हिमाचल प्रदेश के प्रिय लोकेश शर्मा ने इसमें रुचि दिखाते हुए इस सर्ग के श्लोक भिजवाए तथा सारे लेखों को पढा। योगवासिष्ठ अवहेलित है सबके द्वारा। यहाँ तक की शिक्षित साधु समाज तक इससे दूरी बनाकर रखता है।
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२..मुमुक्षुव्यवहार प्रकरण,
११ सर्ग
प्रामाणिकस्य पृष्टस्य वक्तुर् उत्तमचेतसा ।
यत्नेन वचनं ग्राह्यम् अंशुकेनेव कुङ्कुमम् ॥४४।।
वास्तविक अनुभूति / बोध जिसे हो चुका है ऐसे शिक्षक की बाते उत्तम अधिकारी को अ
अवश्य सुननी चाहिए। यह श्लोक मननशील श्रोता को उत्तम अधिकारी मानता है और उसके लिए किसी वेशभूषा, भाषा, आहार, स्थान या अन्य इन्द्रिय जनित आचरण जरुरी नहीं। मननशील व्यक्ति सुनी हुई बातो का विश्लेषण करेगा।
अतत्त्वज्ञम् अनादेयवचनं वाग्विदां वर ।
यः पृच्छति नरं तस्मान् नास्ति मूढतरो ऽपरः ॥४५।।
उस व्यक्ति से बडा मूर्ख कोई नही जो तत्वज्ञान की समझ ठीक से न रखनेवाले से प्रश्न करता है। ऐसो के उत्तर (शब्द) स्वीकिरनै नहीं चाहिए। केवल अच्छा वक्ता होने से यह जरूरी नहीं कि वह जानकार हो।
प्रामाणिकस्य तज्ज्ञस्य वक्तुः पृष्टस्य यत्नतः ।
नानुतिष्ठति यो वाक्यं नान्यस् तस्मान् नराधमः ॥४६।।
विषय की वास्तविकता जानने वाले शिक्षक के बारे में सुनिश्चित होने के बाद मिले उत्तर की अवहेलना करने वाले प्रश्नकर्ता से नीच कोई और य नहीं। यहाँ समझ में न आने पर पूछना अलग बात है। पूरा नकारना अनुचित है।
तज्ज्ञतातज्ज्ञते पूर्वं वक्तुर् निर्णीय कार्यतः ।
यः करोति नरः प्रश्नं पृच्छकस् स महामतिः ॥४७।।
जो पहले से उत्तर देनेवाले की योग्यता सुनिश्चित होने के बाद प्रश्न पूछे वह अत्यंत बुद्धिमान प्रश्नकर्ता है। ऐसा करना मर्यादा के अनुकूल है।
अनिर्णीय प्रवक्तारं बालः प्रश्नं करोति यः ।
अधमः पृच्छकस् स स्यान् न महार्थस्य भाजनम् ॥४८।।
उत्तर देनेवाले की विषय पर पकड जाने बिना एक बच्चा किसी से कोई भी प्रश्न करता है। वैसे ही वह मनुष्य उस बच्चे के समान ही है जो ऐसा करता है। यहाँ पूरी गलती प्रश्नकर्ता की है।
पूर्वापरसमाधानक्षमबुद्धाव् अनिन्दिते ।
पृष्टं प्राज्ञेन वक्तव्यं नाधमे पशुधर्मिणि ॥४९।।
अन्तर्मुखी व्यक्ति सूक्ष्म तात्विक विवेचना करने तथा गुरु द्वारा समझाने पर समझने की योग्यता रखे ऐसे प्रश्नकर्ता को उत्तर अवश्य देना चाहिए। वही ध्यानपूर्वक बोली गई बातो को धारण करता है। स्थूल मन - बुद्धि वाला बहिर्मुखी पशुवत आचरण प्रधान होने के कारण अयोग्य है। पशुधर्मिणि से तात्पर्य :-
आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्। धर्मो हि तेषामधिको विशेष: धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥
पशु और मनुष्यों के अधिकतर कर्म (निद्रा, भय, मोथुन, भूख, प्यासादि) एक ही है केवल मनुष्यों मे उससे ऊपर उठने की क्षमता है। उपरोक्त श्लोक में उन पशु धर्म पालन करने वालो के विषय कहा गया है जो अपना स्तर नहीं उठाते।
प्रामाणिकार्थयोग्यत्वं पृच्छकस्याविचार्य वा ।
यो वक्ति तम् इह प्राज्ञाः प्राहुर् मूढतमं नरम् ॥५०।।
जो शिक्षक प्रश्नकर्ता का परीक्षण किए बिना पहले पढ़ाता है उसे समझदार लोग सबसे बडा मूर्ख कहते हैं। तत्वमिमांसा में प्रश्नकर्ता की धारण क्षमता जाेननी जरूरी है समझाने (उत्तर देनेवाले) के लिए। बहुधा यह कमी देखी जाती है जब केवल अपने स्तर के अनुसार बोलता है। इससे जो संवाद होना चाहिए वह नहीं होता।
त्वम् अतीव गुणाधारः पृच्छको रघुनन्दन ।
अहं च वक्तुं जानामि स च योगो ऽयम् आवयोः ॥५१।।
राघव राजकुल के वंशज द्वारा राम को संबोधित करते हुए उनके गुरु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उन सभी प्रश्नों की उत्तम तथा असाधारण माना। ऐसे प्रश्नों को समझा पाने में वे सक्षम थे। भरी सभा में सारे प्रश्न सुनाए गए थे जहाँ कई ऋषि मुनी बैठे थे। चूँकि गुरु के वचनों पर शिष्य की श्रद्धा अधिक होती है इसीलिए महर्षि विश्वामित्र ने यह दायित्व उनको दिया। कई बार उत्तर मालूम नहीं होता या समझाने की योग्यता नहीं होती जबकि इनके पास वैसी समस्या नहीं थी। प्रश्न - उत्तर अन्योन्याश्रित / संपूरक होने चाहिए और सभा में ऐसे ही गुरु - शिष्य की जोडी बैठी थी।
सर्ग १३
इस ग्रंथ में ऐसे कई श्लोक हैं जिनका सतही और शाब्दिक अनुवाद भ्रम पैदा करते हैं। अतः सावधान रहे।
न तथा शोभते राजा अप्यन्तःपुरसंस्थितः ।
समया स्वच्छया बुद्ध्या यथोपशमशीलया ॥६८॥
अपने राजभवन में रहनेवाला राजा देखने में उतना शोभायमान नहीं होता, जितना कि शांत स्वभाव वाला व्यक्ति अपनी समता और स्पष्ट समझ के चलते दिखता है।
समया शमशालिन्या वृत्त्या यः साधु वर्तते ।
अभिनन्दितया लोके जीवतीह स नेतरः ॥ ७० ॥
जो अपने सौम्य और शांतिपूर्ण आचरण के साथ पवित्र जीवन जीता है, वही सही में इसी संसार में रहता है और कोई नहीं। यह अंदरूनी समझ वाले व्यक्ति के सांसारिक जीवन को सार्थक बतला रहा है। यह समझ जिनके पास नहीं उनका जीना अन्य प्राणियों की भाँति है।
अनुद्धतमनाः शान्तः साधुः कर्म करोति यत् ।
तत्सर्वमभिनन्दन्ति तस्येमा भूतजातयः ॥ ७१ ॥
एक बुद्धिमान, नम्र, खरा, सत्यनिष्ठ व्यक्ति अपने सभी कार्यों से औरों को प्रसन्न करता है, और सभी प्राणियों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। उसकी आध्यात्मिक यात्रा से उत्पन्न तेज स्वाभाविक रूप से औरों को आकर्षित करते हैं। यह श्लोक उनके लिए नहीं जो इसके लिए प्रयास करते हुए अपने तेज को नष्ट भ्रष्ट करते हैं।
सर्ग १७
अन्यसंकल्पचित्तस्था नगरश्रीरिवासती ।
अलभ्यवस्तुपार्श्वस्थस्वप्नयुद्धचिरारवा ॥ ३५ ॥
