Wednesday, 23 September 2020

आयुर्वेद, आहार विज्ञान और जमीनी सच्चाई

 आतंकवाद के नाना भेद हैं और जिनमें अन्दरूनी वाले पर कम चर्चा होती है। भुले भटके हो जाए तब भी उसमें क्षेत्र, वर्ग, भाषा अपने पराए का भेद हावी रहता है। यह देशभक्ति कदापि नहीं। अधिकतम मुनाफे की बात समझाने वाले फिर क्या हैं? क्योंकि उसके लिए जो खेल खेला जा रहा है उसपर भी तनिक गौर करें। 

आँख फेरने या बंद करने या विवेकहीन सकारात्मकता का जाप करने से खतरा खत्म नहीं होगा। यह मुखौटा उतारने का प्रयास नहीं वरन आम व्यक्ति का उद्गार जो अनुत्तरित रहता है। केवल विदेशियों को कोसने से यहाँ वाले दूध के धोये प्रमाणित नहीं होते। थोडे उदाहरणों द्वारा वादों और दावों को जाँचने का प्रयास।

केवल अंग्रेजी या एलोपैथी में नहीं इसमें भी फँसे रहने की सम्भावना काफी है जहाँ एक रोग निवारण हेतु दी गई दवा ने अन्य मुश्किलें धीरे-धीरे पैदा कर दी। आयुर्वेद का विषम या दुष्प्रभाव न होने का दावा इस साहित्य के प्राचीन संस्करणों में नहीं है। यूँ भी पथ्य परहेज के बिना तो नुकसान होना ही है। प्रकृति या तासीर के विपरीत औषध बहुधा मुश्किल बढाती है। यह विधा शरीर की प्रकृतिनुसार चिकित्सा करती है रोग के नामपर नहीं। सप्त धातु (रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र) में दोष उत्पन्न होने से रोग पैदा होते हैं। दोष पैदा होते हैं वात, पित्त, कफ में से किसी एक या दो या तीनों के कुपित (स्थान, काल, स्थितिनुसार) होने पर। अतः केवल रोग के नामपर औषधि सेवन अनुचित है। देखादेखी तो बिल्कुल नहीं क्योंकि एक जैसे रोग होनेवाले सारे रोगियों की पृष्ठभूमि, कारण, तासीर अलग - अलग है।

धातुओं की भस्म गलत प्रभाव दिखाती है - सबसे साधारण शिकायत उदर और हजम सम्बन्धित होती है। नेत्र चिकित्सा में लौह भस्म दी जाती हैै जोो प्रायः पेट साफ न होने की दिशा में मामला बढा देतीी है। वयोवृद्ध वैद्य तक इसपक्ष पर विचार कम करते हैं। जब कई जगह कहा तब कब्ज आदि होने की बात स्वीकार करते हुए और औषधियाँ बताने लगे। यह केवल अक्षय चैतन्य का नहीं वरन नेत्र रोग सह रहे बहुतों का अनुभव है। यह एक ही भस्म के साथ याा बिनाा शोधन के प्रयोग हो ऐसा नहीं है। 

 आयुर्वेद या आहार विज्ञान का अधुरे मन से तैयार पाठ्यक्रम पढने मात्र से व्यक्ति कमाने लायक होता है। दावे करने का अधिकारी बनता है। विवेकहीन तथा विश्लेषण हीन प्रामाणिकता का दिखावा करता है। कई लोग चैनल या छोटा-मोटा पाठ्यक्रम चलकार बौद्धिक विलास फैला रहे हैं । वे अपने चैनलों में औरों पर असली आयुर्वेद पढाने या प्रचार करने का दम्भ और दिखावा करके अपने समर्थक जुटा लेते हैं । जैसे ग्रन्थ दिखाना, श्लोक पढना और अर्थ कहकर वे अपनी विद्वता दिखाते हैं और खुलकर कहते हैं कि आप किसीसे भी प्रमाण पुछिये और वह सही में पढा है की नहीं यह जानकारी लें। सुनने में बात अच्छी लगती है पर यह धौंस जमाना है संस्कृत के नामपर क्योंकि उसके श्लोक सुनते मन झुमने लगता है। भारत में यह भाषा आकर्षण का केन्द्र है और धंधेबाज जानते हैं लोगों की कमजोरी। यूँ भी युवाओं में एक रोग पैदा हुआ है प्रमाण जानने का। अधिकांश का प्रश्न रहता है कि क्या यह शास्त्र में है मानो वे स्वयं कितने पढेसरी हैं। केवल 'लिखा रहने' से कुछ नहीं होता। सही अर्थों में वह पुस्तक कितनी प्रामाणिक है या उसका वर्तमान संस्करण कहाँतक सही या उसमें जोडे हुवे श्लोक (क्षेपक) या समयानुसार लिखे कई नुस्खे या वे प्रायोजित नुस्खे जो उद्योगपतियों का घर भरते हैं - इनपर चर्चा करने पर तथाकथित शास्त्रपशु या भारवाही या दिखावटी शास्त्रप्रेमी या तथाकथित आयुर्वेद वाले ((सब नहीं)) बिदक जाते हैं। प्रशिक्षण केन्द्रों (महाविद्यालय आदि) की बात अलग है। वे केवल पढा रहे हैं। चैनलों आदि द्वारा जानकारी परोसने से क्या होगा। सही अर्थों में यह किसलिए? केवल अनभिज्ञता हटाने या नया भ्रमजाल फैलाने ? क्योंकि आपने तो अपना ज्ञान बघार या झाड दिया या साँझा किया पर शहद, घी, दूध असली नहीं रहे। फल, सब्जियों तथा मसाले तक विश्वसनीय नहीं रहे। दोष कमोबेस सबका है जिन्हें यह चीजें हर समय ताजे दिखने वाली चाहिए और ऊपर से सस्ते। आपलोग परे रहते हैं इन मुद्दों से और पल्ला झाड लेते हुए कुछ का कुछ बोलते हैं । आखिर यह पाठ्यक्रम में नहीं रहता। वह तो रोजी-रोटी के लिए तैयार करता है। 

 

हल्दी में लैड क्रोमेट की मिलावट की जाती है जो केमिकल कंपाउंड है। हल्दी में रंग और चमक बढ़ाने के लिये इसका इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा मक्के का पाउडर और चावल की कनकी मिलाई जा रही है। देश में बिकने वाली अधिकतर चमकदार और तनिक गाढे पीले रंग की हल्दी केवल नाम की हल्दी है। 


