चलती चली जाए जिन्दगी की डगर
https://youtu.be/J-PRs50lQ2E?si=oTjkEZhCbrp2sILb
'मेरा कर्तव्य मेरी मंज़िल की राहों में बिखरा पडा है। हर मोड से मुझे आवाजे देता है, अपने पास बुलाता है मुझे जाना होगा करुणा हर हाल में जाना होगा। मुझे न रोको, मैं रूक नहीं सकता, नहीं रूक सकता….राह में मेरा एक घर और हर घर में मेरी एक राह। दूर को मैं अपने करीब बुला लेता हूँ और खुद को अपनों से दूर' - गीत के पहले का यह संवाद सहायक है गीत को खोलने में। विस्तृत विवेचना हेतु ‘जीवन से लम्बे है बन्धु’ का विश्लेषण पढे-गुने।
संवाद का कथन, ‘राह में मेरा एक घर और हर घर में मेरी एक राह’ श्रीमद्भगवद्गीता २.२२- (वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।।) में नए शरीर (घर) की बात है। रिह शब्द जीवन यात्रा का प्रतीक है। यहाँ कोरा जीवन दर्शन नहीं भारतीय दर्शन है। नौ आस्तिक दर्शनों के सार को दर्शाने वाला एक और गीत जो वेदांत दर्शन तथा प्रेरणा का स्रोत है। चित्रांकन का मेल गीत के साथ है। जीवन मात्रा की अनिश्चितता (नश्वरता) याद करवाने वाली पंक्ति ‘मंजिल की उसे कुछ न खबर / फिर भी चला जाए दूर का राही’ चरैवेती चरैवेती के सिद्धात को दर्शाने के साथ-साथ, अनियंत्रित संग्रह तथा भोग-लालसा पर प्रहार है। आत्मज्ञान या आध्यात्मिक यात्रा के पथिकों का स्तर कोई अन्य तय नहीं करता। किसी को भी दूसरों के ज्ञान की प्रामाणिकता को प्रमाणित करने का अधिकार नहीं। व्यक्ति विशेष का अपना अनुभव ही एकमात्र प्रमाण है। साक्षी भाव में स्थित राही अंदर से शांत रहने का अभ्यास करता है। वह अपने भूतकाल को ढोते हुए नहीं घुमता। अधिकतर लोग नश्वरता की बात करते हुए अपने-अपने अतीत से चिपके रहते हैं। उससे संबंधित वृत्तियाँ आती हैं परेशान करने और राही (आत्माभ्यासी) उनको पनपने नहीं देता। इसी तथ्य को समझाते हुए कहा गया ‘मुड़ के न देखे कुछ भी न बोले / भेद अपने दिल का राही न खोले’। आसक्ति तभी जासक्ति है जब व्यक्ति (राही) संभल कर चले।
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गीतकार: ए ईर्शाद, दूर का राही (१९७१)
पंथी हू उस पथ का अंत नहीं जिसका
https://youtu.be/gdP3_1lU91s?si=GzMCLsY4FohOnkNq
विवेचना:-
वेदांत दर्शन का यह गीत अपने भीतर सरलतापूर्वक समझाने की शक्ति रखता है। विस्तार हेतु ‘जीवन से लम्बे है बन्धु / ये जीवन के रस्ते’ का विश्लेषण पढें-गुने।
‘आस मेरी है जिसकी दिशा, आधार मेरे मन का’- यहाँ आशा का वह आवश्यक रुप है जो आश्वस्त करता है आध्यात्मिक पथ पर चलने के लिए। इस यात्रा में अपनी प्रगति और कमियों को लेकर प्रश्न उठते हैं। जैसे-जैसे मन की सजगता बढती है वैसे-वैसे राही को राह मिलती है। ‘जाने कब तक चलना है / मुझे इस जीवन के साथ’- यह पंक्ति पलायन, पराजय, निराशा का उदाहरण नहीं, चेतना के स्तर का है जहाँ संसार से अपने प्रयोजन पूरे होने के पश्चात् व्यक्ति का जीवन, हवा सहारे उडने वाले पत्ते समान होता है। उसके मन में यह प्रश्न कभी-कभार उठता है जिसका समाधान उसीके अन्तर्मन या किसी और के द्वारा मिलता है।
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गीतकार: ए इरशाद, दूर का राही (१९७१)
जीवन से न हार जीने वाले
https://youtu.be/f0koM6MBWEQ?si=Q6slL8OJU8pTWVG_
विवेचना:-
