शोध सृजन, अप्रैल माह २०२१ में प्रकाशित मार्च वाले अंक की समीक्षा।
एक ओर असहिष्णुता तथा असंजसता का भावानल और दूसरी ओर उस साहित्यिक पत्रिका की समीक्षा करने का अनुरोध जिसमें स्वयं की रचनाएँ प्रकाशित हो रही है एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।
शोध सृजन पत्रिका परिवार को शुभकामनाएं देते हुए मार्च माह के अंक को तनिक समझा जाय। किसी भी पत्र पत्रिका का संपादकीय महत्वपूर्ण होता है और वह यथासंभव निष्पक्ष निष्कलुष रहने के साथ-साथ पाठकों को जगाने सोचने-विचारने का सफल प्रयास करे तब फिर कहना ही क्या। वैचारिक मतांतर या पूर्व पक्ष तक का स्वागत-सत्कार है क्योंकि उसके लिए यथेष्ट स्वाध्याय ही नहीं वरन पंक्तियों के मध्य पढना तथा संगति लगाने की क्षमता चाहिए। अपने विद्यार्थी जीवन में पढी पंक्ति 'हर आवाज विद्रोह और हर भटकन एडवेंचर नहीं होती' याद आ गई। संपादिका महोदया अर्चना पाण्डेय का संपादकीय वक्तव्य उस मानसिकता पर चोट है जो चिन्मय सत्ता के नारी रुप की अराधना करते हुये उसकी प्रतिनिधि माताओं बहनों का शोषण-दमन करने के लिए नाना उपाय करता है। पुरुषों को उस मुकाबले में शोषण का सामना कम करना पडा। घरेलू हिंसा के शिकार दोनों होते हैं। संपादकीय में स्वर्ग तथा मोक्ष वाले बिन्दु पर जोर है। समर्थ से समर्थ रचनाकार तक जीवन के सारे आयामों पर चिन्तन मनन नहीं कर सकता। एक रचना में भी वह गिने-चुने बिन्दु रखता है। समय की क्रमिक जरुरत के अनुसार चीजे सामने आती हैं। मानस के समय तक शोषणकारी बातें धर्म का जामा पहन चुकी थी जैसे नारी को मोक्ष का अधिकार नहीं, वह संस्कृत पढ - बोल नहीं सकती, इत्यादि। अतः समयानुकूल मोक्ष की प्राप्ति बताई गई मानस में। मीराबाई कबीरदास आदि ने नारी सम्मान को उचित स्थान दिया अपनी शैली में। हाँ इतना अवश्य है कि अनियंत्रित स्वच्छंदता नर नारी दोनों के लिए समर्थित नहीं हुई। सामाजिक ढाँचे को चारित्रिक स्वाधीनता या उच्छृंखलता की भयावहता से बचाने के लिए जो करना चाहिए था उसमें लोलुप राजसत्ता और दरबारी विद्वानों ने टाँग अडाकर पुरुषों को हावी रहने का अधिकार दिया। उसके लिए मनगढंत पुस्तक लिखने से लेकर पुराने ग्रंथों में श्लोक जोडे गये। यहाँ तक की स्थापित नौ दर्शन नारी सम्मान के पक्ष में है। हुआ यह कि चारित्रिक स्वाधीनता को नारी मुक्ति का पर्याय कहा गया। यह तक नहीं सोचा की भले मनुष्य पशु हो पर पाशविक जीवन सामाजिक ढाँचे को खत्म कर देगा। हो वही रहा है फिर चरित्रहीनता पर रोना किसलिए?
हिंदी शोध की समस्याएँ शीर्षक लेख ने ध्यानाकर्षण किया जिसमें रचनाकार सरजू प्रसाद मिश्र ने काफी संयमित होकर बातें कहते हुए चुटकियाँ लीं। गागर में सागर भरने का सफल प्रयास और कई सावधानियों के प्रति जागरूक किया। मार्गदर्शक तथा शोधार्थी की कमजोरियों की ओर संकेत किया। आखिर हर तरह के लोग हैं दुनिया में। पुरानी पाण्डुलिपि में फेरबदल से लेकर अन्य शोधार्थी को रुपये देकर लिखवाना और क्या-क्या नहीं होता। इसके अलावा प्रायोजित शोध शिक्षा जगत को दूषित करता है जैसे जबलपुर से एक तथाकथित विद्वान ने मानस में क्षेपकों पर पुस्तक लिखकर प्रकाशित करवाई। अवधी में लिखी गई रचना में हिन्दी के अनुसार या अवधी शब्दों का संस्कृत अर्थ लगाना नासमझी है शोध नहीं। पंद्रह वर्ष के अध्ययन पश्चात लेखनी उठाने वाले रचनाकार को खंडित करने में नाममात्र समय लगता है। मानस या उसकी समकक्ष रचना समझना हँसी ठट्ठा नही है। यह पक्ष शोध में अछूता रहता है और ऐसे ऊटपटांग शोध ग्रन्थ आते हैं की बहुधा आँख शर्म से झुक जाती है। दो दशक पूर्व हमें कहा गया था कि चार्वाक दर्शन को दलित दर्शन प्रमाणित करने पर हुए शोधकार्य को आप समर्थन कर दें क्योंकि आपने उसके सुत्रों को खोला तथा संगति लगाई है। हमने इन्कार कर दिया। नए विषय या पुराने विषय पर नए दृष्टिकोण की आड में खेला जा रहा खेल अपनी जडे काटने के समान है।
