Monday, 20 June 2022

प्रेमचन्द प्रेम कहाँ तक निभा पाए?

                 प्रेमचन्द प्रेम कहाँ तक निभा पाए? 

यह मजबूरी, विडंबना, दुकानदारी, प्रतिस्पर्धा या कुछ और - कभी प्रेमचंद के नामपर कभी कबीरदास, गुप्त तुलसी, हिन्दी दिवस - - एक होड होती है संस्थाओं में अपनों को आगे बढाने की। कार्यक्रमों की सुनामी आ जाती है। शिक्षा विभाग के हितैषी ने बताया की प्राध्यापकों को अपने प्रकाशित लेख, पुस्तक, कार्यक्रम आयोजन तथा उसमें में उपस्थिति दिखानी पडती है प्रोफाइल में। एकाध ही स्तर का ख्याल रखते हैं बाकी इधर-उधर से जुगाड करके काम चलाते हैं। कईयों के थोक में चीजें दिखती हैं। पुस्तक के मामले में थोडा फेरबदल और नया शीर्षक। जरुरत हुआ तो नया प्रकाशक। इसमें वे तक मिले रहते हैं क्योंकि सालाना प्रकाशनों का लक्ष्य पूरा करना उनके लिए जरूरी है। ऐसे वातावरण में प्रेमचंद को खेमें में रखना जरूरी है। वैसे ही वक्ताओं रचनाकारों को बढाया जाता है जो दल की हाँ में हाँ मिलाये। साहित्यिक मठ आपस में चाहे मनमुटाव पालें औरों के समक्ष स्वीकारें पर प्रेमचंद या किसी अन्य पर विशेषांक निकालते समय उनको स्थान अवश्य देते हैं जिनकी बुराई करने में शर्म नहीं आती। नए रचनाकार को आगे बढाते हुए दलगत निष्ठा का ख्याल रखना नहीं भूलते। अपने दल की मुख्य पत्रिका में उसी आधार रचना प्रकाशित होती है। दलों, साहित्यिक मठों, खेमों के अपने पत्र पत्रिकाओं में भी अपनों को स्थान दिया जाता है। इससे प्रेमचन्द की आड में प्रेम से मनगढंत व्याख्या फैला मगरमच्छ के आँसू बहाने वालों का भला भले हो साहित्य का नुकसान होता है। यह विशेषतः होता है कालजयी रचनाकारों के साथ जो ढेरों रचनाओं द्वारा भिन्न-भिन्न समस्याओं को नौ आस्तिक दर्शनों की अन्दरूनी एकता से उत्पन्न सार के चश्में से देखता है। यह होता आ रहा है हर समस्या के साथ जहाँ संतुलित विवेचना के बिना शाब्दिक बाण चलाये जायेंगे सब समय सब जगह कुर्सीधारियों द्वारा। तभी प्रेमचन्द साहित्य पर ठप्पा लगाना जरुरी होता है। उस पर विशेष कार्यक्रमों में वही दलगत आधार वाली सामग्री परोसी जाती है। यह विडम्बना गीता, मानस जैसे बडे ग्रन्थों के साथ जुडी है। कम कोई नहीं। 




     स्थापित नौ आस्तिक दर्शनों की अन्दरूनी एकता सेे उत्पन्न सार संप्रेषित होता आया है उस साहित्य में जो जमीनी सच्चाई को प्रदर्शित करते हुए प्रतिहिंसात्मक प्रतिक्रिया का पोषण न कर आयातित विचारों की आक्रामकता के सामने दण्डवत नहीं करता वरन 
 भारतीय मूल्यों के प्रति सजगता का पाठ पढाता है। रचनाकारों की ऐसी अटूट श्रृंखला में आता है वह नाम जो प्रेम के चन्द शब्द बोल आँसुओं की माला पिरो गया। तो क्या शोषण-दमन पर लिखना प्रेम है? लिखते- बोलते हुए ज्ञानचक्षु का प्रयोग जब - जब जहाँ जिस जिसने किया वह आम व्यक्ति की पीडा को अधिकार - कर्तव्य मिलित स्वर दे गया। ऐसी बोली बोल गयी थी मीराबाई जो नारी सम्मान का प्रतीक बन गई। इतना अवश्य है कि उनके पद लक्ष्यार्थ प्रधान अधिक है इसीलिए बहुधा हडहडी में समझ की गडबडी पैदा होती है। क्या मानस मानव प्रेम से अलग है? नहीं। इस तरह जब परत दर परत खोलते हुए मुंशी प्रेमचन्द की रचना सरिता झकझोरते हुए बनावटीपन धोने का सतत प्रयास करती है। 


