Sunday, 28 March 2021

साहित्य : वैचारिकता तथा बौद्धिकता


शोध - सृजन पत्रिका के मार्च माह में प्रकाशित रचना (साहित्य : वैचारिकता तथा बौद्धिकता पृष्ठ ५३) को ब्लॉग से भेजा गया था।


बचपन में सुना करते थे कि पहले का जमाना बहुत अच्छा था और आजकल मुल्यों का पतन हो गया है। पचपन तक आते-आते वही वाक्य औरों को यो सुनाने लगे मानो यह नवीन खोज है। अपने यहाँ औरों पर दोष थोपने की सुदृढ़ परंपरा ने किसी को नहीं छोडा। भगवान, से लेकर पश्चिमी शिक्षा, मनोरंजन के साधन आदि याद आए पर उसमें अपना योगदान देखना भूल गये। बस आँख बन्द कर समर्थन या विरोध में जुट गए। ऊपर लिखने का वेग हावी हो जाय तो कहना ही क्या। आनन फानन में साहित्यिक सेवा शुरु हो कर किसी-किसी के लिए सुनामी का रुप ले लेती है। भले ही कायदे से प्रश्नपत्र हल न किया हो समस्याओं पर अपनी समझ सही बताते हैं। अपना खोखलेपन बचाने खातिर हर वह उपाय करते हैं जिससे उनकी रचनाधर्मिता प्रतिष्ठित हो जाय। 

वैचारिकता की वर्तमान कडी साहित्य केन्द्रित है जहाँ अपनी-अपनी संकीर्ण बौद्धिकता के बोझ तले रचनाधर्मिता को ठीक से जीने नहीं जीने दिया जाता। बहुतों को इसका बोध अन्तिम साँस तक नहीं होता और वे साहित्य सृजन के नामपर अपनी अतृप्त एषणा, व्यक्तिगत मानसिक विकार, शाब्दिक दंगल में समाज को भरमाते हैं। 

साहित्य शब्द सामने आते ही उसकी नाना विधाएँ मानस पटल पर आ आलोड़ित कर व्यक्ति विशेष की रुचि के अनुसार उसका स्वागत करती है। हर विधा वैचारिक संप्रेषण का सशक्त माध्यम होते हुये भी नाटक, कहानी, कविता, उपन्यास समाज में अधिक लोकप्रिय हैं। जबकि प्रबंध, निबंध, आलेख, समीक्षा, शोधपत्र, शोधग्रन्थ, आत्मकथा आदि की पहुँच वर्ग विशेष तक रहती है। सीधे-सीधे सामाजिक प्रभाव डालने वाली विधाएँ समकालीन विषय केन्द्रित रहती हैं। इनमें पत्रकारिता नामक विधा मुख्यतः समाचार तथा सुचना प्रधान है जिसका उद्देश्य बिना लाग-लपेट के समाज को तात्कालिक परिस्थितियों से अवगत कराना है। उनकी विवेचना संपादकीय में होती है और इसीलिए इसे समाचार पत्र तथा पत्रिका की जान कहा जाता है। आधुनिक संचार माध्यमों में होनेवाली परिचर्चाओं से ऐसी ही विवेकवान विवेचना की आशा समाज करता है। समाज को निराशा तब होती है जब विधाएँ येन-केन प्रकारेण स्वयं को स्थापित करने की अदम्य लालसा से ग्रस्त त्रस्त पस्त हो संप्रेषण करतीं हैं। इस लालसा में उन सबका प्रत्यक्ष - परोक्ष अवदान रहता है जो संसाधनों पर एकाधिकार मानते तथा समाज को मात्र 'वस्तु' समझते हुए बौद्धिक आतंकवाद बढाते हैं। बौद्धिकता और आतंकवाद का मिलन वह विष है जो योजनाबद्ध तरीके से फैलाया जाता है। कभी धीमे-धीमे असर करनेवाले तो कभी एकदम उत्तेजनात्मक शैली का प्रयोग होता है। धीमे असर करनेवाला विष पाठ्यक्रम, चलचित्र, धारावाहिक के माध्यम से पिलाया जाता है। इनमें पाठ्यक्रम सबसे सरल माध्यम है जहाँ पाठ्य पुस्तक को अलग रखना मुमकिन नहीं और इसकी चपेट में पीढ़ी दर पीढ़ी तक आती है। नए खिलाडी परिवर्तन के नामपर इसे ही खेलते रहते हैं। इसमें दूर से दिखने वाली बुराई सत्तासीन होते ही अच्छाई या आवश्यकता में बदल जाती है जैसे कई विषयों पर विपक्षी का विरोध सत्ता प्राप्ति पश्चात भूला दिया जाता है। केवल राजनीति नहीं यह प्रवृत्ति कमोवेश व्यवहार तथा आजीविका के हर क्षेत्र में औरों पर अनाधिकार शासन करने की लालसा द्वारा उस समय मुखर होती है जहाँ मनन, चिन्तन, निदिध्यासन, अनुभव का स्थान नहीं रहता। बहुधा ऐसी पडताल को ढकोसला पाखंड कहकर व्यक्ति अपने खोखलेपन को उजागर करता है। यह और बात है कि पत्रकारिता के मामले में समाचार देते हुए यह पडताल नहीं हो पाती पर संपादकीय में विश्लेषण द्वारा वह (पडताल) होनी जरूरी है बशर्ते व्यक्तिगत हित हावी न हो जो कई रुपों में प्रभावित करते हैं। फिर चाहे वह बदले की भावना, सत्ता का दबाव या ठकुरसुहाती, क्षेत्रवाद, दो एक घटना की आड में पुरे वर्ग या राज्य विशेष को बदनाम करना, समस्या से अधिक व्यक्ति विशेष पर बोलना - लिखना, समाधान बतलाने की आड में अपना खेल खेलना हो या अन्य कारण जो समस्या केन्द्रित नहीं रहते। 