अद्वैत वेदांत में रचा-बसा यह गीत सर्वव्यापी चेतना के स्तरों की ओर संकेत करते हुए कहता है कि ‘साथ तेरे है ऊपर वाला / वही है तेरा रखवाला’- यहाँ किसी अलग से ऊपरवाले (नामरूप या बिना उसके) की बात नहीं वरन अंदरूनी विकास या आत्माभ्यास या आत्म - जागरूकता या मनः शोधन या आध्यात्मिक पथ का वह संकेत जो चेतना के ऊपरी स्तर की बात बतला रहा है। अलग-अलग शब्दों का प्रयोग व्यक्ति की ग्रहण क्षमता हेतु हुआ क्योंकि एक ही अर्थ का बोध बहुतों को नहीं होता और वे किसी विशेष (शब्द) से ही चिपके रहते हैं। तभी ‘साथ तेरे’ जैसा प्रयोग हुआ गीत में नहीं तो प्रायः बाहर ढूढ़ने रहते हैं लोग। ‘बढ़ता चल तू लहरा कर / दुनिया के सुख दुःख को बिसरा कर’- चरैवेती का संदेश देते हुए यह गीत ‘लहरा कर’ के प्रयोग में गतिशीलता रूपी कर्तव्य समझाया गया जो हवा, नदी और समय में प्राकृतिक रूप से हैं। ‘बहती नदिया तुझको याद दिलाए / समय जो जाए कभी लौट ना आए’- सामान्य सा लगने वाला कथन अंदरूनी सजगता बनाए रखने के लिए कहा गया। ‘हर ग़म को तू अपना कर / दिल का दर्द छुपाकर बढ़ता चल / तू लहरा कर’- प्रतिशोध के भाव से अपनी पीर छिपाने की बात नहीं है यहाँ। हवा (गंध चलते) तथा नदी (गंदगी चलते) का आगे बढना नहीं रुकता उसी तरह मानव को करना चाहिए। मनोबल और आत्मविश्वास ही सबसे बड़ी शक्ति है। बाहरी परिस्थितियों से अधिक मानसिक स्थिती ठीक रखनी चाहिए। जीवन में शाब्दिक और व्यवहारिक वेदना अधिक पीड़ादायक होती है। मन-बुद्धि उसमें फँसे न रहे यही शिक्षा है इनमें। ‘दिप तो वो जो हवा में जलता जाए / खुद को जलाकर जग को राह दिखाए’- सबको कर्तृत्वाभिमान से परे रहकर कर्तव्यपरायणता का वह पाठ पढाया जो गीतोक्त कर्मयोग की ओर ले जाता है।
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गीतकार: योगेश (आनंद १९७१)
जिंदगी कैसी है यह पहेली हाय
https://youtu.be/oJU3jWx1soM?si=Be0w-pYzfQyz_YIB
जिंदगी कैसी है यह पहेली हाय - जीवन सुख-दुःख के तालमेल का नाम है जिसमें शरीर में बनने वाले नाना तरह के रासायनिक संदेशवाहक हार्मोन (Hormones) की आवश्यकता है। अतः केवल हैपी हार्मोन से जीवन मुमकिन नहीं। यही वह पहेली है जो परेशान करती है।
अद्वैत वेदांत दर्शन की ओर बढते चरण निदिध्यासन करते हुए ऐसे परिणामों का हृदयाकाश में अवलोकन करता हैं। इसके शब्दों पर ध्यान दें तभी गीत खुलेगा। ‘मन नहीं जागे’- उनका चित्रण जो अपने-अपने मन की मलिनता के आकर्षण में मगन, जीवन की सच्चाई तथा अपने स्वरूप की तरफ से मुँह घुमाए रखना ‘नहीं जागे’ में कहा गया। ‘पीछे पीछे सपनों के भागे’- सबकुछ देखते, सुनते, मानते हुए भ्रम रूपी सपनों के पीछे भागना सुहाता है। ऐसे पागलपन पर चोट करते हुए कहा गया ‘एक दिन सपनों का राही / चला जाए सपनों के आगे कहाँ’- इसका सही विश्लेषण त्रिगुणमयी पाशविक वृत्तियाँ करने नहीं देती। सावधान रहने वाले आत्माभ्यासी का उद्गार है गीत में। यहाँ चित्रांकन या पृष्ठभूमि में गुब्बारे बेचने वाला (दुनियादारी), बच्चे (लोग), गुब्बारे लेना (वेदांतिक या आत्मिक दृष्टि), गुब्बारे उडाना (बंधन मुक्त या आंतरिक समझ) का प्रतीक है। इसी समझ को श्रीमद्भगवद्गीता ६.४४ में कहा गया-
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते।।
योगभ्रष्ट अपने पूर्व संस्कारों के बल पर स्वतः आत्माभ्यास करते हुए वैदिक कर्मकाण्डों से ऊपर उठ जाते हैं। उनमें दैवी शक्ति प्राप्त करने का लोभ नहीं रहता क्योंकि सिद्धियाँ या शक्तियाँ कारण शरीर तक रोकते हुए, उससे प्राप्त परिणाम को अंतिम उपलब्धि मानने का भ्रय पैदा करवाती है। आत्माभ्यासी नामरूप के फेर से परे रहता है। इसका अर्थ उनका खंडन या तिरस्कार नहीं वरन प्रयोजन का न रहना है।
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गीतकार: आनंद बख्शी (ज़िन्दगी ज़िन्दगी १९७२)
