आत्मज्ञान से कोई लेना-देना नहीं। हर शरीरधारी कोई न कोई सुख - दुःख भोगता है और दोनों का रहना अनिवार्य माना गया। ऊपर से हर समय की हाय - हाय के चलते ऐसे काल्पनिक सुखो की बाते गढी गई जिससे उनको पाना ही जीवन का लक्ष्य माना गया। लगातार आत्माभ्यास के बिना अन्य बाते निरर्थक है।
पचासवें श्लोक ये राजा शिखिध्वज को संबोधित करते हुए सीधे स्पष्ट शब्दों में बताया गया की तीनो जगत में जो - जो दुःख आते हैं उनका कारण चित की चपलता है और कुछ नहीं। यह चपलता आत्माभ्यास के अभाव में बढ कर दिव्य भोगो के पीछे दौडाती है।
सर्ग ११३
जीवोबुद्धिर्मनश्चितं माया प्रकृतिरित्यपि।
संकल्पः कलना कालः कला चेत्यापि विश्रुतैः।।११।।
एवभाद्यैस्तथाऽन्यैश्च नामभिर्बहुतां गतैः।
सहस्त्र रूपोऽहड्कारः कल्पितार्थेर्विजृम्भ्ते । ।१२।।
अहंकार शब्द का प्रयोग नाना तरीके से हुआ और क्रिया भेदानुसार उसके अलग - अलग नाम रखे गए समझाने के लिए। शिष्य वर्ग को बोध करवाने हेतु ऐसा करना आवश्यक था। उपरोक्त श्लोकों के अनुसार - प्राणों का आधार होने से जीव, निश्चय (निर्णय) पर पहुँचने से बुद्धि, मनन से मन (संकल्प - विकल्पात्मक स्थिति), चिन्तन से चित, असभ्कल्पना से माया, परिणामी (परिवर्तनशील) स्वभाव से युक्त होने से प्रकृति, संकल्प करते ही संकल्प, उसके संकल्पित अर्थ के पूर्वानुमान से इच्छा, संकल्पित अर्थों के विपरिणाम आदि में कारण होने से काल तथा उसमे भेद (स्थान, समय, नाम, रूप) की कल्पना से कला जैसे हजारों नामों से वह (अहंकार) जाना जाता है।
जिन नामों का उल्लेख श्लोकों में हुआ है वे क्रम से रखे गए है समझ में आने के लिए। अहंकार की संकुचित व्याख्या करने तथा उसे छोडने और उसके आधार पर किसी को अहंकारी कहना अनुचित है। सारे नाम रुपात्मक शरीर इसी के उदाहरण है तभी प्राणों का आधार होने से जीव शब्द आया श्लैक ये। शरीर की उपाधी से संयुक्त होने के कारण समष्टि वायु का नाम हुआ प्राण तथा उसका आश्रय स्थल (आधार) बना शरीर जो अहंकार का ही एक नाम है।
फिर चाहे कोई अपनी विशिष्ट पहचान बनाने के लिए शरीर तीन के बदले पाँच सात माने, सूक्ष्म इन्द्रियों के नाम कुछ अलग से कहे पर सब के सब अहंकार के ही नाम है अलग से कुछ नहीं। बच्चों की भाँति झगड कर क्या होगा की शरीर तीन नहीं सात होते, अन्तःकरण पाँच, चक्र नौ आदि सब वाणी विलास है। इन नामो को के आधार पर अपनी-अपनी श्रेष्टता प्रमाणित करने वाले कितने आए और चले गए पता नहीं। है तो सब के सब अहंकार के ही उदाहरण।
सर्ग ११६
बलादपि हि संजाता न लिम्पन्त्याशयं सितम्।
लोभमहोहादयो दोषाः पयांसीव सरोरूहम् ।।२।।
मुदिताद्याः श्रियो वकत्रं नमुञ्चन्ति कदाचन। रालत्यहड्कारमय चिते गलति दुष्कृते ।।३।।
वासनाग्रन्थयश्छिन्ना इव त्रुट्यन्त्यलं शनैः ।
कोपस्तानवमायति मोहो मान्द्यं हि गच्छति ।।४।।
कामः क्लमं गच्छति च लोभ क्वापि पलायते।
नोल्लसन्तीन्द्रियाण्युच्चैः खेदः स्फुरति नोच्चकैः ।।५।।
न दुःखान्युपंबृहन्ति न वल्गन्ति सुखानि च।
सर्वत्र समतोदेति हृदि शैत्यप्रदायिनी ।।६।।
क्या आत्माभ्यासी के जीवन में काम, क्रोध, मद, लोभ मोह, ईर्ष्या, निराशा आदि जैसे दोष नहीं आते-जाते? जबतक शरीरभाव है तब तक उपरोक्त तरंगे बाधा पहुँचाएँगी। फिर चाहे औरो के द्वारा ही क्यों न हो। यह कार्य ईर्ष्या, परीक्षा लेने, परेशान करने आदि के लिए किया जाता है। ऊपर से मौसम और देह जनित समस्याएँ आती जाती है। कमल अपने जन्मस्थल के चलते उसमे लिप्त नहीं होता। जल के दो चार छीटें किसी कारण वश उसपर गिरे तो वे कमल को अपने वश में नहीं कर पाते। यहाँ जन्मस्थल के लिए कमल कलंकित न हो कर अपने गुणों के चलते पूजित होता है। लगातार आत्माभ्यास करने वाले व्यक्ति विक्षेपो के साथ-साथ नहीं बहते नहीं रहता। सुख - दुःख आते-जाते है जैसे राजा जनक को जानकी विदाई और ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को संतान वियोग से उत्पन्न शोक। इस मानसिकता वे देखते-देखते बाहर आ गए। ज्ञानी और गंभीर अभ्यासी उसमे अधिक देर तक नहीं ठहरता। ये कोई पत्थर दिल वाले नहीं होते। वह तो आततायियों का लक्षण है। वासनाओं (इच्छाओं / अतृप्त एषणा) की गाँठे धीरे-धीरे टुटने लगती है। क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या आदि की मात्रा कम होने लगती है। इन्द्रिय समुह सांसारिक सुखो के लिए उछलकूद कम मचाते हुए अन्दरूनी शान्ति को अपनाता है। दुसरी ओर खेद तक की मात्रा अधिक नहीं रहती। ह्दय में ठंडक उदय होने लगती है। यह सब व्यवस्था में दिखाई दे तब समझना चाहिए कि आत्माभ्यास सही-सही हो रहा है। इसके लिए नाम वेषादि का कोई नियम नहीं है जो कि अधिक प्रचलित है।