यहाँ पहले के समय के अच्छे होने की प्रामाणिकता पर शंका स्वाभाविक है। राजतंत्र के दीर्घकालीन इतिहास में नाना तरह के शासक होते चले गये। यूँ तो हर व्यवस्था कुछ विद्वानों को पालती है ताकि वे उसे महिमामंडित करे और हर वह उपाय अपनाए जिससे उसकी कमजोरी उजागर न हो। इसके लिए नवीन ग्रन्थों की रचना से लेकर पुराने में छेड़छाड़ की गई। दुसरी ओर विजेता द्वारा लिखा गया इतिहास भी मनगढन्त बातों से भरा रहता और जानी हुई बात है कि पराजित शासक जल्दी से इतिहास नहीं लिखवाएगा। ऊपर से अधिकांश साहित्य में साधारण व्यक्ति नदारद है। रचनाकार केवल शासक तक सिमट गये और उससे जुडी बातों का विस्तार किया। औपचारिक लिपाई की तरह कहीं-कहीं दो एक वाक्य समाज के ऊपर दिखते हैं पर वे स्पष्ट जानकारी नहीं देते। यह तो है नहीं की किसी को कोई कष्ट नहीं था। सत्व, रज, तम से बनी सृष्टि में हर तरह की वृत्तियों का चक्र घुमते रहता है और उसके चलते भावनात्मक द्वन्द्व हर युग में था, है, रहेगा। तब समाज का यथार्थ या कम से कम यथासंभव चित्रण न करना ही साहित्य को अप्रासंगिक बनाता है उस समय के लिए जिसके बारे में जानने का प्रयास किया गया। इसीलिए शिष्ट आचार्यों ने पौराणिक साहित्य को विश्वसनीय नहीं माना। उसके बाद में रचित रचनाएँ दरबारी रचनाकारों की देन अधिक थी जिसमें अपने-अपने प्रायोजक शासक को खुश करना प्राथमिकता थी। अधिकतर रचनाकार भक्ति की आड में भोग विलास रचनाओं द्वारा अपने प्रायोजक को खुश करने में मगन थे। उनके लिए कृष्ण या अन्य प्रतीक आवरण मात्र था अतृप्त एषणा की पूर्ति का। समाज की वास्तविकता बतलाने के बदले उसे दबाकर रखने पर जोर देते हुए युगानुसार परिवर्तनशील रीति रिवाजों को मानने की बाध्यता प्रचारित करने के अलावा उनमें बढोत्तरी की। एक वर्ग ने प्राचीन साहित्य के नामपर शोषण किया तो नकली सुधारकों ने अपनी वाक्पटुता द्वारा उनके पास आने को कहा और शोषित लोग उधर गये पर दोनों ने यह नहीं बताया की सही-सही साहित्य लिखा क्या है। इन मगरमच्छी आँसू बहाने वाले सुधारकों ने पंथ या संस्थागत कट्टरता फैलाई जिससे लोग पहले के प्रामाणिक साहित्य में निहित मुल्यों से वंचित रहे और इसका प्रबल उदाहरण मिलता है स्थापित नौ दर्शनों के पठन-पाठन में। चार्वाक दर्शन को तो आजतक उचित मान नहीं दिया गया और उपनिषदों के जीवन मुल्य सामने नहीं आ पाए। दरबारी और पंथों का साहित्य अपने-अपने अन्नदाता को खुश करने में जुटा था। तभी दर्शन और साहित्य का संबंध में खाई बनी और व्यक्तिगत विचारों ने समाज को भ्रमित किया। यहाँ तक की भक्ति के नामपर अशालीन श्रृंगारिक साहित्य तक लिखा गया। शाक्त अघोरी तथा वामाचार विचार का बोलबाला जिन इलाकों में था वहाँ का साहित्य भोंडेपन से भरा था। सबमें साधारण व्यक्ति का जीवन नदारद था और सब अपना वर्चस्व स्थापित करने की लालसा में एक दुजे के लिए अमर्यादित भाषा का प्रयोग धडल्ले से कर रहे थे। अतः इस आपाधापी में जनता का दुःख दर्द महत्वपूर्ण नहीं रहा। 