मसालों के मामले में स्टार्च एक आम मिलावट होती है। मिर्च में लाल रंग, फटकी, चावल की भूसी मिलाई जा रही है। धनिये में हरा रंग, धनिए की सींक मिलाना आम बात है। अमचूर में अरारोट, कैंथ, चावल की कनकी मिलाई जा रही है। काली मिर्च में पपीते के बीज तथा पिसी (महीन) काली मिर्च में लाल मिर्च (पिसी हुई) मिलाई जाती है। जीरा में सोया के बीज बहुतायत में मिलाए जा रहे हैं (बहुधा पीसे हुए में)। फूल झाड़ू की घास से बने जीरे की धरपकड हुई पर वही ढाक के तीन पात। 

दालचीनी सामान्य तौर पर बहुत सस्ती कैसिया छाल के साथ बदली जाती है।दालचीनी की छाल बहुत पतली होती है और इसकी गंध अलग होती है। कैसिया की छाल कठोर और मोटी होती है। इससे कभी किसी भी प्रकार की खुशबूदार गंध नहीं आती। आजकल अलग से सुगंध मिलाई जा रही है। 

 कत्थे में प्रतिबंधित रंग, अफीम या अन्य नशीली चीज मिलाई जाती है बिक्री बढाने के लिये। खोवा तो खुल्लमखुल्ला तेल, युरिया, सुगंध, अरारोट आदि से बनता है। पकडे जाने पर दो एक व्यापरियों ने कहा कि यह ऐसे ही बनता है। जहाँ एक लीटर शुद्ध दूध से लगभग १७० ग्राम मावा (खोवा) बने वहाँ एक किलो मावा दो से चार सौ रुपये किलो बिकना मिलावट का फल है। हिसाब के लिये दोसौ ग्राम मावा और दूध का दाम ४० रुपये (कम से कम) लें तो एक किलो के लिए ५ लीटर दूध लगेगा। ईंधनादि का खर्चा तथा मुनाफा मिलाकर तो असली मावा नहीं बनेगा। अब दिखाने के लिए दाम बढाने से खोवा असली नहीं हो जायेगा। हींग में मैदे की मात्रा काफी होती है। कई जगह पूरा खेल रसायन, रंग, सुगंध, मैदे से खेला जाता है। 

 लौकी, करेला और कद्दू में ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन लगाए जा रहे है। यह अन्य तरीकों से भी हो रहा है। पश्चिम भारत के एक बडे किसान ने लौकी का प्रचार करने वाले उद्योगपति बाबा को जमीन दान में दी। श्रद्दावश नहीं वरन इसके चलते उसकी लौकी की फसल का बाजार चल निकला। यह लगभग तीन दशक पहले की घटना है। 

प्रायः हरी सब्जियों में प्रयुक्त प्रतिबंधित हरा रंग स्नायु रोगदि में वृद्धि कर रहा है। आपको भी रोज ताजा धनिया या पोदीना पत्ता चाहिये। नहीं तो मोलतोल करने लगते हैं। यही स्थिति अन्य सब्जियों की है जो न बिक पाने के चलते बहुधा रंगीन जल में डुबा कर ताजा दिखाई जाती है। फूलगोभी रसायन से धोकर सफेद की जाती है जबकी सही म वह मैदानी क्षेत्रों में पीलेपन लिये पैदा होती है। कई जगह पहले ही दवा देते हैं ताकि वह सफेदी दिखे। बन्दगोभी में पहले से दवा दी जाती है ताकि कीडे न लगे। छिड़काव तो अलग से होता ही है। अदरख को तेजाब से धोया जाता है ताकि वह साफ सुथरी दिखे। बिना धोई अदरख के स्वाद अलग होता है। 

दूध की मात्रा तथा गुणवत्ता बढाने के लिये गायों को रासायनिक दवा खिलाना क्या उचित है? ऊपर से आरारोट, बटर आयल, बताशा, रंग, सुगंध, रसायन (नकली दूध बनाने हेतु), डिटर्जेंट पाउडर, युरिया का प्रयोग सात्विक दूध नहीं दे सकता। सरकारी तंत्र तक नकली दूध की मात्रा ((७५% के पास)) मान चुका है। शहरों में पैकेट (गत्ते के डिब्बे) में बिकने वाला दूध दो माह तक टिकने का दावा करता है। वह गाय का दूध कदापि नहीं। चाहे जितनी उच्च तकनीक हो असली दूध टिक नहीं सकता ((भले भैंसादि का )) और वह भी इतने बडे पैमानेे पर लगातार उत्पदन संभव नहीं।  प्लास्टिक की थैली में बिकने वाला दूध नाम का दूध है। जल + सुखा मेलामाइन + चर्बी मिलाकर दूध बन ही रहा है। मेलामाइन में नाइट्रोजन की मात्रा अधिक रहती है जो खाद्य पदार्थ में प्रोटी की मात्रा बढा देता है। सुखा सफेद रंग + जल + एक छोटी थैली वाला दूध से बनने वाली चाय नुकसान करेगी। ऊपर से तनिक इलायची चुरा छिडक कर अधिक मूल्य में बेचना उचित नहीं। 

वनस्पति तेल को तकनीक से घी तथा गुणवत्ता हेतु रंग, सुगंध, आरारोट, भैंस का दूध, आदि मिलाना या भैंस के दूध से बने घी में नाना चीजें मिलाकर गाय के दूध का घी बतलाना कितना साथ निभायेगा। गाँवों में जब ११०० से ऊपर की लागत आती है तब शहरों में सस्ता बिकने वाला घी क्या है? जबकि गाँवों में भी ठगने वाले कम नहीं। वहाँ भी भैंस का दूध मिलाया जाता है। शहद नींबू के पुष्प, रंग, सस्ता गुड या चीनी, सुगंधादि से बडे पैमाने पर बन रहा है। पहले वह पेडों से लटकने वाले मधुमक्खी के छत्तों से मिलता था। आजकल काठ या धातु की पेटी में मधुमक्खी पाली जाती है और उसे अलग - अलग तरह का भोजन दिया जाता है। अब प्राकृतिक ढंग से पैदा होनेवाले पुष्प तक सब जगह और बडी संख्या में नहीं है। ऊपर से गुणवत्ता कम हो चुकी है। पहाडी क्षेत्रों में दो एक जगह दुकानदार ने बतलाया कि वे स्वयं आम या लीची या अन्य चीजों के बुरादे (या अन्य तकनीक) से शहद बनवाते है मधुमक्खियों से। यह होता है मधुमक्खी पालन उद्योग में जहाँ चारेे केे रुु में बुरादा दिया जाता है। उन्होंने पूछा भी था - 'कौन-सा शहद चाहिये' - तब यह बात खुली। जब उत्पादन शैली से मेल खानेवाले नियमादि होगें तब जाँच के मापदण्ड इनका समर्थन करेंगे। अब समय की माँग है - यह उचित है पर ऐसे दूध, घी, शहद आयुर्वेद का साथ कितना देंगे। कम से कम ऐंठन न दिखायें। 