इस रचना का शीर्षक स्वतः बना और वही लिखवाने लगा तब देखे वह क्या कहना चाहता है। अपनी परंपराएं निभाना हमें खूब आता है। नदियों को माँ कहकर संतान धर्म निभाते हुए जीभर प्रदूषित करना या भारत को माँ मानकर मानभंग करना या अच्छे - भले आस्तिक चार्वाक दर्शन को जडवादी भोगवादी कहकर अपनी जडता भोगाभिमान को सुरक्षित रखना या व्यवस्था को कोसने से पहले उसमें अपनी भागीदारी भूल जाना या मन भावे मुंडिया हिलावे पर विशेषज्ञता या जानबूझकर नास्तिक शब्द की गलत व्याख्या को आगे बढाते रहना या रेवडी की भाँति साहित्यिक पुरस्कार बाँटना या ऊलजलूल चीजों को पाठ्यक्रम में रखवाना और भी न जाने कितने तरह की देसी परदेसी परंपराओं को हम कभी कभार आजीवन ढोते रहते हैं। कोई समझदार बन बोझा उतारता है तो कोई नासमझ अपनी खोखली समझदारी का ढिंढोरा पिटते हुए औरों को अपने स्तर का भारवाही बनाता है। अब इन बातों का अच्छे भले प्रेमचन्द से क्या लेना-देना। 



उनके समय कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था थी भारत में जहाँ एक ओर साम्राज्य विस्तार में मग्न बरतानिया हुकूमत की निरंकुशता तो दूसरी ओर छोटी बडी रियासतों में बँटे देश में समस्याएं अनेक थीं। राजघराने अन्दरूनी और आपसी कलह में व्यस्त थे। कईयों में यह नियम था कि पुत्र संतान पाँच सात वर्ष का होते ही उसे माँ से अलग कर मर्दाना ड्योढी (विभाग) में रखा जाता था और होली, दिवाली, उसकी शादी के समय या अधिक बिमार होने पर ही माँ बेटे से मिल पाती थी। वैभव भोगते हुए यह मानसिक शोषण तक झेलना पडता था। मुगलकाल में कई राजघराने भागकर हिमालय की शरण में रहने लगे और उसके चलते क्षेत्र विशेष का नाम गढवाल हुआ। अंग्रेजों के शासनकाल में तस्वीर थोडी बदली क्योंकि शासन की आड में यहाँ की सम्पदा अपने देश भेजने की लत में राजाओं का सहयोग जरूरी था जो आपसी फूट के चलते घुटने टेकने लगे। केवल गिने-चुने थे जो झुके नहीं पर वहाँ की सामाजिक व्यवस्था नाना शोषण-दमन में पिस रही थी। यही हाल प्रायः हर जगह का था। जनता शतरंज की मोहर बन प्रयोग में लाई जा रही थी फिर चाहे देसी परदेसी किसी का शासन क्यों न हो। जो अपनी दाल नहीं गला पाया उसका शोषण-दमन हुआ। मानस ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए चोट की :-
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं॥
कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।। 
आखिर शोषणकारी तत्व हर उपलब्ध हथियार का उपयोग करता है अपना बर्चस्व बनाय रखने के लिए। दूसरी ओर शोषित वर्ग में आपसी ऊँच नीच की भावना से लेकर घरेलू हिंसा कम नहीं है। उनके अपने-अपने रीति रिवाजों में दमन का स्वर रहता है। यानि शोषण नई विधा नहीं है। मनुष्य की संरचना में यह प्रवृत्ति पाई जाती है जो देश काल परिस्थिति की अनुकूलता में उजागर होती है। अतः शोषण प्रायः दैहिक, मानसिक, बौद्धिक, आर्थिक धरातलों पर होता है और इनसे सराबोर समाज में रहते हुए प्रेमचन्द ने उनका शाब्दिक चित्र बनाकर समाज को जगाने का प्रयास किया। उनकी नजर में वह सफल रहा हो पर हम कितना जग पाए यह समझना होगा। कहीं उनको आयातित विचारों के खेमों-गुटों-वादों में बाँध कर अपने कर्तव्य की इति तो नहीं कर ली। यहाँ इसका रोना व्यर्थ है कि वे अपने आप को ये या वो मानते थे क्योंकि इसमें उलझने से हम समय और अपनी ऊर्जा का दुरुपयोग करके कुछ लोगों की अतृप्त एषणा में आहुतियाँ देते चले जाएंगे। उनका साहित्य स्वयं को क्या मानते हुए मानवीय माँग रखता है यह महत्वपूर्ण है। 