अगर यह कहा जाय की अंग्रेजों के शासनकाल में साहित्य का संबंध सीधे-सीधे जनता से जुडा तो यह प्राचीन साहित्य का अपमान होगा क्योंकि उनमें छिपे मुल्य समाज के समक्ष नहीं रखे गये। इस मामले में बौद्धिकता आयातित विचारो या सुनी सुनाई बातों के जाल में उलझ गई। एक तरफ पारंपरिक राजतंत्र था जिसका समय विदेशी शासक की जी हजूरी या लडने में व्यतीत होने लगा और रचनाकार उसी अनुसार ढलते चले गए। अंग्रेजों से लडने वाले शासकों के समर्थक रचनाकार उनमें जोश भरने या समाज को जगाने वाला साहित्य लिखने लगे। यह उस समय की माँग थी जिसके चलते स्वतंत्रता संग्राम में गीता के कर्मयोग पर विस्तृत चर्चा की बालगंगाधर तिलक ने अपनी पुस्तक गीता रहस्य में। यानि पहले के साहित्य में भी मुल्यों की कमी नही थी पर उन्हें ठीक से उजागर नहीं किया गया। व्यवहार सुधारने वाले साहित्य को पूजा पाठ तक सीमित रखने में भ्रमित लोगों का हाथ था। कुछ ऐसा व्यवहार मानस के साथ हुआ। यहाँ तक की वैदिक वाड्मय में वर्णित नौ दर्शनो की उपादेयता भुला दी गई। उनपर दकियानूसी या पाखंड फैलाने तक का आरोप घुमा-फिराकर लगा दिया गया। अतः आयातित विचार अधिक प्रेरक बने उन सबके लिए जिन्होंने फैलाई गई बातों या विकृत पाठ्यक्रम को आँख मुँद कर प्रमाण माना। कई बार सत्ता या संस्कृति विरोधी आन्दोलन की सफलता के लिए मनगढन्त किस्से-कहानियाँ या अफवाएँ फैलाई जाती है जिससे लोगों में उन्माद बढे और वे मरने-मारने हेतु तैयार हो जाएं। भारत में यह खेल जिन तरीकों से खेला गया उनमें साहित्य भी शामिल था। इस खेल में व्यक्ति विशेष के लालन-पालन ने बडी भुमिका निभाई और कई शिक्षित लोगों को धर्म परिवर्तन सबसे सरल रास्ता लगा। ऐसे शिक्षित लोग प्राचीन साहित्य खँगाल नहीं पाए क्योंकि संस्कृत पठन-पाठन की भाषा नहीं रही, तथ्य समझाने वालों से दुरियाँ, व्यक्तिगत रुचि का पूर्णतः अभाव, विदेशी जीवन शैली का मोह जैसे कारणों का प्रभाव हावी रहा। जहाँ मैक्सिको, क्युबा जैसे देशों ने आयातित विचारों को अपनी-अपनी माटी के अनुकूल बनाकर अपनाया वहीं भारत में न के बराबर परिवर्तन किया गया। ऊपर से यहाँ के पारंपरिक दर्शनों को दरकिनार कर छायावाद, रहस्यवाद जैसे शब्दों के सहारे रचनाकारों को बाँट दिया। पहले भक्ति साहित्य के साथ यह खेल जी भरकर खेला गया था। (१)
आधुनिक साहित्य में कई रचनाकार हुए जिन्होंने यहाँ की तासीर के अनुकूल रचनाधर्मिता निभाई। शोषण-दमन का भरपूर चित्रण किया पर विध्वंसात्मक प्रतिक्रिया का समर्थन अधिक नहीं किया। तभी प्रेमचंद की लेखनी से बडे घर की बेटी जैसी रचना निकलती है। यह उनके साहित्य की अकेली रचना नहीं हैं जिसमें अन्य वर्गों के पारिवारिक मनोविज्ञान और बिगड़ती स्थितियों को सँभालने की बात न हो। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से अवगत कराना गलत नहीं है। शिवानी की रचनाओं में यह भाव निखर कर सामने आया। विन्दु जी शर्मा की रचनाओं में समाज के साथ स्वस्थ संवाद है। यहाँ लकीर के फकीर बनने की बात नहीं वरन नीर क्षीर विवेक वाली दृष्टि है जो मूल्य तथा मूल्यहीनता को समाज के सामने बिना भेदभाव रखे। मध्ययुगीन रचनाओं में रामचरितमानस एक चर्चित उदाहरण है जिसमें कथात्मक शैली में दोनों पक्ष रखे गए। इसमें ढेर सारे दोष देखने वाले कथाकारों ने नई रामकथा लिखी, दो एक तथाकथित विद्वानों ने पुनरावृत्ति / पुनरुक्ति दोष दिखाया मानस में पर भूल गए कि यह एक अलंकार भी है। ऐसे सिरफरों के अनुसार तुलसी असहिष्णु थे, कबीर विरोधी थे - वाह रे बौद्धिक गुलामी तेरा जवाब नहीं। बिना बीजक में ठीक से डुबकी लगाय कबीरदास की आड में जातिवाद का खेल खेल खेलते हुए भूल जाते हैं कि कबीर बने बिना कबीर को समझना टेढी खीर है। सतही चिन्तन प्रसाद, पंत, महादेवी वर्मा आदि की गहराई मापने की कोशिश भले