किसी दूसरे व्यक्ति की वस्तु पर दृष्टि रखना उतना ही व्यर्थ है जितना किसी काल्पनिक शहर की सुंदरता पर
टकटकी लगाना और किसी अप्राप्य वस्तु की आशा में बैठे रहना। यह नींद (स्वप्नावस्था) में किसी वस्तु के लिए शोरगुल मचाने जैसा है। ऐसी आशा में समय नष्ट होने के साथ जो वस्तु सहजता से प्राप्त है वह तक छूट जाती है। यहाँ प्रयास या प्रबल पुरुषार्थ का खंडन नहीं हो रहा। उस वृत्ति पर चोट है जो मृग मरीचिका के सिवाय कुछ और नहीं।
शान्तसंकल्पमत्ताभ्रभीषणाशनिशब्दवत् ।
विस्मृतस्वप्नसंकल्पनिर्माणनगरोपमा ॥३६।।
यह उतना ही व्यर्थ है, जितना कि अनियंत्रित इच्छाओं वाला व्यक्ति, जो जोर से भयंकर गड़गड़ाहट के समान दहाड़ता है, तथा जैसे कि स्वप्न में अपने संस्कारों के आधार पर नगर निर्माण करना। इसमें मन की भीतरी पर्तों में छिपे संस्कारों की बात है। ऐसे काल्पनिक निर्माण अपने स्वरूप से अलग होने से बनते हैं।
भविष्यन्नगरोद्यानप्रसूवन्ध्यामलाङ्गिका ।
तस्या जिह्वोच्यमानोग्रकथार्थानुभवोपमा ॥ ३७ ॥
यह एक भावी नगर के समान व्यर्थ है, जिसमें बगीचा, फूल और फल उग रहे हैं तथा एक बांझ स्त्री के समान जो अपने अजन्मे और होने वाले पुत्रों के वीरतापूर्ण कार्यों की प्रशंसा कर रही है।
अनुल्लिखितचित्रस्य चित्रव्याप्तेव भित्तिभूः ।
परिविस्मर्यमाणार्थकल्पनानगरीनिभा ॥ ३८ ॥
या जब कोई चित्रकार नक्शे के आधार पर किसी काल्पनिक शहर का चित्र बनाने जा रहा हो और वह पहले से उसकी योजना बनाना भूल जाए।
सर्वर्तुमदनुत्पन्नवनस्पन्दास्फुटाकृतिः ।
भाविपुष्पवनाकारवसन्तरसरञ्जना ॥३९॥
यह उतना ही व्यर्थ है जितना कि सभी मौसमों में सदाबहार घास और फल तथा एक बिना उगे हुए कुंज की हवा की कल्पना या फिर भविष्य में वसंत की मधुरता से सराबोर फूलों से भरे एक बगीचे की आशा करना।
आत्माभ्यास कई तरह से इस ग्रंथ में समझाया गया है जिससे दृढ प्रमा बने। शास्त्रविहित या शास्त्रीय उदाहरणों में मृग मरीचिका, आकाश कुसुम, खरगोश के सींग, वन्ध्यापुत्र काम में लाए जाते हैं। स्वप्न या संकल्प-विकल्प वश मनोराज्य बनने के साथ उसमें नाना कृत्य होते हैं। उपरोक्त श्लोकों में वन्ध्यापुत्र तथा मृग मरीचिका का उल्लेख है। उपरोक्त श्लोकों में पुरुषार्थ विरोधी तथा मृग मरीचिका वाली वृत्तियों का विरोध है। ऐसी वृत्तियाँ स्वरूप से अलग रखने, प्रमादी बनाने तथा दैव भरोसे रहने के लिए फँसाती रहती है।
अन्तर्लीनतरङ्गौघसौम्यवारिसरित्समा ।
निर्वाणाख्यं प्रकरणं ततः षष्ठमुदाहृतम् ॥ ४० ॥
शिष्टो ग्रन्थः परीमाणं तस्य ज्ञानमहार्थदः ।
बुद्धे तस्मिन्भवेच्छ्रेयो निर्वाणं शान्तकल्पनम् ॥ ४१ ॥
इसके बाद छठी पुस्तक निर्वाणप्रकरण आती है, जो उतनी ही स्पष्ट है जितना की नदी का जल, जो उसकी भीतरी हलचल के थम जाने के बाद दिखता है। उसके साथ बहनेवाली मिट्टी, रेत, आदि के चलते जल की स्वच्छता बाधित होती है अतः वह तथा अन्य बाधक तत्व के नीचे बैठ जाने से जल साफ दिखता है। यहाँ संगति (सर्ग, प्रकरण तथा पूरे ग्रंथ के साथ) लगाए बिना अर्थ तथा शब्द दोषों पर ध्यान न देना ही अंदरुनी हलचल है जिसके चलते श्लोक का उद्देश्य साफ नहीं होता। कहीं न कहीं फँसा हुआ अंतःकरण कुछ का कुछ अर्थ बतलाता है।
शेष श्लोकों की संख्या (अर्थात् सम्पूर्ण ग्रन्थ के ३२,000 श्लोकों में से १४,५00 श्लोक) को इसमें समाहित किया गया है, इनका ज्ञान गहन अर्थों से परिपूर्ण है, तथा इन्हें समझने से इच्छाओं के साथ न बहते रहने तथा उससै शांति का मुख्य लाभ प्राप्त होता है।
इन दो श्लोकों को यहाँ इसलिए दिया गया है क्योंकि कईयों ने निर्वाणप्रकरण के दो भाग (पूर्वार्ध - उत्तरार्ध) में दूसरे भाग को ६/२ न लिखकर ‘७’ लिखा। और तो और उसे अलग से जोडा हुआ कहा गया। क्षेपक किसी भी प्रकरण में जोडे जा सकते हैं। उसके लिए ग्रंथ के अंत तक रुकने की आवश्यकता नहीं। अपने यहाँ सबको पूरी छूट है जिसका दुष्परिणाम वैदिक वाङमय को झेलना पडता है। जो ऐसे महानुभावों के समर्थक इसे कलान्तर में प्रमाण मानेंगे।
अचेत्यचित्प्रकाशात्मा विज्ञानात्मा निरामयः ।
परमाकाशकोशाच्छः शान्तसर्वभवभ्रमः ॥ ४२ ॥
बुद्धि अपने सभी सांसारिक विषयों से विमुख होने लगती है और शुद्धता की ओर बढती है। वे तत्व (प्रकाश) से ही प्रकाशित होते या जाने जाते हैं। चूँकि उनका आधिपत्य शेष होने लगता है या यूँ कहे कि वे अपने वश में नहीं रख पाते अतः बुद्धि अधिक प्रकाशवान होती हे। श्लोक में प्रकाशात्मा शब्द यही समझा रहा है और विज्ञानात्मा शब्द विज्ञानमय कोष से संबंधित जिसमें बुद्धि या बौद्धिक क्षमता (निदिध्यासन, लक्ष्यार्थ समझने लायक तीक्ष्णता, क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर विश्लेषण) आती है। आत्मा शब्द समझाने के लिए गढा गया है और इसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं इसलिए प्रकाशात्मा तथा विज्ञानात्मा को उसका भेद न समझें और न अलग से प्रकटीकरण अर्थ ले। ऐसी तीक्ष्ण, निर्मल बुद्धि अनंत शून्यता के आवरण में आवृत तथा पूर्णतः शुद्ध और सांसारिक त्रुटियों से रहित है।
निर्वापितजगद्यात्रः कृतकर्तव्यसुस्थितः ।
समस्तजनतारम्भवज्रस्तम्भो नभोनिभः ॥४३॥
प्रथम पंक्ति आत्यन्तिक समाधान तथा अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करने की बात कर रही है। आकाश के अदम्य स्तंभ के समान शांति प्राप्त होती है आत्मा को जो अशांत संसार की छवियों को प्रतिबिंबित कर रही थी। द्वितीय पंक्ति अलंकारिक प्रयोग से शुरु हुई है अतः यहाँ शब्दार्थ केवल लक्ष्यार्थ की ओर इंगित करने के लिए है। आकाश वह है जो अवकाश या स्थान दे। आंतरिक समझदारी से आई शांति अपने मूल स्वरूप या स्वभाव को दर्शा रही है।