फलों में चमक के लिए मोम की पॉलिश, पकाने के लिए प्रतिबंधित रसायन तक का इस्तेमाल हो रहा है। सुगन्ध हेतु सेव पर छिड़काव उचित नहीं है। समय से पहले तैयार करना या कीड़ों से बचाने के नामपर हानिकारक रसायनों का छिडकाव उनकी गुणवत्ता पर असर डालता है। पहले लीची में कीडे मिलने आम बात थी पर आजकल नहीं के बराबर दिखते हैं। कुछ जगहों में सेव पर लाल रंग का छिडकाव होता है (२-४ बार)। प्रारंभ में वह हरे रंग की होती है जो अधिक दिनों तक नहीं टिकती। पहले सेव काट कर रखने से रंग परिवर्तन होना स्वाभाविक बात थी। उसमें स्थित लौह बाहर की हवा (आक्सीजन) के साथ मिलकर यह प्रभाव दिखाती थी जिसे दवाओं की सहायता से अप्राकृतिक कर दिया गया है। करौंदे को मशीन से काटकर, रंग, सुगंध द्वारा चैरी का रुप दिया जाता है जो मिठाई, केक आदि में प्रयुक्त होती है। आजकल तो फलों के आकार बढाने की वृत्ति बढ गई है।

किशमिश में रंग, गंधक का धुआँ जैसी गैर सेहतमंद चीजें मिलाई जा रही है। नमकीन मेवे ((कुछ उत्पादक)) बिक्री हेतु उन रसायनों का प्रयोग करते हैं जिससे बार - बार खाने का मन करे। भारतीय और आसपास के देशों के बादाम तथा अखरोट उतने मीठे नहीं होते जितने अमरीका के जहाँ मिठास बढाने हेतु रसायनों का प्रयोग फसल तैयार होने के पहले हो जाता है। गुरबंदी और मामरा बादाम में उनसे मिलते-जुलते दाने ((बीज)) मिलाये जाते हैं। यह ठीक है कि उनमें मिठास नहीं होती पर उतनी कडवाहट भी नहीं जो मिलावट से बढती है। दिल्ली के एक व्यापारी से संपर्क करने पर उसने मामरा के कडुवे स्वाद की बात स्वीकारी पर गुरबंदी पर मुकर गया। जब उसीके ठप्पे लगे हुए ((गुरबंदी के डिब्बे)) की बात कही तब जवाब ही नहीं दिया। गुरबंदी तो कई मामरा को कडवा मानते हैं। न एक जैसा आकार न वजन, ऊपर से गिरी बेचकर असली होने का दावा उचित नहीं। मूंगफली के दानों को पहले मशीन से खास तरह से काटा जाता है फिर इन दानों को रंगकर इन्हें पिस्ता और बादाम की कतरन की शक्ल दी जाती है। अंजीर को रसायनों से धोकर प्रसंस्करण के नामपर रसायनों का प्रयोग प्राकृतिक गुणवत्ता चौपट करती है। यही प्रसंस्करण /प्रोसेसिंग अखरोट की गिरी के डिब्बे पर विस्तार से लिखी होती है। उचित यही है कि लोग साबुत खरीदें। स्वास्थ्य की दृष्टि से नमकीन बादाम, काजू घरपर तैयार हो सकते हैं। आकर्षक दिखाने के लिए बादाम की गिरी पर गेरुआ रंग या चॉक-मिट्टी से पॉलिश की जाती है और केमिकल लगाया जाता है। आप साबुत यानि बाहरी आवरण / खोल सहित बादाम खरीदे। कई जगह दुकानदार जानकर गिरी रखते हैं। ग्राहक समय और श्रम बचाने के लिए गिरी खरीद कर नुकसान में रहता है। 

 सरसों तेल में राइस ब्रान तेल, पानी, पॉम आयल, सस्ता रिफाइन, रंग आदि मिलाया जाता तथा गन्ध हेतु तेजाब की मिलावट ((तेजाब को सत्तर साल हो गये मिलते हुए सरसों तेल में))। एक उत्पादक ने बताया कि तेजाब मिलाते वक्त ((प्रायः रात को)) कर्मचारी मास्क पहन लेते हैं। उस समय वे ((मालिक)) अपने बच्चों को कारखाने की तरफ जाने नहीं देते। आजकल तो अन्य साधन उपलब्ध हैं गन्ध हेतु। लगभग तीन किलो सरसों की पेराई कराने पर निकलता है एक लीटर तेल। स्वयं हिसाब लगाएं उसके मुल्य का। 

मिट्टी आदि में रंग मिलाकर नकली कुमकुम तैयार होता है। साधारण आटे और सफेद पाउडर में मैटानिल पीला रंग मिला कर धड़ल्ले से नकली बेसन तैयार किया जा रहा है। यह नकली बेसन असली चने के बेसन के मुकाबले ज्यादा पीला और खूबसूरत भी नजर आता है।बेसन में खेसारी और मक्के के आटे और रंग की मिलावट हो रही है। खेसारी कई दालों में मिलाई जाती है। दालों को तरोताजा दिखाने के लिए पाउडर की पाॅलिश साधारण बात है। कई साबुत दालों में उनके आकार के पत्थर के टुकडे मिलाये जाते हैं। 

कुछ शहरों में भिखारियों को रोटियाँ दी जाती हैं जो सुखा कर बेची जाती है और जिनका चुरा बना चीनी मिलाकर मिठाई सजाने या किमती नमकीन भजिया को आकर्षक बनाने के लिये हल्का सा नमक मिलाकर छिडका जाता है। वहाँ चीनी नहीं मिलाते। गर्म तथा तेल मिश्रित भजिया में वह चुरा चिपक जाता है। इस चुरे अन्य प्रयोग भी हैं। 