करे पर उनकी संगति दर्शनों के साथ लगा नहीं पाती क्योंकि अन्तर्मुखता की उपादेयता से वह अलग है। क्या प्रगतिशील या प्रयोगवाद के नामपर ऐसी टिप्पणी विकृत मानसिकता नहीं दर्शाती? नब्बे के दशक में कोलकाता के कई तथाकथित बुद्धिजीवियों ने यह बात खुलकर कही। वे सब शिक्षा जगत के जिम्मेवार पदों पर आसीन थे तब भी कहने के पूर्व सोचा-समझा नहीं। धीरे-धीरे इनकी मंडली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नामपर समझाने लगी की कामायनी, साकेत, दीपशिखा आदि कैसे लिखे जाने चाहिये थे। ऐसा कहने वालों ने स्वयं उस स्तर के ग्रन्थ नहीं लिखे और न उनके रचनाकार इनसे ((परदेसी विचारप्रचारक)) शिक्षा प्राप्त कर सके। अब प्रसाद को प्रसाद बुद्धि से समझने की जरूरत है। स्थापित दर्शनों को जानने तथा जीने वाले रचनाकारों की श्रृंखला की एक कडी थे। केवल छायावाद का ठप्पा लगाना बहिर्मुखता की निशानी है। जो चाहे जितनी ताल ठोक ले आयातित ऐनक से यहाँ की माटी पहचानी नहीं जा सकती एवं उससे यहाँ के उन रचनाकारों पर जो स्थापित नौ दर्शनों को जी चुके हैं या ज्ञान, भक्ति, वैराग्य की त्रिपुटी में स्थित हैं - - मनमाना वक्तव्य देना वाणी का अपमान, अतृप्त एषणा के वशीभूत तथा बिना निदिध्यासन के लिखना भारतीयता नहीं। तत्वदर्शी समालोचना ही ग्रहणशील है। उसीसे शिक्षा का सम्मान है। बोलने की स्वाधीनता कुछ भी बोलने का पर्याय नहीं।(२) ऐसे महानुभावों हेतु गोस्वामीजी ने कहा - नहिं कोउ अस जन्मा जग माहीं | प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ||

सांस्कृतिक चेतना जगाने के लिए इतिहास आधारित रचनाएं सामने आई। यह राजतंत्र वाले युग में अधिक हुआ जहाँ अंग्रेजों का शासन भी था। बातें सीधे-सीधे कहने में अनावश्यक खतरा था विदेशी शासक का। प्रस्तुतिकरण के प्रति जागरूक रहकर भी जगदीश च माथुर ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई। अपने समय की तकनीक (रेडियो) को भी समाज से जोडा ताकि लोग वंचित न रहें। कोरे शास्त्रार्थ से बौद्धिक खुजली भले तुष्ट हो समाज को दिशा नहीं मिलता । मंचित और रेडियो की प्रस्तुति में फर्क होता है। यहाँ अनुभवी रचनाकार या प्रस्तुति करनेवाला सामंजस्य करते हुए अपनी बात कह देता है। हर तरह तथा हर जगह का शासन तंत्र अपनी दाल गलवाने के फेर में लगा रहता है। जगदीश च. माथुर हो या जयशंकर प्रसाद या उस स्तर के अन्य रचनाकार ने उसका एक तरह से विरोध किया और उसके लिये आयातित वादों को आँख बन्द करके नहीं माना। ऐसे कई जने हैं यहाँ उदाहरण हेतु चन्द नाम लिये गये। दुसरी तरफ ऐसे रचनाकारों को संख्या कम नहीं जो केवल परदेसी ऐनक से भारत को जाँच रहे थे। जुगाड लगाकर काले धन को सफेद करनेवाली संस्थाओं के अध्यक्ष से लेकर उनकी पत्रिकाओं के संपादक बनने आदि की होड में साहित्यिक सेवा का वह स्वरुप सामने लाता हैं जहाँ जागरुकता छल के सिवा कुछ नहीं। 
स्वरचित काव्यात्मक शैली में इस भाव का अनुभव करें :- कविता है क्या - - 
 सनसनी - समाचार - सतही संवाद नहीं / कतरन - कलह - कलेस नहीं / हिसाब - किताब नहीं / शब्दकोश - शब्दजाल नहीं / सीधा प्रसारन नहीं / कविता को कविता रहने दो / सहज सरिता बनती कविता। 
कविता, है सविता / अधपके भाव न डाल / साफ सरिता से हमसब / कलम-कविता, दोनों सविता / रव छोर कलरव अपना / सुभाव सुधार अपना / सविता का वरदान / कविता में उतार जरा / मन काँव काँव नहीं / कविता चाह रहा / भारहीनता चाह रहा / बदला नहीं बदलाव चाह रहा / संडास नहीं सुवास चाह रहा / कविता को कविता रहने दो ।(३)
