☁️⛅🌥️🌤️🌦️तप क्या है?☁️🌥️⛅🌤️🌦️
बृहदारण्यक उपनिषद (५-१३-१ - तपो नाम त्रयोदश ब्राह्मण) :-
एतद् वै परमं तपो यद् व्याहितस्तप्यते परम(गुम) हैव लोकं जयति, य एवं वेद, एतद् वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यं(गुम) हरन्ति परम(गुम) हैव लोकं जयति य एवं वेद, एतद् वै परमं तपो यं प्रेतमग्नाभ्यादधति परम(गुम) हैव लोकं जयति य एवं वेद।
ज्वरादि व्याधियाँ निःसन्देह पीडाकारक है। उस पीडा को परम तप समझना चाहिए। ऐसा जानने वाला परम लोक को जीत लेता है। यहाँ किसी अलग लोक की बात नहीं है वरन् यह बतलाया जा रहा है - - तप की भावना के चलते मनुष्य पीडा में सहज रहने का अभ्यास करता है और उसके चलते अवसाद को प्रश्रय नहीं देता। यह नहीं की पीडा नहीं होती या अवसाद पैदा नहीं होता। शव को ले जाने तथा जलाने की क्रिया (उस समय वन में ले जाते थे तभी उसका उल्लेख है), को परम तप के रूप में लेने वाला परम लोक को जीत लेता है। मृत्यु में यानि अन्तिम समय की ओर जानेवाला इसे तप रूप में ले। तप रूप परमात्मा की प्राप्ति होती है क्योंकि परमात्मा का अपना कोई रूप नहीं है। यहाँ समझाया यही जा रहा है कि निरोग कोई नहीं है और जाना सबको है। औरों में यह सब देख कर स्वयं में सुधार करना चाहिए।
तब क्या हर क्रिया को तप बुद्धि से सहने या करने की बात कही जा रही है? ऐसा नहीं है तब फिर? ऐसा क्यों नहीं समझ सकते? वाच्यार्थ उसी ओर संकेत कर रहा है, असुविधा क्या है? व्याकरण तो उसीके पक्ष में है।
तप पर जो विचार प्रस्तुत है आपके सामने उन्हें पढते समय या उसके बाद लग सकता है कि यह तो व्यवहारिक चिन्तन है इसमें अध्यात्म नहीं है। व्यवहार की जरूरत सबको होती है फिर चाहे कोई वन या गुफा में रहे। कम से कम अपने शरीर के साथ तो व्यवहार होता है। अध्यात्म की राह व्यवहार विरोधी नहीं है वरन उसकी सही समझ होने के बाद साधक अध्यात्म की राह पर चलने लायक बनता है। केवल टीका लिखने, आचार्य बनने या बाहरी रहन सहन तो नाटक मात्र है। अगर परमात्मा प्राप्ति की बात करें तो वह पहले ही प्राप्त है। उसका बोध तभी होगा जब व्यवहारिक ग्रन्थियाँ छिन्न भिन्न होंगी।
बहुधा स्वयं में सुधार की बातें अच्छी नहीं लगती और तथाकथित साधक कहने लगता है कि आप केवल ज्ञान की बातें करें। यह असत का संग और सत पर मात्र गाल बजाना है जो सही नहीं है।
अब जरा तप शब्द में झाँक कर देखा जाये :--
इनमें उलझा हुआ साधक मन की ऊपरी सतह ही साफ कर पाता है और गहराई में जमी काई पर ध्यान नहीं जाता क्योंकि उससे वह अनजान रहा। उस ओर ध्यान दिलवाया ही नहीं गया। भूले भटके ध्यान चला गया उस ओर तब भी वह कुछ नहीं कर पाया। मन को साफ करने तथा रखने की कला से वह अनजान रह गया। वन या गुफा में रहने से ही साधना स्थाई नहीं होती है। वहाँ मन की सफाई पर ध्यान देना चाहिए। आखिरकार अपने शरीर, मन, बुद्धि से व्यवहार होता है। बहुधा मन साफ नहीं रहता और कभी कभार सफाई का अहसास हो जाए तो उसपर साधक नजर नहीं रखता। मन की ऊपरी सतह की सफाई को पूरी सफाई मान लेता है और सेवा के नामपर यश कमाने निकल पडता है या किसी तथाकथित अलौकिक सुख में डूब कर आवागमन के चक्र में फँसा रहता है। वह साधक मन की तरफ से निश्चित हो जाता है और यही निश्चिंतता धीरे - धीरे मन को कलुषित कर देती है।
संत कमाल, संत तुलसीदास, संत सूरदास आदि ने ऐसे तप की निंदा की है। ऐसे तप में सहजता नहीं रह पाती जो रहनी जरूरी है ।
