Friday, 26 March 2021

दृष्टि, दर्शन और धर्म


शोध सृजन के फरवरी अंक में प्रकाशित (दृष्टि और दर्शन पृष्ठ ३३) विषय पर तत्वदर्शी समालोचना का एक अंश यहाँ से भेजा गया ।


        

दर्शन का तनिक निकटता से दर्शन करते हुए उनका दृष्टि से भेद जानना जरूरी है। क्या है दर्शन? क्यों पढे हम दर्शन? दृष्टि ही बहुत है। क्या दोनों एक नहीं? क्या दृष्टि, दर्शन और धर्म अलग-अलग है? 

दृष्टि व्यक्तिगत धारणा, अनुभव, योग्यता, समझ, अभिप्राय से उपजती है। यह प्रायः एकसी नहीं रहती। दर्शन वह माध्यम या विधा है जो हमे दर्शन करवाती है स्वयं का स्वयं से। जानने समझने गुनने का अवसर देती है की हम शरीर, मन, बुद्धि के रुप में क्या हैं। परिवार, समाज, देश, प्रकृत्ति आदि के साथ हमारा संबंध क्या है। यह सारी बातें दृष्टि के माध्यम से समझाई जा सकती है फिर अलग से दर्शन की जरुरत क्यो। आखिरकार दोनों धर्म के आधार है तो क्या इनमे भेद है या नहीं। संक्षेप में देखें तब धर्म में दर्शन के बदले दृष्टि प्रधान हो तब वह दर्शन से दूर हो जाता है। ऊपर से दर्शन विशेष की आचार्य परंपरा अतृप्त एषणा में बहकर अपने-अपने दर्शन की गुणवत्ता कम कर देती है। 

मत स्वातंत्रयता नाना दृष्टियाँ पैदा कर विचार - विमर्श का पोषण करते हुए स्वस्थ संवाद की ओर समाज को ले जाती है। जब किसी विषय, व्यक्ति, स्थानादि को जानने की इच्छा पूरी होती है तब उससे होने वाला अनुभव विचार या दृष्टि या समझ पैदा करता है। वह मन में रहे या अभिव्यक्त हो यह व्यक्तिगत स्थितियों पर निर्भर है। समाज में बिना विशेष कारण के जानकारी एकत्रित करते हुए लोग दिखते हैं फिर चाहे समय व्यतीत या मनोरंजन हेतु हो। कई बार जानकारी स्वतः नाना माध्यमों से आती है। प्राकृतिक व्यवस्थानुसार सारी इन्द्रियाँ बहिर्मुखी है इसीलिए मन भागमभाग में लगकर व्यक्ति विशेष के दृष्टिकोण में विविधता लाता है तब समाज का कहना ही क्या। यह विविधता आती है विवेक, विश्लेषण, संयम, निदिध्यासन, क्रियार्जित अनुभव, उम्र जनित बदलाव, जमीनी सच्चाई जैसे कारणों से। इसके साथ शासन का प्रभाव दृष्टिकोण पर पडता है फिर चाहे वह राजतंत्र, लोकतंत्र या अन्य कोई। व्यवस्था चाहे जैसी या जहाँ कहीं की हो अपनी वेचारिकता समाज पर लादने का प्रयास करती है। इसके लिये वह मनचाहे पाठ्यक्रम से लेकर मनोरंजन के साधनों तक का उपयोग अपने प्रचार-प्रसार हेतु करती है। यहाँ तक की प्रश्नपत्र उस आधार पर तैयार होते हैं ताकि विद्यार्थियों को वह विचारधारा रटनी पडे और वे धीरे-धीरे बौद्धिक बंधुआ मजदूर बने। अतः आज नहीं तो कल हर दृष्टि को परस्पर विरोधी विचार से जुझना पडता है जहाँ व्यक्तिगत अनुभव को बिना विश्लेषण के औरों से मनवाया जाता है। अंतर्मुखता के अभाव में व्यक्ति बहुधा इधर-उधर डोलते - डोलते जीवन यात्रा पूरी कर लेता है। इस कशमकश से जुझते हुए कोई एकाध ही सत्यान्वेषी बनता है। यह शुरुआत है पशुवत जीवन से ऊपर उठने की। इस मोड पर 'दर्शन' शब्द अपने तामझाम सहित सामने आता है और जिसका इस चर्चा में 'साक्षात्कार' अर्थ लिया गया है। यह अर्थ व्यक्ति विशेष के अपने वास्तविक रूप तथा व्यवहार में सामंजस्य बिठाता है ताकि सत्य की खोज पूरी हो सके। इसमें वह अन्वेषक 'श्रोतव्य, मन्तव्य, निदिध्यासितव्य' के साथ 'द्रष्टव्य' संग युक्त होता है उस तत्व को जानने की प्रक्रिया में । 