विकट विषम परिस्थितियाँ हर युग में थी, है, रहेगी। समाज से लेकर संस्कृति का उत्थान पतन वह घुमता पहिया है जो किसी का शासन चिरस्थाई रहने नहीं देता। समष्टि प्रबंधनानुसार प्राकृतिक या प्रकृति प्रेरित मानवीय घटना फेरबदल करती है। इसे देखने, जानने, समझने के उपरान्त कर्ताभाव में मन बहते रहता है। वह अपने-अपने क्षेत्र में किसी और को आगे बढाना तो दूर हतोत्साहित कर जात पात, क्षेत्र, भाषा की आहूति पा व्यक्ति विशेष को अधिक दम्भी बनाते हुए कच्ची, अधपकी, जली भावनाओं को लेखनी द्वारा परोसते रहता है। अगर इस विकृत मानसिकता वाले शिक्षा जगत में अपना स्थान बना ले तब पाठ्यक्रम तक कलुषित कर देते हैं खंडन मंडन की कूटनीति चलाकर। एक चर्चित साहित्यिक संस्था के अध्यक्ष ने कहा था कि वे उन्हीं रचनाओं की समीक्षा छापते हैं जिनको उठाना होता है। ऐसी मानसिकता वाला वर्ग समस्या के बिना जी नहीं सकता और उसपर मनन किये बिना लेखनी उठाकर खोखली संवेदनशीलता का ढिंढोरा पीटता है। अपनी समकालीन समस्याओं पर नजर रखने से ज्यादा विरोधी खेमे के रचनाकारों की सक्रियता पर ध्यान देता है। हर समस्या (दुष्कर्म, महामारी, शोषण-दमन, आदि) कुछ को रचनाकार अवश्य बनवाकर पहले से लिखने वालों के लिए प्रेरणादायी बनती है। एक आम समस्या की जाँच की जाय । महंगाई उस समय भी कचोटती थी जब गेहूं दो रुपये किलो बिकने लगा या कोलकाता में सार्वजनिक यातायात की टिकटों में पाँच पैसे बढे। यातायात वाले ईंधन का मूल्य सभीको कचोटता है पर कोई सरकार से पूछ कर गृहस्थ जीवन शुरू नहीं करता जबकि उसीपर तथाकथित महंगाई की अधिकतम मार पडती है। साज श्रृंगार या स्तर दिखानेवाले सामान का मूल्यवान होना सहज स्वीकार्य है पर कृषि उत्पादन का नहीं। लोग पाँच दस साग सब्जियों का नाम लिख दो चार पंक्तियाँ और जोड कविता या अन्य विधा में किस्मत आजमाते हैं। इस तरह सब्जी मण्डी का हिसाब-किताब साहित्यिक रुप लेता है। इस दोहरी नीति में विश्लेषण की याद नहीं आती। 
काव्यात्मक शैली में (स्वरचित) :- मसाला - - 
साहित्य सृजन बाबा / मसाले का सवाल बाबा खेमों-गुटों-वादों खातिर / गहन मनन से बैर बाँधा / परदेसी वाद से संबन्ध साँधा / समझदारी छोर दी बाबा / सृजन सवाल हल हो रहे बाबा / अनाचार, दुराचार, व्यभिचार / फलते फूलते रहे / चले जितनी चाहे / चलती रहे इनकी / भरे रहे खलिआन / साहित्य पल रहा बाबा / पीएचडी दिलवाता बाबा / पुरस्कार दिलवाता बाबा / उपाधियों का चुल्हा, शोषण का ईंधन / कुर्सी की कडाही, भावना का तेल / खेमों की चाशनी, शब्दों की जलेबी / संगत मिली बाबा रंग जमा बाबा / नागफनी किस सहारे पले बाबा / थोरा कहा बहुत समझना बाबा । (४)
इस संक्षिप्त चर्चा में साहित्य हेतु समस्या रुपी संजीवनी की अनिवार्यता समझ में आई। धीरे-धीरे दो स्थितियाँ उभरी। पहले में कथात्मक या साहित्य सम्मत शैली वाले ग्रन्थ जैसे मानस हैं जिनमें समस्या को ज्यों का त्यों नहीं रखा गया और न ही उसके आधार पर किसी क्षेत्र, समुदाय, वर्ग विशेष को कठघरे में खडा कर दिया। दुसरे क्षोर पर वह साहित्य जो सीधे-सीधे मन की भंडास या बहुधा दिखावे की संवेदनशीलता दिखलाता है। इस कंटक सम्मत शैली में मुस्कान तक कंटीली रहती है। यहाँ प्रश्न उठता है रचना के संघटक या अवयवों का जो आधार बनते हैं साहित्यिक विधा का। किसी विषय पर लिखने के लिए तदनुसार सामग्री जुटा लेने के साथ-साथ विवेक विवेचना जरूरी है। कलम का सिपाही बनने के लिए जो अन्दरूनी तैयारी चाहिए उसपर ध्यान नहीं जाता। अधिकतर लोग कलम का मालिक कहलवाने की होड में रचनात्मक गुणवत्ता याद नहीं रखते। और तो और लेखन में भेदभाव का ख्याल रखते हुए अपने-अपने प्रिय शासक दल वाले क्षेत्र के कुकर्मों पर नहीं लिखते भले ही वे साधारण व्यक्ति