प्रेमचन्द युगीन ग्रामीण संस्कृति काफी बदल गई है। यह अनुभव हुआ निष्पक्ष भाव से गाँवों में भ्रमण करते हुए। छतरी तथा लाठी सहारे वह ठीक-ठीक नहीं हो पाता क्योंकि अपने या जान पहचान या किसी दर्शनीय रूप से प्रसिद्ध गाँव गए और किस्सा पूरा हुवा। ऊपर से परवरिश हावी हो जाती है। समष्टि प्रबंधनानुसार अक्षय को इन सबसे अलग रख गया। कई राज्यों में एक जैसी समस्याएं सामने आई। शहरीकरण की रफ्तार गाँवों को निगल रही है। वहाँ की चकाचौंध अपनी तरफ खींच कर भ्रमित करती है। उन्हें मुँह घुमाने में समय नहीं लगता जो प्रमाणित हुआ २०२० में। जिस गाँव से नाता तोडा था वहाँ भागकर गए वापस लौटने के लिए। कागजी योजनाओं से रोजगार नहीं बढता गाँव में। उन्हें सही में क्रियान्वित कर दिया तब कारखानों में काम कैसे चलेगा। शहरवासियों का क्या होगा। भले बन्दी के चलते उत्पादन कम हो पर चाहिए शहरीकरण। गाँवों से पलायन की समस्या विकराल रूप ले चुकी है। नई पीढ़ी खेती के प्रति उत्साहित नहीं है। कूप मंडूक मानसिकता वाले एक महानुभाव ने अधकचरी जानकारी हवा में उछालते हुए कहा यह पहले की बात है अब तो युवा वर्ग में काफी उत्साह है। दो एक जगह की बात से वह स्वयं को जानकार बताने पर तुले थे। अब ऐसे बालक को बडे होने में समय लगेगा। 


कई जगह हानिकारक रसायनो के प्रयोग करने हेतु दबाव बनाया जाता है। ट्रैक्टर आदि के चलते किसानों पर बोझ बढ गया लाभ के साथ। देखा जाए तो लगभन वर्ष भर किसान व्यस्त रहता है पर जहाँ वह पहले खेत में सोने की व्यवस्था रखता था वहाँ अब आधुनिक पीढ़ी दोपहर तक अपने पक्के घर में चली जाती है। यह है अधिकतर उन किसानों का हाल जिनके अपने खेत हैं। उनमें काम करनेवाले मजदूरों की बडी संख्या जागरूकता के नामपर मनमानी करने लगी। समय से खेत पर न जाना, धान के पौधे उल्टे लगाना, थोड़ी देर काम करके पूरे दिन की मजूरी माँगना, बात - बात पर थाने में जाने की धमकी, शहर की मजूरी का आकर्षण, मद्यपान जुआ आदि का सेवन जैसी बुराइयाँ बढ गई। दो एक जगह दीनभर निठल्ले घुमने वाले युवाओं ने तकदीर चमकने का तरीका पूछा। जब उन्हें परिश्रम करने को कहा गया तबू सब उदास हो गए। शहरी विकास ने निर्माण उद्योग को भरपूर बढावा दिया जिससे गाँव से पलायन बढा और वहाँ खेतीबाड़ी में काम करनेवालों का अभाव पैदा हो गया। गन्ने की खेती करनेवाले कई किसानों ने गुड बनाना तक बन्द कर दिया और औने-पौने भाव में चीनी बनाने वाले कारखाने में अपनी फसल बेचने लगे। उधर खेत के मालिकों की नई पीढी में कृषिकर्म के प्रति उदासीनता साफ झलकती है। उन्हें खेत मजूर की कमी खलती है पर वे परबस हैं एक हद तक। आज भी कई प्रदेशों में बडे किसान छोटे किसानों का शोषण करते हैं। एक तरह से जमींदारों का आधुनिक संस्करण जिसपर चर्चा नहीं होती। मुफ्त में प्राप्त ट्युबवेल से जल देते वक्त औरों से रुपये लिये जाते हैं। हाल यह और बातें कुछ और। 