सबको अपनी-अपनी दृष्टि सही लगती है। ऊपर से व्यक्ति का लालन-पालन जिस वातावरण में हुआ उसका प्रभाव मानसिक तथा बौद्धिक स्तर पर पडता है। किसी भी वस्तु, व्यक्ति, मान्यता, आदि पर बचपन से सुनी बातें आगे चलकर सुनने को मिलती रहे तब उनका त्रि-आयामी प्रक्षेपण दर्शन रूपेण, मनमुकुर में होने लगता है। यहाँ उसकी अनियंत्रित भोगेच्छा या अतृप्त एषणा से उत्पन्न भावना लगातार भ्रमित करती है और वह अतीन्द्रिय वस्तु आदि तक के दर्शन का दावा करता है। इस मनोवैज्ञानिक खेल में तन्त्रिका तन्त्र (नर्वस सिस्टम) तथा ग्रन्थिरस (हार्मोन) की भूमिका महत्वपूर्ण है। विशेषतः स्वप्नावस्था इसका माध्यम बनती है। वह व्यक्ति समझ नहीं पाता कि स्वप्न में वही नाना रूपों में था और धीरे-धीरे वह व्यक्ति विशेष स्वसम्मोहन में जीने लगता है। उससे प्रभावित हो कर मनोराज्य को सही मानता है और ऐसे में अनुभव की प्रामाणिकता संदिग्ध हो जाती है। आधुनिक विज्ञान में नवीन प्रयोगों के निष्कर्ष जाँचने की अपनी-अपनी शैली है। साधारण नियमानुसार उस प्रयोग से संबंधित विधा के अन्य विशेषज्ञ वही उसे दोहराते हैं और बहुधा उन्हीं मापदंडों के अनुसार जाँच करते हैं। जब निष्कर्ष एक निकलता है तब उसपर आगे कार्य होता है। नहीं तो आपसी विचार - विमर्श द्वारा प्रयोग पुनः होने की संभावना बनती है। साक्षात्कार की राह में होनेवाले अनुभव जाँच से परे नहीं है। यहाँ बारी आती है उन मनीषियों की जो पहले चल चुके हैं या फिलहाल चल रहे हैं। वैदिक वाड्मय के प्राचीन तथा प्रामाणिक उपनिषदों में पूरी राह इस तरह प्रत्यक्ष तथा सुत्रात्मक शैली द्वारा समझायी गयी है कि कोई केवल अपनी दाल नहीं गला सकता। इस राह में आने वाले पडाव ही सही मायने में दर्शन है। 


 यहाँ शंका उठती है पौराणिक साहित्य पर आधारित दृष्टियों की जिनके लिए 'दर्शन' शब्द का प्रयोग होता है और इसीके चलते मध्ययुगीन भक्ति साहित्य में पनपी विचारधाराएँ दर्शन कहलाई। पुराण परतः सिद्ध है यानि उनकी बातों को प्रमाण रूप में लेने से पहले जाँच-पड़ताल जरूरी है। और यही नियम स्मृति, इतिहासादि पर लागू है। उदाहरण हेतु प्यास लगने पर तरल पदार्थ, स्वतः तथा माध्यम जैसे पेयजल, दूध, रस, छाछादि परतः सिद्ध; क्षुधा तृप्ति हेतु भोजन स्वतः तथा माध्यम जैसे दाल-भात, रोटी - सब्जी, पराठादि परतः सिद्ध है। अब कोई भूख - प्यास दोनों पेयजल से तृप्त करले तब सबके लिए वह नियम नहीं बन सकता क्योंकि वेद रूपी ज्ञान सबके लिए है। पुराणादि को इसीलिए वेद के अनुकूल अंश में प्रमाण माना जाता है। वेद कोई पुस्तक मात्र नहीं बल्कि ज्ञान राशि है जो किसी के अच्छे-बुरे लगने पर निर्भर या माध्यमों को अतिरंजित तरीके से महिमामंडित करने के पक्ष में नहीं है। भक्तिकाल की सभी विचारधाराओं ने पुराणादि को स्वतः सिद्ध मानते हुए कईयों ने अपनी दृष्टि श्रीमद्भगवद्गीता पर भाष्य लिखकर, दर्शन के नामपर चलवाई। यहाँ रेखांकित करने वाली बात है कि सबने सारे अध्यायों पर खुलकर चर्चा नहीं की। यहाँ तक की आहार-विहार व्यवहारादि पर दृष्टि देनेवाले श्लोकों को सतही स्तर तक रखा। समाज को समझाया गया की यह अन्त समय सुनने वाला ग्रन्थ है। सारे महानुभावों के लिए पुराणादि प्रेरणा स्रोत बने और उपनिषदों पर जब लेखनी चलाने की सोची तो सबको अपनी दृष्टि खंडित होती नजर आई जो उन्हें अधिक प्रिय थी। समाज में यह प्रचारित करवाना जरूरी हो गया की श्रीमद्भगवद्गीता उपनिषदों का सार है इसलिए उनपर अलग से लिखने की जरूरत नहीं। इसका मतलब गीता पर लिखना बहुत है। इतनी समझ आदि शंकराचार्य में थी फिर भी अलग से उपनिषदों पर भाष्य जमकर लिखा।अगर गीता ही सबकुछ है तब उसे ठीक से समझाना था पर वहाँ संप्रदायवाद हावी हो गया और सब अपने-अपने मत का समर्थन उससे प्राप्त करने के लिए श्लोकों का विचित्र अर्थ बताने लगे। ऊपर से संस्कृत की वर्तमान व्याकरण के लचीलेपन का दुरुपयोग करके मनमाना अर्थ बताने में सहयोग मिला। नहीं तो दो एक श्लोक या उनमें व्यवह्रत शब्द के आधार पर उछलकूद मचाना उचित नहीं। यह ऐसा शास्त्रीय छल था जिसके झाँसे में समाज आ गया। 