द्वारा किए गये हों। गिने-चुने उदाहरण सामने आते हैं जहाँ कुछ रचनाकारों ने अपने दल द्वारा हो रहे उत्पीडन का सार्वजनिक विरोध किया पर दो एक की पिटाई होते देख बाकी मौन हो गए। अपने घर परिवार के दुष्कर्म पर जागरूक रचनाकार तक ढंग से लिख नहीं पाता और उसके अपने द्वारा हो रहे कार्यों को भूल जाता है। अपने दुष्कर्म पर सजगता तो दूर वह गलत ही नहीं लगता और ध्यान स्वयं को चर्चा में लगाए रखने पर रहता है। वह यह भूल जाता है कि उसके द्वारा कितना मानसिक उत्पीडन, व्यभिचार तथा बौद्धिक आतंकवाद क्रियान्वयन हो रहा है। केवल स्थूल देह से ही व्यभिचार नहीं होता। अपने सूक्ष्म तथा कारण शरीर से खिलने वाले गुल से संभलने के बदले उन्हें साहित्य द्वारा भुनाना जानता है। वह अपनी कुंठित भावनाओं की चिकित्सा करवाने के बदले उनपर कविता कहानी लिख यश कमाना चाहता है। इन स्थितियों पर नादानी मजबूरी समय की हवा जैसे शब्दों का ठप्पा लगा दिया जाता है। हाल यह है कि पैसेवाले परिवार में पल रहे दिव्यांग बच्चे की पीडा या उसके माँ बाप का दर्द नहीं रुलाता। आर्थिक तंगी वाले परिवार हर जगह है पर उनकी पीडा व्यक्त करने में भेदभाव किया जाता है। बदले की भावना तथा भेदभाव में बहने वाले रचनाकार नहीं बनते भले ही साहित्यकार कहलवाने लगे। उन्हें कार से मतलब है जो रचना तथा साहित्य जैसे शब्द के साथ जुडकर उनका स्तर बढाता है। बडी पत्रिकाओं के बन्द होने पर व्यवस्था को कोसनेवाले अक्सर भूल जाते हैं कि उन्होंने स्वयं लघु पत्रिकाओं का संरक्षण कितना किया। (५)
रचनाकार बनने की स्पर्धा में भावना शोधित नहीं होती। जिस तरह स्वयं को सुनने में सक्षम वक्ता जानता है कि उससे क्या कहा जा रहा है वैसे ही लिखतै हुए पाठक तथा तत्वदर्शी आलोचक की दृष्टि होनी चाहिए जो स्वान्तः सुखाय की ओर ले जाती है। आवश्यकता भावनाओं को पकाने की है और इसके लिए बहुआयामी पठन-पाठन या भ्रमण आवश्यक है। केवल पाठ्यक्रम या एकाध समस्याओं पर लिखी रचनाओं को पढने से दृष्टि संकुचित रहती है। आखिर एक रचनाकार विभिन्न क्षेत्रों तथा सभी समस्याओं पर नहीं लिख पाता इसीलिए सजग पाठक अन्दरूनी विकास हेतु नाना तरह की रचनाएँ ध्यान से पढते हुए आँचलिक रचनाओं में वर्णित सामाजिक मूल्यहीनता में भेद तथा समानता समझ पाता है। उसके लिए यशस्वी रचनाकार मायने नहीं रखता और वह औरों को भी एकबार जरूर पढता है। इससे व्यक्ति महामना बनने की अग्रसर होता है और यही अवस्था भ्रमण से उपजती है। अब लिखने के पैदाइशी गुण सबमें नहीं होते वे पहले बताये गये तरीकों से अर्जित करने पडते है। 
साहित्य समाज का केवल दर्पण नहीं नूतन समाज का निर्माता है। जनसंख्या का बडा हिस्सा उससे आजतक प्रेरणा लेता है। दर्पण प्रतिबिंबित करता है अतः व्यक्ति अपने स्तर के अनुसार ही लिखेगा और ऊपर से संस्कारहीन परिवार परिवेश का प्रभाव वैसा फल तब दिखाता है जब रचनाकार उसके अनुरूप बहता है। वह संयमित जीवन को ढकोसला मानकर समस्याओं पर बोलता है। केवल एक पक्षीय या एक देशीय अवधारणा घिनौने खेल को साहित्य कहने में संकोच नहीं करती। घाव की चिकित्सा या प्रदर्शन में अन्तर पकड में आना चाहिए और बिना सोचे समझे रामचरितमानस या अन्य ग्रन्थ को जलाने या विरोध में पुस्तक लिखने से समस्या नहीं सुलझा करती। बहुधा परिचित संपादकों से स्तरहीन थोक या लाट में कविता कहानी प्राप्ति की बात सुनने को मिलती है। उनके अनुसार ऐसे-ऐसे रचनाकारों को गहन चिंतन वाला लेख माँग लो तो मौन छा जाता है। एक संपादक ने हमसे लेख माँगा और अस्वस्थतावश वीडियो भेज दिया जिससे वे सामग्री ले सकें। दो दिन पश्चात जवाब आया एकाग्रहीनता के चलते किसी से