बृहदारण्यक उपनिषद (५-१३-१ - तपो नाम त्रयोदश ब्राह्मण) :-
एतद् वै परमं तपो यद् व्याहितस्तप्यते परम(गुम) हैव लोकं जयति, य एवं वेद, एतद् वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यं(गुम) हरन्ति परम(गुम) हैव लोकं जयति य एवं वेद, एतद् वै परमं तपो यं प्रेतमग्नाभ्यादधति परम(गुम) हैव लोकं जयति य एवं वेद।
ज्वरादि व्याधियाँ निःसन्देह पीडाकारक है। उस पीडा को परम तप समझना चाहिए। ऐसा जानने वाला परम लोक को जीत लेता है। यहाँ किसी अलग लोक की बात नहीं है वरन् यह बतलाया जा रहा है - - तप की भावना के चलते मनुष्य पीडा में सहज रहने का अभ्यास करता है और उसके चलते अवसाद को प्रश्रय नहीं देता। यह नहीं की पीडा नहीं होती या अवसाद पैदा नहीं होता। शव को ले जाने तथा जलाने की क्रिया (उस समय वन में ले जाते थे तभी उसका उल्लेख है), को परम तप के रूप में लेने वाला परम लोक को जीत लेता है। मृत्यु में यानि अन्तिम समय की ओर जानेवाला इसे तप रूप में ले। तप रूप परमात्मा की प्राप्ति होती है क्योंकि परमात्मा का अपना कोई रूप नहीं है। यहाँ समझाया यही जा रहा है कि निरोग कोई नहीं है और जाना सबको है। औरों में यह सब देख कर स्वयं में सुधार करना चाहिए।
तब क्या हर क्रिया को तप बुद्धि से सहने या करने की बात कही जा रही है? ऐसा नहीं है तब फिर? ऐसा क्यों नहीं समझ सकते? वाच्यार्थ उसी ओर संकेत कर रहा है, असुविधा क्या है? व्याकरण तो उसीके पक्ष में है।
तप पर जो विचार प्रस्तुत है आपके सामने उन्हें पढते समय या उसके बाद लग सकता है कि यह तो व्यवहारिक चिन्तन है इसमें अध्यात्म नहीं है। व्यवहार की जरूरत सबको होती है फिर चाहे कोई वन या गुफा में रहे। कम से कम अपने शरीर के साथ तो व्यवहार होता है। अध्यात्म की राह व्यवहार विरोधी नहीं है वरन उसकी सही समझ होने के बाद साधक अध्यात्म की राह पर चलने लायक बनता है। केवल टीका लिखने, आचार्य बनने या बाहरी रहन सहन तो नाटक मात्र है। अगर परमात्मा प्राप्ति की बात करें तो वह पहले ही प्राप्त है। उसका बोध तभी होगा जब व्यवहारिक ग्रन्थियाँ छिन्न भिन्न होंगी।
बहुधा स्वयं में सुधार की बातें अच्छी नहीं लगती और तथाकथित साधक कहने लगता है कि आप केवल ज्ञान की बातें करें। यह असत का संग और सत पर मात्र गाल बजाना है जो सही नहीं है।
अब जरा तप शब्द में झाँक कर देखा जाये :--
सहजात्मक, सरलात्मक, सरसात्मक, सक्रियात्मक, सकारात्मक, सहयोगात्मक, निरपेक्ष सहनशीलता ही तप है। तप हेतु इतनी वृत्तियों का समावेश आवश्यक है क्योंकि उनको बतलाने वाले शब्द अपना स्वतंत्र अर्थ रखते हुए भी तप के विषय में एक दूजे के साथ गूँथे हुए हैं। ये सब एक दूसरे के लिए पर्यायवाची का कार्य नहीं करते। अतः केवल एक गुण के सहारे रहने से तप संपादित नहीं होता।
दैहिक या बौद्धिक या मानसिक आतंकियों में सहनशीलता दिखाई देती है। वह अपनी बात मनवाने या प्रायोजक का हित साधने तक सिमट कर रह जाती है। ऐसी नकारात्मक सहनशीलता सार्वभौमिक तप का मापदंड नहीं बन सकती। कीर्ति, कंचन, कामिनी हेतु या पारलौकिक सुखों की भोगेच्छा निमित्त सहनशीलता एक छल है और कुछ नहीं। रोजी रोटी हेतु सहनशीलता, सरलता, सहजता का दिखावा करना पडता है। यह अनिवार्यता एक ऊब या खीज या तनाव पैदा करती है। नकली मुस्कान अधरों पर चिपकाए घुमना पडता है। अन्दर से भले ही सिसक रहे हों बाहर से 'सब ठीक है' कहना पडता है। ऐसी वृत्ति कबतक साथ देगी??