कुछ क्षेत्रों में उपजाऊ भूमि को बंजर लिखवाकर आवासीय योजना क्रियान्वित हुई। फलों के बाग बहुत बडी संख्या में नष्ट करके जो अर्थ व्यवस्था विकसित की जा रही है उसका दुष्परिणाम सामने है। फल आम व्यक्ति की पहुँच से बाहर तथा उनफर रसायनों का अन्धाधुन्ध प्रयोग (अप्राकृतिक ढंग से पकाने, रंगने, आकार बढाने, उनकी स्वाभाविक प्रकृति में बदलाव) उन्हें हानिकारक बना रहा है। यह कार्य प्रायः उगाने वाली जगहों से शुरू हो जाता है। अब जगह कम और उत्पादन अधिक करना तब यही उपाय होगा। इसके चलते श्रमिक रोगग्रस्त हो रहे हैं जो पेडों पर रसायनों का छिड़काव करते हैं। अन्य फसलों के मामले में धीरे-धीरे ऐसे परिणाम सामने आए जो शोषण का ही एक नया रूप है। इसकी भयावहता श्रमिक वर्ग भोगते हुए जागरूक साहित्य में जगह बना नहीं पाया अभीतक। शहरों से लगे गाँवों में थैलियों वाला दूध हो या मिलावटी मसाले मिलने लगे तथा उनकी खेती से बचने की चेष्टा तक नजर आई। जंगल से सटे गाँवों को जंगली पशुओं से जुझना पडता है। दो एक जगह जहाँ उन्हें मारने की छूट है वहाँ स्थानीय लोगों की आपसी रंजिश आडे आती है। अब जंगल का क्षेत्र कम होते जा रहा है और लोग चिन्ता व्यक्त करने के साथ-साथ साफ कर रहे हैं। जैसे पेड काटना अपराध है पर उससे जानमाल पर खतरे की स्थिति में काटा जा सकता है। इसका आराम से दुरुपयोग होता है। कहना यही है कि गाँव की समस्या और शोषण दोनों बढे हैं। दोष में भागेदारी सबकी है पर जिसकी जहाँ चलती है वह अपना दोष नहीं मानता। कई जगह अलग - अलग दलों के स्थानीय नेता अपने प्रभाव विस्तार में रुचि अधिक रखते हैं। गाँव का समाज दलों में बटकर ऐसो की नेतागिरी चमकाते रहता है। 


नरबली भले अपराध समझी जाय पर वह हो रही है। खजाने की लालसा या अन्य तन्त्रिक प्रयोग में बच्चों की बली लगती है। एक जगह पकड़े जाने पर अपराधी का सामाजिक बहिष्कार हुआ गाँव में। उससे अलग रहने उसके सगे भाई की मुश्किलें बढी। वह जिन खेत खलिआन या घरों में मजूरी करता था उसपर रोक लगा दी उसके समाज वालों ने। गाँव का समृद्ध वर्ग उसकी सहायता के लिए तैयार था पर वह ले तो मुसीबत न ले तो मुसीबत। उसके समाजवाले ने शुद्धि के नामपर सामूहिक भोज की शर्त रख दी जिसे करना उसके लिए असंभव था। बाद में पंचायत ने अपने प्रभाव का प्रयोग कर उस परिवार की बर्बादी रोकी। उन्होंने पहले कदम इसलिए नहीं उठाया क्योंकि उसके समाज वाले इसे हस्तक्षेप मान रहे थे पर बाद में प्रशासन तथा स्थानीय नेताओं के सामने उनकी हठधर्मिता की पोल खुलने पर वे मान गए। न यह अकेला मामला है और और न बली हेतु जाति विशेष का चुनाव। साहित्य सृजन हेतु रंग देना मजबूरी है। 


