छान्दोग्य उपनिषद (४-१० - ५) -
कं ब्रह्म -> भौतिक या विषय सुख --> नाशवान। खं ब्रह्म - भूताकाश --> विषय सुख की भाँति जल्दी शेष नहीं होता। दोनों को एक कहा गया है। 'कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमिती' --> ताकि यह न लगे कि केवल कं ब्रह्म नाशवान है इसीलिए उसे खं ब्रह्म कहा गया। खं ब्रह्म को कं ब्रह्म कहा गया -> चैतन्य विशिष्ट आकाश कोई अलग नहीं। 'कं' स्पष्ट रूप से ब्रह्म नहीं है। इसे 'खं' के विशेषण के रूप में प्रयोग किया गया है।
कं ब्रह्म -> ब्रह्म विशिष्ट सुख = कार्य ब्रह्म।
खं ब्रह्म -> सुख विशिष्ट आकाश को ब्रह्म कहा गया = कारण ब्रह्म।
यह अहंग्रहोपासना है।
अनुभव == जाग्रतावस्था - विशेषतः नेत्रों में
स्वप्नावस्था - कंठ या मन में
सुषुप्ति ----- प्राणों में
कं ब्रह्म -> भौतिक या विषय सुख --> नाशवान। खं ब्रह्म - भूताकाश --> विषय सुख की भाँति जल्दी शेष नहीं होता। दोनों को एक कहा गया है। 'कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमिती' --> ताकि यह न लगे कि केवल कं ब्रह्म नाशवान है इसीलिए उसे खं ब्रह्म कहा गया। खं ब्रह्म को कं ब्रह्म कहा गया -> चैतन्य विशिष्ट आकाश कोई अलग नहीं। 'कं' स्पष्ट रूप से ब्रह्म नहीं है। इसे 'खं' के विशेषण के रूप में प्रयोग किया गया है।
कं ब्रह्म -> ब्रह्म विशिष्ट सुख = कार्य ब्रह्म।
खं ब्रह्म -> सुख विशिष्ट आकाश को ब्रह्म कहा गया = कारण ब्रह्म।
यह अहंग्रहोपासना है।
अनुभव == जाग्रतावस्था - विशेषतः नेत्रों में
स्वप्नावस्था - कंठ या मन में
सुषुप्ति ----- प्राणों में
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