पौराणिक साहित्य को परतः सिद्ध कहने का कारण जानना जरूरी है :-
उनकी रचना साहित्य सम्मत शैली में हुई। लम्बे समय तक चलने वाले ज्ञान सत्र या अन्य अनुष्ठान में खाली समय मनोरंजन हेतु इनका उपयोग होता था। अतिश्योक्ति अलंकार से भरी कहानियाँ एक तरह की शांति पहुँचाती जो मन को तरोताजा करती और इसीलिए भिन्न पुराणों में एक ही पात्र से संबंधित परस्पर विरोधी बातें मिलती हैं। कई जगह एक ही पुराण में विरोध मिलता है। दसियों चीजें मनगढन्त तरीके से कहानी के रूप में परोसी गई। तक्षशिला तथा नालन्दा शिक्षा केन्द्र तहस नहस करने से वहाँ रखा प्राचीन साहित्य नष्ट हुआ। बाद में अन्य स्रोतों से सामग्री इकट्ठी की गई। उनके रखरखाव में वातावरण का प्रभाव तथा पशुओं के चरे जाने से कई पाण्डुलिपियों के पृष्ठ नष्ट हुए और वे पूरी नहीं मिली। इसके साथ संप्रदायों ने अपनी बात मनवाने के लिए प्रसंग जोडे। ऐसी स्थिति में उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध होती है। प्रायः बडे प्रकाशक एक सर्वमान्य संस्करण निकालते हैं फिर भी पाठ भेद रहता है। जब हम १८ उप पुराणों की ओर देखते हैं तब पता चलता है कि पुराणों में से प्रसंग निकालकर उनकी रचना हुई। जैसे स्कन्द पुराण के रेवा खण्ड के आधार नर्मदा पुराण लिखा गया। रेवा का दूसरा नाम नर्मदा है। स्कन्दपुराण के रेवा खण्ड में सत्यनारायण पर कुछ श्लोक है जिनका विस्तारित रूप सत्यनारायण कथा है। अब आम व्यक्ति के बोलने (उवाच) से विश्वसनीयता नहीं बनेगी इसलिए ऐसी चीजों को प्रामाणिक बनाने हेतु 'ईश्वर उवाच, देव्युवाच, नारद उवाच' आदि के साथ श्लोक जोडे गए। उपनिषदों में आई कहानियों को बढ़ा-चढ़ाकर बतलाया गया। 
भारत में राजतंत्र वाले युग के दौरान जिस शासक का प्रभाव बढा जनता ने उसकी विचारधारा न्यूनाधिक अपनाई। इसके चलते नवीन ग्रन्थ रचे गए और पुरानों में फेरबदल किया गया। जब शाक्त संप्रदाय का प्रभाव बढा तब देवी भागवत लिखा गया। स्वामी राजाश्रम ने इसे पुराण प्रमाणित करने के लिए दुर्जनमुखचपेटिका की रचना की। काशीनाथ भट ने विरोध में दुराजनमुखमहाचपेटिका की रचना की। तीसरे महानुभाव ने भट का खंडन करते हुए दुर्जनमुखपद्यपादुका की रचना की। यह सारा खेल प्रधानता यानि कौन बडा कौन छोटा वाले भाव से खेला गया। ऐसी भक्ति किस काम की। ऐसे साहित्य में अभद्रता, अशालिनतादि काफी है। इसके समर्थन हेतु अन्य विधाओं के ग्रन्थों से छेडछाड हुई। यहाँ तक की भक्तों द्वारा रचित साहित्य प्रमाण माना गया बडे ग्रन्थों की तुलना में। 

उपरोक्त कार्य की परंपरा आजतक कायम है। उसके साथ अंग्रेजों के शासनकाल से व्यक्तिगत दृष्टि को दर्शन कहा जाने लगा और उस आधार पर पुस्तकें लिखी गई। यह बाहरी परंपरा का अंधानुकरण है जहाँ ऐसा ठोस साहित्य नहीं जो शंका निवारण करते हुए राह बताए और निजी अनुभवों की जाँच कर सके। इसलिए निष्पक्ष साहित्य के अभाव में जब जो भावना फैली उसपर पुस्तकें आ गई और किसी ने संगति या अलग - अलग विचारों की अन्दरूनी एकता को महत्व नहीं दिया। एक तरह की प्रतिस्पर्धा ने बौद्धिक समाज को ढक लिया। तर्क प्रधान मानसिकता ने कुतर्क, वितण्डा तथा जल्प को बात - बात पर महत्व दिया। जैसे डार्विन का विकासवाद दर्शन से अधिक ईसाई धर्म की मान्यताओं पर टिका है जिसपर विज्ञान का आवरण लगा दिया गया। भारतीय तथा बाहर के कुछ रचनाकार जिस विकासवाद की बात करते हैं उसकी नींव में ईसाई धर्म ही है। यहाँ वाले वैसे महानुभाव विदेशी 'फिलासफी' के भारवाही हैं भारतीय परंपरा के नहीं। भले ही किसीने गीतादि पर लिखा हो वे स्थापित भारतीय दर्शनों के प्रतिनिधि नहीं बनते और न यहाँ के साहित्य पर लिखते समय न्याय कर पाते हैं। ये और इनके समर्थक परदेसी छाप विचारकों का जीभर उल्लेख करेगें भारतीय दर्शन में अहं शीर्षक कार्यक्रम में पर चार्वाक को नकार देंगे। इसके कारणों में एक है उन विचारकों तथा वैज्ञानिकों की पृष्ठभूमि जहाँ येन केन प्रकारेण पूरा परिवेश उन मान्यताओं को दोहराता रहा। अवचेतन मन में उसकी परत पर परत जमती चली गई और मौका आने पर वे हावी हो गईं। इसके साथ जुडा विदेश संस्कृति का वह आकर्षण जो एक हदतक रूढिवादिता से ऊब चुका था और समाधान का मार्ग बाहर खोजने लगा। बाहरी साज सफाई अधिक भा गई। ऐसे लोग यह खोजना भूल गए की क्या सही में बडे ग्रन्थों में भेदभावादि का समर्थन है की नहीं। अपने घर की सफाई करते तो और बात थी, वह न करके गोरी चमडी मनभावन लगी। वहाँ की शिक्षा आधुनिक, प्रगतिशील तथा प्रयोगवादी लगी। 