आजकल अधिकांश शहरों में बिना सुगन्ध की मिठाई नहीं मिल रही। यूँ भी बासी मिठाई को पीसकर मीठे समोसे बनते ही हैं ऊपर से घटिया चीजों से बनी मिठाई को गन्ध द्वारा सुधारा जाता है। अब दुकानदार क्या करे - माल प्रायः पडा रहता है और लोगों को हर समय ताजी मिठाई चाहिए। हानिकारक रंगों का प्रयोग धडलाले से हो रहा है। इमरती जलेबी बिना रंग की मिलनी आसान नहीं। 

ऊपर से कई वर्षों से यह प्रयोग हो रहा है :- बीटी फसलों में टॉक्सिन (जहर) बनाने वाली जीन डाली जाती है, जो मिट्टी में पाए जाने वाले एक बैक्टीरिया बैसिलस थूरिजेनेसिस (बीटी) में पाई जाती है। इससे तैयार होने वाली फसल बीटी फसल कहलाती है। यह जीन फसलों पर खुद जहर बनकर उन पर लगने वाले कीट को मार देती है। ऐसी फसल में एक जैसे साफ दिखने वाले दाने (मकई) आदि मोहक लगते हैं पर वे स्वास्थ्य के प्रतिकूल है। दुर्भाग्य से इनका प्रयोग धडल्ले से निजी आयुर्वैदिक अस्पतालों में भोजन बनाने में होता है ताकि बडी रकम आसानी से ली जा सके। इससे होनेवाली हानियाँ गिनाने के साथ उपरोक्त समस्याओं पर विचार करना चाहिए।

जबतक पाँचों तरह के खाद्य (शब्द, स्पर्श, रुप, रस, गन्ध) पर पकड नहीं होगी तबतक समाज भ्रमित रहेगा। वजन घटाने या बढाने की दुकानदारी जोरों पर है जो स्थाई समाधान नहीं देती वरन नए उत्पात पैदा करती है। ऊपर से खान-पान पर दबंगई का कहना ही क्या। उसपर तथा प्याज लहसुन पर वीडियो है - सुनें - गुने।

खान-पान में दबंगई

https://youtu.be/UUSjbmrZlv4

प्याज लहसुन के नामपर धार्मिक राजनीति आयोजित तथा प्रायोजित है ।

https://youtu.be/HdvB57e9j-c

Among the types of terrorists and the internal ones are less discussed. Even if it is done accidently or by chance the differences of region, class, language, status, thine - mine, ours - others dominate the discussion. This is not patriotism at all. Then what about those who talk about maximum profit / profiteering instead of profit?The game that is being played for that should also be considered for discussion.The danger will not end by turning away or closing the eyes or chanting irrational positivity. This is not an attempt to remove the mask but the expression of the common man which remains unanswered. People here are not proved to be innocent by merely cursing the foreigners. An attempt to test the promises and claims through a few examples.


There is a high possibility of getting trapped not only in allopathy but also in this where the medicine given to cure one disease, gradually creates other problems. The claim of Ayurveda not having side effects or adverse effects is not written in the ancient versions of this literature. Anyway, without proper diet and abstinence, there are bound to be side effects. Medicine against nature or effect often increases the problem. This method treats according to the nature of the body and not in the name of the disease. Diseases arise due to defects in the seven dhatus (rasa, blood, flesh, fat, bone, marrow, semen). Defects arise when one or two or all three of vata, pitta, kapha get aggravated (depending on place, time and situation). Hence, it is improper to take medicine only in the name of disease. It is definitely not imitating because the background, cause and effect of all the patients suffering from the same disease are different.


Bhasma of dhatus shows wrong effects - the most common complaint is related to stomach and digestion. In eye treatment, iron bhasma is given which often worsens the condition in the direction of constipation. Even old doctors give less thought to this aspect. When asked at many places, few accepted the fact of constipation etc., started prescribing other medicines. This is not only the experience of Akshay Chaitanya but also of many patients suffering from eye diseases. It is not necessary that it happened with one bhasma and others are safe happened due to the defective purification of bhasma. 



 आयुर्वेद या आहार विज्ञान का अधुरे मन से तैयार पाठ्यक्रम पढने मात्र से व्यक्ति कमाने लायक होता है। दावे करने का अधिकारी बनता है। विवेकहीन तथा विश्लेषण हीन प्रामाणिकता का दिखावा करता है। कई लोग चैनल या छोटा-मोटा पाठ्यक्रम चलकार बौद्धिक विलास फैला रहे हैं । वे अपने चैनलों में औरों पर असली आयुर्वेद पढाने या प्रचार करने का दम्भ और दिखावा करके अपने समर्थक जुटा लेते हैं । जैसे ग्रन्थ दिखाना, श्लोक पढना और अर्थ कहकर वे अपनी विद्वता दिखाते हैं और खुलकर कहते हैं कि आप किसीसे भी प्रमाण पुछिये और वह सही में पढा है की नहीं यह जानकारी लें। सुनने में बात अच्छी लगती है पर यह धौंस जमाना है संस्कृत के नामपर क्योंकि उसके श्लोक सुनते मन झुमने लगता है। भारत में यह भाषा आकर्षण का केन्द्र है और धंधेबाज जानते हैं लोगों की कमजोरी। यूँ भी युवाओं में एक रोग पैदा हुआ है प्रमाण जानने का। अधिकांश का प्रश्न रहता है कि क्या यह शास्त्र में है मानो वे स्वयं कितने पढेसरी हैं। केवल 'लिखा रहने' से कुछ नहीं होता। सही अर्थों में वह पुस्तक कितनी प्रामाणिक है या उसका वर्तमान संस्करण कहाँतक सही या उसमें जोडे हुवे श्लोक (क्षेपक) या समयानुसार लिखे कई नुस्खे या वे प्रायोजित नुस्खे जो उद्योगपतियों का घर भरते हैं - इनपर चर्चा करने पर तथाकथित शास्त्रपशु या भारवाही या दिखावटी शास्त्रप्रेमी या तथाकथित आयुर्वेद वाले ((सब नहीं)) बिदक जाते हैं। प्रशिक्षण केन्द्रों (महाविद्यालय आदि) की बात अलग है। वे केवल पढा रहे हैं। चैनलों आदि द्वारा जानकारी परोसने से क्या होगा। सही अर्थों में यह किसलिए? केवल अनभिज्ञता हटाने या नया भ्रमजाल फैलाने ? क्योंकि आपने तो अपना ज्ञान बघार या झाड दिया या साँझा किया पर शहद, घी, दूध असली नहीं रहे। फल, सब्जियों तथा मसाले तक विश्वसनीय नहीं रहे। दोष कमोबेस सबका है जिन्हें यह चीजें हर समय ताजे दिखने वाली चाहिए और ऊपर से सस्ते। आपलोग परे रहते हैं इन मुद्दों से और पल्ला झाड लेते हुए कुछ का कुछ बोलते हैं । आखिर यह पाठ्यक्रम में नहीं रहता। वह तो रोजी-रोटी के लिए तैयार करता है। 


