भारतीय चलचित्रों में आध्यात्मिक गीतों की स्वस्थ, सार्थक, सफल परंपरा है। पहले ऐसे रचनाकार होते थे जो अध्यात्म- व्यवहार के तालमेल, fववेक तथा ज्ञानचक्षु का उपयोग करके fलखते थे। नौ स्थाfपत आस्तिक भारतीय दर्शनों की अर्थवत्ता यहाँ की माटी, हवा, पानी में बसी हुई है। नौ आस्तिक हैं - चार्वाक, जैन, बौद्ध, न्याय, वैशेfषक, सांख्य, योग, पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा (शारीरिक मीमांसा, वेदांत)। वेदांत से तात्पर्य अद्वैत से है। बाकी तो दृष्टि है दर्शन नहीं क्योंकि औपनिषदिक साfहत्य तथा जाँची-परखी प्रमा बारंबार यही समझाती है। सारे नों दर्शनों का आधार प्राचीन उपनिषद हैं दृष्टियों का नहीं। दृष्टियों में अशोधित व्यक्तिगत विवेचना, खंडन-मंडन को प्रश्रय देते-देते उपनिषदों से परे हो जाती है। औपनिषदिक साfहत्य आम जीवन से जुडा है जबकि दृष्टियाँ केवल स्वयं की प्रतिष्ठा पर आधारित रहती है। इसके लिए बात-बात पर अलगाव दिखाना जरूरी है जो प्राचीन उपनिषदों का लक्ष्य नहीं। उपनिषद स्वरुपानुसंधान की ओर ले जाते हुए व्यवहारिकता का उपदेश करते हैं।
अध्यात्म शब्द का अर्थ एक ही है - अपने असली स्वभाव या स्वरुप को पहचानना और वह भी बिना सांसारिक उपाधियों के जैसे नर नारी, बाल युवा वृद्ध, देसी परदेसी, पहचान (आजीविका, क्षेत्रगत, भाषागत, वेषगत, आहारगत), इत्याfद। केवल आध्यात्मिक ग्रंथों और विशेष शब्दावली तक अध्यात्म सीमित नहीं। उसे वही तक रखना पूर्णतः अनुचित है। जैसे सर्व व्यापक चिन्मयी सत्ता उपाधियों के साथ तादात्म्य होने के फलस्वरूप, प्रयत्न से समझ में आती है वैसे ही आत्माभ्यासी व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति के बिंदु सांसारिकता में पकड लेता है। इसी प्रयास को आगे बढाते हुए पुराने और भूले बिसरे गीतों को समझें। यह विवेचना नौ दर्शनों की अन्दरूनी एकता से उत्पन्न सार को दर्शाती है जहाँ कोई दर्शन छोटा - बडा नहीं। सभी मिलकर आत्यन्तिक समाधान की ओर ले जाते हैं आत्माभ्यासी को। विवेचना में दर्शन विशेष का नाम केवल समझाने की दृष्टि से रखा गया है। उसमें बाकियों का सहयोग है। ये सारे दर्शन हम सब के अन्दर कार्यरत रहने के साथ-साथ दैनन्दिन व्यवहार में काम आते हैं। तभी इन्हें जीवंत माना गया क्योंकि ये कल्पना या अपनी-अपनी प्रधानता बनाए रखने की ऊपज नहीं। प्रायः लोग इनके अलग-अलग नामों से अपरिचित रहते हुए इनसे काम चलाते हैं। यहाँ यह तथ्य जानना आवश्यक है कि गीत को सुनते ही दर्शन सामने आता है उसे बौद्धिक विलास के सहारे पकडना नहीं पडता। इसके लिए सभी नौ आस्तिक दर्शनों की समझ जरूरी है। जिनको जानकारी नहीं पर जानने की इच्छा हैं उनको दार्शनिकता पकड में आएगी। इन जैसे गीतों की कोई कमी नहीं अपने यहाँ। दर्शनों की अन्दरूनी एकता के साथ जिनके तार जुड गए, ऐसे गीतकारों ने अपनी-अपनी लेखनी से दार्शनिक गीत लिखे। उनमें कोरी कल्पना या पलायन नहीं, आध्यात्मिक यात्रा का अनुभव आधारित पाथेय है जो बोलचाल की शब्दावली में दर्शन के गूढ तत्वों को उजागर करता है। चलचित्रों में ऐसे गीतों के समय दिखने वाले दृश्य में जो अटका वह बहुधा भटकता है। प्रेरणादायक गीत इसी परंपरा की देन क्यों है? आध्यात्मिकता जीवन को समझने की स्वस्थ दृष्टि देता है पलायन, हताशा, स्वेच्छाचारिता, आत्महत्या, हिंसात्मक प्रतिस्पर्धा का पक्ष नहीं लेता।
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गीतकार: यशोधनंदन जोशी (विद्या, १९४८)
किनारे किनारे चले जाएंगे
https://youtu.be/f09gxDbF6eA?si=q11O53ZlLUPid842
वेदांत दर्शन वाले गीतो में जो स्वाधीनता पश्चात लिखे गए उनमें समकालीन परिस्थितियों का सामना करने के संदेश में गीतोक्त कर्मयोग समझाया गया। किसी और की सहायता पर पूरी निर्भरता ठीक नहीं। किसी काल्पनिक बाहरी नाम रूप तक को अतिरंजित ढंग से महिमामंडित तक नहीं करने की बात छिपी है इसमें।
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गीतकार शकील बदायूंनी, दुलारी (१९४९)
कौन सुने फरियाद हमारी
https://youtu.be/z17YvYUQTJY?si=r5LXrOvC1Q8bi_XA
अद्वैत वेदांत में निदिध्यासन की अनिवार्यता पर जोर दिया गया है। यह गीत उसकी आवश्यकता की ओर संकेत कर रहा है। एक ओर जहाँ भारतीय दर्शन अपने भीतर ईश्वरानुभूति की बात करता है वहीं दुर्भाग्यवश उसे बाहर खोजने पर अधिक जोर दिलवाया गया। वेदांत दर्शन अपने भीतर खोजने की शिक्षा देता है। यह गीत राजनैतिक स्वाधीनता के दो वर्ष पश्चात लिखा गया और इसकी पंक्ति, ‘छूट गए इस कैद से फिर भी / हो ना सके आजाद’ तात्कालिक परिदृश्य को समझा रही है जहाँ शैक्षणिक तथा बौद्धिक दिशा-निर्देश समाज के बडे वर्ग को विवेक के साथ जोड नहीं पाया और वह परवशता का शिकार बना। श्रीमद्भगवद्गीता, १८.६१ में समझाया गया -
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।
इस श्लोक की संगति गीत के साथ लगती है क्योंकि यह किसी अन्य के भरोसे बैठे रहने की मानवीय कमजोरी पर प्रहार करता है। विवेक रुपी ईश्वर सबके भीतर है और सिखाया गया किसी ऊपरवाले और बाहरवाले के भरोसे रहना। हँसी आती है वेदांत के आचार्यों के मुख से ऐसी काल्पनिक व्याख्या इस श्लोक की। ईश्वर शब्द की मनमानी व्याख्या एक षड्यंत्र है मानवता के साथ। इसीके चलते कर्महीनता, आलस्य, निराशा, प्रमाद, जैसी लहरें बहाने लगी और सब स्वयं को कोसते रहे। इसे महिमामंडित करने के लिए श्रद्धा और समर्पण जैसे शब्द जोडे गए। पीड़ित को तब और अधिक पीड़ा हुई जब उसके साथ अमानवीय व्यवहार या/और दैवीय सहायता की प्रतीक्षा करने के लिए कहा जाता है। और तो और उसकी अधूरी श्रद्धा तथा अपूर्ण समर्पण होने का ताना मारा जाता है। ऐसे वक्ता सामाजिक जुड़ाव बनाने और आत्मनिरीक्षण से बचने के लिए ऐसी शिक्षा देते हैं। तभी अपराधियों को संरक्षण दिया जाता है, उन्हें माला पहनाई जाती है और पीड़ितों को प्रायः उनके भाग्य भरोसे छोड़ दिया जाता है। उन्हें अपने-अपने भीतर विवेक रूपी ईश्वर के साथ रहने की प्रक्रिया से परे रखा गया। ऐसा वर्ग स्वयं से खुश रहना और अपने में मगन रहना सीख नहीं पाया। तभी गीत में कहा गया- ‘कोई नहीं पूछने वाला / किसको करे हम याद’, ‘टूट गयी सब दिल की उमीदे’। यह तभी होता है जब हर तरफ से मार पडती है। विशेषतः अंदरुनी मार केन्द्रीय बिंदु है इस गीत में।