पहले जहाँ शोषण करनेवाले प्रायः गाँव में रहते थे वही अब शहरों में रहने लगे। कर्ज देनेवालों का आतंक आजतक जारी है। व्यापारियों के मामले में नरमी से पेश आनेवाली वित्तीय संस्थाओं का व्यवहार किसानों के प्रति प्रायः कटु होता है। मानवता शर्मसार हुई है बहुत बार। मझोले और छोटे किसान कुचले जाते हैं हर बार। नाम पदवी पोशाक बदली पहचान वही रही। वर्ग संघर्ष को बढावा देकर अपनी-अपनी मलाई सुरक्षित रखी जाती है। चाहिए हमें शहरी सुख सुविधा और बात करते हैं गाँवों की। अन्धाधुन्ध कल कारखाने न लगाओ या लगाओ दोनों मामले में नुकसान का बोध होने के बावजूद आंसूओं को भुनाना जारी है। थोक में श्रमिक और कहाँ से मिलेंगे। आधुनिक कपडे फोनादि का भुलावा देकर लोग परवाह नहीं करते की खेतीबाड़ी का बडा नुकसान हो रहा है और पेट की भूख के लिए वह पहले चाहिए। सामाजिक न्याय तक सोच को बाँध कर रखना मजबूरी है शहरी आन्दोलनकारियों की। शोषण-दमन के नए आयामों पर सोचने से अपनी-अपनी हिस्सेदारी दिखने लगती है। केवल कल-कारखाने बन्द करवाने से वृहत समाज का नुकसान होता है। दो एक जगह बेचैनी इस बात को लेकर है कि नए उद्योग लग नहीं लग रहे तो बन्द किसे करवाएँ। न्याय दिलाने की बात लालफीताशाही में उलझी रह जाती है जब जमीनी स्तर की नई नियुक्तियाँ जो काम की पारदर्शिता बढाने या जवाबदेही या तथाकथित भ्रष्टाचार को रोकने के लिए हुईं वे अधिकांश असफल हो कर रह गई। शहर में रहकर रोने धोने में जो आनन्द है वह गाँव में रहकर उसके विकास में लगने से कहाँ। आग लगाते रहो शरीर तापते रहो। इसका थोडा अनुभव करवाया एक सुहृद विचारक ने। बातों-बातों में उन्हें पता चला की चार्वाक दर्शन के सत्रों को खोलने तथा संगति लगाने का काम अक्षय चैतन्य ने किया और यह दर्शन समस्याओं पर भारतीय शैली में प्रहार करते हुए कुछ संकेत कर रहा है। वे अपनी संस्था वालों से चर्चा करने लगे। अब खेल यह शुरु हुआ की एक अधिकारी समर्थन करे तो दूसरा नाराज और दूसरा करे तो पहले वाला नाराज। आखिर भय इसका सताता है की कहीं दर्शन की सच्चाई सामने आ गई तो वे कैसे मुँह दिखायेंगे। अब छ - छ टाँगों का सवाल है। क्या कह रहे आप स्वामी अक्षय जी। होश में हैं? यह कहाँ का प्रयोगवाद है? ऐसी प्रगतिशीलता मत दिखाईये। केवल प्रेमचन्द तक रहिये यहाँ। देखिये उन्होंने कैसे पूँजीवाद की धज्जियाँ उडाकर जनवादी चेतना का विकास किया। है ऐसी सोच आपके यहाँ। पढा है उसका साहित्य। प्रेमचंद चेयर का नाम सुना है। उसपर बैठने के लिए खून पसीना एक करना पडता है। शांति शांति, मनुष्य की दो और कुर्सी की चार बस हो गई छ टाँगें। अब वाद चाहे जो हो जिसके पास छ टाँगें है वह कैसे कोई तथ्य समाज के सामने रखेगा या तत्वदर्शी आलोचना को आगे बढ़ाएगा। रही पढने की बात तो कक्षा छ से उनके साहित्य के साथ परिचय शुरू हुआ जिसमें धीरे-धीरे अन्य रचनाकार जुडते चले गए। तभी उनके समय के और वर्तमान ग्रामीण जीवन पर कह पा रहे हैं। खैर आपको पूस की रात, बडे घर की बेटी या ईदगाह जैसी कहानियों में भारतीय मूल्य दिखे की नहीं। यह ऊपर से टपका कमाल नहीं है। ऐसे मूल्यों के दसियों उदाहरण मिलेंगे। बस उसकी पकड होनी चाहिए।