सर्ग १२१
चिद्विलासो ह्यनड्कुशः ।।६।।
यह न्यूनाधिक हम सबकी वास्तविकता जो बहुधा औरों से छिपाना चाहते है पर उससे अपना भला कभी नहीं होता। चिदविलास में सत्वगुण अधिक परेशान करता है। तम और रज के मामले में सावधानी रहती है।
एतत्स्वरूपमासाद्य प्रकृतिः परिशाम्यति ।
न देशोमोक्षनामाऽस्ति न कालो नेतरा स्थितिः ।।१२।। जब आत्माभ्यासी अपना स्वरुप सही में जानने लगता है तब उस व्यक्ति विशेष के लिए अविद्या शान्त होते हुए अपने वश में नहीं रख पाती। शरीर शांत होने पर मोक्ष की अवधारणा पर प्रहार किया गया। मोक्ष नामक न प्रदेश (लोकादि), न काल (समय, मुहूर्त) और न अलग से कोई स्थिति (कर्मकांड) है। चार्वाक दर्शन, योगवासिष्ठ तथा वेदांत तीनो का मत एक है मोक्ष के बारे में। सारे बाहरी साधनो से मोक्ष मिलने की अवधारणा आत्माभ्यासी हेतु बाधक तथा घातक दोनो है।
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योगवासिष्ठ ६.निर्वाणप्रकरण - उत्तरार्ध
योगवासिष्ठ निर्वाणप्रकरण के इस लेख को पढते हुए
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सर्ग १९ (१६१)
विराज एते संकल्पा ब्रह्मविष्णुहरादयः ।
तस्य चित्तचमत्काराः सुरासुरनमश्चराः।।३३।।
विराट जीव के संकल्प स्वरुप ब्रह्या, विष्णु, शिव तथा उसीके चित्त के चमत्कार रुप सुर, असुर आदि है। यहाँ 'विराट जीव' का प्रयोग समझाने हेतु है अतः उसे नाय रुप मे बाँध कर अलग से कोई नाटक करने की भूल न की जाए। तब इस प्रसंग का उद्देश्य क्या है? एकता का प्रतिपादन मुख्य हेतु है। व्यष्टि से समष्टि की ओर संकेत है। मूर्ति पूजन पश्चात विसर्जन की क्रिया यही समझाती है कि भेद वास्तविक नहीं मनोमय है, काल्पनिक है, स्वप्निल है। व्यवहार मे मनुष्य ब्रह्मा की भाँति निर्माण, विष्णु की भाँति लालन-पालन तथा शिव की भाँति नाश करता है। इसके अलावा मन से सुर - असुर वाले भाव को पुष्ट कर तदनुसार व्यवहार होता है।
सर्ग २६ (१६७)
सर्व एव त्विमे भावाः परस्परमसिड्गनः ।
अटव्यामुपलानीव भावनैतेशु श्रृख्डला।।२।।
भावना ही अपने - पराए, तेरे - मेरे, संबंधी का बोध करवाती है। मानसिक स्थिति के रुप में भावना अपने वश में करती है। यह मन की भाँति चंघल होने से प्रतिक्षण अपना रंग रुप बदलती है।
तनोनि यत्तदात्मैव तस्य तत्र तथा स्थितम्।
छश्यिमावादसद् छशायं तेन कः करोति किम्।।२६।।
यहाँ बहिर्मुखी मन सृजनकर्ता के रुप में दर्शाया गया है। वह जिस ओर जैसे आकर्षित होता है वहाँ वैसा बनकर स्वयं स्थित हो जाता है। तभी एक वस्तु, घटधा, स्थान की व्याख्या अलग होती है। इतना ही नहीं एक व्यकि का मन तक एक जैसा निर्माण करता न वैसा होता है। पल प्रतिपल कुछ न कुछ नया होता है।
सर्ग २८ (१६९)
कर्मैव पुरूषो राम पुरूषस्यैव कर्मता।
एते ह्यभिन्ने विद्धि त्वं यथा तुहिनशीतते ।।८।।
ब्रह्मर्षि वशिष्ठ राम को संबोधित करते हुए कहते हैं कि कर्म और पुरुष का आपसी संबंध बर्फ और शीतल की भाँति अभिन्न है। कर्म ही पुरुष तथा पुरुष में कर्मरुपता कहने के पीछे अभिप्राय है की देह इन्द्रियों का मिराजुला रुप होने के कारण उसीसे सारे कार्य क्रियान्वित होते है और इसके अलावा शरीर अलग से कुछ नहीं।
संवित्स्पन्दरसस्यैव दैवकर्मनरादयः।
पर्याय शब्दा न पुनः पृथक्कर्मादयः स्थिताः ।।१०।।
दैव, कर्म, पुरुष (नाना आकार) आदि संवित के स्पन्दन से अनुभूत पर्यायवाची (व्यवहार जनित) शब्द है। इनमे से किसी का सब अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं।
चित्वं च क्वचिदस्पदं क्वचिदस्पदं स्वभावतः।
अनन्तमेकार्णक्वछिक्काल क्रम संस्थितम् ।।१२।।
'बहु स्यां प्रजायेयेति' जैसे इस छान्दोग्योपनिषद् के श्रुति वाक्य मे चिदित्मा का अकारण स्पंदन रुप सामने आता है। इसके बाद जगत में रेलाकार वृत्ति या भ्रम अध्यास (आरोपित) होता है।
चितस्वभिव कभी स्पन्दन शून्य तो कभी स्पन्दन रुप बन जाता है। सरल शैली में देखे तो मन कभी संसार रुप लेता है और कभी उससे अलग। इसीलिए देशकाल क्रम का प्रयोग हुआ है।
संवित्स्पन्दो वासनावानिह बीजमकारणम्।
भूत्वा कारणतामेति देहादेरडकुरावलेः ।।१३।।
कर्ता भोक्ता भाव से कर्म करते - करते उसके पाप, पुण्य, मिश्रित फल आवागमन के चक्र में घुमाते है। पहले स्पन्दन अकारण होता है जैसे शिशु की चेष्टाएँ (मुस्कुराना, हाथ - पाँव हिलाना)। उसके बाद इच्छाओं (वासनाओं) को अपनाकर या उनका रुप ले नाना तरह के शरीरो का कारण रुप बीज बन जाता है। कोई न कोई अतृप्त एषणा अधिकांश मामलो में रह जाती है।