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गीतकार शैलेन्द्र (आवारा, १९५१)
नैय्या तेरी मँझधार, होशियार, होशियार
https://youtu.be/PywzcrViwAk?si=NVq535eRkNHffSSQ
न्याय - वैशेषिक दर्शन की ओर स्पष्ट संकेत है इसमें। यहाँ तर्कशास्त्र, ज्ञानमीमांसा तथा वस्तुनिष्ठ यथार्थ के संतुलित मिश्रण द्वारा आंतरिक सजगता बनाए रखने की ओर संकेत है। संसार की उपमा में प्रायः नदी या सागर का प्रयोग प्रवाह दर्शाने हेतु होता है। जीवन (नैय्या) संसार (नदिया) के मँझधार में है। कुशल नाविक सजग सचेत रहकर नाव खेता है और उसके लिए होशियार शब्द का प्रयोग हुआ। स्थिति की भयावहता बतलाई गई ‘सूझे आर ना पार’ के द्वारा। ‘डर कैसा रे खुला हुआ आसमान’- कूपमण्डूक बने रहने पर चोट करती यह पंक्ति ‘आसमान’ की उपमा से व्यापक विचारवान वाला बनने को कहा जा रहा है। हर समय संकुचित कलुषित विकृत कुंठित विवेकहीन या उदण्ड उच्छृंखल भावनाओं के भँवर में फँसे रहनेवालों के लिए कहा गया ‘तेरी नाव में है तूफ़ान’ ‘सूझे आर ना पार’ ‘गहरी चंचल धार’। दर्शनों की आंतरिक एकता या यूँ कहें कि सारे कर्मों का समापन ज्ञान (निरुपाधिक ज्ञान) में होता है। श्रीमद्भगवद्गीता ४.३३ श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।।
जितने तरह के अनुष्ठान है उनमें ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। इसी ओर संकेत इन पंक्तियों मे- ‘काठ का टुकड़ा बह जाता है, लोहा डूबके रह जाता है / ग्यानी सोच विचार, होशियार, होशियार।
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गीतकार असद भोपाली, अफसाना (१९५१)
आज कुछ ऐसी चोट लगी है, टूट गया पैमाना दिल का
https://youtu.be/LEBDdttDzNU
वेदांत में निदिध्यासन अनिवार्य है। जिन्हें वेदांत शब्द से असहजता लगे वे आध्यात्मिक पथ में आवश्यक विवेचना जैसे शब्द का प्रयोग करें। चोट के कारण कई हों पर जो सच्चाई से परिचित करवा प्रतिशोध के बदले मोड दे स्वरूप की ओर, वह हिय नैन खोलते हुए वेदांत की ओर ले जाती है। कुछ लोगों के लिए यह केवल दुःख-दर्द और रोने-धोने वाला गीत हैं, लेकिन यह मन को सजग करने में सक्षम है। अधिकारी व्यक्ति के लिए ऐसे गीत व्यर्थ की दुनियादारी से अलग करने में सहयोग करते हैं, भले ही दुनिया चोट दे उससे क्या? इसका प्रमाण मिलता है गीत में- ‘कैसा शिकवा किसकी शिकायत देख लिया अंजामे मुहब्बत, आपही अपनी आग में जलकर खाक हुआ परवाना दिल का’। निष्ठावान प्रेम पतंगें की भाँति जलने के लिए दुसरी जगह नहीं जाता। परवाना शब्द फ़ारसी से उर्दू में आया। ऐसा आत्मनिष्ठ संतुष्ट रहता है सांसारिक लगाव के शेष होने से। तभी परवाना शब्द उस दिल के लिए प्रयुक्त हुआ जो उसकी (दिल) आग में जल जाता है।
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गीतकार:शैलेन्द्र (दो बीघा ज़मीन, १९५३)
धरती कहे पुकार के, बीज बिछा ले प्यार के
https://youtu.be/vIRd3hvTW9g?si=H81G733WE0Ls3UUS
चार्वाक दर्शन वाला यह गीत कुछ समझा रहा है। इस नाम रूपात्मक जगत को छोडने से पहले ‘बीज बिछा ले प्यार के’ माध्यम से उस दृष्टि के प्रचार-प्रसार की बात कही गई जिससे अंधी दौड़ पर रोक लगे तथा घर आंगन संतोष रुपी धन (गीतानुसार फसल) से लहलहाने लगे। ‘मौसम बीता जाए’- निमित्तमात्रं न समझने वाले स्वयं को सबकुछ समझ बैठते हैं। यह रचना उसीपर चोट करती है। प्रायः लोग अपनी-अपनी ऐंठन में जकड़े रहते हैं एक उम्र तक तो कुछ जीवन भर। इस दर्शन के संतुलित आहार विहार व्यवहार की बात को ही ‘अपनी कहानी छोड़ जा, कुछ तो निशानी छोड़ जा’ के माध्यम से कहा गया। ‘कौन कहे इस ओर, तू फिर आए न आए’- संतोष रुपी धन प्राप्ति की राह बतला कर चले जा। इस धन की बात मौखिक रुप से सभी मानते हैं पर उसके लिए बाहर यहाँ वहाँ भटकते रहते हैं। उसके लिए अंदरुनी परिश्रम चाहिए। खेत तथा बीज के प्रतीक में प्यार शब्द सुलझे हुए मनुष्य की ओर संकेत कर रहा है। यूँ तो निशानी गलत काम करने वाले तक छोडते हैं और वह भी बहुधा अधिक। गीत की पंक्तयों में उनका नहीं कोई स्थान।
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गीतकार: शेवन रिज़वी (सुरंग १९५३)
गहरी गहरी नदियाँ में बही चली जाऊं रे
https://youtu.be/Z_tmIbbplXI?si=D1_9erd2QpE5wSsf
अद्वैत वेदान्त वाले इस गीत में गीतोक्त कर्मयोग की बात चरैवेती - चरैवेती के संदेश सहित दी गई है। वेदांत का व्यवहारिक पक्ष गीतों में भलीभाँति बतलाया गया। ‘बढ़ी चले आये देखो आगे पीछे मौजे/ लड़ने को आईं जैसे राजा की फौजें/ मैं भी हूँ तूफान कैसे रुक जाऊँ रे’- मौजे (लहरें), राजा की फौजें सभीके जीवन में आने-जाने वाली बाधाओं को दर्शाया गया है। विशेषतः कभी-कभी फौज की भाँति नाना बाधाएँ एक साथ आती हैं। उनसे घबरा कर न बैठने वालों के लिए कहा गया ‘मैं भी हूँ तूफान कैसे रुक जाऊँ रे’। ऐसी सोच बाधाओं को हावी नहीं होने देती। ‘इतनी सी मछली बडी शैतान है / पाँव मेरा काट लिया जान न पहचान है/ धोखा मुझे दे गई पीछा किए जाऊँ रे/ जल्दी है लेकिन माफ किए जाऊँ रे’- मछली उन बाधाओं का प्रतीक जो कभी-कभी अपनेपन का नाटक करते हुए परेशान करती है। ‘जान न पहचान’ का प्रयोग अपनों से पाए धोखे को बता रहा है। जीवन में इसकी संभावना अधिक रहती है। ‘माफ किए जाऊँ रे’- यह लक्ष्य केन्द्रित अवस्था राह की बाधा से उलझ कर समय नष्ट न करने के साथ क्षमादान की है। अधिकतर बाधाएँ आवेश पैदा करके मन को साफ रहने नहीं देती। उनके अनुसार न बहना ही अभ्यास है जिसे अवश्य करना चाहिए। ‘काहे मुझे रोक रही फूलों की डाली/ तू भी मेरे साथ चल ओ मतलाली’- फूलों की डाली सात्त्विक बाधा है जिनमें फँसना फिर भटकना होता है अधिकांश मनुष्यों का। लगन का पक्का व्यक्ति उनपर हावी रहता है।
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गीतकार अज़ीज़ कश्मीरी, आग का दरिया (१९५३)
उड जा पंक्षी बावरे
https://youtu.be/DM5Z0jHWfiM
उड जा पंक्षी बावरे (२)/ जा देस बेगाने जा, जा बावरे, उड जा पक्षी बावरे/ ये जो तेरे मीत हैं / देंगे पंख जला, जला बावरे /उड जा… / ये बेदर्दी लोग हैं (२)/ देंगे दिल को तोड / हँस कर पास बुलाएंगे, ऐ बावरे / हँस कर पास बुलाएंगे /लेंगें लहु निचोड़…/ तू उड़ जा पंक्षी बावरे/ उस नगरी की ओर / जहाँ सुहानी शाम है (२)/ जहाँ सुहानी भोर, हाय जहाँ सुहानी भोर / जा उड़ जा..।