अपना या अपनों का दुखडा साहित्य में साँझा करना एक बात है पर उसमें औरों को कोसना या पूरे वर्ग विशेष को कलंकित करना कुछ और भले हो रचनाधर्मिता नहीं है। आपलोग दलित साहित्य शब्द से परिचित हैं और एक वाक्य नाना तरीके से सुना होगा - 'आप दलित नहीं इसलिए उसका दर्द नहीं समझ सकते। हमलोगों ने बहुत सहा है और अब भी अवहेलित हैं।' इससे इंकार नहीं किया जा रहा पर साहित्य सृजन के बहाने घावों को कुरेद कर ताजा रखा जा रहा है। क्या इससे समस्या सुलझेगी? अवहेलित वर्ग स्वयं अनेक उपजातियों में विभाजित ही नहीं वरन उसके चलते आपस में एक दूसरे का शोषण-दमन करते हैं और रोटी बेटी का संबंध तक नहीं रखते। जब आरक्षण आदि के चलते मोटी तनख्वाह वाली नौकरी करते लगते हैं तब बहुतों को अपने समाज का गरीब तबका याद नहीं रहता पर वे स्वयं योजनाओं से लाभ लेने से नहीं चूकते जो केवल आर्थिक रुप से गरीबों के लिए बनी है। दलित साहित्य के बडे हिस्से को इन बातों से मतलब नहीं। विडम्बना यह भी है कि आहूति देने में प्रायः सब साथ-साथ चलते हैं लेखनी के द्वारा फिर चाहे वे जिस वर्ग (वर्ण) के हो। इस अंक में छपे दलित काव्यभाषा पर लेख ऐसा ही एक उदाहरण है। पूर्व पक्ष उठाते हुए कहा जाय कि यह मात्र परिचय करवा रहा है तो साहित्यिक जगत उससे अनजान नहीं। जरुरत है तत्वदर्शी आलोचना की जिससे बौद्धिक तृपि होती है। इसे व्यक्तिगत कटाक्ष न समझा जाय। इसीलिये केवल रचना का जिक्र किया है।
अपना अनुभव साँझा किया जाय। २०१३ में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ने भारतीय दर्शन में अंतर्निहित मूल्य पर वक्तव्य देने के लिए आमंत्रित किया था। चार्वाक दर्शन पर बोलने के बाद कई शोधार्थियों ने ने घेर लिया। बातों-बातों में पता चला कि अछूते विषय पर मार्गदर्शक करने वाले नहीं या रुचि नहीं क्योंकि उसमें तैयार मसाला नहीं मिलता। आई आई टी के एक प्राध्यापक ने अपने विद्यार्थी जीवन का अनुभव बताते हुए कहा कि भाषा विज्ञान पर भारत में दकियानूसी सोच अब भी जारी है जिसके चलते उसे संस्था बदलनी पडी और आई आई टी में दाखिला लेना पडा क्योंकि शोध के मामले में उसके तथा विश्वविद्यालय के कई नियम अलग है। उसके अनुसार विषयानुसार मार्गदर्शक न मिलने पर निदेशक या अन्य किसी अधिकारी को मार्गदर्शक बनना पडता है नियम की रक्षा के लिए। जब स्वतंत्र जाँच-पड़ताल की चार्वाक दर्शन पर तो उसे अलग पाया। जब शैक्षिक जगतवालों से संपर्क साँधा तो कुछ ने खुलकर या संकेत में समझा दिया की दर्शन का विद्यार्थी होना जरूरी है। अधिकांश लोग आयातित विचारों के आधार पर यहाँ के दर्शनों की पारिभाषिक शब्दावली की परिभाषा मानने में सहूलियत महसूस कर रहे थे।
रैदास पर भवदीय राम आह्लाद चौधरी का मननशील लेख संत परंपरा की याद दिलाता है जो कट्टरता से ऊपर है। लेख में प्रवेश करते हुए वे एक जगह कहते हैं, 'इस पर गौर करने से यह पता चलता है कि जीवन को निष्कलंक निष्पाप बनाने में जहां रचनाशीलता की भमिूका होती है इसलिए कि सृजनशीलता हमेशा सर्जक को सत्ता और उसके गलियारे से दर रखती है।' यह दरबारी रचनाकारों पर कटाक्ष है जो नाम भले कमा ले पाठ्यक्रम में शामिल हो जायें पुरस्कृत हो जायें शिक्षा जगत में बर्चस्व कायम कर लें पर समाज को सही दिशा नहीं दे सकते।(१)