द्वित्वं नृकर्मणोर्यस्य बीजाडकुरतया तयोः।
विपश्रिचत्पशवे तस्मै महतेऽस्तु सदा नमः ।।२२।।
जिसे पुरुष - कर्म, बीज - अंकुर में वास्तविक भेद दिखे ऐसे महान पण्डित (विद्विन) पसु को सदा नमस्कार करना चाहिए। ऐसे लोग भारवाही बन केवल शास्त्रो का बोझ ढोते रहते हैं।
सर्ग ३२ (१७३)
द्वैताद्वैतसमुद्भेदैर्वाक्य सन्दर्भ विम्रमैः।
मा विषीदत दुःखाय विबुधा अबुधा इव ।। ८।।
लगातार आत्माभ्यास न करने वाले विद्वतजन भ्रमित व्यक्ति की भाँति द्वैत अद्वैत जैसे नाना संकल्प विकल्प वाले क्लेशपूण वघनो पर विचार करते हैं। इस सर्ग में उन्हे ऐसे मानसिक पीडा पहुँचाने वाले कार्य से अलग रहने को कहा गया है। तत्वज्ञान वाणी विलास, बौद्धिक व्यायाम, शाब्दिक दंड बैठक पर निर्भर नहीं है। पहले कह दिया गया है कि इसमे व्यक्ति का अपना-अपना अनुभव ही प्रमाण है। यहाँ तक कि यह शक्तिपात तक से नहीं होता और न कोई गुरु करवा सकता है। कोई रास्ता दिखा दे, कुछ कदम साथ-साथ चले पर यात्रा स्वयं को करनी पडती है।
असदाश्रयते दुःखं स्वप्नवद्घनवासनः।
रूपालोकमनस्कारान् संकल्परचितानिव ।।९।।
अपनी नाना इच्छाओं के वशीभूत रहनेवाला मृग मरीचिका के पीछे-पीछे दौडते या धूप मे चमकती सीप को चाँदी समझने की भूल करते रहना है। स्वप्न मे मिले दुःख स्वप्न काल में सच लगते है। वैसे ही काल्पनिक नामरुपात्मक लोक (जगत) के प्रति दृढ लगाव उसे सच मानकर वैसा अनुभव करने के साथ-साथ तदनुरूप बहन लगता है। व्यकि संकल्प विकल्प के वश
आ कर अपने भीतर एक जगत का निर्माण करता है। इस तरह आन्तरिक बाहरी दोनो स्तर पर तीव्र मानसिक उथल-पुथल का अनुभव करता है। पदार्थों (जगत) को सत समझने के कारण उसे वैसे ही अनुभव होने के साथ वह उनमे (अनुभव) फँसा रहता है।
दुःखंसदेव नाश्र्नाति सुप्तवत्तनुवासनः।
रूपालोकमनस्कारान् संकल्परहितानिव ।।१०।।
प्रश्न उठधा स्वाभाविक है कि किसमे मानसिक वेदना से देखते-देखते बाहर आने की क्षमता है? संकल्प विकल्प में न बहनेवाला व्यक्ति संयमित जीवन शैली वाला होने के फलस्वरूप इच्छाओं के पीछे-पीछे दौडते नहीं रहता। धीरे-धीरे अतृप्त एषणा उसे परेशान नहीं करती। ऐसा अभ्यासी नामरुपात्मक लोक (जगत) की वास्तविकता सयझते हुए व्यवहार करता है। घुम फिरकर संयमित जीवन शैली तथा संतोष की बात सामने आई जो आत्माभ्यासी द्वारा संभव है।
श्रीमद्भगवतगीत :-
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।२.६९।।
सर्ग ३३ (१७३)
संविद्वारितरड्गौघा भ्रान्ति सर्गाः सहस्रशः।
विचारितास्त्वस्व्यास्ते सत्यास्त्वनुभवभ्रमात्।।२७।।
बुदबुदे, फेन जल की तरंग में दिखते हैं पर वे जल ही है और उसके अपनी शक्ति का परिणाम है। वेसे ही चिन्मय सत्ता का स्पंदन नाना सृष्टियों के रुप में दिखते का भ्रम पैदा करता है। विवेकशील या आत्माभ्यासी उसे असत्य और विवेकहीन को सत्य लगती है।
सर्ग ३४ (१७४)
अहं ब्रह्य जगच्चेति शब्दसंभ्रमविभ्रमः।
सर्वस्मिञ्छान्त आकाशे केन नामोपकल्पितः।।४।।
यही आश्चर्य है कि किसने शान्त चिदाकाश में अहं, ब्रह्म, जगत रुपी शब्दजाल की कल्पना की।
वेदनं बन्धनं विद्धि विद्धि मोक्षमवेदनम्।
यथास्थितं यथाचारं भव शान्तभवेदनम्।।३३।।
बन्धन मोक्ष की स्वतंत्र सत्ता नहीं। वेदना रुपी बन्धन पदार्थों की जानकारी से पैदा होता है। वेदना का संबंध सुख - दुःख दोनों से है। सुख तुरंत जाता हुआ या औरो के पास अधिक लगने या प्राप्त सुविधा में प्रसन्न न रहने से वेदना का कारण बनता है। दुसरी ओर असंयमित जीवन शैली या औरो से प्रतिस्पर्धा वश बाहरी पदार्थ पाने की छटपटाहट बन्धन का कारण बनती है। जहाँ उपरोक्त बाते लागू नहीं वहाँ मोक्ष है।
सर्ग ३६ (१७६)
निश्छित्वं समाधानभाहु रागम भूषणाः।
यथा शाम्येन्मनोऽनिच्छं नोपदेशतैस्तथा ।।२३।।
प्रारब्धवश मिले भोग को छोड अन्य भोगों की इच्छा का त्याग ही समाधि है। इच्छाओं के त्याग से मन जिस तरह से शान्त होता है वैसा सैकडों उपदेशों से नहीं होता। उपदेश सुनते हुए या मनन तक शान्ति का अनुभव टिकाऊ नहीं होता जबकि इच्छाओं में न बहने से मानसिक शांति बनी रहती है। इसीका अभ्यास जरुरी है।
शास्त्रोपदेशगुरवः प्रेक्ष्यन्ते किमनर्थकम्।
किमिच्छाननुसन्धान समाधिर्नाधिगम्यते ।।३४।।
यदि इच्छाओं का वेग शान्त नहीं किया हो पा रहा तब शास्त्रों और गुरुओ के उपदेश निरर्थक है। ऐसी प्रतीक्षा किस क्यों? सभा को संबोधित करते हुए कहा गया कि सब कोई चित की शान्ति हेतु इच्छा त्याग जैसे उपाय को क्यों नहीं अपनाते।
यस्येच्छाननुसन्धानमात्रे दुःसाध्यता मतेः।
गुरूपदेशशास्त्रादि तस्य नूनं निरर्थकम्।।३५।।