संभव नहीं हो पा रहा अतः आप ही लिखकर दें। वह कार्य किसी तरह हुआ पर रुचि का अभाव तथा सतही मानसिकता साहित्य के साथ न्याय नहीं कर सकती और किसी तरह छपास रोग पूरा करने में समय व्यतीत होता है। रचनाकर्म कारखाने का उत्पादन नहीं बनना चाहिए। ऊपरर से पाठकों की कमी का रोना शोभा नहीं देता। आखिरकार परोसा क्या जा रहा है इसपर ध्यान जाता नहीं। समाज समस्याओं से अनजान नहीं और रचनाकार सीधे प्रसारण की भाँति बताए जा रहा है। ऐसी रचनाएँ चाय समोसे के बलपर थोडे दिन टिकती है और वहाँ भी एक दुजे की पीठ थपथपा कर उसी विदेशी संस्कृति को कोसा जाता है जिसके अधिकतर विचार आँख मूँद कर मान लिए गए। यहाँ तक की साहित्यिक संस्थाएँ तक श्रोताओं की घटती संख्या से परेशान नजर आती हैं। नब्बे के दशक में कुछ साहित्य अनुरागी युवाओं ने एक संस्था की युवा गोष्ठी से जुडकर कई अच्छे कार्यक्रम किए और लोगों को जोडना शुरू किया जो वहाँ के सचिव को पसंद नहीं आया। उसने अपने साथ प्रबंधन समिति के एक रईस सदस्य का समर्थन जुटा उस युवा गोष्ठी को छिन्न-भिन्न करवा दिया। अब उसके चाटुकारों का साहित्य से लेना-देना था नहीं और वे अन्य प्रतिभाशालियों को आगे बढने नहीं देना चाहते थे। कर्मठ युवाओं द्वारा कम लागत में चर्चित कार्यक्रम करवाना संस्था सह नहीं पाई। अपने अन्दर झाँकने की आदत अविकसित होने के फलस्वरूप साहित्य समाज को देने लायक बातें सही तरीके से दे नहीं पाता। (६)
मध्ययुगीन रचना मानस की चौपाई इस प्रसंग में याद आती है :-
बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि।। 
आधी चौपाई में ही साहित्य का एक लक्षण बता दिया - रामकथा के माध्यम से कही गई बातें विद्वानों को विश्राम यानि बौद्धिक शान्ति तथा आम जनता को प्रसन्न करने वाली है क्योंकि उन्हें लक्ष्यार्थ से मतलब नहीं केवल कथा सुनकर खुश होना है। अधिकांश मनुष्य मानसिक भावनात्मक तथा बौद्धिक शांति हेतु साहित्य के पास जाता है। भले ही समय बिताने के लिए जाए पर वह तनावमुक्त होना चाहता है। उसके अनुसार सबको जाँचना, शक करना, व्यक्त भावनानुसार बहना मनोरोग पैदा करता है। कुकर्मों के भरोसे जी रही विधाएँ कार्यालयों में भरपूर चर्चित होने के कारण एक वर्ग उससे आतंकित होकर अपने बच्चों को पढने या खेलकूद का प्रशिक्षण प्राप्त करने हेतु अन्य शहर में जाने नहीं देते। यूँ तो सुरक्षित घर परिवार तक नहीं पर शक औरों पर अधिक होता है। यह आधुनिकीकरण का परिणाम हो ऐसा नहीं क्योंकि नाना रुपों में दरिन्दें हमेशा से समाज में थे और सबने धर्म या आयातित वाद का खुलकर दोहन किया। केवल तकनीकी विकास के चलते समाचारों की बहुलता है। यहाँ संवेदना अपने-अपने जीवन में न उतर कर रचनात्मकता तक सिमटी रहती है। 
यहाँ जिन समस्याओं के बलपर घर का चूल्हा जलता है वे विदेशों में होने के बावजूद उसपर ध्यान नहीं जाता। पचास से लेकर सत्तर के दशक तक नाना तरीकों से पुरस्कृत किये गये सैकडों रचनाकारों तथा पत्रकारों को विदेशों की भुखमरी, बेरोजगारी, घरेलू तथा बाहरी हिंसा, प्लेटफार्म तथा मैदानों पर सोते लोग, शीतलहरी में ठिठुरते बेघर लोग आदि के बारे में मौन रहे। विदेशी मतलब पैसेवाला हो यह जरूरी नहीं। विकसित देशों के कई छोटे दुकानदार यात्रा के पैसे जोडकर महंगाई के चलते यूरोप की यात्रा न कर भारत आते हैं क्योंकि मुद्रा विनिमय दर उनको अनुकूल पडती है। जर्मनी के एक बुद्धिजीवी ने बताया कि जब उनके यहाँ शीत काल के दौरान मैदानों में सोये लोगों की बेहाली पर शोर मचने के बाद कुछ सरकारी कदम उठते हैं फिर वही ढाक के तीन पात। सरकारी विभागों की थोडी लापरवाही अमरीका, इग्लैंड आदि देशों के अन्दरूनी