जीवन की सच्चाई दर्शाता तथा आध्यात्मिक ओजवाला यह गीत, स्वरूपानुसंधान या आत्मज्ञान की आवश्यकता तथा अनुभवात्मक परिणाम से ओतप्रोत, वेदांत दर्शन का एक उदाहरण है। दैनिक बोलचाल की शब्दावली में दुनिया की व्यवहारिक दुकानदारी (सात्विक, राजसी, तामसिक) से दूर रहने की शिक्षा दी गई। संक्षिप्त रचना में पंक्तियों की पुनरावृत्ति गहन सोच/चिंतन हेतु की गई। उसके साथ शिक्षा की शुरूआत होती है ‘ये जो तेरे मीत हैं / देंगे पंख जला,
ये बेदर्दी लोग हैं / देंगे दिल को तोड, हँस कर पास बुलाएंगे / लेंगें लहु निचोड’ जैसी बातों से। इन्हें समझने के लिए उन मानसिक उलझनों से परिचित हुआ जाए जो अवचेतन मन तक में डेरा डाले हुए है जैसे औरों की राह रोकना, रोडा अटकाना, अपने जीते जी औरों को आगे न बढने देना, भद्दी मानसिकता से टांग चने के झाड़ पर चढ़ाना और गलत राह बताना। इनमें निपुण व्यकि विशेषज्ञ होते हैं औरों का जीवन नष्ट-भ्रष्ट करने में, फिर चाहे वे जिस देश, वेष, काल, परिस्थिति में हो। ऐसे महानुभाव अपनी उम्र और पद तक की मर्मादा भूलते हुए औरों को सीढियाँ बनाते हैं अपने यश के लिए। ऐसे लोग गीता पढते-पढाते हैं पर औरों के दमन का विरोध करने के मामले में गणित लगाते हैं। आग किसी को भी नुकसान पहुँचा सकती है और यह जीपीएस का प्रयोग नहीं करती। ऐसे ही व्यवहार पर चोट करते हुए कहा गया, ‘देंगे पंख जला’ यानि संबंधित व्यक्ति अपनी चेष्टा से आगे बिल्कुल न बढे। यहाँ तक कि उसे येन-केन-प्रकारेण हतोत्साह किया जाता है। इसीलिए ‘देंगे दिल को तोड’ वाली बात बाद में कही गई। औरों की क्षमता को अपने लिए सीढ़ी बनाना तत्पश्चात उसके साथ दुर्व्यवहार को दर्शाया गया ‘लेंगें लहु निचोड’ में। इस गीत में रत्ती भर अतिश्योक्ति नहीं है। ज्ञानचक्षु खुलना ही 'सुहानी' शब्द से दर्शाया गया है।
स्वरूपानुसंधान करते हुए एक आत्माभ्यासी ऐसे लोगों की पकड से अलग होने लगता है। यही वेदांत का उद्घोष है जो गीत में बार-बार दोहराया गया ‘उड जा पंक्षी बावरे’, ‘जा देस बेगाने जा’। यहाँ ‘देस बेगाने’ का संकेत उस स्थिति से है जहाँ व्यक्ति चिदाभास (संक्षेप में- मन, बुद्धि पर पडने वाले जगत का प्रतिबिंब) की वास्तविकता समझ कर उससे अलग होने लगता है। ऐसे आत्माभ्यासियों हेतु यह गीत लिखा गया जो स्वयं से खुश और संतुष्ट रहते हुए जीवन व्यतीत शक्यते हैं।
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गीतकार : राजेंद्र कृष्ण (भाभी १९५७)
चल उड़ जा रे पंछी की अब ये देश हुआ बेगाना
https://youtu.be/JMJdG6gjLsE?si=bWb5cQ4YV0Oz4JQY
fववेचना :-
अद्वैत वेदांत - स्वरुप में स्थित रहो। मतलब का सारा ताना-बाना फिर क्यूँ इसमें रम जाना? इस गीत में कागजी हताशा का गायन नहीं है। पंछी की भाँति जीवन जीने की शिक्षा देनेवाले इस गीत में वेदांत दर्शन की गूँज सुने। यह शरीर केवल लेने नहीं देने का भी माध्यम है। यही बात भूलकर मनुष्य शरीरधारी हर समय छटपटाते रहते हैं। उसीपर चोट करते हुए कहा गया ‘ग़म ना कर जो तेरी मेहनत तेरे काम ना आई / अच्छा है कुछ ले जाने से, देकर ही कुछ जाना’। यूँ तो जितने दिन का दाना-पानी लिखा है उतने समय तक स्थान विशेष तो क्या पृथ्वी पर व्यक्ति रहता है। यह जानते हुए लोग अपना आचरण नहीं सुधारते और इसीलिए याद करवाया गया ‘खतम हुए दिन उस डाली के जिस पर तेरा बसेरा था / आज यहाँ और कल हो वहाँ / ये जोगी वाला फेरा था’। इसमें ‘जोगी वाला फेरा’ कथन में नश्वरता के साथ संसाधनों के दोहन तथा दुरुपयोग वाली वृत्ति पर चोट है। यहाँ जोगी वेशधारी नहीं वरन संयमी गृहस्थ का प्रतीक है। इस रचना में भूतकाल से अलग होने की बात कही ताकि नई परिस्थिति अनुसार ढलना आसान हो। यहाँ स्वयं को मिटाने की बात नहीं वरन भूतकाल की यादों को बाधा न बनने का संदेश है।
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गीतकार शैलेन्द्र - जागते रहो (१९५६)
ज़िन्दगी ख्वाब है/ख्वाब में झूठ क्या और भला सच है क्या
https://youtu.be/lzK8UpxGFs8
यह स्वीकारोक्ति- ‘दिल ने हमसे जो कहा हमने वैसा ही किया’ व्यवहार के अनुसार बहते रहने की दशा बता रही है। संगीतमय व्याख्या जीवन की जो ज्ञान चक्षु खोलने में सहायक है। वेदांत की ओर ले जाने वाली इसकी पंक्तियों में सैद्धांतिक बातें सरलता से समझाई गई। निरंतर अभ्यास के चलते ज्ञानचक्षु खुलने की ओर व्यक्ति बढता है। पग-पग पर विपरीत वृत्तियाँ आती हैं। अपनी-अपनी जगह सब सच लगती है। बहिर्मुखता में उलझे रहने की लत जल्दी नहीं जाती। केवल पोथी पढने, केवल सुनने, रटने, वेषधारी बनने, नियमाधीन रहने से fत्रपुटी (ज्ञान, भक्ति और वैराग्य) सिद्ध नहीं होती। अंतर्दृष्टि बंद रहती है। योग दर्शन के अनुसार कारण शरीर की उपलब्धियाँ साधना का चरमोत्कर्ष लगती है जबकि उठना उससे ऊपर है। इसमें फँसे व्यक्ति वाचिक वेदांती, शास्त्रशिल्पी, शास्त्रपशु, मसानिया बैरागी बने रहते हैं। यह सांसारिक उपलब्धि है आध्यात्मिक नहीं। अभ्यास की सजगता बतलाई गई इनमें- ‘एक प्याली भर के मैंने ग़म के मारे दिल को दी /
ज़हर ने मारा ज़हर को / मुर्दे में फिर जान आ गई’
हर तरह के व्यवहार से व्यथित हृदय के चलते व्यक्ति (अभ्यासी) मृतवत होता है। ऐसा समय हर अभ्यासी के जीवन में आता है। साधना की रक्षा होती है आत्मज्ञान या निरुपाधिक ज्ञान से। जहर शब्द दो बार आया है एक ही पंक्ति में और वह यमक अलंकार का उदाहरण है। पहले प्रयोग (ज़हर ने) में पथ्य (औषध) तथा दुसरे (ज़हर को) रोग को दर्शा रहा है। यहाँ ज्ञान कर्ता तथा रोग कर्म स्थानीय है। श्रीमद्भगवद्गीता - ४.१९, ४.३७ के अनुसार ऐसे रोग का नाश ज्ञानाग्नि में होता है।
यस्य सर्वे समारंभ: कामसंकल्पवर्जिता: |
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा:||१९||
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन |
ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ||३७||
गीत का कथन- ‘मुर्दे में फिर जान आ गई’ बतला रहा है औषधि का परिणाम। अविद्या का आवरण हटते ही अंतर्दृष्टि खुल गई। ये पंक्तियाँ - ‘एक कतरा मय का जब पत्थर के होंठों पर पड़ा / उसके सीने में भी दिल धड़का / ये उसने भी कहा / ज़िंदगी ख़्वाब है / ख़्वाब में झूठ क्या और भला सच है क्या’ श्रीमद्भगवद्गीता की याद रिदा रही है।