 


हल्दी में लैड क्रोमेट की मिलावट की जाती है जो केमिकल कंपाउंड है। हल्दी में रंग और चमक बढ़ाने के लिये इसका इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा मक्के का पाउडर और चावल की कनकी मिलाई जा रही है। देश में बिकने वाली अधिकतर चमकदार और तनिक गाढे पीले रंग की हल्दी केवल नाम की हल्दी है। 


मसालों के मामले में स्टार्च एक आम मिलावट होती है। मिर्च में लाल रंग, फटकी, चावल की भूसी मिलाई जा रही है। धनिये में हरा रंग, धनिए की सींक मिलाना आम बात है। अमचूर में अरारोट, कैंथ, चावल की कनकी मिलाई जा रही है। काली मिर्च में पपीते के बीज तथा पिसी (महीन) काली मिर्च में लाल मिर्च (पिसी हुई) मिलाई जाती है। जीरा में सोया के बीज बहुतायत में मिलाए जा रहे हैं (बहुधा पीसे हुए में)। फूल झाड़ू की घास से बने जीरे की धरपकड हुई पर वही ढाक के तीन पात। 


Just by studying a half-hearted course on Ayurveda or dietetics, a person becomes capable of earning money. He becomes eligible to make claims. He pretends to be authentic without any discretion and analysis. Many people are spreading intellectual luxury by running channels or small courses. They gather their supporters by showing off and boasting of teaching or promoting real Ayurveda on their channels. For example, by showing books, reading shlokas and telling their meanings, they show off their scholarship and openly say that you can ask anyone for proof and find out whether he has really read it or not. It sounds good but this is bullying in the name of Sanskrit because the heart starts dancing on hearing its shlokas. This language is the center of attraction in India and the businessmen know the weakness of the people. Anyway, a disease has developed among the youth to know the proof. Most of them ask whether it is in the scriptures, as if they themselves are so educated. Nothing happens just by 'having it written'. How authentic is that book in the true sense or to what extent is its current version correct or the shlokas (interpolations) added to it or the many remedies written according to time or the sponsored remedies which fill the coffers of industrialists - on discussing these, the so-called Shastra Pashus or the burden bearers or the pretentious Shastra lovers or the so-called Ayurveda people ((not all)) get angry. The matter of training centers (colleges etc.) is different. They are only teaching. What will be achieved by serving information through channels etc. What is this for in the true sense? Only to remove ignorance or to spread a new web of confusion? Because you have bragged or shown off or shared your knowledge but






 honey, ghee, milk are not real. Even fruits, vegetables and spices are not reliable. The fault is more or less of everyone who wants these things to look fresh all the time and on top of that to be cheap. You people stay away from these issues and while shrugging off the responsibility, say all sorts of things. After all, this is not in the curriculum. It is prepared for livelihood.


Turmeric is adulterated with lead chromate which is a chemical compound. It is used to increase colour and shine in turmeric. Apart from this, corn powder and rice bran are being added. Most of the bright and slightly dark yellow coloured turmeric sold in the country is turmeric only in name.


Starch is a common adulterant in the case of spices. Red colour, crackers, rice husk are being added to chilli. It is common to add green colour, coriander stalks to coriander. Arrowroot, kanth, rice bran are being added to dry mango powder. Papaya seeds are added to black pepper and red chilli (ground) is added to ground (fine) black pepper. Soya seeds are being added in abundance to cumin (mostly in ground form). There was a raid on cumin made from the grass of flower broom but it was all the same.


दालचीनी सामान्य तौर पर बहुत सस्ती कैसिया छाल के साथ बदली जाती है।दालचीनी की छाल बहुत पतली होती है और इसकी गंध अलग होती है। कैसिया की छाल कठोर और मोटी होती है। इससे कभी किसी भी प्रकार की खुशबूदार गंध नहीं आती। आजकल अलग से सुगंध मिलाई जा रही है। 


 कत्थे में प्रतिबंधित रंग, अफीम या अन्य नशीली चीज मिलाई जाती है बिक्री बढाने के लिये। खोवा तो खुल्लमखुल्ला तेल, युरिया, सुगंध, अरारोट आदि से बनता है। पकडे जाने पर दो एक व्यापरियों ने कहा कि यह ऐसे ही बनता है। जहाँ एक लीटर शुद्ध दूध से लगभग १७० ग्राम मावा (खोवा) बने वहाँ एक किलो मावा दो से चार सौ रुपये किलो बिकना मिलावट का फल है। हिसाब के लिये दोसौ ग्राम मावा और दूध का दाम ४० रुपये (कम से कम) लें तो एक किलो के लिए ५ लीटर दूध लगेगा। ईंधनादि का खर्चा तथा मुनाफा मिलाकर तो असली मावा नहीं बनेगा। अब दिखाने के लिए दाम बढाने से खोवा असली नहीं हो जायेगा। हींग में मैदे की मात्रा काफी होती है। कई जगह पूरा खेल रसायन, रंग, सुगंध, मैदे से खेला जाता है। 


 लौकी, करेला और कद्दू में ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन लगाए जा रहे है। यह अन्य तरीकों से भी हो रहा है। पश्चिम भारत के एक बडे किसान ने लौकी का प्रचार करने वाले उद्योगपति बाबा को जमीन दान में दी। श्रद्दावश नहीं वरन इसके चलते उसकी लौकी की फसल का बाजार चल निकला। यह लगभग तीन दशक पहले की घटना है। 


प्रायः हरी सब्जियों में प्रयुक्त प्रतिबंधित हरा रंग स्नायु रोगदि में वृद्धि कर रहा है। आपको भी रोज ताजा धनिया या पोदीना पत्ता चाहिये। नहीं तो मोलतोल करने लगते हैं। यही स्थिति अन्य सब्जियों की है जो न बिक पाने के चलते बहुधा रंगीन जल में डुबा कर ताजा दिखाई जाती है। फूलगोभी रसायन से धोकर सफेद की जाती है जबकी सही म वह मैदानी क्षेत्रों में पीलेपन लिये पैदा होती है। कई जगह पहले ही दवा देते हैं ताकि वह सफेदी दिखे। बन्दगोभी में पहले से दवा दी जाती है ताकि कीडे न लगे। छिड़काव तो अलग से होता ही है। अदरख को तेजाब से धोया जाता है ताकि वह साफ सुथरी दिखे। बिना धोई अदरख के स्वाद अलग होता है। 


Cinnamon is usually replaced with the much cheaper cassia bark. Cinnamon bark is very thin and has a different smell. Cassia bark is hard and thick. It never gives any kind of aromatic smell. Nowadays, fragrance is being added separately.