इलाकों में दिखती है। कई जगह सडकों पर पडा कचरा, कुडेदान से बेचने लायक सामान निकालते लोग, मेट्रो रेल में यात्रियों के शरीर से आनेवाली नाना तरह की बदबू, बात - बात पर होती हिंसा जैसे दृश्य उस लुभावनी तस्वीर को खंडित करते हैं जो भारत में दिखाई जाती है। दूसरी ओर यहाँ वाले सबसे अधिक उसीपर लिखते या चलचित्र बनाकर यश कमाते हैं पर वहाँ के अधिकतर रचनाकारों ने उस पक्ष को प्रधानता नहीं दी और बहुतों ने अनदेखा कर दिया। उनकी संवेदना भारतीयों से कम नहीं थी पर उसके बलपर घिनौना खेल नहीं खेला। अपनी समकालीन व्यथा की अभिव्यक्ति में यथेष्ट शालीनता रखते हुए आशावादी तथा दार्शनिक पुट दिया। इसमें अपवाद हैं पर भारतीयों के मुकाबले कम। यहाँ आँसुओं को भुनाने वाले अधिक हैं। इग्लैंड के एक साहित्यिक दंपति ने कहा था की उनके यहाँ जब दंगेफसाद होते हैं तब लौटने का मन करता है और कई बार संचार माध्यमों में समाचार तक ठीक से नहीं रहते। वहाँ मजबूरी वश अलग - अलग राज्यों से आए लोग मिलकर रहते हैं। अमरीका में भारतीय विद्यार्थीयों की हत्याओं पर लिखना याद नहीं रहता। कई देशों में रचनाकारों के संगठन किसी नेता को अपने कार्यक्रम में आमंत्रित कर ले तब वह स्वयं को भाग्यशाली मानता है और यहाँ नेता किसी रचनाकार को बुलाए या दोस्ती कर ले तब वह स्वयं को भाग्यशाली मानते हुए साहित्यिक समाज में ढिंढोरा पीटता है। विदेश में जहाँ कहीं राजतंत्र के विरोध में क्रांति हुई वहाँ उसे सफल बनाने के लिए जो साहित्य लिखा गया उसमें अवश्य अतिश्योक्ति का मसाला मिलाया गया था। वहाँ अधिकार केन्द्रित लडाई समय विशेष की माँग थी जिसका भारतीय संस्करण विकृत किया गया। मुनाफे में दो भाग श्रमिक और एक मालिक की बात से लेकर अराजकता फैलाने वाली रचनाएँ सामने आई। अनुशासन तथा कर्तव्य को पाखंड, दकियानूसी, तानाशाही घुमा-फिराकर या कहीं-कहीं स्पष्ट रूप से कहा गया। नैतिक पतन पर भाषण देनेवाले रचनाकारों ने चरित्र निर्माण की कला का विस्तार नहीं किया। दूसरी ओर ऐसे पोंगापंथी रचनाकार हुए जो केवल कर्तव्य की वकालत करके अधिकारों को भूल गए।(७) प्रायः लोगों को केवल अपनी मक्खन मलाई से मतलब इसीलिए चरित्रादि के पक्षधर चार्वाक दर्शन को बदनाम कर दिया। इसके घोषित समर्थक तक सुत्रों से दूर रहते हैं। साहित्य के नामपर खेल उचित या अनुचित है की नहीं इसपर विचार कर लेना चाहिए शरीर छोडने से पहले। साँसों का क्या भरोसा कब थम जाए। केवल अपने-अपने जैसे पाँच दस इकट्ठे करके साहित्यिक कबड्डी खेलना शोभा नहीं देता। यह तो वही बात हुई :-
उष्ट्राणां विवाहेषु , गीतं गायन्ति गर्दभाः ।
परस्परं प्रशंसन्ति , अहो रूपं अहो ध्वनिः ।
ऊँटों के विवाह में गधे गीत गाते हुए एक-दूसरे की प्रशंसा कर रहे हैं , अहा ! क्या रूप है? अहा ! क्या आवाज है ? 
ऐसा रचनाकर्म अपना अपमान है जिसपर ध्यान जाना चाहिए। 

स्वामी अक्षय चैतन्य 
सन्दर्भ :-
१ साध्वी मीराबाई की मर्दानगी (शोध सृजन, जनवरी अंक पृष्ठ ४०) 
२.साहित्य का उपयोग 
https://youtu.be/2xrmh1Q1V_Y
साहित्य में रचनाधर्मिता 
https://youtu.be/9x1eZXZ0DkQ
महादेवी वर्मा - गौरा 
https://youtu.be/9phTfeTjyZE
आलोचना, समालोचना और समीक्षा 
 https://youtu.be/e6LwQwIRI3o
३.स्वरचित कविताओं द्वारा संवाद 
https://youtu.be/0yuoOHThHGM
 ४. स्वरचित कविताओं द्वारा संवाद 
https://youtu.be/0yuoOHThHGM

५. साकेत - दो राहा (कहानी संग्रह) कोलकाता से प्रकाशित
६. साकेत - दो राहा (कहानी संग्रह) कोलकाता से प्रकाशित
७. अधिकार और कर्तव्य 
https://youtu.be/h7Z_6w0Csdw


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