ऊपरी निष्क्रियता यानि कर्मयोग छोड़कर दिखावे के बाबाजी बनने की अदम्य लालसा ने बहुतों को गुमराह किया है, ऊपर से ऐसे साहित्य और समझाने वाले भी कम नहीं है जो बाबागिरी या वेषधारी साधु बनने के लिए उकसाते हैं। वह जीवन शैली अपनाने से पता चलता है कि अधिकांश समय पेट भरने के कार्य और मौसम की मार से बचने के उपाय करने में चला जाता है। अगर किसी और के आश्रम में रहो तो उसके अनुसार चलो, उसे ही साधना समझो। अपनी कुटिया अलग बना ली तो और सांसारिक लालसा कम नहीं हुई तो नाना चिन्ताएं घर कर लेती है। गृहस्थ और आश्रम दोनों ही प्रपंच है - - - यह समझाया नहीं जाता। अगर ऐसी जगह रहे जहाँ तथाकथित बाबा लोग गृहस्थ वृत्ति (साम, दाम, दंड, भेद) वाले हो और आप सही में साधना करना चाहते हैं तो करने नहीं दिया जाएगा। ऐसे लोग साधु वेष अपनाने के बाद भी गृहस्थपना छोडना तो दूर आततायी बनने से नहीं चूकते। न समाज को मतलब और न संचार माध्यमों को परवाह। यह अतिशयोक्ति अलंकार नहीं वरन् सुना, देखा तथा भोगा यथार्थ है जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है।
अपने मतलब के लिए सक्रिय या औरों को परेशान या नष्ट करने वाली सक्रियता में तप के अन्य मापदंड अवहेलित रहते हैं। क्षेत्र, भाषा, रीति - रिवाज, परंपरा, खानपान की लहरों में बहने वाले सापेक्ष सहनशीलता को महिमामंडित करते हैं पर वे मर्यादित बौद्धिकता से परे है क्योंकि वह विद्वान भले बनादे विद्यावान नहीं बना सकती। व्यक्ति पशुवत शास्त्रों का बोझ ढोकर शास्त्र पशु बनता है या फिर शिल्पी की भाँति नाना तरह से शास्त्र के अर्थ बतलाते हुए औरों को प्रभावित करता है पर स्वयं उससे दूर रहता है। अपनी अतृप्त एषणा को छिपाने हेतु कहता है कि सड़क पर बिजली का खंभा रात को प्रकाश देता है, साथ नहीं चलता। यह दुष्ट दृष्टांत है जहाँ येन केन प्रकारेण अपनी बात मनवाने की चेष्टा साफ नजर आ रही है। यूँ तो सारे चर्चित असुर तपस्वी तथा आत्मज्ञानी थे पर उसके चलते वे तप या आत्मज्ञान का उदाहरण नहीं बने।
केवल निरपेक्ष सहनशीलता ही तप नहीं है क्योंकि सिर्फ सेवा या साधना का सहारा अभिमानी बनाता है। एक शरीर से दूसरे शरीर की सेवा समाजोपयोगी हो सकती है पर वह अलग विषय है। कीर्ति, कंचन और कामिनी हेतु या यहाँ कष्ट भोगने का दिखावा करके पारलौकिक भोग विलास के लिए साधना करना तो व्यर्थ है। देह है तो उसके प्रारब्धानुसार भोग मिलते ही हैं। और वे स्थाई कदापि नहीं होते। देह आधारित साधनाओं से योग दर्शन का विभूतिपाद भरा हुआ है। सरसरी तौर पर लगता है कि योग शरीर से परे की बात कर रहा है पर वह केवल स्थूल और सूक्ष्म शरीर के लय की बात करता है, कारण शरीर ज्यों का त्यों रहता है। तभी मनोराज्य का निर्माण हो पाता है। यहाँ परलोक का खंडन - मंडन नहीं हो रहा वरन उनमें महत् बुद्धि न रखने की ओर संकेत किया गया है। इसीलिए गौतम बुद्ध लोक से संबंधित प्रश्न का उत्तर नहीं देते।
