जिन प्रदेशों के लोग रोजी-रोटी हेतु बंगाल में आकर मार्क्सवाद लेनिनवाद के रंग में रंग गए उनकी सारी सोच सामन्ती या महाजनी व्यवस्था, वर्ग संघर्ष, नव जागरण जैसे शब्दों तक रह गई। उनको आनन फानन में सरकारी पद रेवडी की तरह बाँटे गए। विदेशों की नौकरियाँ तक हथिया ली। नागार्जुन मुक्तिबोध पर चर्चा जरुरी होती है हर कार्यक्रम में। जब आजीविका प्रधान होती है तो विवेक कैसे काम करे। भूख क्या जाने खाद्य अखाद्य। इसके माध्यम से मगज धुलाई प्रेम से होती है उनकी कमजोर नसों को दबाकर।
शब्द को बहुधा अर्थ देती है मानसिकता जिसपर नाना पर्तें चढ जाती है। प्रतिबद्धता के नामपर ढोना न्याय संगत नहीं। समयानुसार हर संस्था में कलुषता आती है। इसपर मनन किए बिना केवल प्रतिबद्धता प्रतिबंध बन मानसिक बौद्धिक विकृति पैदा करती है। ठहरे जल में बदबू आने लगती है। समय-समय जाँच पडताल जरुरी है। ऐसे स्थापित निर्धारित मापदंड हैं जिनका उपयोग नहीं हौता। पारिवारिक एकजुटता बनाए रखने के नामपर जो विडंबनाएं पैदा होती हैं उनपर सारगर्भित विश्लेषण न कर केवल लकीर के फकीर बने रहना गलत है। कई संप्रदाय और संस्थाएं छद्म प्रतिबद्धता को कटिबद्धता में बदल कर अपना खेल खेलती हैं। नाम चाहे सनातनी हो आर्य या कुछ और घृणित अव्यक्त अभिप्राय हावी रहता है जब स्वाभिमान नहीं रहता।
गाँव कस्बों, नगरों का मिलावटी शैक्षणिक पाठ्यक्रम तथ पारिवारिक परिवेश भी आहुतियां डालता है। प्रायः धर्म के नामपर पाखंड शोषण ही अनुभव किया हुवा होता है। शिक्षा उसे ही महिमामंडित करती है। भक्ति संप्रदायों के लिए पौराणिक साहित्य प्रमाण बना जबकि वह स्वतः सिद्ध नहीं है । उसकी बातों को सही मानने के लिए बडे ग्रन्थों का अनुमोदन अनिवार्य है। दूसरी तरफ ओर युगानुसार परिवर्तनशील धर्मशास्त्रों पर अपरिवर्तनशीलता का ठप्पा लगवा दिया गया ताकि समाज पर पकड मजबूत हो। वामपंथियों ने मौके का लाभ उठाया। सही अर्थों में क्या लिखा है वैदिक वाङमय में उसकी जाँच पडताल वे क्यों करें। अंग्रेजों के शासन काल से लेकर सत्तर के दशक तक तथाकथित बुद्धिजीवियों के बडे वर्ग को मुफ्त हवाई यात्रा पुरस्कार नौकरियाँ द्वारा खरीदा गया। ऐसे बौद्धिक आतंकवादी उन प्रतिभाओं का दमन करते हैं जो इनकी दासता से दूर रहे। तत्वदर्शी समालोचना जरूरी है केवल आलोचना नहीं क्योंकि वह आलू चना की तरफ जाती है जो बाहरी विचारों या विश्लेषणहीनता का अंधानुकरण है। बातें नव जागरण की और कुटिलता में नम्बर वन। यही जागरण बडे पद दिलवाता है शिक्षा जगत में। किसी भी देश को बर्बाद करने के लिए उसके पाठ्यक्रम को नष्ट कर दें वह तीन चार दशकों में मन - बुद्धि से गुलाम बन जाएगा।
ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की त्रिपुटी को अलग कर घृणित खेल बहुतों ने खेला। मध्ययुगीन संप्रदायों ने भरपूर योगदान दिया। वे भिन्न-भिन्न मानसिकता वाले राजघरानों द्वारा प्रायोजित थे जिसके चलते धर्मशास्त्रों पौराणिक साहित्य के साथ जमकर छेडछाड़ हुई। एक राधा का उदाहरण काफी है जिसका परिचय अलग - अलग है ग्रंथों में। सतही विरोध होता तब बात और थी। यहाँ मामला कुछ और बन गया। कहीं कृष्ण की आत्मा, कहीं मौसी, कहीं मामी, कहीं रुक्मिणी से एकता, कहीं कृष्ण की ब्याहता।चैनल की भागवत महापुराण नामक प्लेलिस्ट में राधा पर वीडियो है। उसका विवरण तथा पिन्ड कॉमेन्ट पढ लें। पूर्वपक्ष उठाते हुए कहा जाए - त्रिजटा का परिचय अलग - अलग रामकथाओं में हर जगह एक नहीं है। तब राधा के मामले में क्या दोष है? उनके रचनाकार एक नहीं थे। पुराणों के एक या वह समूह जो एक प्रधान के अन्तर्गत कार्य करता था और एक ही जगह रहकर। कुछ दशकों से कृष्ण राधा कबीर आदि नाम का उल्लेख ऋग्वेद में बताया जा रहा है। मनमाने या संस्कृत व्याकरण के लचीलेपन का फायदा उठाया गया। ऐसे घोटालों का विरोध मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधियों ने नहीं किया वरन मौन समर्थन देकर अपने खेल को सुरक्षित किया। तभी ऐसे लोग श्रीमद्भगवतगीता में वर्णित यज्ञों का प्रचार-प्रसार तो दूर उसे महत्वपूर्ण ग्रंथ नहीं मानते। खुलकर न बोले यह और बात है। सनातन धर्म के नाम पर अपना अव्यक्त अभिप्राय पूरा करने वाले छद्मवेषी दक्षिणपंथी, इनके उत्तराधिकारी तथा वामपंथी बुद्धिजीवियों ने अन्दर ही अन्दर मिलकर शिक्षा विभाग के तमाम महत्वपूर्ण पद अपने समर्थकों को दिलवा दिये। साहित्य, समाजविज्ञान, इतिहास, दर्शन, राजनीति, प्रबंधन के पाठ्यक्रम अपने-अपने हिसाब से तैयार करवा लिए जिससे समाज को विदेशों में अच्छाई और यहाँ केवल गन्दगी उदण्डता कामुकता अन्धविश्वास दिखे।
किसी देश की शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करके उसे बौद्धिक गुलाम बनाया जाता है। ताकि अतिवादी या कट्टर समर्थकों की फौज तैयार हो जाए। इनके खेल के कुछ आयाम -
आयुर्वेद को पूरी सुरक्षित पद्धति बताना, शिखा सूत्र अग्निहोत्र अष्टांग योग पर उपनिषदों का वक्तव्य सामने नहीं रखा गया। नौ स्थापित भारतीय दर्शनों को जानकर आस्तिक नास्तिक में बाँटने, उनका जीवन में उपयोग न समझाने से लेकर, मीराबाई के साहित्य का लक्ष्यार्थ जानकर अनदेखा किया। प्रबंधन तथा समाज विज्ञान में विदेशी सिद्धांत तथा खोज को आँख मूँद मानना कैसे यहाँ की जलवायु के अनुकूल हो गया। इतिहास का कहना क्या।पारिवारिक संबंधों या सामाजिक समरसता पर सही में उपनिषद या अन्य बडे ग्रन्थों की बातें रखी नहीं गई। यह नमूना मात्र है।
संचार माध्यमों की जिम्मेवारी बनती है कि वह इन खेलों से समाज को सावधान करे शोधित तथ्यों को सामने रख। दिख रहा है कुछ और। इनमें खोखली जागरुकता पर उछलकूद मचाने वाले उन योग्य कर्मचारियों को आगे बढने नहीं देते जो तलवे नहीं चाटते। प्रांतीयता इस कदर हावी रहती है वह भोगने वाला जानता है। तमाम योग्यता अनुभव होते हुए पदोन्नति से वंचित कर्मचारी अवहेलित रहता है क्योंकि वह दूसरे प्रांत का है। ऊपर से जनता के सामने प्रगतिवाद और नाना तरह के वादों का समर्थक बनाकर लोग स्वयं को पेश करते हैं। रोजी-रोटी हेतु समझौता करना एक बात अपना स्वाभिमान बेचना उचित नहीं।
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