यहाँ मय (सुरा) सांसारिक मान सम्मान दर्शाता है। ‘होठों’ शब्द पाँचों ज्ञानेन्द्रियों का प्रतीक है। संयमी संभल जाता है और बहते नहीं रहता। ‘पत्थर के होठों’ में तीनों (सत्व, रज, तम) तरह की खोखली व्यवहारिकता के समक्ष सावधानीपूर्वक लिया गया निर्णय (पत्थरवत होना) दर्शाया गया है। यही स्थिति कछुए के दृष्टान्त से बतलाई गई श्रीमद्भगवद्गीता,२.५८ में -
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वश: |
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||
जिस तरह कछुआ संकट की आशंका से अंगों को अपने खोल में समेट लेता है वैसे ही आत्माभ्यासी अपनी सभी इन्द्रियों को अंतर्मुखी करता है।
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गीतकार शैलेन्द्र, एक गाँव की कहानी (१९५७)
रात ने क्या-क्या ख्वाब दिखाए / रंग भरे सौ जाल बिछाये
https://youtu.be/iD5pNcyQdGU?si=7rcCI0xmUDTzriK5
विवेचना :-
अद्वैत वेदांत से संबंधित इस गीत का मुखड़ा ‘रात ने क्या-क्या ख्वाब दिखाए / रंग भरे सौ जाल बिछाये’ सुनते ही श्रीमद्भगवद्गीता २.६९ का श्लोक आया-
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी |
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने: ||
'रात’ शब्द प्रपंच का द्योतक है। तभी बौद्ध दर्शन सजग रहने को कहता है ताकि यादें तक बहाकर न लेजा सके और वही सजगता की बात वेदांत में है। सांसारिकता में तामसी राजसी लगाव दूर करना भले सरल लगे सात्विकता पकडे रहती है। तीनों तरह के लगाव की बात गाने तथा श्लोक में है।
निदिध्यासन से धीरे-धीरे अंदर से पंक्तियाँ निकलती है, ‘आँखें खुली तो सपने टूटे / रह गये ग़म के काले साये’- सांसारिकता को सच माननेवाले स्वप्निल दुनिया में जीते हैं। यह भ्रम जिसके जीवन से जाने लगता है वही ऐसी पंक्तियों के साथ स्वयं को जोडेगा। ‘काले साये’- यह प्रयोग हुआ सभी यादों (सुख-दुःख) के लिए। तथाकथित सुख की यादें तक दुःखदायी बनती है भोग समाप्त होने पर। बोध यादों को नष्ट नहीं करता क्योंकि वह एक प्राकृतिक व्यवस्था है और रहेगी अतः अभ्यासी सजग रहते हुए उनको अलग से स्थान नहीं देता। आत्माभ्यासी की यात्रा में अपने-अपने भीतर दबी वृत्तियाँ तथा औरों की नकारात्मकता का प्रहार होता ही है। इसी ओर संकेत है, ‘हम ने तो चाहा भूल भी जायें / वो अफ़साना क्यों दोहोरायें / दिल रह रह के याद दिलाये’ जैसी पंक्तियों में। इसमें ‘क्यों दोहोरायें’ के द्वारा भूतकाल से न चिपके रहने की बात है। बहुधा समाज उसे याद दिलाते रहता है। वह अभ्यासी की आंतरिक उन्नति से हिंसात्मक स्तर वाली ईर्ष्या से छटपटाता है। साधारण रूप से उसके अंदर ईर्ष्या रहती ही है क्योंकि औरों का स्तर गिराने में बहुतों को आनंद आता है। यह भारत के कई राष्ट्रीय रोगों में से एक है। यहाँ ‘दिल’ शब्द याद करानेवालों से उत्पन्न विक्षेप के लिए प्रयुक्त हुआ है। ‘चलो जहाँ क़िस्मत ले जाये / दुनिया परायी लोग पराये’- यह सभी जानते हैं कि जिसका जितने दिन का दाना-पानी जहाँ लिखा है उतने समय तक वहाँ रहने के बाद स्थान परिवर्तन को ‘चलो जहाँ क़िस्मत ले जाये’ के द्वारा कहा गया। इसमें नई चुनौतियों के अनुसार खुद को ढालने, लचीलापन दिखाने और समायोजित होने की क्षमता है जो कईयों में रहती है इसीलिए इसके साथ कहा गया ‘दुनिया परायी लोग पराये’। हालाकि स्थान और लोग पहले पराए रहते हैं नए आने वाले के लिए, यहाँ संगति पूरे गीत के मुखड़े के साथ लगनी चाहिए जो वेदांतिक समझ बता रही है।
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गीतकार प्रेम धवन, एक साल (१९५७)
किसके लिए रुका है किसके लिए रुकेगा
https://youtu.be/f2-szw7atxs?si=Vset1NIICNY3vqI1
वेदांत (निदिध्यासन), बौल दर्शन (सजगता) तथा चार्वाक दर्शन (साधनों का संयमित उपयोग) पर आधारित रचना आत्माभ्यासी हेतु सहायक है। किसके लिए रुका - अपनी सजगता पर दृष्टि रखो, आंतरिक स्थिति हेतु औरों की स्वीकारोक्ति और मान्यता प्राप्ति अनावश्यक है। ‘दिल का चिराग तुझको रास्ता दिखा रहा है’ (बौद्ध दर्शन)। तीनों दर्शनों ने व्यक्ति के अपने प्रयास की बात कही है। वेदांत के सर्वोच्च ग्रंथ योगवासिष्ठ में इसीपर जोर है। संत कबीरदास का कथन (पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात। देखत ही छुप जाएगा, ज्यों सारा परभात) गीत में पिरोया हुआ है इसमें। ‘खुद मिट के भी किसी की तू ज़िन्दगी बचा ले’- जीवन केवल अपने लिए नहीं मिलता (तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहिं न पान। कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान।।)। यह तभी संभव है जब ‘संपति’ हो यानि शरीर स्वयं और समाज हेतु बोझ न बने। ‘किसी की तू ज़िन्दगी बचा ले’- तभी संभव है जब शरीर वैसा हो और उसको ठीक रखने के लिए संसाधनों का सदुपयोग होता रहे ताकि मन-बुद्धि मलिनता में बहते न रहे। अगर यह कहा जाए की ‘न बहें’ तो वह अतिश्योक्ति होगी जो अभ्यास को रोकेगी।
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प्रेम धवन, Miss Bombay (१९५७)
ले चला जिधर ये दिल निकल पड़े
https://youtu.be/tAQEyqq6hsY
गीतासार को गीतात्मक शैली में पिलाने वाला यह गीत चार्वाक दर्शन का है जिसमें दर्शन की कर्मठता और गीता के कर्मयोग का मिश्रण है। दोनों में संतोष, संयम, धैर्य, आन्तरिक खुशी रहती है। समय का मुल्य समझाया ‘सुबहो शाम काम ही से काम है / यही तो है नसीब जिसका नाम है’ के कथन से। ‘जो साथ वक़्त के चला वो मर्द है / जो रह गया वो रास्ते की गर्द है’- वक्त (समय) के अनुसार तो असामाजिक कार्य करनेवाले तक चलते हैं तब यहाँ किनके बारे में कहा गया? उत्तर इसी गीत ने यूँ दिया, ‘मोती भी मिले तो तुम ना भीख लो ‘हाथों से कमा के जीना सीख लो’। पंक्ति में ‘हाथों से कमा के’ जैसा प्रयोग केवल दैहिक नहीं वरन मानसिक तथा बौद्धिक श्रम की ओर संकेत कर रहा है। मानसिक कहने का कारण? मन में छिपी मलिनता से अलग रहना जरूरी है अपने आंतरिक विकास हेतु। चार्वाक दर्शन में