दैहिक या बौद्धिक या मानसिक आतंकियों में सहनशीलता दिखाई देती है। वह अपनी बात मनवाने या प्रायोजक का हित साधने तक सिमट कर रह जाती है। ऐसी नकारात्मक सहनशीलता सार्वभौमिक तप का मापदंड नहीं बन सकती। कीर्ति, कंचन, कामिनी हेतु या पारलौकिक सुखों की भोगेच्छा निमित्त सहनशीलता एक छल है और कुछ नहीं। रोजी रोटी हेतु सहनशीलता, सरलता, सहजता का दिखावा करना पडता है। यह अनिवार्यता एक ऊब या खीज या तनाव पैदा करती है। नकली मुस्कान अधरों पर चिपकाए घुमना पडता है। अन्दर से भले ही सिसक रहे हों बाहर से 'सब ठीक है' कहना पडता है। ऐसी वृत्ति कबतक साथ देगी??
ऊपरी निष्क्रियता यानि कर्मयोग छोड़कर दिखावे के बाबाजी बनने की अदम्य लालसा ने बहुतों को गुमराह किया है, ऊपर से ऐसे साहित्य और समझाने वाले भी कम नहीं है जो बाबागिरी या वेषधारी साधु बनने के लिए उकसाते हैं। वह जीवन शैली अपनाने से पता चलता है कि अधिकांश समय पेट भरने के कार्य और मौसम की मार से बचने के उपाय करने में चला जाता है। अगर किसी और के आश्रम में रहो तो उसके अनुसार चलो, उसे ही साधना समझो। अपनी कुटिया अलग बना ली तो और सांसारिक लालसा कम नहीं हुई तो नाना चिन्ताएं घर कर लेती है। गृहस्थ और आश्रम दोनों ही प्रपंच है - - - यह समझाया नहीं जाता। अगर ऐसी जगह रहे जहाँ तथाकथित बाबा लोग गृहस्थ वृत्ति (साम, दाम, दंड, भेद) वाले हो और आप सही में साधना करना चाहते हैं तो करने नहीं दिया जाएगा। ऐसे लोग साधु वेष अपनाने के बाद भी गृहस्थपना छोडना तो दूर आततायी बनने से नहीं चूकते। न समाज को मतलब और न संचार माध्यमों को परवाह। यह अतिशयोक्ति अलंकार नहीं वरन् सुना, देखा तथा भोगा यथार्थ है जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है।
अपने मतलब के लिए सक्रिय या औरों को परेशान या नष्ट करने वाली सक्रियता में तप के अन्य मापदंड अवहेलित रहते हैं। क्षेत्र, भाषा, रीति - रिवाज, परंपरा, खानपान की लहरों में बहने वाले सापेक्ष सहनशीलता को महिमामंडित करते हैं पर वे मर्यादित बौद्धिकता से परे है क्योंकि वह विद्वान भले बनादे विद्यावान नहीं बना सकती। व्यक्ति पशुवत शास्त्रों का बोझ ढोकर शास्त्र पशु बनता है या फिर शिल्पी की भाँति नाना तरह से शास्त्र के अर्थ बतलाते हुए औरों को प्रभावित करता है पर स्वयं उससे दूर रहता है। अपनी अतृप्त एषणा को छिपाने हेतु कहता है कि सड़क पर बिजली का खंभा रात को प्रकाश देता है, साथ नहीं चलता। यह दुष्ट दृष्टांत है जहाँ येन केन प्रकारेण अपनी बात मनवाने की चेष्टा साफ नजर आ रही है। यूँ तो सारे चर्चित असुर तपस्वी तथा आत्मज्ञानी थे पर उसके चलते वे तप या आत्मज्ञान का उदाहरण नहीं बने।