इस प्रसंग में अपने-अपने उद्धार हेतु औरों पर निर्भर रहने वालो पर प्रहार किया गया है। जिनको अपने विवेक द्वारा अपनी-अपनी इच्छा का विश्लेषण करने मे कष्ट हो रहा हो उनके लिए शास्त्रों और गुरुओ के उपदेश की निरर्थकता निःसन्देह प्रामाणिक बात है।
सर्ग ३७ (१७७)
शान्तं शिवमयं जगत ।१९।
यदा-यदा ज्ञतोदेति शाम्यतीच्छा तदा-तदा ।।२३।।
मार्गयन्ति प्रबोधाय तैर्मृगैरलमस्तु नः।
व्योमरूपे किलैकस्मिन् सर्वात्मनि तते सति ।।१६।।
व्योमरूपे शब्द का प्रयोग ब्रह्म को आकाश बताना नहीं वरन् समझाने के लिए हुआ। आकाश अर्थात जो स्तान दे और साथ ही सबमें समाया हुआ है वैसे ही ब्रह्म को लेना चाहिए। अब घटाकाश, मठाकाश, छिद्राकाश उपाधियों के कारण आकाश के टुकडे नहीं होते वैसे ही ब्रह्म भेदरहित है। इस श्लोक में उन महानुभावों पर प्रहार है जो दृशायमिन जगत को स्वीकार तथा सच मानकर ब्रह्मज्ञान के लिए नाना साधन ढूढ़ने रहते हैं। ऐसे लोग अपनी-अपनी बात मनवाने के लिए कुतर्क (वितण्डा, जल्प) का सहारा लेकर समझने की दृष्टि से शास्त्र चर्चा नहीं करते वरन स्वयं को श्रेष्ठ मनवाने का रोग पालते है। इन्हे मृग तथा इनकी परंपरा को शिष्य मृग कह अपनी दूरी बतला दी। पशु चरने के साथ-साथ जुगाली करते है और वाक् शक्ति का दुरुपयोग जुगाली वत है जहाँ विवेक जगा नहीं रहता।
यो हेतुः स्पन्दने वायोर्द्रवत्वे सलिलस्य च।
शून्यत्वे नमसः सौम्य सर्गादित्वे चिदात्मनः ।।१७।।
अपने शिष्य तथा मुख्य श्रोता को सौम्य शब्द से संबोधित करते हुए ब्रह्मर्षि वशिष्ठ कहते हैं कि जो वायु के स्पन्दन, जल के तरल, गगन के शून्य में हेतु (कारण) है वही सृष्टि (नाम रुपात्मक जगत) के होने में होने में है।
कार्यकारणभावादि ब्रह्यैव सकलं यदा।
तदा ब्रह्यणि सर्गाणां कारणार्था विलञ्जता ।।१८।।
जब कार्यकारण भाव से सब ब्रह्म ही है तब वापस उसमे सृष्टियों का प्रतिपादन या अलग से कारण खोजना निर्लज्जता (विलञ्जता) है।
काकतालीययोगेन परप्रेरणायाऽनया।
यदिकिञ्चत्कदाच्चि सम्यगिच्छति वा न वा ।।२८।।
काकतालीय न्याय के अनुसार परिस्थितिजन्य, परेच्छा या समष्टि प्रारब्ध के फलस्वरूप या देहधारण हेतु आत्माभ्यासी कुछ इच्छा कर सकता है या नही भी करता। व्यकि को केवल अपना प्रारब्ध नहीं वरन परेच्छा तथा समष्टि प्रारब्ध का अंश तक भोगना पडता है अगर उस व्यक्ति विशेष के चलते (कायिक या वाचिक या दोनो रुप) औरों को फल मिलना लिखा हो। उस व्यक्ति विशेष को फल मानसिक या दैहिक या दोनो रुप में मिलते देखे गए है।
प्रतिषेधविधीनां तु तज्ज्ञो न विषयः क्वचित्।
शान्तसर्वषणेच्छस्य कोऽस्य किं वक्ति किंकृते।।३१।।
आत्माभ्यासी बन चुके व्यकि विधि निषेध वाले
शास्त्रों से ऊपर है। पारलौकिक सुखो के पीछे-पीछे दौडने वाले बहिर्मुखी पर ही नियमादि अपनी-अपनी दाल गलाते है। तत्वदर्शी इच्छाओं के बँधन मे नही फँसता और उसका अभ्यास उसे देखते ही देखते इच्छा से अलग कर देता है तब ऐसी स्थिति में उसे कोई किस सिद्धि हेतु उसे उपदेश करेगा।
मैत्रेय्युपनिषद् अध्याय २ -
मृता मोह मयी माता जातो बोधमयः सुतः। सूतकद्वयसंप्राप्तौ कथं संध्यामुपास्महे ॥१३।।
हृदाकाशे चिदादित्यः सदा भासति भासति ।
नास्तमेति न चोदेति कथं संध्यामुपास्महे ॥१४।।
मोहरूपी माँ मृत्यु और ज्ञानरूपी पुत्र उत्पन्न होने से दो प्रकार का सूतक लगा तब संध्या किस प्रकार की जाए?।।१३।।
हृदयाकाश मे चैतन्य रूप सूर्य सदैव प्रकाशित रहता है तब फिर सन्ध्या किस प्रकार करे? ॥१४।।
परब्रह्मोपनिषद्
सशिखं वपनं कृत्वा बहिःसूत्रं त्यजेद्बुधः।
यदक्षरं परं ब्रह्म तत्सूत्रमिति धारयेत् ॥६।।
बाहरी शिखा सुत्र का परित्याग कर पर ब्रह्म अक्षर रुप सूत्र को धारण करना चाहिए। यह श्लोक ब्रह्मोपनिषद् में भी मिलता है। दोनो उपनिषदों में उस आत्माभ्यासी की बात कही गई है जो इच्छाओं से परे है। इनमे और योगवासिष्ठ में इसके लिए अलग से सन्यास लेने की बात नहीं की गई। चारो आश्रम अविद्या के अलग - अलग रुप है जिसे रानी चुडाला प्रसंग द्वारा समझाया गया। प्रायोजक विद्वानों ने उपरोक्त श्लोकों का संबंध सन्यास आश्रम से लगाया जो उचित नहीं।
दृश्यं विरसतां यातं यदा न स्वदते क्वचित्।
यदा नेच्छा प्रसरति तदैव च विमुक्तता ।।३३।।
आत्माभ्यासी को धीरे-धीरे सारा नाम रुपात्मक प्रपंच नीरस लगने लगता है। यह स्वाभाविक परिवर्तन उसे इच्छाओं से बचाने के साथ-साथ उनके बंधन से मुक्त रखता है।
कृष्ण यजुर्वेद ब्रह्मबिन्दूपनिषद्
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥२।।
सांसारिकता में फँसा मन इच्छा का दास बन बंधन में फँसता है। विषयासक्त मन बंधन तथा उससे रहित मन ही मुक्ति (मोक्ष) है।