Banned colour, opium or other intoxicants are mixed in catechu to increase sales. Khoya is openly made from oil, urea, fragrance, arrowroot etc. When caught, a couple of traders said that it is made like this. Where about 170 grams of mawa (khoya) is made from one liter of pure milk, selling one kilo of mawa at two to four hundred rupees per kilo is the result of adulteration. For calculation, if we take the price of 200 grams of mawa and milk as 40 rupees (minimum), then 5 liters of milk will be required for one kilo. If we add the cost of fuel etc. and profit, then real mawa will not be made. Now, increasing the price just for show will not make khoya real. Asafoetida contains a lot of refined flour. In many places, the whole game is played with chemicals, colours, fragrances and refined flour.


Oxytocin injections are being given to bottle gourd, bitter gourd and pumpkin. This is happening in other ways as well. A big farmer of western India donated his land to an industrialist Baba who promotes bottle gourd. Not out of devotion but because of this, his bottle gourd crop became popular in the market. This is an incident of about three decades ago.


The banned green colour used in green vegetables is increasing nervous diseases. You also need fresh coriander or mint leaves every day. Otherwise, you have to bargain. The same is the situation with other vegetables which, because of not being sold, are often dipped in coloured water to make it look fresh. Cauliflower is washed with chemicals and made white, whereas in reality it is grown in the plains with a yellowish tinge. In many places, medicine is given beforehand so that it looks white. Medicine is given beforehand in cabbage so that it does not get infested by insects. Spraying is done separately. Ginger is washed with acid so that it looks clean. Unwashed ginger tastes different.




दूध की मात्रा तथा गुणवत्ता बढाने के लिये गायों को रासायनिक दवा खिलाना क्या उचित है? ऊपर से आरारोट, बटर आयल, बताशा, रंग, सुगंध, रसायन (नकली दूध बनाने हेतु), डिटर्जेंट पाउडर, युरिया का प्रयोग सात्विक दूध नहीं दे सकता। सरकारी तंत्र तक नकली दूध की मात्रा ((७५% के पास)) मान चुका है। शहरों में पैकेट (गत्ते के डिब्बे) में बिकने वाला दूध दो माह तक टिकने का दावा करता है। वह गाय का दूध कदापि नहीं। चाहे जितनी उच्च तकनीक हो असली दूध टिक नहीं सकता ((भले भैंसादि का )) और वह भी इतने बडे पैमानेे पर लगातार उत्पदन संभव नहीं। प्लास्टिक की थैली में बिकने वाला दूध नाम का दूध है। जल + सुखा मेलामाइन + चर्बी मिलाकर दूध बन ही रहा है। मेलामाइन में नाइट्रोजन की मात्रा अधिक रहती है जो खाद्य पदार्थ में प्रोटी की मात्रा बढा देता है। सुखा सफेद रंग + जल + एक छोटी थैली वाला दूध से बनने वाली चाय नुकसान करेगी। ऊपर से तनिक इलायची चुरा छिडक कर अधिक मूल्य में बेचना उचित नहीं। 


वनस्पति तेल को तकनीक से घी तथा गुणवत्ता हेतु रंग, सुगंध, आरारोट, भैंस का दूध, आदि मिलाना या भैंस के दूध से बने घी में नाना चीजें मिलाकर गाय के दूध का घी बतलाना कितना साथ निभायेगा। गाँवों में जब ११०० से ऊपर की लागत आती है तब शहरों में सस्ता बिकने वाला घी क्या है? जबकि गाँवों में भी ठगने वाले कम नहीं। वहाँ भी भैंस का दूध मिलाया जाता है। शहद नींबू के पुष्प, रंग, सस्ता गुड या चीनी, सुगंधादि से बडे पैमाने पर बन रहा है। पहले वह पेडों से लटकने वाले मधुमक्खी के छत्तों से मिलता था। आजकल काठ या धातु की पेटी में मधुमक्खी पाली जाती है और उसे अलग - अलग तरह का भोजन दिया जाता है। अब प्राकृतिक ढंग से पैदा होनेवाले पुष्प तक सब जगह और बडी संख्या में नहीं है। ऊपर से गुणवत्ता कम हो चुकी है। पहाडी क्षेत्रों में दो एक जगह दुकानदार ने बतलाया कि वे स्वयं आम या लीची या अन्य चीजों के बुरादे (या अन्य तकनीक) से शहद बनवाते है मधुमक्खियों से। यह होता है मधुमक्खी पालन उद्योग में जहाँ चारेे केे रुु में बुरादा दिया जाता है। उन्होंने पूछा भी था - 'कौन-सा शहद चाहिये' - तब यह बात खुली। जब उत्पादन शैली से मेल खानेवाले नियमादि होगें तब जाँच के मापदण्ड इनका समर्थन करेंगे। अब समय की माँग है - यह उचित है पर ऐसे दूध, घी, शहद आयुर्वेद का साथ कितना देंगे। कम से कम ऐंठन न दिखायें। 


फलों में चमक के लिए मोम की पॉलिश, पकाने के लिए प्रतिबंधित रसायन तक का इस्तेमाल हो रहा है। सुगन्ध हेतु सेव पर छिड़काव उचित नहीं है। समय से पहले तैयार करना या कीड़ों से बचाने के नामपर हानिकारक रसायनों का छिडकाव उनकी गुणवत्ता पर असर डालता है। पहले लीची में कीडे मिलने आम बात थी पर आजकल नहीं के बराबर दिखते हैं। कुछ जगहों में सेव पर लाल रंग का छिडकाव होता है (२-४ बार)। प्रारंभ में वह हरे रंग की होती है जो अधिक दिनों तक नहीं टिकती। पहले सेव काट कर रखने से रंग परिवर्तन होना स्वाभाविक बात थी। उसमें स्थित लौह बाहर की हवा (आक्सीजन) के साथ मिलकर यह प्रभाव दिखाती थी जिसे दवाओं की सहायता से अप्राकृतिक कर दिया गया है। करौंदे को मशीन से काटकर, रंग, सुगंध द्वारा चैरी का रुप दिया जाता है जो मिठाई, केक आदि में प्रयुक्त होती है। आजकल तो फलों के आकार बढाने की वृत्ति बढ गई है।