कर्मठता कहने का तात्पर्य? व्यकि की सक्रियता संतुलित जीवनशैली की ओर। उसीकी लगन तथा उसके फलस्वरुप अपने में मगन। दिल द्योतक है मन का जो कर्ता भोक्ता दोनों है। विवेक रुपी ईश्वर का वह निवासस्थान, श्रीमद्भगवद्गीता १८.६१- ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। यहाँ ईश्वर नामरुप में बँधा न क्षेत्र, प्रांत, भाषा, संप्रदाय, पंथ विशेष में। बंधनों में आम मनुष्य है और उसे आरोपित किया आसमानी ईश्वर पर। ये दो वीडियो सुने।
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 - कर्म संकरता
https://youtu.be/vmZ8LpdVZT0
श्रीमद्भगवतगीता अध्याय 3 - कर्मबंधन से छुटकारा
https://youtu.be/5L-Tt2m69Xo
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गीतकार: साहिर लुधियानवी (सोने की चिड़िया १९५८)
रात भर का मेहमान है अंधेरा किसके रोके रुका है सवेरा
https://youtu.be/mobmoEJk8PI?si=byqgEqciFAmwmEQM
सुनने में प्रेरणादायक दायक यह गीत उस राही को धीरज बँधाना है जो आध्यात्मिक पथ की भयावह बाधाओं के सामने सकपका जाता है। न्याय वैशेषिक की विश्लेषणात्मक क्षमता उसे आगे बढते रहने को प्रेरित करती है। नित्य अनित्य वस्तु विवेक या निदिध्यासन में इसकी जरुरत होती है। इसके आधार पर यह गीत वेदांत का उदाहरण है।
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गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी (असरार उल हसन खान)
१९५९ (सुजाता)
सुन मेरे बंधु रे / सुन मेरे fमतवा सुन मेरे साथी रे
https://youtu.be/sbamz71b0JM?si=FUQvoDzChQYaHG5h
विवेचना:-
वैशेषिक के कार्य कारण संबंधों का विश्लेषण, सांख्य के त्रिगुणात्मक प्रकृति में लय की बात करता हुआ यह गीत अंत में वेदांत की ओर जाता है (लहर बहर कर तू अपने, पीया चमन जाती रे), इसीलिए दीया शब्द का प्रयोग हुआ जो अनुभव जनित ग्यान का बोधक है और वेदांत नौ दर्शनों का अंतिम सोपान है। यहाँ प्रतीक है नौका रुपी शरीर नदी रुपी संसार - उस तत्व की ओर जाने की ललक जो नामरुप से परे है। उस ओर इंगित करने के लिए ‘पीया चमन जाती’ का प्रयोग हुआ। नदियाँ सागर में मिलती है और नामरूप में प्राणी / भौतिक जगत अपने मूल तत्व में। पीपल को अश्वत्थ कहते हैं संस्कृत में। यूँ तो लम्बी आयु तथा औषधीय गुण वाले पेड कई हैं। पीपल को अलग से नश्वरता का प्रतीक माना गया इसके नाम अश्वत्थ के चलते। बरगद में फैलने का प्राकृतिक गुण है। यह अपनी शाखाओं से लटकने वाली लंबी जड़ों, जिन्हें जटा (Aerial roots) कहा जाता है, के माध्यम से अपना विस्तार करता है। नश्वरता समझाने के लिए विस्तार वाला गुण अनावश्यक है इसलिए बरगद का प्रयोग नहीं हुआ। एक तरफ बरगद चौड़ाई के लिए जाना जाता है ऊँचाई के लिए नहीं जबकि पीपल अपनी ऊँचाई के लिए। दुसरी ओर उतना लम्बा, अधिक घनी और फैली हुई छाँव नीम में नहीं होती। नीम को नश्वरता का उदाहरण समझाने के लिए न रखने के पीछे, उपरोक्त दो कारण के साथ-साथ उसका कसैला (तिक्त) स्वाद है। दुसरी ओर अश्वत्थ शब्द 'अ' (नहीं) + 'श्व' (कल) + 'त्थ' (स्थित/रहने वाला) से बना है, जिसका भावार्थ है- जो कल वैसा ही नहीं रहेगा अर्थात नित्य परिवर्तनशील तथा अनित्य।
यह गीत एक संदेश दे रहा है साधनारत व्यक्तियों को। इसमें नामरुप से परे होकर विद्युत चुंबकीय तरंगों से एकत्व होने का प्रयास करना चाहिए। सभी उसी ओर लगे हैं, कोई आगे कोई पीछे। जो दृश्य में उलझ गए वे गए।
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गीतकार: मजरूह सुलतानपुरी (बंबई का बाबू १९६०)
साथी न कोई मंज़िल
https://youtu.be/I8JlV1M2yQ4?si=vPYxz9t0CbSCHLMe
अद्वैत वेदांत का पाठ पढाया गया गीत में। संगीत के माध्यम से जीवन की जमीनी सच्चाई याद करवाई गई विवेकशीलों को। हर रिश्ता माँग और आपूर्ति के चक्र में फँसा है। व्यक्ति अपने भीतर झाँकना भूलकर खुशी के बाहरी साधनों के बारे में सोचने लगता है, जो कि सिर्फ एक भ्रम है। ‘साथी न कोई मंज़िल / दिया है न कोई महफ़िल / चला मुझे लेके ऐ दिल, अकेला कहाँ’- अलग-अलग प्राकृतिक व्यवस्था के अनुसार हर व्यक्ति नाना परिस्थितियों से होता हुआ आध्यात्मिक पथ पर बढता है। कभी-कभी यह सिद्ध होता है कि किसी और के प्रयोजन हेतु उस व्यक्ति विशेष का आना रहना जाना हुआ। पथिक की उपस्थिति मात्र होनी थी इसीलिए समष्टि प्रबंधन समझना जरुरी है। योगभ्रष्ट के स्तरानुसार पथ पर बाहरी अकेलापन तक आता है जिसका उल्लेख पूरे गीत में हुआ। बाहरी एकाकीपन की वृत्ति कचोटती है पर वह बहता नहीं। पग-पग पर हर पडाव उसे अनासक्त रहने की शिक्षा देता है तभी गीत में व्यर्थ का उलाहना या पलायन या प्रतिशोध या विद्रोह नहीं।
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बंगला भाषा का एक गीत। भाषा से अनभिज्ञ लोगों के लिए लिप्यंतरण दिया जाएगा।
বাংলা আধুনিক গান बंगला भाषा का आधुनिक गीत
गीतकार गौरीप्रसन्न मजूमदार (१९६०)
Bengali non-film songs (Adhunik Gaan) were dependent on the Durga Puja release cycle, and it was released in an album in 1972 but it was present for a section of listeners before that.
गायक: हेमंत मुखर्जी
संगीतकार: नचिकेता घोष
এক গোছা রজনীগন্ধা হাতে দিয়ে বললাম, চললাম (२)/ চললাম / বেশ কিছু সময় তো থাকলাম, ডাকলাম, মন রাখলাম / দেখলাম দুটি চোখে বৃষ্টি / বৃষ্টি ভেজা দৃষ্টি / মনে কোরো আমি এক মৃত কোনো জোনাকী / সারারাত আলো দিয়ে জ্বললাম / চললাম / এক গোছা রজনীগন্ধা হাতে দিয়ে বললাম, চললাম, চললাম/ এখানেই সব কিছু শেষ নয়, বেশ নয়, যদি মনে হয় (२)/ লিখে নিও গল্পের শেষটা / থাক না তবু রেশটা / দেখো না গো চেয়ে তুমি আনমনা চরণে / কোন ফুল ভুল করে দললাম, চললাম/ এক গোছা রজনীগন্ধা হাতে দিয়ে বললাম, চললাম, চললাম.
Ēka gōchā rajanīgandhā hātē diẏē balalāma, calalāma (2)/ calalāma/ bēśa kichu samaẏa tō thākalāma, ḍākalāma, mana rākhalāma/ dēkhalāma duṭi cōkhē br̥ṣṭi/ br̥ṣṭi bhējā dr̥ṣṭi/ Manē kōrō āmi ēka mr̥ta kōnō jōnākī/ sārārāta ālō diẏē jbalalāma/ calalāma/ ēka gōchā rajanīgandhā hātē diẏē balalāma, calalāma, calalāma/ ēkhānē'i saba kichu śēṣa naẏa, bēśa naẏa, yadi manē haẏa (2)/ likhē ni'ō galpēra śēṣaṭā/Thāka nā tabu rēśaṭā/ dēkhō nā gō cēẏē tumi ānamanā caraṇē/ kōna phula bhula karē dalalāma, calalāma/ ēka gōchā rajanīgandhā hātē diẏē balalāma, calalāma, calalāma.