सर्ग ३८ (१७८)
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपश्यसि हंस्यषि तत्सर्वं शिवमव्ययम् ।।३७।।
कर्मेन्द्रियों द्वासर्गरा होने वाली क्रियाएँ जैसे खाना, हवन, दान, तप, देखना, चलना आदि को शिवरुप समझिए। यहाँ गलत (अनाचार, दुराचार, व्यभिचार, आदि) कार्यों को शिवरुप समझने की बात नही है। प्राकृतिक विनाश मनुष्य की कर्मेन्द्रियों से नहीं होता पर वह शिवरुप है क्योंकि सृष्टि की त्रिपुटी में संहार विभागाध्यक्ष शिव है। नूतन निर्माण मे पुराने को जाना पडता है।
श्रीमद्भगवतगीत! :-
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्।।९.२७।।
कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, खाते हो, हवन करते हो, दान देते हो और जो तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो। उपरोक्त श्लोक श्रीमद्भगवतगीता मे तनिक दुसरे रुप मे है। इसे पढ कर यही लगेगा कि कृष्ण अपने बारे में कह रहे हैं की सारी क्रियाएँ उनको समर्पित की जाए। ऐसे प्रयोग श्रीमद्भगवतगीता मे बहुत है और गलत अर्थ लगता है कृष्ण शब्द को अवतार तक बाँधने से। इस रुप में अर्जुन और कृष्ण साथ-साथ थे फिर उपदेश की क्या आवश्यकता थी। नाम रुपात्मक जगत तथा कर्ता - भोक्ता भाव से परे करने के लिए उपदेश हुआ अतः वहाँ शुद्ध अन्तःकरण मे होनेवाले अनुभव को संबोधित किया गया है कृष्ण शब्द से।
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धारणा, ध्यान, समाधि अलग से करने वाली क्रिया नहीं है। योग दर्शन तक अष्टांग योग में केवल शब्दों का उल्लेख करता है परिभाषा और शैली की नहीं। उसे बाद में औरों ने अपनी तथा अपने-अपने भक्तों की सुविधानुसार इन्हें समझाया। यहाँ केवल प्राचीन प्रमाणों को देखते हुए उनकी उपादेयता प्रस्तुत की जाएगी। उन प्रमाणों की संगति आपस में लगती है।
सर्ग ४६ (१८६) -
तदेतभोगवैतृष्ण्यं ध्यानमडकुरित हि तत्।१७।।
अस्ति चेद्भोगवैतृष्ण्यं किमन्यद्ध्यानदुर्धिया।
नास्ति चेद्भोगवैतृष्ण्यं किमन्यद्ध्यानदुर्धिया।। १९।।
दृश्यस्तदनमुक्तस्य सम्यग्ज्ञानवतो मुनेः।
निर्विकल्पं समाधानम विरामं प्रवर्तते।।२०।।
यस्मै न स्वदते द्दष्यं स सम्बुद्ध इति स्मृतः।
न स्वदन्ते यदा भोगाः सम्यबोधस्तथोदितः ।।२१।
विषयों में नीरसता का अनुभव नाना कारणों से होता है पर वह मसानिया वैराग्य की भाँति टिक नहीं पाता। योगवासिष्ठ के उपरोक्त श्लोकों में स्वाभाविक रूप से उत्पन्न नीरसता का उल्लेख है। कई व्यक्तियों में स्वाभाविक रुप से विषयों के प्रति अरुचि रहती है। विषय उन्हें आकर्षित करते हैं पर अगर वे न मिले तो वे जीवन से निराश नहीं होते और आत्महत्या, नशादि जैसे काम की ओर नहीं बढते। आन्तरिक ऊब के चलते परिस्थिति के साथ समायोजन या सामंजस्य करते हुए अनुकूलता का कोई न कोई विचार उन्हें संभाल लेता है। यही भावना धारणा कहलाती है। यह भावना जहाँ टिक जाए वहीं वैराग्य रुपी ध्यान अंकुरित होता है। जब इसमे दृढता आती है तब वह स्थिति समाधि कहलाती है।
योगवासिष्ठ में धारणा, ध्यान , समाधि का संबंध अन्य किसी क्रिया से नहीं है। तभी कहा गया कि विषयों के प्रति आसक्ति है तब ध्यान रूप दुःख साध्य बुद्धि से कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा। यहाँ दुःख साध्य का अर्थ उन क्रियाओं से है जिनसे दैहिक दृष्टि सिद्ध होती है। ऐसे ध्यान से एकाग्रता बढने के साथ स्थूल - सूक्ष्म शरीर से अलग होने के अनुभव को फरमानंद मानने वाले कारण शरीर तक सीमित रहते हैं। भले ही उस स्थिति में समाधि लगे पर उससे बाहर आते ही संसार ज्यों का त्यों सवार हो जाता है। दुसरी पंक्ति में प्रश्न किया गया है कि अगर विषयासक्ति नहीं है तब ध्यान रूप दुःख साध्य बुद्धि से कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा।
बीसवे श्लोक में निर्विकल्प समाधि का वर्णन है। खाने के लिए तो कुछ जीने के लिए खाते है। वैसे ही कुछ व्यावहारिकता में डुबे रहते है तो कुछ अलग रहते है। यहाँ जीने हेतु भोजन तथा व्यावहारिकता से अलग रहनेवालो की बात है। दृश्य के स्वाद से मुक्त वाली स्थिति का उल्लेख श्लोक के आरंभ में हुआ। यहाँ 'मुक्त' शब्द का प्रयोग किया गया 'हीन' का नहीं। व्यक्ति स्वाद के पीछे-पीछे न भागे और मन समता की ओर रहे तभी वह 'स्वाद से मुक्त' का अर्थ ग्रहण कर पाएगा। सब जगह एक - सी सभी सुविधाएं देखने वाले इस स्थिति को मन से नहीं स्वीकारेंगे। स्वादानुसार न बहने के साथ-साथ विवेक रुपी ज्ञान हो तब उस स्थिति में रहते हैं जिसे यहाँ निर्विकल्प समाधि कहा गया। केवल एक यानि 'स्वाद से मुक्त' या 'विवेक' होने स पञ्च स्वाद (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) लोग अपनी-अपनी शैली में श्लोक का अर्थ लगाएंगे। अगले श्लोक में केवल 'न स्वदते द्दष्यं' यानि दृश्य के प्रति स्वाभाविक अरुचि का उल्लेख है। उसमें विवेक जुडा हुआ है।