कुछ कहानियों के माध्यम से मूल्यबोध समझा जाए ताकि रचनाधर्मिता पर पकड मजबूत हो। प्रेमचन्द ने पशुओं द्वारा मानवता का पाठ पढाया जो आयातित विचारों सहारे संभव नहीं। वे पाशव को मानव बनाने में रुचि रखते थे। तभी दो बैलों की कथा, दो भाई में मानवता का प्रतीकात्मक वर्णन हुआ। सतही सोच वाले चौपायों में मानवीय गुण देखने की रचनाकार की क्षमता कहकर संतुष्ट हो जाते हैं। विवेक का उपयोग लक्ष्यार्थ समझाता है। नहीं तो बौद्धिक दिवालिया पन कुछ का कुछ समझावा और कहलवा देता है। पंच परमेश्वर में फैसला न्यायानुसार होता है व्यक्तिगत राग-द्वेष से रहित। बडे घर की बेटी जैसी रचना कट्टर प्रयोगवादी या प्रगतिशील या जनवादी से संभव नहीं क्योंकि यह प्राचीन मूल्यों का समर्थन करती है जिनका आयातित विचारों में स्थान नहीं। हिंसा परमो धर्म का वाक्य "मूझे दीन और दीनगारों से नफरत हो गई है" शहरी धर्मावलंबियों के मुँह पर जहाँ तमाचा है वहीं भक्ति संप्रदायों तथा राजसत्ता द्वारा पोषित विद्वानों के द्वारा फैलाए गए पाखंड का विरोध। ऐसी मानसिकता का विरोध चार्वाक दर्शन ने किया जिसके चलते उसे नास्तिक कह मुख्यधारा से अलग कर दिया गया। यही व्यवहार जैन तथा बौद्ध दर्शन के साथ हुआ। दर्शन वाला पक्ष यथास्थान देखा जाएगा। तावान कहानी ऐसे दर्द की दास्तान है जिसे अपनों ने दिया अंग्रेजों ने नहीं। राष्ट्रीय तंगहाली भूखमरी के नामपर एक परिवार खत्म होने के कगार पर पहुँचा दिया गया ताकि ऐसे उदाहरणों से औरों को कुचला जा सके। आन्दोलनों की सफलता में कई तरह के कार्य होते हैं जिसपर चुप्पी छा जाती है। सोए समाज को उसकी जिम्मेवारी याद करवाने की बात कही जा सकती है पर ऐसे सैकडों लोग खत्म हो जाते हैं जिनका उल्लेख पाठ्यक्रम में नहीं होता। कुछ नेता पूजनीय बन मुखौटे पहन वाहवाही लेते हैं। फ्रांस क्रान्ति के समय अफवाह फैलाई गयी थी कि संवैदनहीन रानी ने कहा की गरीब रोटी न खरीद पाएं तो केक खरीदे। लगभग सौ साल बाद यह बात गलत प्रमाणित हुई जो उस समय समाज को उत्तेजित करने में सफल रही। सद्गति में सूर्यप्रकाश की उदण्डता शेष हुई ममेरे भाई मोहन के चलते जो प्रेरणा रुपी इष्ट बना। यह उदाहरण समझा देता है की साधारण मनुष्य तक इष्ट हो सकता है तथा दुसरी ओर इष्ट शब्द को काल्पनिक जामा पहना चल रही दुकानदारी का खंडन वाला भाव छिपा है। यह प्रतीकोपासना का विरोध नहीं वरन उसके नामपर चल रहे धंधे का विरोध है। यही भाव मानस, गीता आदि में है जो दर्शनों के सार पर आधारित है। पुत्र प्रेम में कंजूस पिता भले ही चिकित्सा का खर्च न उठाए बेटे की मौत होते ही दिल खोलकर खर्च करता है। यह भारतीयों की उस मानसिकता पर चोट है जो मरने के बाद याद का दिखावा करती है। बासी भात में खुदा का साँझा कहानी में दीनानाथ द्वारा आस्तिक होते हुए मनौती का विरोध भक्ति संप्रदायों की चाल पर प्रकाश डालता है जो भगवान तथा ईश्वर को एक बता सबको कल्पना में फँसाए रखना चाहता है। कर्मफल के सिद्धांत तथा आत्मबल का खंडन अभीष्ट नहीं है रचनाकार को। उनकी आपबीती आधारित कहानी जीवन सार में वे स्वयं को भाग्यवादी कहते हैं। यह परिश्रमानुकूल फल देरी से मिलने पर व्यक्त भाव प्रारब्ध का महत्व समझाता है। प्रायः नादानीवश इसे पलायन या परिश्रम से जी चुराना या संकल्प की कमी कहा जाता है। यहाँ पेचिश से परेशान लेखक जब यकायक इससे छुटकारा पाया तब भाग्य को माना जिसका संकेत मानस में :-
तुलसी जस भवितव्यता, तैसी मिलै सहाय। 
आपु न आवै ताहि पै, ताहि तहाँ लै जाय॥