विनिगीर्णयथासंख्यजगज्जालातितृप्तिमान् ।
आकाशीभूतनिःशेषरूपालोकमनस्कृतिः ॥४४।।
सांसारिक या व्यवहारिक जाल-जंजाल की सारहीनता पक्की होने के साथ विषयासक्ति का बंधन ढीला होने लगे तब आंतरिक (मानसिक - बौद्धिक) बोझ कम होने लगता है। इसके चलते वायु समान हल्केपन का अनुभव होता है। व्यक्ति स्वयं से प्रसन्न रहना सीख लेता है। आकाश में सारी घटनाएँ घटित होती हैं। धुंध, मेघ, आँधी तथा प्रकाश के प्रकीर्णन के चलते आकाश का रंग लाल, पीला, नीला, श्वेत लगता है। सही में उसका अपना कोई रंग नहीं। यही स्थिति उस अभ्यासी की होने लगती है।
कार्यकारणकर्तृत्वहेयादेयदृशोज्झितः ।
सदेह इव निर्देहः ससंसारोऽप्यसंसृतिः ॥ ४५ ॥
तत्पश्चात आत्मा कार्यकारण, प्रभाव या कर्तृत्व पर ध्यान नहीं देती, जो टालने योग्य है या स्वीकार करने योग्य है, उस पर भी ध्यान नहीं देती, वह शरीर से आबद्ध होने पर भी देहरहित कहलाती है। वह अपनी सांसारिक अवस्था में असांसारिक कहलाती है। नासमझी के चलते कल्पित शब्द आत्मा पर कर्ता या भोक्ता या दोनों आरोपित करने तथा उसे सत्य मानने वालों को ठीक से यह संवाद समझना चाहिए।
चिन्मयो घनपाषाणजठरापीवरोपमः ।
चिदादित्यस्तपँल्लोकानन्धकारोपरोपमम् ॥ ४६ ॥
देह की उपाधि के चलते चिन्मय सत्ता का संसर्गाध्यास सर्वविदित है। इसकी तुलना एक ठोस सघन चट्टान से की गई जिसमें कोई दरार नहीं। यह बुद्धि का प्रकाशक है जो सभी लोगों को ज्ञान प्रदान कर, अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।
परप्रकाशरूपोऽपि परमान्ध्यमिवाsगतः ।
रुद्धसंसृतिदुर्लीलः प्रक्षीणाशाविषूचिकः ॥ ४७ ॥
यद्यपि चिन्मय सत्ता अत्यन्त प्रकाशमान है, फिर भी यह अध्यास के चलते, माने हुए बंधन से उपजी तृष्णाओं के रोग से नष्ट हो, घोर अंधकारमय हो गई।
नष्टाहंकारवेतालो देहवानकलेवरः ।
कस्मिंश्चिद्रोमकोट्यग्रे तस्येयमवतिष्ठते ।
जगल्लक्ष्मीर्महामेरोः पुष्पे क्वचिदिवाsलिनी ॥४८॥
जब व्यक्ति मलिन अहंकार (सात्त्विक, राजसी, तामसिक) के भ्रम से मुक्त हो जाता है, तब वह देहधारी अवस्था में भी निराकारवत होता है। सम्पूर्ण जगत् को उसी प्रकार देखता है, जैसे वह अपने शरीर के असंख्य रोमों में से किसी एक के शीर्ष पर स्थित हो या सुमेर पर्वत के पुष्प पर बैठी हुई मधुमक्खी के समान हो। अतिशयोक्ति अलंकार के द्वारा आत्माभ्यासी की दृष्टि समझाई गई है। इसमें अस्तित्व (जीवित रहने) के लिए जरुरी अहं (अहंकार) की बात नहीं हो रही। देखा जाए तो देहाभियान से ही सारे कार्य होते हैं। यह श्लोक इस वृत्ति के साथ लगातार न बहने की ओर संकेत कर रहा है। संक्षेप में देखे तो व्यवहारिकता में महत् बुद्धि नहीं रहती। इस श्लोक का अनुवाद ‘अहंकार का विनाश मा नष्ट होना’ करने से देहपात की बात सामने आती है जो इस ग्रंथ का उद्देश्य नहीं है।
विततता हृदयस्य महामतेर्हरिहराञ्जजलक्षशतैरपि ।
तुलनमेति न मुक्तिमतो यतः प्रविततास्ति निरुत्तमवस्तुनः ॥ ५० ॥
हजारों हरि, हर और ब्रह्मा के लिए भी यह संभव नहीं कि वे उस महान् बुद्धि वाले ऋषि की व्यापक आत्मा के बराबर पहुंच सकें क्योंकि मुक्त पुरुषों का मुख्य कल्याण (आंतरिक आनन्द) किसी भी अन्य की अपेक्षा कहीं अधिक विस्तृत होता है। इसमें उनका खंडन या हेय प्रमाणित नहीं किया गया बल्कि मायिक रूप को अलग रखा गया है। भक्ति के नामपर मायिक रूप मनभावन तथा सच्चा लगता है। इससे रूप विशेष का कार्यक्षेत्र संकुचित होता है जो तथाकथित भक्त समझ नहीं पाता। वह रूपों की तुलना तथा श्रेष्ठता में उलझ कर मनगढंत रचनाओं से उसका प्रतिपादन करता है। यहाँ तक कि नए रूपों की स्थापना के लिए वह वैदिक देवी-देवताओं का विरोध खुलकर करता है। इसी कलुषित परंपरा ने ब्रह्मा, देवराज इन्द्र, चन्द्रादि की पदवियों को कलंकित किया। हाल यह है उन कहानियों का प्रकाशन रोका नहीं गया। यह अप्रमाणित सिद्धांत और व्यक्तिगत दृष्टिकोण नहीं वरन् आवश्यक विवेचना है। लोग इसे विकास से जोडते हुए पुरानों का महत्व कम होने को सामान्य घटना मानते हैं पर उसके लिए अशालीन कहानियों का सहारा लिए जाने का खुलकर विरोध नहीं करते। इसी ग्रंथ के कुछ संस्करणों में विष्णु के नाभि कमल से ब्रह्मा की उत्पत्ति का उल्लेख हुआ जो पौराणिक उदाहरण है वैदिक नहीं। ऊपर से पुराण परतः सिद्ध है स्वतः नहीं। इनकी बातों की प्रामाणिकता को जाँचेपरखे बिना मानना अनुचित है। अपनी हठधर्मिता के चलते लोगों ने योगवासिष्ठ तक को नहीं छोडा। यह सौभाग्य की बात है कि इस ग्रंथ का संवाद इस तरह हुआ जिससे क्षेपकों की दाल नहीं गली।
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३.उत्पत्ति प्रकरण
6 टा सर्ग, 11 वाँ श्लोक -
दान के फल का अधिकारी
रागाद्युपहते चित्ते वञ्चयित्वा परं धनम् ।
यद् अर्ज्यते ततो दानाद् यस्यार्थस् तस्य तत्फलम् ॥11॥
राग से युक्त चित्त में धोखे से कमाया हुआ धन उससे किया हुआ दान उसे जाता है जिनका वह धन होता है।
भ्रष्ट तरीको से अर्जित धन अच्छा लगता है भ्रष्टाचारियों को। सबको भ्रष्ट व्यवस्था कघोटती है। उसका प्रचार-प्रसार होते देख पीड़ा होती है। राजनीतिक परिवर्तन तक इसे हर स्तर पर बदल नहीं पाता वरन अनैतिकता नित नूतन शेली में सायने आती है। इसका एक बडा कारण इस उपरोक्त श्लोक में समझाया गया। दान के मामले में काला धन का उपयोग होने से उसका फल का अधिकांश भाग दानदाता को नहीं मिलता। परोक्ष रूप में उन विभागों को मिलता है या उन लोगों को जिनका उस धन पर अधिकार था। जैसे करो की चोरी, नकली सामान बनाना, मिलावट, कम तौलना - मापना, धोखाधड़ी, संपत्ति हडपनाधि आदि कार्य से अर्जित धन की यही गति होती है।
ऐसे दानदाता को फल के नामपर क्या मिलता है?