https://share.google/TKnzENl5eSe2zEnxl
https://youtu.be/w0bzCL2qfHM?si=ANHn940zduHsAMyF
यह रचना अद्वैत वेदांत के व्यवहारिक पक्ष को गायन शैली में अभिव्यक्त कर रही है।कर्तृत्वाभिमान - भोक्तृत्वाभिमान को परे रखकर, आजीविका तथा स्थान काल परिस्थिति के अनुसार कर्तव्यों का पालन करना ही मानव धर्म है। केवल पुस्तकीय जानकारी अपर्याप्त होने के साथ व्यावहारिक अनुभव और आंतरिक बुद्धिमत्ता के असंतुलन से समस्याग्रस्त होना पडता है जैसे महाभारत में अर्जुन के साथ हुआ। इस गीत के प्रतीकों में रजनीगंधा तथा जुगनू पूरी रचना को खोलते हैं। एकादश इन्द्रियों का प्रमोग हर मनुष्य करता है। यहाँ सदुपयोग की ओर संकेत है जो सबको अपने-अपने कर्तव्यों की याद दिलाता है केवल अधिकार की नहीं। देखा जाए तो अधिकतर लोग अपने अधिकार तथा औरों के कर्तव्य के प्रति अधिक सजग रहते हुए याद दिलाते रहते हैं। यहाँ गीतकार ने आत्माभ्यासी का वर्णन किया है जो अपने सभी सामाजिक कर्तव्यों को यथासंभव निभाते हुए धीरे-धीरे, दुनियादारी से अलग हो रहा है। सभी अपना सबकुछ यूँ ही छोडकर या सौंपकर जाते हैं पर वही
सब रजनीगंधा की श्रेणी में हो यह जरूरी नहीं। यह आने वाली पीढ़ियों को कर्तव्यपरायणता का दायित्व संभालने की शिक्षा देते हुए नाना तरह के लगाव-दुराव-छिपाव के अनुसार बहते न रहने की बात कह रहा है। गीत में व्यक्त मीठा दर्द - ‘पूरी रात प्रकाश से जगमगाता रहा’ (Sārārāt ālō diẏē jbalalām), व्यकि की निष्ठा (लग्न, प्रतिबद्धता) दर्शा रहा है। आत्माभ्यासी अंतर्दृष्टि से काम लेते हुए संतुलित जीवन जीता है। जुगनू का प्रकाश कम ऊष्मा पैदा करने के कारण ‘शीत प्रकाश’ कहलाता है और यहाँ इसीलिए इसका प्रयोग हुआ है ताकि प्रकाश की लगातार चकाचौंध तथा असहनीय गर्मी परेशान न करे। कर्तव्य पालन करते हुए औरों के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप, हठधर्मीता, स्वयं का महिमामंडन करना - करवाना जैसे दुर्गुण अधिक प्रकाश और उष्मा की ओर संकेत करते हैं और उसी लिए जुगनू को रखा गया। यह रचना संतुलन सिखाते हुए आध्यात्मिक पथ पर चलाती है। चार्वाक दर्शन और वेदांत का उचित मात्रा में मिश्रण हुआ है।
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गीतकार:(मजरूह सुल्तानपुरी, १९६१)
मैं हूँ झुम झुम झुम झुम झुमरू
https://youtu.be/E3_wqpUgQKQ?si=O-Po8oS4Gr0KsrWb
चार्वाक दर्शन का यह गीत उस मानसिकता का उदाहरण है जो आत्माभ्यासी के जीवन पथ पर आती हैं। ‘मैं दुनिया से बेखबर, बीती बातों पर धूल उडाता चला’- उनके अनुसार बहना तो क्या अधिक लल्लो-चप्पो और बहिर्मुखता तक नही। लक्ष्यकेन्द्रित जीवन में इधर-उधर की बातों में समय नष्ट न करने की जरुरी शिक्षा दी गई। अपने-अपने भूतकाल के अनुसार न बहने का अभ्यास करते रहना चाहिए।
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गीतकार शैलेन्द्र (सूरत और सीरत १९६२).
बहोत दिया देने वाले ने तुझको
https://youtu.be/y-cSeV61XBo?si=jWubL0Up31uWbcMR
विवेचना:-
पूरा मीमांसा (कर्ममीमांसा या धर्ममीमां) के दार्शनिक पक्ष पर आधारित यह गीत संतोष की शिक्षा दे रहा है। प्रायः कर्मकांड का लेन-देन (यह करो वह पाओ) की शैली में इस तरह प्रचार-प्रसार हुआ मानो कोई चाटुकारिता प्रिय ऊफर बैठा है इच्छाओं को पूरा करने के लिए। ऊपर से अधिकतर लोगों में असंतोष अत्यधिक रहता है। वे अपने अंदर झाँक कर नहीं देखते की वहाँ कितनी क्षमता है और उसे कैसे बढाया जाए। ऐसे लोगों को अपने अंदर छिपी शक्ति का बोध नहीं होता जीवन भर। केवल हर समय तुलना और कुढना ही ऐसों की दिनचर्या बनी जबकि सबके जीवन में, खोजने पर खुशी के पल मिलते हैं। आंतरिक खुशी ही प्रधान है बाहरी नहीं। गीत हिम्मत न हारने की सलाह देता है ‘देंगे दुःख कब तक भरम के ये चोर! / अरे ढलेगी ये रात प्यारे फिर होगी भोर / कब रोके रुकी है समय की नदिया / घबरा के यूँ गिला मत कीजे’ के माध्यम से। बात-बात पर रोने-धोने की आदत तभी बढती है जब मनुष्य उसका स्थाई समाधान साधनों में ढूढ़ता है। ‘बीत गए जैसे ये दिन रैना, बाकी भी कट जाये दुआ कीजे’- यहाँ गीत के अनुसार ‘दुआ कीजे’ का अर्थ कृतज्ञता (धन्यवाद) से है किसी प्रार्थना विशेष से नहीं।
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गीतकार प्रेम धवन, प्राइवेट सेक्रेटरी (१९६२)
जा जा रे चंदा जा रे / तेरी चाँदनी भी मेरा जियरा जलाए
https://youtu.be/kfEYItzM3F0
चाँदनी हो या कुछ और सब अन्तःकरण के अनुसार प्रभावित करते हैं। वस्तु, व्यक्ति, स्थान, इत्यादि की प्रियता व्यक्ति विशेष पर निर्भर है औरों पर नहीं।
दुनियादारी से छलनी हुवा मन ऊब जाता है ऊपरी स्नेह सत्कार से। रामचरितमानस, ४.१२.२-
‘सुर नर मुनि सबकै सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति’ यही बात चौपाई द्वारा कही गई। यह है
वेदांत की ओर ले जानेवाला गीत। प्रकृति इस तरह साधना करवाती है जिससे मनुष्य सजग हो। यह पूर्व जन्मों की कमाई दर्शाता है जहाँ पथिक ने अन्तर्मुखी
होना शुरु किया। आम तौर पर चांदनी की प्रशंसा की जाती है, लेकिन जो लोग आरामदेह जीवन से दूर या दोहरे मापदंड और संकीर्ण मानसिकता से त्रस्त हैं, उनको वही चांदनी बोझ लगती है। यह पलायनवाद नहीं, बल्कि अंतर्मुखी बनने की दिशा में उठाया गया चरण है। वेदांत दर्शन यही सिखाता है की सांसारिक मामलों में उलझें न रहें। इस गीत में बहिर्मुखी जीवन से चोट खाया हुआ व्यक्ति समाज को नहीं कोसता, प्रतिशोध में नहीं झुलसता। यह कथन, ‘कोई भी सहारा मेरा नहीं है जहान में / एक भी सितारा मेरा नहीं आसमान में / दुःख तो हजारों है / एक मेरी जान में’, बहुआयामी प्रताड़ना दर्शाई गई। अतः जो चाँदनी शितलता के लिए प्रसिद्ध है वही अंदरुनी पीडा को शांत नहीं कर पाई। अपने यहाँ ज्योतिष में मन का स्वामी चंद्रमा माना गया और पुरुष सूक्त में सांकेतिक रूप से ‘चंद्रमा मनसो जातः’ कहा गया। इसका शाब्दिक अर्थ ‘मन से चंद्रमा की उत्पत्ति’ में चंचलता, परिवर्तनशीलता तथा ज्वारभाटा (मन की दृष्टि से जीवन के उतार-चढाव) की क्षमता दर्शाई गई है। तभी रचनाकार ने उस अंतर्मुखी का चित्र प्रस्तुत किया जो मन और चंद्रमा, दोनों को संबोधित कर रहा है। साधनाकाल का अनुभव है इनमें, ‘एक मैं ही जागू जागे गम मेरे साथ में / अँखियाँ तो भर भर आई बात बात में’। गीत में सूक्ष्म रूप से अद्वैत का प्रतिपादन हुआ ‘तेरी चाँदनी’ के प्रयोग द्वारा। जैसे वे एक है वैसे ही भारतीय चिंतन पति-पत्नी को एक मानता है दो भिन्न-भिन्न ईकाई नहीं। निदिध्यासन वाली पंक्ति ‘दुनिया तो सारी सोई सपनों की रात में / एक मैं ही जागू जागे गम मेरे साथ में’ और गीतकार शैलेन्द्र की रचना ‘रात ने क्या-क्या ख्वाब दिखाए / रंग भरे सौ जाल बिछाये’ मे समानता होने के कारण विस्तृत विश्लेषण वही होगा। यहाँ इतना ही कहना है कि ‘सपनों की रात’ का प्रयोग