भक्तिकाल तथा अंग्रेजों के युग से पनपी मान्यताओं का मिश्रण काफी हुआ। सहूलियत हेतु दर्शन के बदले फिलासफी शब्द का प्रयोग एक बात है पर उसे पाश्चात्य फिलासफी समान समझना उचित नहीं पर हो वही रहा है। आए दिन गोरखनाथ का दर्शन, मीराबाई का दर्शन, तुलसीदास का दर्शन, कबीरदास का दर्शन, श्रीमद्भगवद्गीता का दर्शन, अष्टावक्र गीता का दर्शन, रामायण का दर्शन, महाभारत का दर्शन, योगवासिष्ठ का दर्शन, इत्यादि सुनने को मिलता है। और तो और दर्शन शास्त्र के लेखकों के नाम से सिलसिला चल पडा। चर्चित विभूतियाँ में स्वामी रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानन्द की दृष्टि को नव-वेदांत माना जाता है। जबकि परमहंस ने उपनिषदों के अनुसार समझाया बिना उनका नाम लिए। उन्होंने विपरीत या विशेष या अलग से कुछ नया नहीं कहा। स्वामी विवेकानंद के नव-वेदांत दर्शन में जिस कर्मयोग की बात है वह पहले से ही योगवासिष्ठ तथा गीति में है। अस्ल में गीता की आड में अपनी-अपनी दाल गलाने की भावना ने इसके लक्ष्यार्थ को धुंधला कर दिया। दोनों ग्रंथ आत्मज्ञान के बाद कर्तव्यनिष्ठ या कर्तव्यपरायण हो कर जीवनयात्रा करने की बात समझाते है। वाल्मीकि रामायण तो प्रबंधन परर आधारित ग्रंथ है। भ्रामक प्रचार-प्रसार के चलते कुछ का कुछ समझाया गया। दुषित शिक्षा पद्धति हेतु केवल विदेशियों को कोसने वाले स्वयं दर्शन, भोजन प्रणाली पर धार्मिक राजनीति, औपनिषदिक साहित्य में छिपे मुल्यों, परिवर्तनशील धर्मशास्त्रों पर अपरिवर्तनशील की ठप्पा लगाने, जैसे विषयों पर मौन रहते हैं। यह वैसा ही है जैसे वेदान्त के साथ नाना शब्द जोडकर अपनी अलग विशिष्ट पहचान बनाना (विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, शुद्धाद्वैत, अचिंत्य भेदाभेद)। 
यह जानना विचारोत्तेजक है कि ऐसी शाखा तत्पश्चात प्रशाखा बनाने वालों ने उपनिषदों पर भाष्य नहीं लिखा और अपना-अपना चिंतन एक दुजे के खंडन, पौराणिक साहित्य तथा स्मृतियों तक रखा। कई जगह सुनने पढने को मिला की चूँकि गीता उपनिषदों का सार है इसलिए उसपर लिखना ही उपनिषदों पर लिखना है। यह बचकना शिशुवत तर्क है क्योंकि गीता उनका स्थान नहीं ले सकती। बाद के विद्वानों ने उसे सार माना है प्रधान वक्ता (कृष्ण) तथा रचनाकार (वैदवायास) ने नहीं। ऐसी शाखावावों को अपने-अपने संकुचित दृष्टिकोण का औपनिषदिक (प्राचीन तथा प्रामाणिक) साहित्य द्वारा समर्थन न मिलने पर उसकी अवहेलना कर दी। शाखाओं की उपज का प्रमुख कारण था आदि शंकराचार्य के योगदान का अवमूल्यन करना जबकि उनके द्वारा व्यवह्रत शब्द 'माया, अद्वैत' आदि पहले से प्रामाणिक उपनिषदों में थे। जब वे जगत के मिथ्यात्व का उद्घोष करते हैं तब वहाँ लक्ष्यार्थ का अनुभव किये बिना विरोध कहना शोभा नहीं देता। जिस घर में सब मालिक बनना चाहते हों वहाँ स्वस्थ वैचारिकता के बदले बोझिलता रहेगी। सर्व दर्शन संग्रह में संप्रदायों की विचारधाराओं को दर्शन माना गया। मानस में कहा गया - 'श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक। तेहिं न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक।।' 
वेद समर्थित तथा ज्ञान एवं वैराग्य से परिपूर्ण हरि भक्ति के मुताबिक लोग नहीं चल रहे। कल्पना- जल्पना सहारे पंथ बनाने में लगे हैं। (१)
 शिक्षा जगत ने सबको स्वीकार लिया। यह नहीं की उसका दिल बडा था वरन कारण कई थे। चूँकि बहिर्मुखी समाज को बाहरी श्रृंगारिक छाप भक्ति अधिक रूचिकर लगी और वे किसी न किसी संप्रदाय से जुडे रहे अतः उसके प्रचार प्रसार हेतु अपने पद का दुरुपयोग करते हुए पाठ्यक्रम में फेरबदल किया। स्थापित भारतीय दर्शनों के प्रति उदासीनता ने ऐसी चित्र - विचित्र स्थिति पैदा कर दी जिससे दर्शन का पाठ्यक्रम दिन पर दिन बोझिल हो गया। हँसी तब आती है जब तुलसीदास को कबीर विरोधी या असहिष्णु कहा जाता है। कबीरदास को केवल ब्राह्मण विरोधी कहकर अपनी मलिन मानसिकता का ढोल बजाया जाता है। आजीविका हेतु पाखंड का सहारा न्युनाधधिक हर वर्ग नाना तरीके से लेता है भले ही कुछ लोग उसे अपने-अपने परिवार - परिजनों तक सीमित रखे। ब्राह्मण शब्द की जाँच हेतु स्वाध्याय जरूरी पर वहाँ संस्कृत आ जाती है और ऐसो को उससे सख्त परहेज। आखिर परदेसी चिकित्सक की सलाह सर्वोपरि। कहीं कुछ हो गया तो