रैदास का साहित्य उपनिषदों का सरलीकरण करते हुए सामाजिक पाखंड पर प्रहार करता है जहाँ शास्त्रों की दुहाई देकर शोषण धर्र सम्मत बना दिया गया। जैसे वैदिक वाड्मय गुण कर्म की बात करता है। इसी आधार पर सृष्टि कार्य बँटे हैं पर पढाया कुछ और गया। घर में आग लगी घर के चिराग से। इसीलिये ऐसे विचारक आते हैं समाज में अलख जगाने। ज्ञान, भक्ति, वैराग्य की त्रिपुटी में स्थित संतों ने प्रामाणिक उपनिषदों को समाज तक पहुँचाया। स्थान काल परिस्थिति वश समझाने की शैली भले अलग हो पर मूल चीज़ एक है। यहाँ तत्त्व एक है कहने मात्र से लक्ष्यार्थ नहीं खुलता रचनाओं का। आखिर ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती। गीता कर्मयोग पर कहती है कि राग-द्वेष में बहना बंद करके कर्तव्य पालन करो और वही स्वधर्म है। अन्य तरीके से कहें तो सृष्टि प्रबंधन द्वारा प्राप्त भूमिका को निभाते रहो। (२)
एक बार सत्संग के लिए रैदास से संबंधित आश्रम के महंत से मिलने गये। पदों पर चर्चा के बदले सुनने को मिला, 'उनके पहले कोई गुरु नहीं हुआ। पहले ऋषि होते थे। आपके यहाँ शिष्य अलग थाली में खाना खाता है, तब ब्रह्म एक कैसे हुआ। हमलोग एक थाली में खाते हैं, हमारे यहाँ कोई भेदभाव नहीं।' जबकि वे अलग पोशाक पहने ही नहीं अलग सजे हुए आसन पर बैठे थे। चर्चा के नामपर वे रैदास रचनाओं से अनर्गल बातें करते रहे। हमलोग संत साहित्य को वाद या नाम के आधार पर बाँट देते हैं डुबकी नहीं लगाते। यह लेख डुबकी लगाने की ओर संकेत कर रहा है।
कविता के विदूषक शीर्षक लेख अच्छा प्रयास है वेदमित्र शुक्ल का। ऐसे कार्यक्रम सतही वाहवाही हेतु आयोजित होते हैं। यह भी काले धन को सफेद करने का अच्छा माध्यम है जहाँ स्तर के बदले अन्य सभी बातों का ख्याल रखा जाता है। गद्य को खुल्लमखुल्ला नई कविता के नामपर चलाकर फूहड़ उत्तेजित भड़काऊ शब्दों द्वारा वाहवाही लुटी जाती है। आयोजक क्या करें समाज में हर तरह के श्रोता हैं औरू ऐसे कवियों की माँग अधिक रहती है। राजनीतिक दल ऐसे कवियों का उपयोग अपने प्रचार-प्रसार हेतु करते हैं।
एक अन्य शीर्षक पर ध्यान गया- साहित्य : वैचारिकता तथा बौद्धिकता। अरे, यह तो अपने द्वारा लिखी गई है। निज कबित्त केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका॥ इच्छा हुई अपनी पीठ थपथपाते की। अपने परंपरावादी न प्रयोगवादी, विवादी न प्रतिवादी। अब जरा सा और कह दिया जाय स्वरचित कविता आँसू द्वारा:-
तुमसा उपकारी न दूजा / एक से निकल / दूजे का वजन बढाते / तुमसे सजता रचना संसार / वाद वाद खेल खिला / लगाते प्रयोजनवादी कतार / कहीं ऊष्म आँसू कहीं शीतल आँसू / कहीं नर आँसू, कहीं मादा आँसू / कहीं अपने आँसू, कहीं पराये आँसू / कहीं अगडा आँसू, कहीं पिछडा आँसू / कहीं प्रेमी आँसू कहीं विरही आँसू / कहीं धोते आँसू, कहीं धुलाते आँसू / कहीं छिपे आँसू, कहीं दिखे आँसू / कहीं छिपते आँसू, कहीं छिपाते आँसू / कहीं छपते आँसू, कहीं छपवाते आँसू / कहीं छल के आँसू, कहीं मन के आँसू / कहीं भरमाते आँसू, कहीं घबराते आँसू / कहीं दीन आँसू, कहीं मीन आँसू / कहीं हँसते आँसू, कहीं हँसाते आँसू / कहीं रोते आँसू, कहीं रुलाते आँसू / तु क्या है आँसू ? / तुम्हें साहित्य का वास्ता / धर्मध्वजी का वास्ता / मसानिया वैराग का वास्ता / कुर्सी का वास्ता / मगरमच्छ का वास्ता / इन नैनों से न निकलना / निरावरन न करना । (३)
स्वामी अक्षय चैतन्य
संदर्भ :--
१. रचनाधर्मिता
https://youtu.be/9x1eZXZ0DkQ
हिन्दी साहित्य का उपयोग
https://youtu.be/2xrmh1Q1V_Y
साकेत (दो राहा - कथा संग्रह) कोलकाता से प्रकाशित।
२. वेलकम और भीडकम
https://youtu.be/SAMO8F2wNaM
३. स्वरचित कविताओं द्वारा संवाद
https://youtu.be/0yuoOHThHGM
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