श्रीमद्भगवद्गीता १६.१२ के अनुसार है-
आशापाशशतैर्बद्धा: कामक्रोधपरायणा:|
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ||
अनंत कामनाओं के जाल में फँसा व्यक्ति (विवेकहीन अंधभक्त) तामसी क्रोध से प्रेरित होकर अपनी-अपनी इन्द्रियों की तृप्ति हेतु नाना प्रकार का संचय करता है। चूँकि स्थाई तृप्ति होती नहीं अतः क्रोध, हिंसात्मक प्रतिस्पर्धा, दिखावा बढते रहता है। यह स्थिति केवल गृहस्थों के साथ हो ऐस कोई सिद्धांत नहीं है।
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गीतकार: आनंद बख्शी (मेहंदी लगी मेरे हाथ,१९६२)
आपने यूँ ही दिल्लगी की थी
https://youtu.be/mejmRsXsmfU?si=54NeaDb23fkyUFQa
न्याय वैशेषिक दर्शन की झंकार सुनाने वाली इस रचना में कोरी विवेचना या मसानिया वैराग्य नहीं है। विवेकहीन विश्वास स्वयं को नहीं जाँचता और उबलता अधिक है प्रतिशोध में। उसमें भले ही किसी को जीवन दर्शन लगे वह भारतीय दर्शन नहीं। इस रचना में विवेक रुपी विवेचना है। यही छिपा गुण इसकी भारतीय दर्शन वाली पहचान पक्की करता है।
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गीतकार: प्रेम धवन (तूफान में प्यार कहां,१९६६)
इतनी बड़ी दुनिया, जहाँ इतना बड़ा मेला
https://youtu.be/jpUxagwIJZc?si=aClUfyFNcpGPfHln
केवल उदासी नहीं वेदांत दर्शन वाले गीतों में मनन, निदिध्यासन जैसी प्रक्रिया या उनके परिणाम की स्पष्ट झलक रहती है। इस गीत में मनन है जहाँ व्यक्ति स्वयं के साथ संवाद चाहता है जो ‘ऐ दिल घड़ी भर तो, मिल के करे बातें’ के माध्यम से गीत में कहा गया। जीवन की भागम-भाग में मगन व्यक्ति ऐसा सोच नहीं पाता करना दूर की बात। दुनियाँ के मेले में सब अकेले ही हैं भले ही भीड में चले या उसके साथ रहे। सही अर्थों में हम स्वयं के ही सबसे अधिक प्रिय और निकट के होते हैं। औरों के साथ निकटता, भ्रम मात्र है।
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गीतकार: गोपाल दास नीरज (मझली दीदी, १९६७)
उमरिया बिन खेवक की नैया
https://youtu.be/UNiB6MkogIY?si=Kd_K3h3lcoFevRY8
चार्वाक दर्शन वाले इस गीत में नश्वरता को दो आयामों से समझाया गया। पाल, पतवार, नाविक का योग नाव को संभाल पाता है। यह संभालना चार्वाक दर्शन के संयमित जीवन को दर्शाता है और गीत के बोल दुनियादारी में बहने वालो के लिए चेतावनी और समझदार या आत्माभ्यासी हेतु सजग रहने का संदेश। गीत में ‘राम रखैया’ का प्रयोग घटघट व्यापक राम हेतु हुवा जो संदर्भानुसार अंतर्दृष्टि या साफ मन का प्रतीक है। गीत में व्यक्त नश्वरता अवसाद या मानसिक रोग बढाने या हर समय मृत्यु भम से आक्रांत रहने के लिए नहीं वरन संयमहीन की दशा साथ-साथ समझा रहा है। गीत में पानी अनंत मानसिक वृत्तियों तथा भँवर शब्द उनमें फँसने का प्रतीक है।
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गीतकार भरत व्यास, रामराज्य (१९६७).
रैन भई सो जा रे पंछी
https://youtu.be/99ZZMhHq7xY?si=st0NDyXkR5jmAz_U
वेदान्तिक गीतों में आंतरिक समझदारी नाना तरह से समझाई गई है। इनमें वेदांत के नामपर व्याकरण तथा तर्क के बिना बातें कहीं गई। सीधे-सादे सरल शब्दों में अभिव्यक्त भाव गंभीर अभ्यासकर्ताओं के लिए सहयोगात्मक पुनरावृत्ति है। प्रस्तुत रचना अपने प्रारम्भिक ‘रैन भई सो जा रे पंछी’ से लेकर शेष में ‘तुझको कभी न आना है’ तक वेदांत को प्रमुखता से स्थान मिला है। प्रायः मानसिक बौद्धिक बोझवश नींद ठीक-ठाक नहीं आती। हर तरह की बोझिलता से त्रस्तपस्त मनुष्य को जीवन की अनिवार्य परिणति याद करवाते हुए उससे स्वयं को अलग करने को कहा गया ‘रैन भई सो जा रे पंछी’ के माध्यम से। बोझ ढोते-ढोते उमरिया बीत जाती है इसीलिए उससे अलग होने को कहा गया। वैसे तो तनाव में नींद थोडी देर के लिए आए वह शांति प्रदान नहीं करती और उसके लिए ‘रैन भई’ का प्रयोग हुआ। ‘भोर भये उड़ जाना है’- नश्वरता दर्शाने वाली इस पंक्ति में सजगता का छिपा संदेश (बौद्ध दर्शन) की याद दिलाते हुए वेदांत के निदिध्यासन हेतु उपयोगी जानकारी देता है। आवागमन हेतु कहा गया, ‘आज तो सो ले सुख की निंदिया / कल कहीं और ठिकाना है’। ‘सुख की निंदिया’- इसमें अभ्यास करने वालों को संबोधित किया गया। अभ्यास से भागने वाले खोखली और हानिकारक आशा के चलते भारवाही बनते हुए अतिमहत्वाकांक्षा पालते है। इससे प्रगति का भ्रम पैदा होता है जो आंतरिक शांति हरता है। उदाहरणतः संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) में लाखों युवाओं का जीवन उसमें सफलता पाने की आशा में नष्ट-भ्रष्ट होता है। जीवन का सृजनात्मक तथा रचनात्मक काल उसके चलते शेष होता है। युवा अपनी क्षमता के अनुसार आगे न बढकर औरों की देखा-देखी या दबाव में आकर विवेचना नहीं करता। बाहर से हृष्ट-पुष्ट दिखने वाले युवाओं में आत्महत्या तथा दिल के दौरे से मौत के मामले बढने के पीछे चाहे जितने कारण हो एक सामान्य कारण गीत में यूँ कहा गया, ‘समझ अरे जीवन की भाषा / आशा में भी छिपी निराशा / जीवन भर का रोना है और पल भर का मुसकाना है’। क्षणिक सुख या विषयानंद हेतु अपने जीवन को शेष करना अनुचित है। मानव योनी पाशविक भोगों के लिए नहीं आंतरिक समझ के लिए है। यह समझ निकम्मा नहीं वरन जीना सिखाती है। जाग्रत जगत की तुलन स्वप्निल घटनाओं से करने का चलन बौद्ध तथा वेदांत दर्शन में है। यहाँ दृश्यानुसार न बहने की शिक्षा है। ‘ये बसंत ये सुंदर कलियाँ / रंग बिरंगी ये रंगरलियाँ / अपना मन बहलाने को ये / सपना बडा सुहाना है। इस नगरी की रीत है झूठी / मीत है झूठा प्रीत है झूठी / लौट के पंछी इस नगरी में / तुझको कभी न आना है’- यहाँ नगरी शब्द मानव शरीर के लिए प्रयुक्त हुआ। अन्य योनियों की भाँति मनुष्य योनी तक भोग योनी बनकर रहती है अगर समझदारी न हो। अतः मनुष्य देह पर इठलाने की जरुरत नहीं। बसंत, कलियाँ, रंगरलियाँ जैसे प्रयोग से उन उपायों को दर्शाया गया जो क्षणिक सुख से अधिक दुःखी करते हैं।
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गुलजार, आशीर्वाद (१९६८)
जीवन से लम्बे है बन्धु / ये जीवन के रस्ते
https://youtu.be/KbhwaNm09oY?si=vGQTM_Ob0q6Nk0iW
विवेचना:-
अद्वैत या वेदांत दर्शन के गीतों की इस कडी में
उस मानसिकता पर प्रहार है जहाँ बहिर्मुखी व्यक्ति केवल कर्ता-भोक्ता भाव में बहते हुए नाना योनियों आते-जाते रहता है। अविद्या आशापाश में बाँधे रखती है। जन्म मृत्यु पड़ाव है उस जीवन पथ में जिसका लक्ष्य स्वयं को जानना तथा अनुभव करना है। बार-बार का आवागमन बतलाया गया है इस पंक्ति में- ‘राहों से राही का रिश्ता / इतने जनम पुराना’। वैदिक वाङमय का संदेश चरैवेति-चरैवेति (निरंतर चलते रहो) छिपा है ‘एक पल थम के रोना होगा / एक पल चलना हँसके’ तथा ‘मोड पे मत रुक जाना बंधु / दो राहो में फँसके’ में। ऋग्वेद की शाकल शाखा से संबंधित ऐतरेय ब्राह्मण-