कौन संभालेगा। उसके लिए दुसरा धर्म अपनाना मंजूर और वहाँ के रीति-रिवाज में पाखंड नजर नहीं आता। यह अद्भुत 'अपनी भाषा' प्रेम है जो सुविधानुसार समझाया जाता है। यहाँ के पुराने साहित्य की भाषा अन्य ग्रह की लगती है और दर्शन के सुत्र उसमें लिखे हुए। अब इसमें ऐसों का क्या दोष। इस बाहरी व्यक्तिवादी लगाव से हिन्दी साहित्य में तुलनाओं का युग शुरु हुआ। यह समीक्षात्मक या सारग्राही भाव से कम एक रचनाकार को दुसरे से महान बताने के लिए अधिक हुआ। कईयों के अनुसार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कबीरदास को महत्व नहीं दिया और वह द्विवेदी युग में मिला। इससे कोई छोटा बडा नहीं बनता पर झगड़ालु व्यक्ति समय बिताने के लिए और क्या करे। ऐसों को रचनाधर्मिता से मतलब नहीं होता। गोस्वामी ने पंद्रह वर्ष अध्ययन पश्चात लेखनी उठाई और उनके साहित्य को पढे बिना नकारने में पंद्रह दिन तक नहीं लगते। उनके द्वारा किया गया पाखंड का विरोध पल्ले नहीं पडता। 
दुनिया कहाँ से कहाँ चली गई पर बहुतों की यह सोच वैसी ही है। अब जिन आधुनिक रचनाकारों ने दर्शकों की दार्शनिकता समझ कर लेखनी उठाई उनपर आयातित वाद (दृष्टि) थोपने पर बहुधा हास्यास्पद स्थिति बन जाती है क्योंकि उनकी अधिकतर रचनाएँ उसपर खरी नहीं उतरती। वे शोषणकारी तत्वों को निरवंश करने की बात ज्यादातर नहीं करती। उनके पात्रों में ईश्वर तत्व पर भरोसा नजर आता है भले ही उसे कोसे। ऐसे रचनाकारों में बहुतों ने अलग से अध्ययन नहीं किया दर्शनों का पर यह कोई सिद्धांत नहीं कि व्यक्ति विशेष उन्हें पढकर ही समझे। मुंशी प्रेमचन्द की लेखनी से तभी बडे घर की बेटी जैसी रचना निकलती है। यह अकेला उदाहरण नहीं है उनके साहित्य का और न वे एकमात्र रचनाकार। इसका मतलब यहाँ शोषण कम हुआ यह बात नहीं वहाँ (विदेशों में) सत्ता परिवर्तन लक्ष्य था। फ्रांस में जनता को भड़काने के लिए एक वाक्य रानी के नाम से प्रचारित करवाया (रोटी नहीं है तो केक खाये)। प्रायः आंदोलनों में ऐसी चाल चली जाती है उसे सफल बनाने के लिए। भारतीय दर्शनों में तो दूर यहाँ की जलवायु तक में ऐसी भावना नहीं थी। यह और बात है कि परदेसी रंग में सराबोर लोगों ने उकसा कर मालिकों को मरवाया तो दूसरी ओर वे भी क्रूरता के शिकार हुए। साहित्य में यह भेद स्पष्ट दिखता है जहाँ भारतीय चिन्तन शैली अपनाने वाले रचनाकार भीड में अलग खडे दिखाई देते हैं। उनपर छाप चाहे जैसी लगवा दी जाए पर समझने वाले समझते हैं। एक प्राध्यापक का विश्वविद्यालय में अन्तिम दिन था और वे आखिरी कक्षा लेने गए जो खाली दिखी। दो एक जने इधर-उधर टहल रहे थे। पूछने पर पता चला कि विभागाध्यक्ष ने सबको एक निजी संस्था की गोष्ठी में जाने को कहा था। इनको छोडकर बाकी चले गए। इसमें प्रयोग या प्रगतिवाद या आधुनिकता देख कर खुश होना था पर उन्हें मार्मिक वेदना हुई। सहनशीलता, संतोष, धीरज या शिष्टाचार ढकोसला लगता था और वही याद आने लगे। अपनी पीडा सार्वजनिक मंचों पर परोसी ताकि भक्तगण तसल्ली दें। इसे भी प्रचार का माध्यम बना लिया। जो दो-एक विद्यार्थी रह गए थे उन्हें कक्षा में बुलाकर तस्वीर ली और समाचार सहित साँझा किया। ऐसी मंडली केवल अपनों को हर जगह छपते देखना चाहती और पुरानी पत्रिकाओं के बन्द होने का रोना तभी रोती है क्योंकि उन्हें भाव मिलना बन्द हो गया। पर वे समाज को नहीं बताते की उनके चलते दसियों लघु पत्रिकाएं बन्द हुई। समय का घुमता पहिया ऊपर नीचे होते रहता है। काली कमाई भरोसे टिकने वाली पत्रिका अक्सर स्वस्थ सदेश नहीं देती, केवल छपास रोग पर मलहम लगाती है। ऐसी हल्की सोचवाले रचनाकारों के तार दर्शनों के साथ नहीं जोड पाते। ये भले समाज की बात करें रहते हैं मलिन मन के घोर व्यक्तिवादी। 