अब दर्शनों का सार समझे। कठोपनिषद - परांचि खानि व्यतृणत् स्वयंभूस्तस्मात्परांग पश्यति नान्तरात्मन्। कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्।।
ब्रह्म विद्या के आचार्य यमराज ने नचिकेता को समझामा की ज्ञानेन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से बहिर्मुखी हैं। यह प्राकृतिक व्यवस्था है जिसे धैर्यवान व्यक्ति अन्तर्मुखी करता है। यहाँ स्वयंभू शब्द को नामरुप में न बाँधे और तात्विक दृष्टि से समझे।उसका अर्थ परमात्मा लगानेवाले आम लोगों को आत्मा - परमात्मा के झमेले में फंसाते हैं। आत्मा अलग से वस्तु नहीं और बोध हेतु कल्पित शब्द है। अपने यहाँ क्रमबद्ध तरीके से समझाया जाता है खोखले पांडित्य के आतंक से नहीं। यहाँ धैर्यवान उसे कहा गया है जो उपाधियों से परे अपने आपको जानना मानना तदनुरूप रहना चाहता है। आध्यात्म तथा व्यवहार में संतुलन जरुरी है। आखिरकार अपने शरीर से संबंध अन्तिम साँस तक रहता है। उसके चलते दैहिक मानसिक बौद्धिक व्यवहार न्यूनाधिक होते रहता है। ऊपर से स्वस्थ सुखी जीवन सबको प्रिय है फिर चाहे वह बहिर्मुखी हो या अन्तर्मुखी। यह प्रियता संयमित जीवन शैली से संभव है और वह आती है अंतर्मुखी होने से। संयम हेतु संतोष, शील, यम नियम, विवेक जेसे शब्द प्रयुक्त हुए दर्शनों में। चार्वाक दर्शन से वेदांत तक सब संयम की बात करते हैं। संयमित जीवन विवेकपूर्ण व्यवहार करता है। केवल आत्मज्ञान सहारे यह दुर्लभ है क्योंकि 'तुम शरीर नहीं हो' का पाठ आतंकवादी पढकर आतंक फैलाते हैं। इसके लिए जरूरी है दर्शनों की अर्थवत्ता समझ कर जीवन यात्रा पूरी हो। यही भाव आया है इनके साहित्य में जो कोरी शिक्षा नहीं देती। किसी एक दर्शन का कट्टर समर्थन करवाना तो दूर स्वयं तक नहीं करती। यह सर्वविदित तथ्य है कि दर्शनों का आधार उपनिषद है जो साफ - साफ सारग्राही बनाते हैं मताग्रही पूर्वाग्रही नहीं। प्रेमचन्द साहित्य इन्हीं मूल्यों का शंखनाद करता है। 


अच्छा हुआ आपने पूँजीवाद शब्द का प्रयोग किया। क्या बिना उसके कोई वाद चल सकता है। उसे कोसने के लिए उसीकी सहायता लेना पड़ता है। अगर यह कोई सोचे की उद्योगपति पूँजी लगाकर मुनाफा न कमाय तो यह नहीं हो सकता। एक उद्दोग बहुतों का पेट पालता है। उसके विरोधी अपना पाल ले यह तक ठीक-ठीक नहीं होता। देश केवल एक वर्ग के भरोसे नहीं चलता। यहाँ तक की एक व्यक्ति के मनोभाव पलटते रहते हैं। दैहिक मानसिक बौद्धिक धरातल एक वाद पर टिके नहीं रहते। इसकी स्वीकृति के लिए दिल में जगह चाहिए। भेदभाव हीन समाज बनाने की बात उच्च स्तरीय साहित्य में नहीं है। कोई व्यवस्था सबको एकसाथ एक ही समय संतुष्ट नहीं कर सकती। शोषण कौन नहीं करता और कहाँ नहीं होता।यह अधिकार केन्द्रित मनोवृत्ति थी है रहेगी। वह कर्तव्य नहीं मानती या उसे दया के दायरे में रखती है या इच्छानुसार उसकी व्याख्या करती है। 


अपनी-अपनी बारी आनी चाहिए तब पता चलता है कौन कितने पानी में है। मौका तो मच्छर तक नहीं गँवाता। रही न्याय मिलने की बात तो समय-समय पर ऐसी घटनाएँ घटती हैं जो हिसाब-किताब बराबर कर देती है। जो बात न मानने वालों को बॉयलर में फिकवाया था उसकी अधिकांश संपत्ति शेष हो गई। अन्याय चाहे जो करे सजा आज नहीं तो कल मिलती है। भारतीय सोच में जंग नहीं लगी उसकी छिपी सोच में यथेष्ट धार है। प्रेमचंद साहित्य उसीका जीता-जागता प्रमाण है। साधक अक्षय की वैचारिकता भुनभुनाने और भुनाने वालों पर निर्भर न स्वच्छंदता के ऊपर।