इससे भरपूर सामाजिक यश तथा व्यापारिक लाभ मिलता है।
तब क्या ऐसा दान नहीं देना चाहिए?
धन चाहे जिस तरह का हो या जिस विधि से अर्जित
किया गया हो उसकी तीन गति होती है - भोग, दान,
नाश। जिस प्रकार के धन की चर्चा उपरोक्त श्लोक में है
वह सामाजिक कार्यों में काम आता है। हर तरह की
राजनीतिक व्यवस्था में शासक को धन की जरुरत होती
है और विशेषत शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक रुप से
कमजोर लोगो की भलाई जैसे कई कार्यों के लिए काफी धन लगता है। इसके लिए सरकारें व्यापारियों से इन सबके लिए धन लेती है। दूसरी ओर व्यापारियों को कई तरह की छूट मिलती है। उन्हें समाजसेवी के रुप में जान - माना तथा पुरस्कृत किया जाता है। ऐसे ही चार पाँच समाजसेवियों ने को भारतीय मिठाईयों के लिए उपयुक्त बताया था
जब बडे स्तर पर पॉम आयल का आयात आरम्भ हुआ तब उसके व्यापक उपयोग के लिए ऐसे कुछ समाजसेवियों ने इसे भारतीय मिठाईयों और नमकीन हेतु उपयुक्त बताते हुए दैनिक समाचार पत्रों - पत्रिकाओं में भिन्न-भिन्न शैली में दर्जनों लेख लिख सरकारी योजना में सहयोग दिया। अब तो कहीं-कहीं कॉटन सीड आयल तक साथ में मिलने लगा है। यूँ भी अपने यहाँ खाद्यपदार्थ के उत्पादन में सभी सामग्रियों की जानकारी ग्राहक को नहीं दी जाती अथवा वैज्ञानिक नाम और गुढार्थ शब्द लिखै जाते हैं ताकि लेने वाला सरलता से हानिकारक चीज पकड न सके। ऐसो को दण्डित करने की माँग करने वाले समाजसेवा वाली बात भूल जाते हैं। दूसरी मुफ्तखोरी राष्ट्रीय रोग होने कारण लोग उलाहना, समय को कोसना मे कुशलता दिखाते हुए भूल जाते हैं कि इसके लिए धन की आपूर्ति कहाँ से लगातार होती रहेगी जिससे उस विभाग विशेष की देख रेख हो।
पाठ्यक्रम से लेकर अभिप्रेरणा (motivation) देनेवाले अधिकतम लाभ का उपदेश देते हैं तब मुनाफाखोरी ही बढेगी मुनाफे के बदले। ऐसा करनेवाले प्रायः दान बहुत करते हैं पर जो पुण्य मिलना चाहिए वह कभी नहीं मिलता।
सर्ग २२
सर्गादावेव नोत्पन्नं दृश्यं नास्त्येव तत्सदा ।
इदं जगदहं चेति बोधाभ्यास उदाहृतः ।। २८।।
यह संसार नाम रुपात्मक तथ मैं (अस्तित्व को दर्शाने वाला और त्रिगुणात्मक अहं) हर समय अस्तित्व में नहीं रहते। इस प्रकार ज्ञान के अभ्यास की घोषणा की जाती है। अतः उत्पत्ति को लेकर काल्पनिक जाल बुनकर उसमे उलझना - उलझाना तथा सुलझाने का दंभ उदरनिमित्तं बहुकृत वेष तथा समाज, राज्य, देश की अर्थ व्यवस्था सुधारने का उदाहरण मात्र है।
यह प्रसंग अभ्यास के बारे में भ्रांत अवधारणाओं का निर्मूलन कर रहा है। यह श्लोक उसे संत्रेप में व्यक्त करते हुए अभ्यासी की आँखे खोलती है। अन्य साधनो को अतिरंजित शैली से तत्वज्ञान हेतु प्रधान कारण प्रचारित करना उचित नहीं।
सर्ग ५७
यथा स्वप्नस्तथा जाग्रदिदं नास्त्यत्र संशयः ।
स्वप्ने पुरमसद्भाति सर्गादौ भात्यसज्जगत् ।।५०।।
जैसा स्वप्न है वैसा ही जाग्रत् भी इसमें कोई संशय नहीं। स्वप्न में असत् नगरादि दिखते हैं और जाग्रत में असत् जगत्। तभी इसके साधनों का तत्वज्ञान का दृढ़तापूर्वक
प्रधान कारण मानना - मनवाना उचित नहीं। ऐसे साधनों कै अभ्यास का समर्थन योगवासिष्ठ में नहीं है।
बाइसवें सर्ग में अभ्यास की बात स्पष्ट की गई है।
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४.स्थिति प्रकरण
सर्ग १८
स्वप्नोऽपि स्वप्नसमये स्थैर्याज्जाग्रत्वमृच्छति ।
अस्थैर्याज्जाग्रदेवास्ते स्वप्नस्तादृशबोधतः ।। १२।।
स्वप्न भी स्वप्न के समये स्थिरता के कारण जाग्रत् ही बन जाता है और अस्थिरता के कारण जाग्रत् स्वप्न ।
सर्ग १९
स्थिरप्रत्यययुक्तं यत्तजाग्रदिति कथ्यते ।
अस्थिरप्रत्ययं सत्स्यात्तत्स्वप्नः समुदाहृतः ।।९।। स्थिरता का जहाँ आभास हो वह जाग्रत् कहा जाता है और अस्थिरता का जहाँ हो वह स्वप्न ।
जाग्रत्स्वप्नदशाभेदो न स्थिरास्थिरते विना ।
समः सदैव सर्वत्र समस्तोेेऽनुभवोऽनयोः ।।११।।
स्थिरता और अस्थिरता को छोड कर जाग्रत् और स्वप्न में कोई अन्तर नहीं । हर प्रकार से इन दोनों का अनुभव एक समान ही है ।
इन सर्गों में क्या समझाया गयि?