इस विकट स्थिति में स्वस्थ विकल्प तलाशना और क्रियान्वयन करना जरूरी है। इससे साहित्यिक सेवा तक होगी। साहित्य दर्शन से दृष्टि पाता है और उसे गति देता है। इसे ही संसरण या संचारित कहते हैं क्योंकि उनमें छिपे मूल्यों को साहित्यिक विधाओं द्वारा फैलाया जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि जैसे - तैसे रचना का संबंध दर्शन से जोडकर काम चलाया जाय। जरूरत पहले यह है की स्थापित दर्शनों को समझकर भक्तिकाल में पनपी विचारधाराओं को दर्शन न कहा जाय। उनमें प्रतिस्पर्धा, प्रभुत्व, महामंडित काल्पनिकता, ईश्वरोन्मुखी करने के नाम भ्रमित करना, भक्ति की आड में भोग विलास को उचित ठहराना, नारी समाज को 'वस्तु' के रूप में चित्रित करना, भाषाई अशिष्टता, उपनिषदों का खंडन प्रचुर मात्रा में है। यौनाचार को गुरुसेवा के नामपर बढाया गया। इनकी भोगवाद वृत्ति के चलते १८८५ में मुंबई में एक संप्रदाय पर मुकदमा चला। यह वृत्ति आजतक कायम है नाना प्रकार से। अविभाजित भारत के लाहोर में से वहाँ के अधिकारियों ने १९४० में एक तथाकथित कृष्ण को भगा दिया था रासलीला के चलते। भारत पाक और भारत चीन युद्ध के समय तीन स्वघोषित कृष्ण रासलीला में व्यस्त थे। ऐसों को सामाजिक समर्थन मिलते रहा और जहाँ अनबन हुई या स्थानीय प्रशासन को खुश नहीं किया गया वहाँ पोल खुल गई। यहाँ इनके 'गुरु' ही नहीं पर समर्थक तक वैसे ही थे तभी दसियों जगह केन्द्र खोल भगवद्प्रेम के नामपर पापाचार किया। अधिकांश जगह सत्संग या कीर्तन का नाम रखा जाता। पचास - साठ के दशक में कई जगह केवल महिलायें केन्द्र चलाती थीं। किसी दुखियारी के बारे में सुनते ही उसे भगवद्चर्चा के लिए बुलाती। उसके लिए आसान रास्ता था मन्दिर आते-जाते पकडना। कोई एकाध ही इनके चंगुल से बच पाती। यह कार्य घरों या अलग से ली गई जगह पर होता आश्रम में प्रायः नहीं। वैसे भी उस समय अधिक आक्रम नहीं थे सब जगह क्योंकि इनसे कमाने की कला अपनी शिशुवस्था में थी। भारतीय समाज में संतानहीनता को पाप समझा जाता है और उसके लिए सारे उपाय करने की छूट दी गई जिसका दुरुपयोग भरपूर हुआ। ऐसा करने वालों ने दैहिक रुप से गुरुसेवा को महिमामंडित कर दिया और लोगों के दिलो-दिमाग में बात जम गई की इससे महिलाओं का जीवन सफल हो जाएगा। आज भी इसे सच माननेवाले बहुत हैं। इसमें केवल एक वर्ग दोषी नहीं। आखिर हर तरह के लोगों से समाज बना। दूसरी ओर आम आदमी का भोजन रोटी, मिर्चा, नमक और प्याज पर आघात किया गया। मनगढन्त किस्सों को पुराण में जोडकर प्याज लहसुन को बदनाम करके समाज को उनके विरुद्ध भड़काया।(२) कईयों ने गीता के सत्रहवें अध्याय में सात्विक राजसिक तथा तामसिक गुण वाले आहार के नामपर इन्हें गलत कहा जबकि ग्रन्थ में किसी खाद्य पदार्थ का नामतक नहीं है। टीकाओं में समझाने के नामपर इनका उदाहरण रहता है जबकि कोई भी वस्तु स्वयं में अच्छी-बुरी नहीं होती। आस्थावान समाज बातों में बह गया। सैकडों घरों में कलह रहने लगी खाने और न खाने के नाम पर। बाद में पनपी कुछ प्रान्तीय विचारधाराओं में गाजर, कटहल, बैंगन, लीची तक वर्जित कहा गया और ग्रन्थ तक लिखे गए। इनको पैसेवालों तथा विदेशी भक्तों का समर्थन अधिक नहीं मिला इसलिये प्रचार प्रसार कम हुआ। प्याज लहसुन से दूर रहने वाले गाजरादि खाते हैं तब उन्हें निषिद्ध समझने वालों की दृष्टि में बाकी लोग बुरे हो गए। सबकी सुनना और सिर पर बिठाना एक बात नहीं है। कोई तथाकथित विचारक जीव, जगत, आत्मा, ईश्वर, ब्रह्म पर विचार व्यक्त करने मात्र से उसके भाव दर्शन नहीं बन जाते। इनलोगों ने भगवान और ईश्वर को एक अर्थ में लेकर अनर्थ कर दिया। आस्तिक नास्तिक तक की मनगढन्त व्याख्या कर भ्रमजाल फैलाया। उपनिषदों में शिखा जनेऊ आदि के स्वरूप को समाज से छिपा अपनी दाल गलाई। इस मामले में पहले के भोग-विलासी राजाओं द्वारा प्रायोजित मान्यताओं का विरोध नहीं किया। वेदाध्ययन के लिये इसकी अनिवार्यता, वर्ग विशेष तथा नारी समाज के शोषण-दमन पर उनके द्वारा लिखवाए साहित्य की जाँच नहीं की। यह नहीं समझाया की वे वैदिक वाड्मय के प्रतिकूल होने के कारण ऐसे ग्रन्थ प्रमाण नहीं है। समाज सुधारक बन वंचित लोगों को वे अधिकार दे कर अपना समर्थक बना लिया। एक ने लूटा शास्त्र के नामपर दूसरे-तीसरे ने मानसिक दास बना लिया। किसी ने सही जानकारी नहीं दी। यानि सबने प्रामाणिक उपनिषदों के तथ्यों तथा उपासनाओं को सामने नहीं आने दिया। ऐसी भावनाएँ तथाकथित आस्तिक या शास्त्रानुरागी की कैसे हो सकती है। मानस में पहले ही संकेत कर दिया - 'हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ। जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सद्ग्रन्थ।।' 
वर्षाकाल में कच्चे रास्ते घास से ढक जाते हैं वैसे ही पाखंडवाद के चलते सद्ग्रन्थ छिप जाते हैं यानि उनका सार दबा रह जाता है। (३)