इक्कीसवें श्लोक में तत्वज्ञ की दृष्टि में ज्ञानी उसे मानने की बात कही गई है जो विषयों के स्वाद से मुक्त हो। तभी सम्यक् ज्ञान उत्पन्न होगा।
तेजोबिन्दूपनिषत् प्रथमोऽध्यायः में कहा गया -
धारणा का स्वरुप
यत्र यत्र मनो याति ब्रह्मस्तत्र दर्शनात् ।
मनसा धारणं चैव धारणा सा परामता ॥ ३५॥
जहाँ-तहाँ मन जाए वहाँ - वहाँ ब्रह्म का ही दर्शन है। यह उत्कृष्ट धारणा है।
ध्यान का स्वरुप
ब्रह्मैवास्मीति सद्वृत्त्या निरालम्ब तया स्थितिः ।
ध्यानशब्देन विख्यातः परमानन्ददायकः ॥ ३६॥
प्रपञ्च का अनुसन्धान यानि उसके साथ-साथ बहना छोड देना चाहिए तथा अनियंत्रित इच्छा पूर्ति तथा संतोषहीनता वश विषयों के पीछे-पीछे भागना बन्द करना ही ध्यान है। व्यक्ति हाय - हाय नहीं करता। व्यवसायिकत की दृष्टि से संयमित लाभ से खुश रहता है मुनाफाखोरी नहीं अपनाता। नकली शिक्षकों की अधिकतम लाभ की अनैतिक शिक्षा से दूर रहता है। यही तथ्य सद्वृत्ति तथा निरालंब शब्दों से श्लोक में कही गई है। प्रथम पंक्ति में ब्रह्मैवास्मीति का शाब्दिक अर्थ अहं ब्रह्मास्मि है पर उतने से बात साफ नहीं होती। यहाँ उस दृष्टि की ओर समझाया गया है कि औरों के लाभ, उन्नति, ऊँचे स्तर को देखकर ईष्र्या न करो वरन यह बात मन में बिठाओ की तुम उस रूप में वह भोग रहे हो। अपनी-अपनी उन्नति की चेष्टा णरने की मनाही नहीं है पर यह भी सत्यं है कि सबको सबकुछ नहीं मिलता। सारे पेड - पौधे एक जैसे नहीं होते और न एक रंग ही है जगत में। किसी की समयानुसार अधिक बूझ होने से बाकी चीजें व्यर्थ नहीं होती।
समाधि का स्वरुप
निर्विकारतया वृत्त्या ब्रह्माकारतया पुनः ।
वृत्तिविस्मरणं सम्यक्समाधिरभिधीयते ॥ ३७॥
नाम रूपात्मक जगत मिथ्यात्व अन्तःकरण में बैठ जाता है। उपरोक्त दो श्लोकों में धारणा - ध्यान में जिस आत्माभ्यासी की बात है उसमें स्थापित होना ही समिधि है। ऐसे व्यक्ति सावधानीपूर्वक रलते हुए निर्धारित जीवन जीते हैं। समष्टि योजनानुसार ऐसे व्यकि को संभाल लिया जाता है प्रकृति द्वारा।
अगर किसी मुद्रा या क्रिया को समाधि कहने में भयानक दोष है क्योंकि उस अवस्था विशेष से बाहर आने पर पूरा प्रपञ्च सवार होता है।
ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की त्रिपुटी में स्थित संत कबीरदास के इस पद में यही भाव दर्शाया गया है :-
संतो सहज समाधि भली
साईं ते मिलन भयो जा दिन ते सुरत न अन्त चली
आँख न मूँदूँ कान न रूँधूँ काया कष्ट न धारूँ
खुले नैन मैं हँस-हँस देखूँ सुंदर रूप निहारूँ
कहूँ सो नाम सुनूँ सो सुमिरन जो कछु करूँ सो पूजा
गिरह उध्यान एक सम देखूँ भाव मिटाऊँ दूजा
जहँ-जहँ जाऊँ सोई परिकरमा जो कछु करूँ सो सेवा
जब सोऊँ तब करूँ दण्दवत पूजूँ और न देवा
शब्द निरंतर मनुआ राता मलिन बचन का त्यागी
उठत-बैठत कबहुँ न बिसरै ऐसी तारी लागी
कहै 'कबीर' यह उनमुनि रहनी सो परगट कर गाई
सुख-दुख के इक परे परम सुख तेहि में रहा समाई ।
The word “meditate” originates from the Latin word meditatum, which means, to ponder or think carefully on any topic. While doing this the practitioner is focused on one particular query and sidelines other issues. At this junction the word "concentration" comes on the surface which do not justify meditation properly. The concentration is the status where an individual stays under the influence of same type of frequency related with physical (body level - gross, subtle or causal), mental or intellectual level. And for this separate expertise on meditation isn't needed. Everyone experienc
and express this knowingly - unknowingly through their favorite action or where there is a threat on one's own life like driving. A baby who does not even know the meaning or spelling of concentraition, demonstrates this via his / her behavior while playing with the toy or watching cartoons which are his /her favourite. On the other hand the concentration is present in performing various crimes, violence,
smuggling, black marketing, adultering, manufacturing fake goods, brainwashing.