नाना तरह के स्वप्नों के आने-जाने का कारण चाहे जो हो उसे देखते हुए वह सच, स्थिर, स्थाई लगता है। उस समय अधिकतर लोग उसे असत्य और भ्रम नहीं जाग्रत मानते हैं और जाग्रत को स्वप्न। व्यवहार में प्रसिद्ध जाग्रतास्था में आने पर स्वप्न की अस्थिरता प्रमाणित होती है। शरीर अपनी-अपनी बाल्यावस्था, युवावस्था, प्रौढावस्था तथा वृद्धावस्था में रहते हुए जिस स्थिरता का अनुभव करता है वह अवस्था विशेष व्यतीत होने पर स्वप्नवत लगती है। उसकी अधिकांश बाते केवल स्मृति पट पर ही नहीं रहती वरन भोग चुके व्यक्ति को अविश्वसनीय लगती है। अपरिचित व्यक्ति केवल श्रद्धा या अपने-अपने प्रयोजनवश उन बातो को सुनकर भले ही हाँ भरे प्रायः मन से नहीं मानता। व्यकि विशेष के लिए भोगी हुई अवस्था की अधिकांश बाते कुछ क्षणो में मानस पटल पर आ जाती है। अढाई तीन घंटे वाले चलचित्र में सारी अवस्थाओं से भरी कहानी दिखती है। स्थिरता की यही कहानी सपने में दिखती है।
श्लोक मे अस्थिरता बाद का प्रयोग क्रम से समझाने के लिए हुआ है। चूंकि जाग्रत के प्रति अवधारणा मन में जमी रहने के कारण वह स्वप्न से अलग ही दिखती है इसीलिए इसे क्रम से समझाना जरूरी है। जाग्रत का मिथ्याताव सरलता से स्थापित नहीं होता। इसीलिए बार - बार-बार अभ्यास करने का उपदेश दिया गया योगवासिष्ठ में।
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स्वयं का निरन्तर प्रयास या आत्माभ्यास
५. उपशम प्रकरण, सर्ग ४३ :-
आत्मा नारायणश्चैव न भिन्नौ तिलतैलवत्
तथैव शौक्ल्यपटवत् कुसुमामोदवत् तथा ॥५।।
शरीर दिखने में ठोस पदार्थों का बना हुआ लगता है। ध्यान से समझने पर यह बात पकड में आती है की इसमे ठोसपन नहीं केवल तरंगे है। प्रचलित मान्यतानुसार ऐसे तरंग रुपी शरीर में आत्मा के वास को नारायण शब्द से लक्षित किया गया है। जिस तरह तिल में तेल, वस्त्र में तन्तु, पुष्प में सुगंध ( खुश करने की वृत्ति) है वैसे ही आतमतत्व तथा शरीर का संबंध है।
यो हि विष्णुस् स एवात्मा यो ह्य् आत्मा स जनार्दनः ।
विष्ण्वात्मशब्दौ पर्यायौ यथा विटपिपादपौ ॥६।।
प्रह्लादनाम्ना प्रथमम् आत्मैव स्वयम् आत्मना ।
स्वयैव शक्त्या परया विष्णुभक्तौ नियोजितः ॥७।।
प्रह्लादो ह्य् आत्मनैवैतं वरम् अर्जितवान् स्वयम् ।
स्वयं विचारं कृतवान् स्वयं विजितवान् मनः ॥८।।
कदाचिद् आत्मनैवात्मा स्वयं शक्त्या विबोध्यते ।
कदाचिद् विष्णुदेहेन भक्तिलभ्येन बोध्यते ॥९।।
विष्णु शब्द को नाम रुप में बाँधने के बदले उसके लक्ष्यार्थ को देखना चाहिए जिसके आनुसार वह संचालन भाव से सबमे व्याप्त है। ज्ञानी भक्त प्रह्लाद ने अपने विवेक के चलते विचारवान बन स्वयं में स्थित होकर विष्णु भक्त कहलाए। कभी कभी स्वयं ही अपनी ही शक्ति से अपना बोध हो जाता है और कभी कभी विष्णुदेह की भक्ति से बोध की ओर बढता है पर वहाँ स्वयं का आत्माभ्यास ही सफल होता है। (६,७,८,९)
चिरम् आराधितोऽप्य् एष परमप्रीतिमान् अपि ।
नाविचारवतो ज्ञानं दातुं शक्नोति माधवः ॥१०।।
विचारहीन व्यक्ति भले ही जितनी पूजा -पाठ - अर्चना कर ले उसे माधव तक ज्ञान नहीं दे सकते। बाहरी क्रियाएँ सहायक कारण है पर वे स्वयं ज्ञान कराने में स अक्षम है।
मुख्यः पुरुषयत्नोत्थो विचारस् स्वात्मदर्शने ।
गौणो वरादिको हेतुर् मुख्यहेतुपरो भव ॥ ११।।
आत्मज्ञान या आत्मदर्शन के जिज्ञासु को यहाँ मुख्य पुरुष कहा गया है। आवश्यकता जिसको है वही मुख्य। पुरुष शब्द में स्त्री-पुरुष दोनों है। आत्मज्ञान या आत्मदर्शन में ईश्वर से प्राप्त वरादि गौण हेतु है अतः मुख्य हेतु का सेवन (अभ्यास) करना चाहिए। गौण हेतु (कारण / उपाय) पर निर्भर न रहे।
पूर्वम् एव बलात् तस्माद् आक्रम्येन्द्रियपञ्चकम् ।
अभ्यासात् सर्वयत्नेन चित्तं कुरु विचारवत् ॥१२।।
इसलिए पहले बल रुपी लगातार अभ्यास से पञ्च ज्ञानेन्द्रियों को अन्तर्मुखी करते हुए मन को विचारशील बनाना चाहिए। यहाँ विचार शब्द विवेकशील बनने के लिए आया है।
यद् यद् आसाद्यते किञ्चित् केनचित् क्वचिद् एव हि ।
स्वशक्तिसम्प्रवृत्त्या तल् लभ्यते नान्यतः क्वचित् ॥१३।।
कभी भी किसी के द्वारा कहीं भी (आत्मज्ञान) प्राप्त होता है वह उसके स्वयं के प्रयत्न से ही प्राप्त होता है अन्यथा नहीं । इसीलिए योगवासिष्ठ में प्रबल पुरुषार्थ और प्रयास की बात कई बार कही गई है।
पौरुषं यत्नम् आश्रित्य प्रोल्लङ्घ्येन्द्रियपर्वतम् ।
संसारजलधिं तीर्त्वा पारं गच्छ परं पदम् ॥१४।।
प्रयत्न का आश्रय लेकर इन्द्रियों के पर्वत (अनन्त इच्छाओं का अंबार) को लाङ्घ (अन्तर्मुखी) कर संसार रूपि सागर को तार कर परम पद को प्राप्त हो जाओ । पञ्च ज्ञानेन्द्रियों एवं मन की बहिर्मुखता को पर्वत शब्द से समझाया गया है। परम पद कोई लोक विशेष नहीं वरन आत्मसाक्षात्कार या आत्मदर्शन या उपाधि रहित आत्मज्ञान है। जिस तरह पर्वत लाँघने हेतु प्रबल प्रयास जरुरी है वैसे ही आत्मदर्शन हेतु लगातार प्रयासरत रहना चाहिए।