 इन बातों पर जल्दी से ध्यान नहीं जाता। जैसे महर्षि पतंजलि का अष्टांग योग बहिर्मुखता को बनाए रखता है क्योंकि वह स्थूल सुक्ष्म शरीर के लय तक सीमित रहकर कारण शरीर को आत्मरूप में लेता है। उसका संबंध आनन्दमय कोश से। होने के कारण उससे प्राप्त आनन्द को सर्वोच्च मानता है। जबकि उस स्तर की तमाम साधनाएं दैहिक है और आत्मज्ञान शरीर रूपी उपाधि संग है। ऐसा सामान्य ज्ञान प्रायः लोगों को रहता है। तभी कबीरदास पुत्र कमाल ने कहा -'इतना जोग कमाय के साधू, क्या तूने फल पाया। जंगल जाके खाक लगाये, फेर चौरासी आया।। राम भजन है अच्छा रे, दिल में रखो सच्चा रे। जोग जुगत की गत है न्यारी, जोग जहर का प्याला।। जीने पावे उने छुपावे, वो ही रहे मतवाला।।' यहाँ भजन स्वभाव या आदत सुधारने का द्योतक है। जोग को जहर का प्याला 'पहले चमत्कार फिर नमस्कार' वाली सामाजिक वृत्ति को लक्षित कर रहा है। यह अशिक्षित - शिक्षित दोनों वर्ग में देखी जा सकती है। इसमें यश कमाने की तीव्र लालसा योग - भोग को एक करती है। विभिन्न प्रदेशों में अलग-थलग मान्यताएँ हैं हमलोगों के बारे में। सामान्य तरीके से रहने वाले साधु को बहुधा हेय समझा जाता है। वह चप्पल जूते न पहने या पैसे न छुए या शीतकालीन वस्त्र न पहने या नशा करे या विचित्र वेष में रहे या केवल एक चीज का सेवन करे जैसे जल, मिर्चा, आलू, चना, आदि या स्नान बंद कर दे या बात करते हुए ढेरो गालियाँ दे इत्यादि। इनमें अधिकांश पूजित होने के लिए ऐसे चित्र विचित्र अभ्यास करते हैं। उस प्रांत विशेष का समाज उसे ही असली साधु मानता जो या तो वैसी (उनकी मान्यतानुसार) हरकत करे या कुछ और अलग से करे। जो एकांतवास करते हुए अलग से नियम पालन करते हैं उनकी बात अलग है, यहाँ संत कमाल उनपर कटाक्ष कर रहे हैं जो इनके चलते समाज में कीर्ति, कंचन, कामिनी के फेर में रहते हैं। उनके महलनुमा आश्रम और दबदबा ही उनकी साधना का फल जो बाद में औरों के काम आता है। ऐसी साधना आगे नहीं बढ़ाती साधक को। आखिर सब है अविद्या का परिवार। (४) व्यक्तिगत विचारों को भी अलग से दर्शन न माना जाए क्योंकि आधुनिक विचारकों ने श्रुति, युक्ति तथा अनुभूति वाले सुत्र का दुरुपयोग करते हुए युक्ति के नामपर वितण्डा का सहारा लिया और अपनी अनुभूति को बिना जँचवाए समाज पर लादी। जिस तरह रसायन शास्त्र में निर्णय लेने के लिए इतिहास या जीव विज्ञान काम नहीं आ सकता वैसे ही भारतीय दर्शन हेतु उनके लिए निर्मित सुत्र काम आएगें। यह लकीर के फकीर बनने या हठधर्मिता नहीं और न स्वतंत्र वैचारिकता को रोकने का प्रयास। अब चिन्तन और निठल्ला चिन्तन एक नहीं है। कई बार व्यक्ति अपने ही अनुभव को त्रुटिपूर्ण पाता है। अतः स्वानुभूत आधारित निर्णय का विश्लेषण न्याय संगत है। यह व्यक्तिवाद या व्यक्ति पूजा की अविद्याजनित अवधारणा को परे करेगा। इससे दृष्टि तथा दर्शन का वह आवश्यक भेद समझ में आएगा जहाँ संस्था, संप्रदाय या व्यक्ति विशेष की दृष्टि एक दुसरे पर हावी होने की जी तोड कोशश करती है वहीं दर्शन मनुष्य को महामना बनाने का सामर्थ्य रखता है बशर्ते वह ह्रदयंगं किया जाए। दृष्टि महामना नहीं बना सकती क्योंकि वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से व्यक्ति पूजा पर आधारित रहती है। 