चरन्वै मधु विन्दति चरन्त्स्वादुमुदुम्बरम्।
सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरन्।।
जीवन में कर्मशील (कर्तव्यपरायण) व्यक्ति प्रयत्न करते रहता है। उसे ही सफलता (मधु) मिलने की संभावना अधिक रहती है। जैसे पथिक को स्वादिष्ट गूलर (उदुम्बर- एक औषधीय और पौष्टिक फल) पाता है वैसे ही कर्मशील व्यक्ति के जीवनपथ में खुशी का समय आता है। यही चलायमानता सूर्य में है जिसमें आलस्य नही। इसीलिए वह उत्तम है। अतः आलस्य, प्रमाद, हताशा, अचानक प्राप्त खुशी, वाहवाही के चलते कर्मशीलता न छोडें।
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गीतकार इंदीवर, सफ़र (१९७०)
ज़िन्दगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र
https://youtu.be/vLpRfaRiDnk?si=Bsq_TQ1XYPOZqBGj
वेदांत दर्शन वाला यह गीत ज्ञानचक्षु खुलने के उपरांत मनःस्थिति का संक्षिप्त वर्णन कर रहा है। जीवन को समझने का खोखला दंभ व्यर्थ है। अपनी-अपनी संकुचित दृष्टि के अनुसार आधी-अधूरी समझ में झुलनेवाले, जीवन दर्शन की बात करते हुए बहुधा अविद्या में डुबे रहते हैं। प्रायः ऐसे लोग अपनी मस्ती में मस्त नहीं रहते, अंदर-बाहर के एकांत से भयभीत रहते हैं उनके लिए कहा गया, ‘ऐसे जीवन भी हैं जो जिये ही नहीं / जिनको जीने से पहले ही मौत आ गयी’। दुसरी ओर पथिक अपने एकांत को सकारात्मक रूप में लेकर उसीमें सहज, सरल, संतुष्ट रहता है। इसीके लिए कहा गया, ‘ज़िन्दगी को बहुत प्यार हमने दिया / मौत से भी मोहब्बत निभायेंगे हम / रोते रोते ज़माने में आये मगर /
हँसते हँसते ज़माने से जायेंगे हम’। यहाँ ‘हँसते हँसते’ का अभिप्राय संतोष से है जहाँ लेन-देन की कलकल नहीं, जोड-घटाव नहीं, हानि-लाभ नहीं वरन ‘ज़िन्दगी को बहुत प्यार हमने दिया’ वाली स्थिति है जहाँ देने का नही निमित्तमात्रं (श्रीमद्भगवद्गीता, ११.३३- केवल निमित्त) की छाप रहती है। देह छुटने के उपरांत कहाँ जाना, इसकी चिंता गीत में नहीं है। कहा गया, ‘जायेंगे पर किधर है किसे ये खबर / कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं’। खुले ज्ञानचक्षु वाले के जीवन में देहो देवालय (योगवासिष्ठ, देह ही मंदिर) सिद्ध होता है।
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गीतकार -शैली शैलेंद्र, मेरा नाम जोकर (१९७०)
जीना यहाँ मरना यहाँ / इसके सिवा जाना कहाँ
https://youtu.be/JNyjRLyAEso?si=gW6-mcoqrpX9XNgG
शैलेंद्र (शंकरदास केसरीलाल) ने "जीना यहाँ, मरना यहाँ, इसके सिवा जाना कहाँ" का मुख्य हिस्सा लिखा था, जो उनकी मृत्यु से ठीक पहले का है। आर्थिक और भावनात्मक परेशानियों के चलते 14 दिसंबर 1966 को निधन हुआ। उनके पुत्र शैली शैलेंद्र ने अपने पिता के अधूरे काम को पूरा किया।
विवेचना :-
स्पष्टतः चार्वाक दर्शन की गूँज है इसमें। भौतिकता से मिले मानव शरीर को संयम का पाठ इसीने पहले पहल पढाया। कल्पना के जाल जंजाल में फँसी मानसिकता अंदरूनी उत्थान की परवाह नहीं करती तथा अंधभक्ति को धर्म समझती है। प्रथम पंक्ति ‘जीना यहाँ मरना यहाँ’
इस दर्शन की याद दिलाता है क्योंकि इसी ने सर्वप्रथम जीने मरने को एक जगह रखा। सुखी जीवन सभी चाहते हैं और वह मुमकिन होता है भारहीन (बौद्धिक तथा मानसिक बोझ) रहने से। ऐसा मनुष्य स्वयं से खुश तथा संतुष्ट रहने की कला जानता है। भारवाही मनुष्य केवल हाय-हाय ही नहीं वरन् उसमें बहते रहते हुए जीवन को बोझ समझता है। अधिकतर व्यकि अपनी-अपनी समझ वश, स्वर्ग नर्क का निर्माण करते वक्त यह भूल जाते हैं कि ये दोनों यही है और उसके अपने कर्मों का परिणाम है। यह गीत चार्वाक से सीधे वेदांत पर आता है और इसकी शुरूवात होती है इनसे -
‘जग को हँसाने बहुरूपिया / रूप बदल फिर आयेगा / कल खेल में हम हो न हो / गर्दिश में तारे रहेंगे सदा’
सही में सभी बहुरूपिया हैं जो मुखौटे पर मुखौटा लगाते हैं। व्यवहारिकता के खेल में आएदिन नए खिलाडी / पात्र आते-जाते हैं। इसके चलते फूलकर कुप्पा होने की लत पर चोट की गई है। सभी को गर्दिश (दुःख दर्द) से होकर चलना पड़ता है। ‘गर्दिश में तारे रहेंगे सदा’ का प्रयोग अपनी-अपनी प्रभुता में डुबे हुए लोगों के लिए है। ऐसे लोग ईष्या, हिंसात्मक प्रतिस्पर्धा और अपना बर्चस्व कायम रखने की लालसा के चलते अंदरुनी पीडा से पीड़ित रहते हैं। साधन चाहे जितने हो वे आंतरिक सुख शांति नहीं देते। ‘जी चाहे जब हमको आवाज़ दो / हम हैं वहीं हम थे जहाँ’ - यह कथन उस पथिक हेतु प्रयुक्त हुआ जो अंतर्दृष्टि के अनुसार व्यवहार करना है। ‘ये मेरा गीत जीवन संगीत’- यहाँ ‘जीवन संगीत’ रूपी गीत की बात है केवल गीत की नही। जीवन संगीत से तात्पर्य राग-द्वेष के संतुलन से है जिसके फलस्वरूप सुरीली सरगम निकलेगी। ‘भूलोगे तुम भूलेंगे वो / पर हम तुम्हारे रहेंगे सदा’- शुद्ध मन (व्यक्ति का अपना उपाधी रहित स्वरूप) साथ नहीं छोडता (पर हम तुम्हारे रहेंगे सदा) और दुनिया साथ नहीं निभाती (भूलोगे तुम भूलेंगे वो)। सारा लगाव, दुराव, छिपाव अपने-अपने प्रयोजन पर निर्भर है। यही बात बृहदारण्यक उपनिषद में कही गई - न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति -प्रियता हेतु प्रिय नही वरन् अपने प्रयोजन हेतु सबकुछ प्रिय लगते हैं। यहाँ पलायन और निष्ठुरता की शिक्षा नहीं दी गई। कर्तव्यपरायणता की ओर संकेत है जहाँ व्यकि बंधनों के साथ-साथ नहीं बहता। चलचित्र और नाटक के पात्र अपनी-अपनी भूमिकाओं के अनुरूप नहीं बहते और नई भूमिका के अनुरुप तैयार रहते हैं। दुसरी ओर आत्माभ्यासी व्यक्ति केवल भूमिका निभाते तक जुडे रहने का अभ्यास करते-करते स्थाई आंतरिक शांति पाता है जहाँ जगत का लेशमात्र तक नहीं। इसके लिए कहीं भागने की नहीं समझदारी की जरूरत है।
यूँ तो सभी की योनियां पूरी होती है यहाँ आध्यात्मिक पथ के पथिकों की ओर संकेत है। गीतकार ने गायन शैली में नश्वरता, असंयमित जीवन शैली, जीवन की निरंतरता तथा मिथ्याभिमान में तालमेल बिठाया गया है।
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गीतकार: राजेन्द्र कृष्ण (गोपी, १९७०)
सुख के सब साथी दुःख का न कोय
https://youtu.be/oVBHO3TbVEM?si=mRfksLRt_450VNqA
रचना अद्वैत वेदांत की उस शिक्षा पर आधारित है जिसे रामचरितमानस के किष्किंधा काण्ड में इस तरह कहा गया-
उमा राम सम हत जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं॥
सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति।।
व्यवहारिकता में फँसा मनुष्य मनन से भागता हुए अपने-अपने मन की सफाई पर ध्यान नहीं देता। यहाँ मन की उपरी नहीं अंदरूनी सफाई न होने की ओर संकेत है। शुद्ध मन में राम का तात्विक बोध जल्दी होता है। मलिन मन से वह बात नहीं बनती।
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