विना पुरुषयत्नेन दृश्यते चेज् जनार्दनः ।
मृगपक्षिगणं कस्मात् तद् असौ नोद्धरत्य् अजः ॥१५।।
बिना पुरुषयत्न यानि प्रबल पुरुषार्थ के यदि जनार्दन (भगवान्) तारते हैं तो पशुपक्षियों को क्यों नहीं तारते। समाज को दैव या ईश्वर भरोसे रहने की कुशिक्षा ने आलस्य और प्रमाद को बढाया। जब आजीविका हेतु परिश्रम जरुरी है तब यहाँ प्रश्न आत्मदर्शन का है जिसके लिए स्वयं का प्रयास ही काम आता है।
गुरुश् चेद् उद्धरत्य् अज्ञम् आत्मीयात् पौरुषाद् ऋते ।
उष्ट्रदान्तबलीवर्दांस् तत् कस्मान् नोद्धरत्य् असौ ॥१६।।
उस समय भी समाज में गुरु के नाम से भ्रमित किया जाता था। तभी कहा गया कि यदि कोई गुरू प्रयत्न विहीन अज्ञानियों को तारने में सक्षम है तो वह गुरु ऊँठ, हाथी, बैल आदि को क्यों नहीं तारता। कम से कम आत्मज्ञान, आत्मदर्शन में सक्षम गुरु तक केवल मार्ग बता सकता है और कुछ नहीं। उसका तथाकथित शक्तिपात तक काम नहीं आता इसमे । पथ पर चलना (प्रयास) शिष्यवर्ग को करना पडता है।
न हरेर् न गुरोर् नार्थात् किञ्चिद् आसाद्यते महत् आक्रान्तमनसस् स्वस्माद् यन् नासादितम् आत्मनः
।। १७।।
अगर अपने मन पर नियन्त्रित करके अपनी ही आत्मा नहीं पाई जा सकती तब न ही गुरु से न ही हरि से न ही अर्थ (धनादि) से वह महत् वस्तु पाई जा सकती है। यहाँ उन उपायों का खोखलापन दर्शाया गया जिन्हें सदा महिमामंडित किया जाता है।
अभ्यासवैराग्ययुताद् आक्रान्तेन्द्रियपन्नगात् ।
आत्मनः प्राप्यते यत् तत् प्राप्यते न जगत्त्रयात् ॥१८।।
जो वस्तु अभ्यास और वैराग्य से, इन्द्रियरूपी साँपों को आक्रान्त (नियन्त्रित) करके पाई जाति है वह तीनों जगत् में अन्य किसी उपाय नहीं पाई जा सकती। इनको धीरे-धीरे लगातार अभ्यास द्वारा अन्तर्मुखी करने की बात कही गई है। जिस तरह पाँव हीन सर्प पार्श्व-घुमावदार, सीधी और टेढी मेढी चाल में चलता है वैसे ही प्राकृतिक रुप से बनी बहिर्मुखी इन्द्रियाँ अपनी-अपनी चाल चलती है। इन्द्रियों की चाल अधिक वक्र है अपने तीनों गुण (सत्व, रज, तम) के चलते।
आराधयात्मनात्मानम् आत्मनात्मानम् अर्चय ।
आत्मनात्मानम् आलोक्य सन्तिष्ठ स्वात्मनात्मनि ॥ १९।। अपने से ही अपनी आराधना करें अपने से ही स्वयं की अर्चना करें। अपने को देख कर अपने में स्थित हो जाएं। इसम स्वयं के मूल स्वरुप को जानने की बात है कोई अलग से पूजा-अर्चना करने की नहीं। आहार-विहार व्यवहार पर नियंत्रण की बात आराधना तथा अर्चना द्वारा समझाई गई है। ऐसे अभ्यासी अपने आप से खुश रहना जानते हैं। वे औरो की उन्नति से ईर्ष्या नहीं करते और न हिंसात्मक, अनियंज्ञित, असंयमित नििरर्थक प्रतिस्पर्धा।
शास्त्रयत्नविचारेभ्यो मूर्खाणां प्रपलायताम् ।
कल्पिता वैष्णवी भक्तिः प्रवृत्त्यर्थं शुभस्थितौ ॥२०।।
यो मूर्ख शास्त्र, यत्न और विचारे से भागते हैं उसके लिए ही वैष्णवी भक्ति का आविष्कार हुआ शुभस्थिति में प्रवृत्त करवाने के लिए। शास्त्र शब्द किन ग्रंथों के लिए आया है? जो ग्रन्थ स्वशासन तथा अनुशासन की बात संगति लगाते हुए सरलता से तात्विक विवेचना करे वही यहाँ शास्त्र शब्द से कला गया है। उसीके अनुसार प्रयास (श्रवण, मनन, निदिध्यासन) ही प्रयत्न तथा अन्दरूनी जागरूक विवेक ही विचार करना है। प्रवृत्त्यर्थं शुभस्थितौ पुर्णतः बहिर्मुखी लोगों के लिए कहा गया जो आत्मज्ञान से विमुख है तथा आत्माभ्यासी बनने की बात पसंद नहीं। ऊपर से जीवन में संयमहीन आचरण का बोलबाला रहता है।
अभ्यासयत्नौ प्रथमं मुख्यो विधिर् उदाहृतः ।
तदभावे तु गौणस् स्यात् पूज्यपूजामयः क्रमः ॥२१।।
अभ्यास और यत्न ही पहली और मुख्य विधि है । उसके अभाव में पूजनादि क्रम गौण हैं ।
अस्ति चेद् इन्द्रियाक्रान्तिः किं पूजापूज्यपूजनैः ।
नास्ति चेद् इन्द्रियाक्रान्तिः किं पूजापूज्यपूजनैः ॥ २२।।
यदि इन्द्रियविजय सिद्ध है तो पूजापूज्यादि से क्या लाभ। यदि इन्द्रियविजय सिद्ध नहीं तो पूजापूज्यादि से क्या लाभ। इसे पूजा-पाठ - अर्चना का खंडन न समझा जाए। यह सब गौण साधन है जिनकी क्षमता संसार तक है। यह सब पूर्ण बहिर्मुखी समाज तक बडे तामझाम सहित करता और करवाता है। दैहिक तथा बौद्धिक आतंकवादी, मुनाफाखोरी करनेवाले तक प्रेम से पूजा-अर्चना करते है। विस्तार। हेतु उत्पत्तिप्रकरण सर्ग
6 श्लोक 11 वे की विवेचना अवश्य पढे।
विचारोपशमाभ्यां हि विना नासाद्यते हरिः ।
विचारोपशमाभ्यां च युक्तस्याब्जकरेण किम् ॥ २३।।
विचार और उपशम (मन की शान्ति) के विना हरि साधे नहीं जा सकते। शुद्ध अन्तःकरण में उनका अनुभव होता है बाकी सब कलुषित मन की कल्पना है। इसके चलते भगवान के दर्शन और उनसे संवाद की कल्पित बात बताई जाती है।
विचारोपशमोपेतं चित्तम् आराधयात्मनः ।
तस्मिन् सिद्धे भवान् सिद्धो नो चेत् त्वं वनगर्दभः ॥२४।।