तब क्या दर्शन और धर्म अलग - अलग है? क्या धर्म दर्शन से नहीं निकला? 

जैन दर्शन और जैन धर्म अलग हे। वैसे ही बौद्ध दर्शन तथा बौद्ध धर्म। जब किसी दर्शन विशेष का विस्तार या रुपांतरण धर्म के रुप में होता है तब उसमें कई बातें जोडी जाती है उसे औरों से विशेष प्रमाणित करने की जी तोड चेष्टा की जाती है। भारत के नौ स्थापित दर्शनों की अन्दरूनी एकता भंग होती है और संगति लगने का प्रश्न पैदा नहीं होता। नौ दर्शनों का सार उपनिषदों की वाणी सुनाता है संक्षेप में। वहीं दृष्टि केन्द्रित धर्म समाज में विघटन पैदा करता है जैसे प्याज लहसून की धार्मिक राजनीति, शिखा सूत्र की केवल कर्मकांड वाली व्याख्या को अतिरंजित ढंग से बतलाना, इत्यादि कार्य दर्शन विरोधी हैं। यह बातें दृष्टि या विचार अन्तर्गत है जिन्हें मध्ययुगीन संप्रदायों ने दर्शन का नाम देकर फैलाया। इनके प्रचार-प्रसार में उन राजघरानों का योगदान रहा जो उपनिषदों में समझाए धर्म के समानान्तर धार्मिक प्रणाली खडी करना चाहते थे। इसलिए जरुरी था की पौराणिक साहित्य तथा धर्मशास्त्रों में फेरबदल किया जाए और मनमाने ग्रन्थ रचकर उन्हें वैदिक साहित्य का हिस्सा बताया जाए। चूंकि संस्कृत पठन-पाठन की भाषा नहीं रही अतः उसके आधार पर अनर्गल बातें फैली जैसे संस्कृत पर वर्ग विशेष का अनाधिकार, आदि। एसो की दृष्टि को दर्शन कहना उचित नहीं। 
 इसीलिए चार्वाक, जैन, बौद्ध को नास्तिक कह अलग कर दिया गया। जमीनी सच्चाई से अनजान लोग तभी कहते हैं कि भारतीय दर्शनों में सामुदायिक जीवन (community living) की शिक्षा नहीं है। जबकि चार्वाक दर्शन यही समझाते हुए वेदांत की ओर ले जाता है। इन दोनों के बीच के दर्शन क्रमबद्ध तरीके से अध्यात्म तथा व्यवहार में संतुलन बनाते हुए जीना सिखाते हैं और मरना भी। 
अतः दृष्टि आधारित धर्म सही में जोडते नहीं। जब स्थापित दर्शनों के सार के क्रियान्वन में धीरे-धीरे विकृति आती हे और उसपर आधारित धर्म की मनमानी व्याख्या हो तब दृष्टि से निकले धर्म का कहना ही क्या। दर्शनों के मामले में समाधान उसी ए निकलता है। यह भी एक अन्तर है दर्शन और दृष्टि का। दृष्टि आधारिक धर्म स्मृति पुराण को अतिरंजित तरीके से महिमामंडित करता है और धर्मशासाज्ञों को अपरिवर्तनशील मानता तथा मनवाता है जिसके चलते समाज में वैमनस्यता बढती रहती है। (५)


स्वामी अक्षय चैतन्य 
संदर्भ :-
(१) कैसे उतरे मानस गहरे - स्वामी अक्षय चैतन्य विक्रम संवत २०७४ कोलकाता से प्रकाशित। 
(२) प्याज लहसुन के नामपर धार्मिक राजनीति आयोजित तथा प्रायोजित है।
https://youtu.be/HdvB57e9j-c
(३) कैसे उतरे मानस गहरे - स्वामी अक्षय चैतन्य विक्रम संवत २०७४ कोलकाता से प्रकाशित।
(४) संत वाणी - भाग २.
   https://youtu.be/xi2PyPVGo5s

(५) स्थापित भारतीय दर्शनों की अर्थवत्ता 
http://akshayaharshudou.blogspot.com/2020/10/blog-post_29.html

सनातन और वैदिक धर्म 
https://youtu.be/4xtQQuLbKAk
Before teaching sanatan e
https://youtu.be/KehVUf6v0J4


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