Is it right to feed chemical medicines to cows to increase the quantity and quality of milk? Moreover, the use of arrowroot, butter oil, batasha, colour, fragrance, chemicals (for making fake milk), detergent powder, urea cannot give satvik milk. Even the government machinery has accepted the quantity of fake milk ((near 75%)). The milk sold in packets (cardboard boxes) in cities claims to last for two months. That is definitely not cow's milk. No matter how high the technology is, real milk cannot last ((even if it is of buffalo etc.)) and that too continuous production on such a large scale is not possible. The milk sold in plastic bags is just milk in name. Milk is being made by mixing water + dry melamine + fat. Melamine has a high amount of nitrogen which increases the amount of protein in the food item. Tea made from dry white colour + water + milk in a small bag will cause harm. It is not right to sell at a higher price by sprinkling a little cardamom powder on top.


How long will it take to convert vegetable oil into ghee through technology and add colour, fragrance, arrowroot, buffalo milk etc. for quality or mix various things in ghee made from buffalo milk and call it cow milk ghee? When the cost of ghee in villages is more than 1100, then what is the ghee sold cheap in cities? Whereas there are many cheats in villages too. Buffalo milk is added there too. Honey is being made on a large scale from lemon flowers, colour, cheap jaggery or sugar, fragrance etc. Earlier it was available from beehives hanging from trees. Nowadays bees are reared in wooden or metal boxes and are given different types of food. Now even the flowers that grow naturally are not available everywhere and in large numbers. On top of that, the quality has gone down. At a few places in the hilly areas, shopkeepers told that they themselves make honey from the bees using sawdust of mango or litchi or other things (or other techniques). This happens in the beekeeping industry where sawdust is given as feed. He had also asked - 'Which honey is required' - then this thing came to light. When there will be rules etc. that match the production style, then the standards of testing will support them. Now the need of the hour is - this is right, but how much will such milk, ghee, honey support Ayurveda. At least do not show any rigidity.


Wax polish is being used to make fruits shine, and banned chemicals are being used for ripening. Spraying on apples for fragrance is not right. Preparing them before time or spraying harmful chemicals in the name of protecting them from insects affects their quality. Earlier, it was common to find insects in litchis, but nowadays they are hardly seen. In some places, red color is sprayed on apples (2-4 times). Initially it is of green color which does not last for long. It was natural for the apple to change color after cutting and keeping it. The iron present in it used to show this effect when it combined with the outside air (oxygen) which has been made unnatural with the help of medicines. Karonda is cut by machine, coloured and perfumed to give it the shape of cherry which is used in sweets, cakes etc. Nowadays the trend of increasing the size of fruits has increased.


किशमिश में रंग, गंधक का धुआँ जैसी गैर सेहतमंद चीजें मिलाई जा रही है। नमकीन मेवे ((कुछ उत्पादक)) बिक्री हेतु उन रसायनों का प्रयोग करते हैं जिससे बार - बार खाने का मन करे। भारतीय और आसपास के देशों के बादाम तथा अखरोट उतने मीठे नहीं होते जितने अमरीका के जहाँ मिठास बढाने हेतु रसायनों का प्रयोग फसल तैयार होने के पहले हो जाता है। गुरबंदी और मामरा बादाम में उनसे मिलते-जुलते दाने ((बीज)) मिलाये जाते हैं। यह ठीक है कि उनमें मिठास नहीं होती पर उतनी कडवाहट भी नहीं जो मिलावट से बढती है। दिल्ली के एक व्यापारी से संपर्क करने पर उसने मामरा के कडुवे स्वाद की बात स्वीकारी पर गुरबंदी पर मुकर गया। जब उसीके ठप्पे लगे हुए ((गुरबंदी के डिब्बे)) की बात कही तब जवाब ही नहीं दिया। गुरबंदी तो कई मामरा को कडवा मानते हैं। न एक जैसा आकार न वजन, ऊपर से गिरी बेचकर असली होने का दावा उचित नहीं। मूंगफली के दानों को पहले मशीन से खास तरह से काटा जाता है फिर इन दानों को रंगकर इन्हें पिस्ता और बादाम की कतरन की शक्ल दी जाती है। अंजीर को रसायनों से धोकर प्रसंस्करण के नामपर रसायनों का प्रयोग प्राकृतिक गुणवत्ता चौपट करती है। यही प्रसंस्करण /प्रोसेसिंग अखरोट की गिरी के डिब्बे पर विस्तार से लिखी होती है। उचित यही है कि लोग साबुत खरीदें। स्वास्थ्य की दृष्टि से नमकीन बादाम, काजू घरपर तैयार हो सकते हैं। आकर्षक दिखाने के लिए बादाम की गिरी पर गेरुआ रंग या चॉक-मिट्टी से पॉलिश की जाती है और केमिकल लगाया जाता है। आप साबुत यानि बाहरी आवरण / खोल सहित बादाम खरीदे। कई जगह दुकानदार जानकर गिरी रखते हैं। ग्राहक समय और श्रम बचाने के लिए गिरी खरीद कर नुकसान में रहता है। 


 सरसों तेल में राइस ब्रान तेल, पानी, पॉम आयल, सस्ता रिफाइन, रंग आदि मिलाया जाता तथा गन्ध हेतु तेजाब की मिलावट ((तेजाब को सत्तर साल हो गये मिलते हुए सरसों तेल में))। एक उत्पादक ने बताया कि तेजाब मिलाते वक्त ((प्रायः रात को)) कर्मचारी मास्क पहन लेते हैं। उस समय वे ((मालिक)) अपने बच्चों को कारखाने की तरफ जाने नहीं देते। आजकल तो अन्य साधन उपलब्ध हैं गन्ध हेतु। लगभग तीन किलो सरसों की पेराई कराने पर निकलता है एक लीटर तेल। स्वयं हिसाब लगाएं उसके मुल्य का। 


मिट्टी आदि में रंग मिलाकर नकली कुमकुम तैयार होता है। साधारण आटे और सफेद पाउडर में मैटानिल पीला रंग मिला कर धड़ल्ले से नकली बेसन तैयार किया जा रहा है। यह नकली बेसन असली चने के बेसन के मुकाबले ज्यादा पीला और खूबसूरत भी नजर आता है।बेसन में खेसारी और मक्के के आटे और रंग की मिलावट हो रही है। खेसारी कई दालों में मिलाई जाती है। दालों को तरोताजा दिखाने के लिए पाउडर की पाॅलिश साधारण बात है। कई साबुत दालों में उनके आकार के पत्थर के टुकडे मिलाये जाते हैं। 