विचार और उपशम से युक्त अपने चित्त की आराधना करे । उसके सिद्ध होने पर (तुम) सिद्ध हो अन्यथा (तुम) वन के गधे हो। संयमित आहार, विहार तथा व्यवहार ही चित्त की आराधना है।
क्रियते माधवादीनां प्रणयः प्रार्थनाय यत् ।
स चैव कस्मात् क्रियते न स्वकस्यैव चेतसः ॥२५।।
जो माधव (विष्णु) आदि की प्रार्थना के लिए विनम्र बनते हो तो वही अपने मन के लिए क्यों नहीं करते। मन की उग्रता को विनम्रता में बदलनै की ओर संकेत किया गया है। अधिकतर बाहरी विनम्रता का प्रचार-प्रसार होने से मन की अन्दरूनी पर्तों का मैल जमा रह गया। यह स्पष्ट दिखता है व्यवहार के समय जब ऐसे लोग समय तथा साधन यन की सफाई हेतु लगातार उपयोग बिल्कुल नहीं करते।
सर्वस्यैव जनस्यास्य विष्णुर् अभ्यन्तरे स्थितः ।
तं परित्यज्य ये यान्ति बहिर् विष्णुं न ते बुधाः ॥२६।।
सभी जनों के अन्दर विष्णु स्थित है। उसे छोडकर जो बाहर विष्णु को ढूँढते हैं वे बुद्धिमान् नहीं है। यह बोलने वाले भी बाहर अधिक ढूढते और उसे रीति रिवाज में बाँध कर संकुचित करते हैं विष्णु शब्द संचलन तथा देखरेख से संबंधित है न की वेशभूषा, धर्म, संप्रदाय, पंथ विशेष से। यहाँ हाल है कि प्रायः वैष्णव व्यवहार में अन्य पंथो के साधुओ के साथ बहुत भेदभावपूर्ण व्यवहार करते हैं।
हृद्गुहावासि चित्तत्त्वं मुख्यं सानातनं वपुः ।
शङ्खचक्रगदाहस्तो गौण आकार आत्मनः ॥२७।।
हृदय की गुहा में स्थित जो चित् तत्त्व है वही आत्मा का सनातन रूप है। शङ्खचक्रगदा हस्त वाला
रूप गौण है। यहाँ शुद्ध अन्तःकरण में होने वाले अनुभव या बोध का उल्लेख है किसी वास्तविक और काल्पनिक गुहा (गुफा) का नहीं। क्रम से श्लोक और अर्थ पढने से बात ठीक-ठीक सयझ आएगी।
यो हि मुख्यं परित्यज्य गौणं समनुधावति ।
त्यक्त्वा रसायनं सिद्धं साध्यं संसाधयत्य् असौ ॥ २८।।
जो मुख्य साधन का परित्याग कर गौण के पीछे दौडता है वह स्वतः सिद्ध रसायन का त्याग कर साध्य के पीछे दौडता है। गौण साधनों को प्रधानता देना अनुचित है। वे स्वतः सिद्ध और विश्वसनीय नहीं। आत्मज्ञान, आत्मनिष्ठ हेतु आत्माभ्यास ही प्रमुख है। उसके सहायक साधन को सबकुछ समझने से जिसके लिए अभ्यास होना चाहिए वह नहीं होता।
यस् तु वा स्थितिम् एवास्याम् आत्मज्ञानचमत्कृतौ ।
नासादयति सम्मत्तमनास् स रघुनन्दन ॥२९।।
अप्राप्तात्मविवेको ऽन्तर् अज्ञश् चित्तवशीकृतः ।
शङ्खचक्रगदापाणिम् अर्चयत्य् अमरेश्वरम् ॥३०।।
तत्पूजनेन कष्टेन तपसा तस्य राघव ।
काले निर्मलताम् एति चित्तं वैराग्यवारिणा ॥३१।।
मुख्य साधन में स्थित व्यक्ति के लिए आत्मज्ञान चमत्कार जैसा है क्योंकि इसीसे सरलता से पाया जाता है। गौण साधनो को महत्व देने से उलझन पैदा होने के साथ निष्ठा नहीं बन पाती। आत्माभ्यास से दूर विवेकहीन का चित्त (मन) अज्ञान के वश रहकर शङ्खचक्रगदा हस्त वाले रूप की अर्चना को ईश्वरीय समझता है। लम्बे समय तक उसकी पूजा करने, कष्ट सहने, तपस्मा करने जो निर्मलता संभवतः प्राप्त होती है वह वैराग्य के जल से पूरी सरलता से मिलती है।
सर्ग ५०
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
निरस्तमननानन्तसंविन्मात्रपरो भव ॥ २९ ॥
बोलने, विसर्जन,ग्रहण, पलक उठाने - गिराने, देखते, सुनने, स्पर्श, सूंघने,, श्वास-प्रश्वास, स्वप्न जैसी सभी क्रियाओं में इन्द्रियों अपने-अपने गुण (धर्म) का पालन करने की बात मानते हुए इनसे स्वयं को अलग करने की शिक्षा दी गई है। आत्माभ्यासी हेतु ऐसा आवश्यक अभ्यास व्यवहार द्वारा करते रहना चाहिए।
निर्वाणप्रकरण इस श्लोक की प्रथम पंक्ति आई है। वहाँ अभ्यास करने तथा उसके बाद की स्थिति का उल्लेख है।
सर्ग ५०
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
निरस्तमननानन्तसंविन्मात्रपरो भव ॥ २९ ॥
बोलने, विसर्जन,ग्रहण, पलक उठाने - गिराने, देखते, सुनने, स्पर्श, सूंघने,, श्वास-प्रश्वास, स्वप्न जैसी सभी क्रियाओं में इन्द्रियों अपने-अपने गुण (धर्म) का पालन करने की बात मानते हुए इनसे स्वयं को अलग करने की शिक्षा दी गई है। आत्माभ्यासी हेतु ऐसा आवश्यक अभ्यास व्यवहार द्वारा करते रहना चाहिए।
निर्वाणप्रकरण इस श्लोक की प्रथम पंक्ति आई है। वहाँ अभ्यास करने तथा उसके बाद की स्थिति का उल्लेख है।
तेजोबिन्दूपनिषत् अ० ४ श्लोक ३०
स्वयमेव स्वयं हंसः स्वयमेव स्वयं स्थितः ।
स्वयमेव स्वयं पश्येत्स्वात्मराज्ये सुखं वसेत् ॥३१॥
इसमे उन्नीसवे श्लोक का तनिक विस्तार है। हंस शब्द का प्रयोग संस्कृत साहित्य में विवेकवान पक्षी के रुप में हुआ है। इसपर चर्चित श्लोक है :-
नीर-क्षीर-विवेके हंसालस्य त्वमेव तनुषे चेत् । विश्वस्मिन्नधुनान्यः कुलव्रतं पालयिष्यति कः?
अगर हंस ही पानी और दूध को अलग करने का काम छोड़ देगा तो यह और कौन कर पाएगा? उसी भाँती समझदार लोग ही अपने विवेक रुपी कर्तव्य को नहीं निभाएंगे तब दूसरा कौन करेगा?