They cannot be simply sidelined by calling it a misuse of meditation. In fact it is the byproduct of the concept of meditation. Therefore proper understanding of the vision / concept of meditation is essential. In the simple terms it can be described as a way of living where there is no need of any particular dress, day, time, aroma, music, initiatuon, mantra which continuously keeps a practioner at body level.
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सर्ग ६२ (२०२)
स्वप्नस्य विद्यते द्रष्टा साकारो युष्मदादिकः ।
द्रष्टा तु सर्गस्वप्नस्य चिद्व्योमैवामलं स्वतः ।।४०।।
समझाने, अभ्यास तथा आसक्ति दूर करने हेतु जाग्रत तथा स्वप्न को एक कहते है। अन्तर पर दृष्टि देने से स्वप्न में द्रष्टा साकार (अतृप्त एषणा या त्रिगुणात्मक इच्छानुसार) है परन्तु सृष्टिरूपी स्वप्न का द्रष्टा मलरहित चिदाकाश (स्वतः) ही । यहाँ 'तु' शब्द त्रोति के लिए है और इसमे सभा में सभी उपस्थित सभी लोग हैं।
सर्ग ८० (२१५)
सर्वभूतात्मभूतत्वात्सर्व गत्वान्महाकृतिः।
यानि तस्यानुषक्तानि पञ्चज्ञानेन्द्रियाण्यलम्।।२१।।
तत्वज्ञों ने पञघ ज्ञानेन्द्रियों को रुद्र के पाँच मुख माना है। इसीलिए ये प्रकाशवान है। किंपञघवदनः का यही उत्तर बताया जाता है।
सर्ग १०० (२३०)
निर्मानमोहां जितसंगदोषाः प्रवाहंसप्राप्तनिजार्थमानः।
तिष्ठन्ति कार्यव्यवहारद्दष्टौ निरामया यन्त्रमया इवैते।५१।।
जिस तरह यन्त्र की अपनी इच्छा - अनिच्छा नहीं रहती तथा वह केवल अपनी भूमिका मात्र निभाता है वैसे ही अपने-अपने स्थान तथा समयानुसार निर्धारित कार्य करना चाहिए। मोह जाल को काटने का यही सीधा-सादा उपाय है। मोह के जाल जंजाल में फँसकर मनुष्य नाना बँधनों में आ जाता है और विवेक का सही-सही उपयोग नहीं हो पाता।
सर्ग १०१ (२३१)
मरिष्यामि मरिष्यामि मरिष्यामीति भाषसे
भविष्यामि भविष्यामि भविष्यामीति नेक्षसे ।।२८।।
शरीर शांत होने की सच्चाई न्यूनाधिक सबको याद रहती हैं। इसीलिए 'मैं मर जाऊँगा' (मरिष्यामि) दोहराया गया और उसकी काट दिखाने के लिए भविष्यामि दोहराया गया जो कह रहा हैं कि 'मैं चिद्रूप से रहूँगा रहूँगा रहूँगा - ऐसा मनन नहीं करते जो आत्माभ्यास का ही अंग है।
सर्ग १०२ (२३२)
क्रियाफलानि चिद्वयोम गमनादीनि राघव।
अज्ञानामपि सिध्यन्ति मन्त्रौषधिवशादिह ।।३२।।
राघव संभोधन द्वारा ब्रह्मर्षि वशिष्ठ अज्ञानियों को प्राप्त होने वाली आकशगमनादि सिद्धियों के बारे में कहते हैं कि वे यन्त्र, तन्त्र, मन्त्र, औषधि के वश में होने के कारण मिल जाती है। यह सर्ग उन सभी सिद्धियों का संबंध आत्मज्ञान से न होने की बात समझा रहा है। मूढमति या पूर्णतः बहिर्मुखी व्यक्ति तक इन्हें पा सकता है। चूँकि ये सारी क्रियाएँ सूक्ष्म और कारण शरीर से संबंधित है और योग दर्शन कारण शरीर के आनन्द को ही ब्रह्मानन्द या आत्मज्ञान या स्वरुपानुभूति से जोडकर देखता है तब वहाँ वास्तविकता समझानी जरुरी है।
सर्ग १०३ (२३३)
यान्ति वो दिवसाः कष्ट विज्ञातगभाग्माः।
व्यवहारे हि तैरेव प्रतिपालयतां मृतिम्।।३१।।
यह जानते हुए भी कि कब मृत्यु आएगी पता नहीं अधिकांश व्यक्तियों का समय व्यवहार में व्यतीत होता है। व्यावहारिकता संभालते - संभालते कब दिन आया - गया पता नहीं चलता। ऊपर से समय की कमी का रोना साधारण बात है। अपने आत्माभ्यास के लिए समय भले न हो व्यवहार हेतु रहता है। लौकिक व्यवहार में व्यस्तता में यह स्थिति दिखती ही है। कई बार निठल्ला व्यक्ति तक व्यर्थ की बातो में व्यस्त रहता है। प्राण - अपान प्रवाह में दिन - रात व्यतीत होते हैं। संसार का व्यवहार किसी के भरोसे नहीं टिका अतः व्यर्थ की चर्चा या ऐसे वैसे व्यवहार वश समय का दुरुपयोग न सामाजिकता की बात करने वाले बहुधा व्यवहार के प्रबल पक्षधर देखे जा सकते हैं। ऐसो के झाँसे में रहना ही मंगल है।
सर्ग१४८ (२५६)
सत्यस्वप्नस्थितिर्लोकेश्वीछग्रूशा यदा स्थिता।
तदैशा काकतालीयन्यायादन्या न लभ्यते।।४।।
