Sunday, 22 December 2024

बृहस्पति' शब्द की विवेचना

वैदिक वाङमय में 'बृहस्पति' शब्द कई ऋषियों के साथ जुडा हुआ है। यह एक पदवी या उपाधि के रुप में, शिक्षण जगत की अलग - अलग धाराओं में विशेषज्ञता प्राप्त करने वालों के लिए प्रयुक्त होती थी। ये सभी मन्त्र द्रष्टा ऋषि थे जिन्होंने अपनी-अपनी साधना द्वारा चीजों को समझा। आधुनिक व्यवस्थानुसार एक शोधकर्ताओं की संस्था जहाँ विशिष्ट आचार्यों को यह उपाधि दी जाती थी जो प्रायोगिक, क्रियात्मक, व्यवहारात्मक विद्याओं के प्रवर्तक थे।प्रायोगिक शब्द का संबंध प्रयोग किए जानेवाले कार्य से है। यह नियम व्यवहार तथा परमार्थ दोनों पर लागू है। अन्तर कल पद्धति का है। परमार्थ विषयक मामले में अनुभव की बात आती है। हर बात केवल मानने पर नहीं जानने पर निर्भर है अधिकतर मामलों में। कई मामलों में स्वयं का जानना जरूरी नहीं जैसे जलने, डूब कर या ऊँचाई से गिरकर मरने, दुर्घटनाग्रस्त होने के विषय में पढी - सूनी बातों पर विश्वास काफी है। कोई यह न कहे कि अनुभव से प्रमा दृढ होगी - ऐसी बेतुकी बात करनेवालों से अलग रहें। जब व्यवहार मे संदर्भानुसार मानना - जानना जरुरी है तब परमार्थ केवल मानने का पर्याय नहीं। 
चारों उपवेद (ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सायवेद का गन्धर्वेद, अथर्ववेद का स्थापत्य वेद) में सारे बृहस्पतियों का योगदान अधिक मिलता है। जल तथा सूर्य (किरण / धूप) चिकित्सा अथर्ववेद में होने के फलस्वरुप तथा अनभिज्ञता चलते कुछ लोग आयुर्वेद को इसका उपवेद कहते है जो सरासर अनुचित है। 

 पारमार्थिक विषय इन्द्रियों से परे है इसलिए अपनी-अपनी साधना ही साधक को अनुभव करवाती है। यहाँ साधना रुपी प्रयोग एकमात्र सहारा है। प्रयोग की प्रणाली भले भिन्न - भिन्न हो उसकी जरूरत व्यवहार तथा परमार्थ दोनों में जरूरी है। उसके आधार पर व्यवहार में आनेवाली विद्याओं को भौतिकवाद में सीमाबद्ध करना और जडवाद का ठप्पा लगाना अन्याय है। इसके साथ मनमाना अर्थ लगाते हुए कहा गया कि भौतिकता वाले इन्द्रिय बाह्य किसी बात को नहीं मानते। इसके कारण का विश्लेषण करके लक्ष्यार्थ समझना किसी को याद नहीं रहा। चूँकि ऐसी अनर्गल बात करने के पीछे अपनी-अपनी मान्यताओं को सही ठहराना था अतः मर्म कौन और क्यों पकडे? 


इस कुतर्क में कुछ विद्वानों ने 'आत्मा' शब्द के सहारे समझाया मानो वह अलग से तत्व है जबकि यह शब्द समझाने के लिए बडे ग्रन्थों में प्रयुक्त हुआ तभी इसकी संदर्भानुसार व्याख्या मिलती है। बृहदारण्यक उपनिषद में ऋषि याज्ञवल्क्य - मैत्रेयी संवाद में कहा गया - न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति - प्रियता हेतु कोई (और सबकुछ) प्रिय नहीं लगता सब अपने-अपने प्रयोजन के लिए प्रिय लगते हैं। यहाँ आत्मा को देह रुप म लिया गया है क्योंकि सारा व्यवहार दैहिक होता है फिर चाहे स्थूल सूक्ष्म या कारण शरीर से हो। (१)

संदर्भ :-
१ आत्मा परमात्मा 
     https://youtu.be/2l1gszVhmQU
     
   कौन देहात्मवादी नहीं है? 
    https://youtu.be/l1ZXXrFoNFA

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