इस संक्षिप्त संवाद में प्रेमचंद के दसियों पात्र दिखाई दे गए जो आजतक उस समाधान की आस में जी रहे हैं जो उन्हें मानवता का बोध करवाए। समस्या का प्रचार-प्रसार वाहवाही दिलवा देगा स्थाई सताधान नहीं क्योंकि उसमें लक्ष्य कुछ और है। जैसे विपदा के समय सामान बाँटना मानवता है उसे बाद में करते रहना लोगों को आलसी तथा आश्रित बनाए रखना है। इससे दानदाता का भला होता है, कई तरह की सरकारी छूट मिलती है, इत्यादि। आर्थिक विपन्नता में मुफ्त शिक्षा देना एक बात और उसी आधार पर पद देना योग्यता की अवहेलना है। विपन्नता किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं। वैसा देखना षड्यंत्र है असली समाजवाद नहीं। प्रेमचंद प्रेम तभी सार्थक है जब लोग गाँवों की ओर लौटना शुरू करे या कम से कम अन्धाधुन्ध शहरीकरण बन्द करके अपनी अतृप्त एषणा को नियंत्रित करेगें। आखिर उसके लिए हरियाली को हराना अनिवार्य है इसीलिए वन क्षेत्र कम होते जा रहे हैं उस विकास के लिए जो मजबूर बना रहा है। जो मजबूती दिख रही है उसका हाल कौन नहीं जानता। अब क्या करे पसंद वही खोखलापन। अब गाँव बिना हरियाली के जी नहीं सकते। कृषि उपज पर आधारित कारखाने अधिक बन्द हुए भारत में। केवल घड़ियाली आँसू बहाने से गाँव में खुशहाली नहीं आएगी और हर मोड पर प्रेमचन्द का कोई न कोई अवहेलित शोषित पात्र आईना दिखाता मिल जाएगा। उसे सुविधा से सजाकर, आन्दोलन का हक देकर हम कबतक भुनाते रहेंगे। तो क्या वह देना बेकार है। नहीं वह नहीं कहा जा रहा पर आप समझ कर अनजान रहें यह और बात है। समझदारी का ठेका किसीके पास नहीं मजबूरी हावी हो जाय तब क्या किया जाय। शोषण-दमन के नित नए रुप देखने को मिल रहे हैं। साहित्य को भरपूर खुराक मिल रही है। लक्षद्वीप या अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के किसानों पर समय मिले तब सोचें वहाँ कौन-से पात्र रहते हैं। केरल में पेड से नारियल तोडने वालों की तनिक कमी है। पडौसी प्रदेश से बुलवाकर काम कराया जाता है जिससे लागत बढ कर ग्राहक की जेब का शोषण करती है। दूरदृष्टि को कबतक बँधुआ बनाय रखिएगा। क्या प्रेमचन्द साहित्य उसका विरोध नहीं करता। सही अर्थों में हम चाहते क्या हैं। तनिक गर्दन झुकाकर देखें पता चल जाएगा। कहना जरूरी नहीं। 


ऐसे रचनाकर को खाँचे में रखना हठधर्मिता है। अपनी दाल गलानी की सुनियोजित चाल। यहाँ तक की अगर कोई दार्शनिक पक्ष या विश्लेषणात्मक लक्ष्यार्थ या तत्वदर्शी समीक्षा करे तो उसके लेख को उचित स्थान नहीं दिया जाता। नाम न छापने की शर्त पर एक ने कहा कि 'पार्टी कार्यालय फिर जवाब माँगेगा। वैसी चीजें मुख्य पत्रिका तो दूर रखा जाता है ...यह बौद्धिक आतंकवाद नहीं तो क्या है। 


अगर कहा जाए - प्रेमचन्द की दृष्टि केवल वर्तमान पर थी और वे इसलिए प्रगतिशील थे तब भी वे प्रतिक्रिया बाद में व्यक्त कर रहे थे। तत्कालीन घटना पर किसी भी तरह की प्रतिक्रिया उसके वर्तमान में नहीं होती। हर 'क्षण' भूतकाल बन रहा है। आमने-सामने हो रहे संवाद में भूतकाल काम करता है और लोग समझते हैं वे वर्तमान में जवाब दे रहे हैं। प्रगतिशीलता क्या उन्हीं के साहित्य में है, क्या उसीमें जनता की आवाज है - - स्पष्ट अभिव्यक्ति के आधार पर 'हाँ' और उपनिषदों के आधार पर 'ना'। श्रीमद्भगवतगीता तक में यथेष्ट जनवाद है अगर कोई समझना चाहे। 

स्वामी अक्षय चैतन्य 







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