इस श्लोक में काकतालीय शब्द का प्रयोग इसके एवं इस सर्ग को समझने के लिए पर्याप्त है। पहले काकतालीय न्याय समझे। शब्दाय्थानुसार ताल वृक्ष पर कौवा बैठा और उसी समय एक ताल फल गिरा जिससे कौवे को मान हुआ की उसके चलते फल गिया। इन दोनों घटनाओ में कार्य कारण का संबंध बिल्कुल नही है। वैसे ही स्वप्न के सत्य होने के लिए कहा जाता है। चिकित्सा जगत में स्वप्न विज्ञान (Oneirology) की पढाई होती। विशेषतः आयुर्वेद तथा पाश्चात्य चिकित्सा दोनों में इसका अपना स्थान है। यह सर्ग उस मानसिकता पर प्रश्न खडा करता है जहाँ इसके आधार पर साधारण लोगो को भ्रमित किया जाता है। अब स्वप्न का निर्माता कर्ता भोक्ता कोई दुसरा तीसरा नहीं वरन स्वप्न देखने वाला व्यकि ही है। आयुर्वेद की शैली में कहे तब सारे स्वप्न वात, पित और कफ में एक या दो या तीनो के कुपित होने से आते हैं। देखा जाए तो अधिकांश सपने याद नहीं रहते अतः उनकी संख्या पर ध्यान न दें। जिनको देवी-देवताओं के दर्शन बहुत म होते हैं वह कल्पना मात्र है सच नहीं। लालन-पालन तदनुसार वातावरण दिशा देता है ऐसे सपनो को और इस आधार पर सपने आते हैं इनके उनके दर्शनों के। भविष्य में होने वाली घटना को पहले सपने में देखने का सौभाग्य सबको नहीं मिलता पर दावा करनेवाले बहत मिलते हैं।
काकतालीय शब्द को विस्तार से समझने के बाद पूरे श्लोक को देखे तब यही बात प्रमाणित होता है कि स्वप्न की सच्चाई काकतालीय न्याय की भाँति है इसलिए इसको लेकर दिमाग को बोझिल न ब न बनाया जाए।
सर्ग १५४(२३०)
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्।।।
श्रीमद्भगवतगीत १५.५ मे यह पूरा श्लोक है।
यह श्लोक आत्माभ्यास की शैली समझा रहा है। अन्वय का खेल खेले बिना इस श्लोक के 'अध्यात्मनित्या' शब्द को खोलना पर्याप्त है। श्रीमद्भगवतगीत में अध्यात्म शब्द दो बार आया है। आठवें अध्याय के तीसरे श्लोक मे इसकी परिभाषा दी - स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते - अपना मूल स्वभाव ही अध्यात्म है। मूल स्वभाव नाम रुप से अलग या किसी भी उपाधि से रहित है। उपाधियाँ यानि वे सारे व्यावहारिक परिचय जो सबके साथ जुड कर
मनुष्यों को अत्यधिक परेशान करते हैं। परिस्थितियों का सामना करते हुए वह अपना मूल स्वभाव भुल जाता है। इस ऊहापोह से परेशान होने के उपरांत कुछ लोग इससे परे की बात सोचते हुए स्वरुपानुसंधान या आत्मज्ञान के पथ पर चलने है। यहाँ अध्यात्म शब्द को केवल पठन-पाठन, श्रवण, मनन, लेखन तक संकुचित करने से पूरे प्रसंग के साथ अन्याय होगा क्योंकि अध्यात्मविचार बौद्धिक व्यायाम या समय बिताने का सात्विक साधन बनकर रह जाता है। निदिध्यासन और अपने स्वयं के प्रयास से ही आत्माभ्यासी बनता है मनुष्य। उपनिषद तक बाहरी साधनो को प्रधान और प्रबल कारण नहीं मानते।
ऐसा नहीं है कि आत्माभ्यासी के जीवन मे द्वन्द्व नहीं होता या सुख - दुःख की अनुभूति नहीं होती पर वह उसके अनुसार बहते नहीं रहता। जैसे पहले कहा जा चुका है कि उस व्यक्ति विशेष का अभ्यास उसे बचा लेता है। अभ्यास की दृढता हेतु हर अभ्यासी हर समय स्वयं को जाँचता परखता रहे।
सर्ग १५५ (२६१)
ज्योतिः शास्त्रार्थ विज्ञानैरिह भाव्यर्थवेदनम्।
भवत्यन्यदपूर्वं तु न किंचन कदाचन ।।५५।।
ज्योतिष विद्या वाले प्राचीन शास्त्र भविष्य में होनेवाली घटनाओ की जानकारी देने के अतिरिक्त कुछ अलग से नहीं कर सकते। होनी को पलटना उनके सायर्थ्य की बात नहीं। केवल इतना ही नहीं वरन शनि राहु केतु के य नामपर चलने वाली बाते मनगढंत है। सान्त्वना के लिए जो उपाय बताय जाते हैं वे प्रारब्ध वश भले सफल हो अधिकतर असफल रहते हैं। जिन समस्याओ के निदान हेतु लोग ज्योतिषियों के पास जाते हैं वे बतलाने (ज्योतिषी) वाले के परिवार में रहती है और वे उसे पलट नहीं पाते। आहार विहार तथा व्यवहार दोषपूर्ण है तब तथाकथित अच्छे ग्रहो के रुप में चर्चित तक ठीक-ठीक काम नहीं आते।
सर्ग १६३ (२६७)
तेषां सततयुक्तानां भजता प्रीतिपूर्वकम्।
जायते बुद्धियोगोऽसौ येन ते यान्ति तत्पदम्।।४१।।
श्रीमद्भगवतगीत
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।।१०.१०।।
यह सर्ग आत्माभ्यासी को प्राप्त होनेवाले बुद्धियोग अर्थात नीर-क्षीर-विवेके को बतला रहा है। यह विवेक किसी नाम - रूप पर निर्भर नहीं और न किसी के द्वया दिया जा सकता है। श्रीमद्भगवतगीता मे पहली पंक्ति वही है जो इस श्लोक की है। दोनो मे 'भजता' शब्द किसी की शरण लेने के बारे में नहीं वरन अपने मूल स्वभाव के साथ रहने की शिक्षा है। न्यूनाधिक सभी ने गीता के इस श्लोक की व्याख्या नाम रुप वाले कृष्ण से जोड कर रखी जिसपर ठीक से विचार जरूरी है।
आत्मज्ञान हेतु बुद्धियोग शब्द आया जो औरों के देने और उत्पन्न करवाने की वस्तु नहीं। अन्य माध्यमों से जानकारी मिलती है पर सबलता हेतु स्वयं का अपना प्रयास चाहिए। यह सर्वमान्य तथ्य है कि आत्मज्ञान की बाते सुनते-सुनते और इससे संबंधित शास्त्रों के पठन-पाठन से मन प्रभावित होता है। इससे आत्मज्ञान में निष्ठा बनना तो दूर मनुष्य बहुत विक्षिप्त या पलायनवादी या केवल बोलनेवाला वाचिक वेदांती या मसानिया बैरागी बन कर रह जाता है। ऐसो को ही शास्त्रबंधु, शास्त्रशिल्पी तथा शास्त्रवाही कहते हैं।