केवल निरपेक्ष सहनशीलता ही तप नहीं है क्योंकि सिर्फ सेवा या साधना का सहारा अभिमानी बनाता है। एक शरीर से दूसरे शरीर की सेवा समाजोपयोगी हो सकती है पर वह अलग विषय है। कीर्ति, कंचन और कामिनी हेतु या यहाँ कष्ट भोगने का दिखावा करके पारलौकिक भोग विलास के लिए साधना करना तो व्यर्थ है। देह है तो उसके प्रारब्धानुसार भोग मिलते ही हैं। और वे स्थाई कदापि नहीं होते। देह आधारित साधनाओं से योग दर्शन का विभूतिपाद भरा हुआ है। सरसरी तौर पर लगता है कि योग शरीर से परे की बात कर रहा है पर वह केवल स्थूल और सूक्ष्म शरीर के लय की बात करता है, कारण शरीर ज्यों का त्यों रहता है। तभी मनोराज्य का निर्माण हो पाता है। यहाँ परलोक का खंडन - मंडन नहीं हो रहा वरन उनमें महत् बुद्धि न रखने की ओर संकेत किया गया है। इसीलिए गौतम बुद्ध लोक से संबंधित प्रश्न का उत्तर नहीं देते।
इनमें उलझा हुआ साधक मन की ऊपरी सतह ही साफ कर पाता है और गहराई में जमी काई पर ध्यान नहीं जाता क्योंकि उससे वह अनजान रहा। उस ओर ध्यान दिलवाया ही नहीं गया। भूले भटके ध्यान चला गया उस ओर तब भी वह कुछ नहीं कर पाया। मन को साफ करने तथा रखने की कला से वह अनजान रह गया। वन या गुफा में रहने से ही साधना स्थाई नहीं होती है। वहाँ मन की सफाई पर ध्यान देना चाहिए। आखिरकार अपने शरीर, मन, बुद्धि से व्यवहार होता है। बहुधा मन साफ नहीं रहता और कभी कभार सफाई का अहसास हो जाए तो उसपर साधक नजर नहीं रखता। मन की ऊपरी सतह की सफाई को पूरी सफाई मान लेता है और सेवा के नामपर यश कमाने निकल पडता है या किसी तथाकथित अलौकिक सुख में डूब कर आवागमन के चक्र में फँसा रहता है। वह साधक मन की तरफ से निश्चित हो जाता है और यही निश्चिंतता धीरे - धीरे मन को कलुषित कर देती है।
संत कमाल, संत तुलसीदास, संत सूरदास आदि ने ऐसे तप की निंदा की है। ऐसे तप में सहजता नहीं रह पाती जो रहनी जरूरी है ।
श्रीमद्भगवद्गीता में तप की अवधारणा :-
श्रीमद्भगवद्गीता में कायिक वाचिक मानसिक तप का उल्लेख है (अध्याय १७) । तप क्या है यह समझे बिना इनको समझने में मतभेद ही रहेंगे। कायिक में बडों का सम्मान और ब्रह्मचर्य की बात आई। इसमे ज्ञान वृद्ध शामिल हैं केवल अधिक उम्र वाले नहीं। ब्रह्मचर्य जीवन शैली है और उसे दैहिक दृष्टि से समझना अनुचित है। अपने स्वरुप में स्थित रहते या रहने का प्रयास करते हूए आचरण करना ही ब्रह्मचर्य शब्द की प्रधान और उपनिषद सम्मत व्याख्या है। वाचिक तप तत्वदर्शी समालोचना से उत्पन्न सत्य का उद्घोष है। इसे ज्ञानचक्षु का सदुपयोग कह सकते हैं। केवल समर्थकों प्रशंसकों की संख्या हेतु बोला गया सत्य या वाणी प्रयोग तप नहीं है। मानसिक तप ग्यारह इन्द्रियों के संयमित प्रयोग तथा बाहर भीतर के मौन से संबंधित है।
No comments:
Post a Comment