उपनिषद के श्लोक में विवेकशील व्यक्ति ही अपने उपाधि रहित स्वरुप के लिए लगातार आत्माभ्यास करेगा। उसके प्रति सजग रहते हुए उसमे स्थित रहेगा। यह विवेक कोई अन्य नहीं करवा सकता। अपना प्रयास ही काम आता है। इसमे साक्षीभाव बनता है जिसमे व्यक्ति स्थिति के अनुसार बहते नहीं रहता। इस पथ चलने वाले पथिकों का स्तर भले न्यूनाधिक हो अभ्यास का बल सबको संमालता है। उन सबके जीवन में संतोष तथा संयम सिद्ध होते हैं। आन्तरिक सुख - शांति रुपी राज्य में वह रहता है। जिस तरह बाहरी राज्य में नाना तरह के लोगों का आनाजाना लगा रहता और उसके फलस्वरूप नाना स्थितियाँ पैदा होती जिन्हें सुलझाना शासक का धर्म होता है वैसे अन्दरूनी राज्य में नाना तरह की वृत्तियाँ आती है। यह स्वाभाविक तथा प्राकृतिक व्यवस्था है। विवेक या आत्माभ्यास रुपी शासक व्यक्ति को संभालता है। तभी कहा जाता है कि आदत अपनी सुधार लो बस हो गया भजन।
जाबालदय्शनोपनिषद
आत्भतीर्थं समुत्सृज्य बहिस्तीर्थानि यो व्रजेत ।
परस्थं सयहारत्नं त्यक्त्वाकाचं विमार्गते।।खंड ४ मन्त्र ५०।।
आत्मज्ञान रूपी तीर्थ को छोडकर बाहर के तीर्थों के पीछे-पीछे दौडने का कार्य हाथ में प्राप्त महारत्न के विकल्प में काँच को पाने की लालसा समान है। आत्माभ्यासी हेतु ही नहीं वरन सबके लिए आत्मा पहले से प्राप्त है। बस उसे निरुपाधिक जानता है केवल मानना नहीं।
तीर्थानि तोयपूर्णानि देवान्काष्टादि निर्मितान ।
योगिनो न प्रपूज्यते स्वात्म प्रत्ययकारणात्।। ५२।।
सब तीर्थों मे जल स्रोत (झरना, नदी, सरोवर, समुद्र तट - स्थान के अनुसार) है तथा देव विग्रह काष्ट, पत्थर, धातु आदि से बने हुए हैं
बहिस्तीर्थंपरंतीर्थं मंतस्तीर्थं महामुने।
आत्मतीर्थ महातीर्थममन्यतीर्थं निरर्थकम्।। ५३।।
आत्मा रुपी तीर्थ सही रुप में पवित्र पावन तीर्थ है इस महातीर्थ से भिन्न बाकी तीर्थ निरर्थक है। पूर्व पक्ष उठाते हुए प्रश्न आया की क्मा यह एक की महिमा बढाने के लिए औरो को हेय प्रमाणित करने जैसा है? क्या पुराणो तथा उप पुराणो में ऐसा नहीं किया गया? सभी संप्रदाय, पंथ तथा संस्था अपने-अपने तीर्थ को ही श्रेष्ठ कहते हैं और श्लोक में बाह्य तीर्थो, मंत्र रुपी तीर्थ को परंतीर्थ कहा गया।
श्लोक में उदाहरण के लिए दो नाम लिए पर समझना सबके लिए है। अपने प्रचार-प्रसार हेतु बाह्य तीर्थो के समर्थक एक दुजे को नीचा दिखाते हैं जोकि एक साधारण नियम है। उन सबके लिए जो प्रशंसासूक शब्द का प्रयोग हुआ वह व्यंग्य होने के साथ-साथ उनके लिए है जो बाह्य साधनो को सबकुछ समझते - समझाते है। सरल, सहज, सुगम आत्मज्ञान को अपनाना तथा आत्माभ्यासी बनना ही उचित है। तीर्थ शब्द का अर्थ ही होता है पार करना और अज्ञान अविद्या से पार पाने के लिए आत्मा रुपी तीर्थ बहुत है। यहाँ एक आक्षेप उठता है की नदी पार करने के लिए नाव तीर्त है तब आत्मतीर्थ बडा कैसे हुआ? जो पार या गन्तल्य तक पहुँचाए वही तीर्थ और जाना हैं धाम (उत्तराखंड और अन्य राज्यों के अपने-अपने धाम -> मुख्य धार्मिक स्थल) तब आत्मतीर्थ महान कैसे हुआ? यह उस स्थिति में ले जाता है जो अन्य किसी माध्यम (तीर्थ) से संभव नहीं। इसके लिए प्रमुख साधन आत्माभ्यासी व्यक्ति का अपना शरीर है। व्यवहार में धाम (गंगोत्री, यमुनोत्री, आदि) हेतु तीर्थ शब्द का प्रयोग होता है। यह सर्वविदित तथ्य है कि आत्मा, शरीर का अपना अलग अस्तीत्व नहीं और सयझानै के लिए इनका प्रयोग किया जाता है। तब क्या प्रमुख साधन के रूप में आत्माभ्यासी का शरीर तीर्थ हुआ? जैसे अन्य साधन ठीक से बने हुए होने चाहिए (आसन, मादा, रास्ता, नाव, जलयान, आदि) वैसे ही अभ्यासी का शरीर होता है। संयमित जीवन शैली को अपनाने वाले आत्माभ्यासी हेतु उसका शरीर तीर्थ है। इससे वह आत्मज्ञान मे समझाई स्थिति तक पहुँचा और फिर सतत अभ्यास द्वारा जान लेना की अलग से कही कुछ नहीं। नाम रुपात्मक जगत केवल शब्द तथा भ्रम जाल है। न आत्मा अलग से कोई तत्व और न वह ब्रह्म से भिन्न है। जब चार्वाक दर्शन में शरीर को महत्व दिया गया तब वहीं संयमित जीवन शैली वाले आत्माभ्यासी के शरीर की बात है। असंयमित व्यक्ति का स्वास्थ्य (अन्दरूनी - बाह्य) ठीक नहीं रहता। देखा यही जाता है कि ऐसे व्यक्ति का आत्मिक बल न्यूनतम रहता है तब वह आत्माभ्यासी कभी नहीं हो सकता।
भागवत महापुराण में इस प्रसंग पर कहा गया -
तपस्तीर्थं तपोदानं पवित्राणि तराणि च ।
नालंकुर्वंति तां सिद्धि या कलया कृत।।११.१९.४।।
जो समाधान आत्मज्ञान के अंश मात्र से होता है वह तप, बाह्य तीर्थ जप (मारा, मानसिक), दान तथा दुसरे चर्चित उपायो बिल्कुल नहीं हो सकता।
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इतनी सरल विधि होते हुए कठीन, श्रमसाध्य, व्यय प्रधान साधन क्यों बताए जाते हैं। बतलाने वाले औरों को अपने-अपने तक रखना चाहते हैं। अब शारीरिक रुप से सक्षम भूखों के लिए रोज भोजन बाँटना अच्छा लगता है पर उन्हे आजीविका की ओर प्रेरित करना ठीक नहीं लगता। अगर लोग समझदार हो गए और अपनी-अपनी रोजी-रोटी की व्यवस्था करने लगे तो तथाकथित दानवीरों का नाम कैसे होगा? रोज खाने वाला दो चार काम तक मुफ्त में करेगा। इसीलिए आत्मज्ञान को या तो छिपाया गया नहीं तो गौण साधनो को महिमामंडित कर औरों को अपने-अपने जाल ये फँसाया गया।
पैंगलोपनिषद
अमृतेन तृप्तस्य पयसा किं प्रयोजनम् ।
एवं स्वात्मानं ज्ञात्वा वेदैः प्रयोजनं किं भवति ।। ९।।
अमृत से तृप्त हुए व्यक्ति को अन्य पेय पदार्थो की आवश्यकता नहीं। वैसे ही आत्मज्ञान पश्चात वेद पढने से क्या होगा?
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