कुछ शहरों में भिखारियों को रोटियाँ दी जाती हैं जो सुखा कर बेची जाती है और जिनका चुरा बना चीनी मिलाकर मिठाई सजाने या किमती नमकीन भजिया को आकर्षक बनाने के लिये हल्का सा नमक मिलाकर छिडका जाता है। वहाँ चीनी नहीं मिलाते। गर्म तथा तेल मिश्रित भजिया में वह चुरा चिपक जाता है। इस चुरे अन्य प्रयोग भी हैं। 


आजकल अधिकांश शहरों में बिना सुगन्ध की मिठाई नहीं मिल रही। यूँ भी बासी मिठाई को पीसकर मीठे समोसे बनते ही हैं ऊपर से घटिया चीजों से बनी मिठाई को गन्ध द्वारा सुधारा जाता है। अब दुकानदार क्या करे - माल प्रायः पडा रहता है और लोगों को हर समय ताजी मिठाई चाहिए। हानिकारक रंगों का प्रयोग धडलाले से हो रहा है। इमरती जलेबी बिना रंग की मिलनी आसान नहीं। 


Unhealthy things like colour, sulphur fumes are being added to raisins. Salted dry fruits ((some producers)) use chemicals for sale which make one want to eat them again and again. Almonds and walnuts of India and neighboring countries are not as sweet as those of America where chemicals are used before the crop is ready to increase sweetness. Similar seeds are added to Gurbandi and Mamra almonds. It is true that they are not sweet but they do not have the same bitterness which increases due to adulteration. On contacting a Delhi-based trader, he accepted the bitter taste of Mamra but denied the mention of Gurbandi. When asked about the Gurbandi boxes bearing the same stamp, he did not even reply. Many Gurbandis consider Mamra to be bitter. Neither the size nor the weight is the same, and on top of that, selling kernels and claiming it to be real is not right. Peanuts are first cut in a special way by a machine, then these grains are coloured and given the shape of pistachio and almond shavings. Washing figs with chemicals and using chemicals in the name of processing ruins the natural quality. This very processing is written in detail on the box of walnut kernels. It is appropriate that people buy whole ones. From the health point of view, salted almonds and cashews can be prepared at home. To make it look attractive, almond kernels are polished with ochre colour or chalk-clay and chemicals are applied. You should buy whole almonds, that is, with the outer cover/shell. At many places, shopkeepers knowingly keep the kernels. The customer buys the kernels to save time and labour and incurs loss.


Rice bran oil, water, palm oil, cheap refined oil, colour etc. are mixed in mustard oil and acid is mixed for smell ((acid has been mixed in mustard oil for seventy years)). A producer told that while mixing acid (usually at night) the workers wear masks. At that time they (owners) do not allow their children to go towards the factory. Nowadays other means are available for smell. One liter of oil is obtained from crushing about three kilos of mustard. Calculate its cost yourself.


Fake Kumkum is prepared by mixing color in soil etc. Fake gram flour is being prepared by mixing metanil yellow color in ordinary flour and white powder. This fake gram flour looks more yellow and beautiful than the real gram flour. Khesari and maize flour and color are being mixed in the gram flour. Khesari is mixed in many pulses. To make pulses look fresh, polishing with powder is a common thing. Pieces of stone of the same size are mixed in many whole pulses. In some cities, rotis are given to beggars which are dried and sold and their powder is mixed with sugar and sprinkled with a little salt to decorate sweets or to make expensive salty Bhajiya attractive. Sugar is not added there. That powder sticks to hot and oil-mixed Bhajiya. This powder has other uses also.


Nowadays, sweets without fragrance are not available in most of the cities. In any case, sweet samosas are made by grinding stale sweets and on top of that, sweets made from inferior materials are improved by fragrance. Now what can the shopkeeper do - the goods are often lying and people want fresh sweets all the time. Harmful colors are being used indiscriminately. It is not easy to get Imarti Jalebi without color.


ऊपर से कई वर्षों से यह प्रयोग हो रहा है :- बीटी फसलों में टॉक्सिन (जहर) बनाने वाली जीन डाली जाती है, जो मिट्टी में पाए जाने वाले एक बैक्टीरिया बैसिलस थूरिजेनेसिस (बीटी) में पाई जाती है। इससे तैयार होने वाली फसल बीटी फसल कहलाती है। यह जीन फसलों पर खुद जहर बनकर उन पर लगने वाले कीट को मार देती है। ऐसी फसल में एक जैसे साफ दिखने वाले दाने (मकई) आदि मोहक लगते हैं पर वे स्वास्थ्य के प्रतिकूल है। दुर्भाग्य से इनका प्रयोग धडल्ले से निजी आयुर्वैदिक अस्पतालों में भोजन बनाने में होता है ताकि बडी रकम आसानी से ली जा सके। इससे होनेवाली हानियाँ गिनाने के साथ उपरोक्त समस्याओं पर विचार करना चाहिए।


जबतक पाँचों तरह के खाद्य (शब्द, स्पर्श, रुप, रस, गन्ध) पर पकड नहीं होगी तबतक समाज भ्रमित रहेगा। वजन घटाने या बढाने की दुकानदारी जोरों पर है जो स्थाई समाधान नहीं देती वरन नए उत्पात पैदा करती है। ऊपर से खान-पान पर दबंगई का कहना ही क्या। उसपर तथा प्याज लहसुन पर वीडियो है - सुनें - गुने।




Moreover, this experiment has been going on for many years:- A toxin-producing gene is inserted in BT crops, which is found in a bacteria Bacillus thuringiensis (BT) found in the soil. The crop produced from this is called BT crop. This gene itself becomes a poison on the crops and kills the insects attacking them. In such a crop, the grains (corn) etc. that look similar look attractive but they are harmful for health. Unfortunately, these are used openly in private Ayurvedic hospitals for preparing food so that a large amount can be easily taken. Along with counting the losses caused by this, the above problems should be considered.


Until there is a grip on the five types of food (sound, touch, form, taste, smell), the society will remain confused. The business of reducing or increasing weight is in full swing, which does not provide a permanent solution but creates new troubles. On top of this, what to say about the dominance over food. There is a video on this and on onion and garlic - listen - count.



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