जिन्दगी ऐ जिन्दगी तेरे हैं दो रुप
https://youtu.be/Vq3mRpWoqc4?si=cw1Cpwu4LEDR_6_m
न्याय - वैशेषिक दर्शन के इस गीत में तर्कशास्त्र, ज्ञानमीमांसा तथा वस्तुनिष्ठ यथार्थ की जाँच प्रणाली का प्रयोग हुआ द्वंद्वात्मक स्थिति, वृत्ति, भावना को समझने के लिए। इससे आंतरिक सजगता ठीक रखने में मदद मिलती है।
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गीतकार : कपिल कुमार, आविष्कार (१९७४)
हँसने की चाह ने इतना मुझे रुलाया है
https://youtu.be/E0RrCsPh8yQ?si=8ytlLmqQP-wlLzFI
वेदांत दर्शन के निदिध्यासन को दर्शाता यह गीत, आत्माभ्यासी हेतु उपयोगी है अंतर्दृष्टि खोलने के लिए।
भावनात्मक उतार-चढ़ाव में हँसना रोना सामान्य
प्रतिक्रिया है। प्रायः दबी हुई भावनाएँ अनियंत्रित हो कर प्रकट होती है हँसने रोने में। यहाँ सबके व्यवहार पर हँसने की इच्छा और उसके चलते रोना, साधना काल की स्वाभाविक घटना है। मन की ऊपरी सतह बाहरी उपचारों से भले साफ लगे, अवचेतन मन हेतु आंतरिक प्रयास अनिवार्य है। यह जब होने लगे तब उसके लिए कहा गया ‘हँसने की चाह ने इतना मुझे रुलाया है’।
यहाँ बात-बात पर हँसने रोने की बात नहीं और न किसी कोरे भावुक का चित्रण है। इन जैसे गीतों में किसी नाते को न निभाने, सारे संबंधों को तोडने, कर्तव्यों से मुँह मोड़ने जैसी अनर्गल बातें नहीं वरन उनकी आड में खेले जानेवाले नाना खेलों के दुष्परिणाम का उल्लेख है। ‘अपने छलते ही रहे रोज़ नई रागों से’- खुलकर की गई ऐसी स्वीकारोक्ति उसीसे संभव है जिसमें बोलने का साहस है नहीं तो लोग क्या कहेंगे, समाज में रहना है, रीतियाँ माननी पडती है, जैसी नाना कुंठाओं में जीवन शेष हो जाता है। इसीसे भेड चाल वाले वर्ग हेतु कहा गया ‘दिल तो उलझा ही रहा ज़िन्दगी की बातों में’। इन्हीं में से जो जगा वह ऐसों से अलग हुआ ‘कोई फिसला है अभी अभी बाहों से’। जगा हुआ कहता है ‘कोई हमदर्द नहीं। ‘दर्द मेरा साया है’ जैसा प्रयोग सचेत करने के लिए है। ‘किसी की आह पर तारों को प्यार आया है’- इसमें ‘तारों को प्यार’ प्रतीक है आध्यात्मिक आलोक का। यहाँ व्यंग्य या उपहास नहीं, समझदारी दर्शाई गई है।
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गीतकार: आनंद बख्शी (मजबूर १९७४)
आदमी जो कहता है, आदमी जो सुनता है
https://youtu.be/-ArgZa-UsAM?si=bFbM7cl8U4kgjTCV
न्याय - वैशेषिक दर्शन वाले गीत अपनी अलग पहचान के चलते सरलता से पहचाने जाते हैं। इनमें दार्शनिक दृष्टि रहती है कोरी दृष्टि नहीं। इनमें छिपे दर्शन वेदांत के विश्लेषणात्मक निदिध्यासन की ओर ले जाते हैं। ‘बहुत ज़्यादा प्यार भी अच्छा नहीं होता’- संतुलन की शिक्षा वाला कथन। गीत में यादों का वह प्रभाव है जो मनन करते हुए तसल्ली देती है भले देरी से हो क्योंकि अवचेतन मन में छिपी वे गाँठे धीरे-धीरे खुलती हैं। गीत में वर्णित दूरदर्शिता अनिवार्य रूप से होनेवाली विपत्ति को साधारण शब्दों में समझा रही है।
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गीतकार- गुलजार (आंधी फरवरी १९७५)
इस मोड़ से जाते हैं
कुछ सुस्त क़दम रस्ते कुछ तेज़ क़दम राहें
https://youtu.be/QcY89TXRaps?si=p6SuabM0qYu0xd4B
यह माना जाता था कि यह चलचित्र तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जीवन पर आधारित है, जिसके चलते इसे आपातकाल में कांग्रेस दल की सरकार ने प्रतिबंधित किया और १९७७ में जनता दल का शासन आने पर उसे हटाया गया।
विवेचना:-
यह रचना सांख्य दर्शन का उदाहरण है।
जहाँ कहीं मनुष्य ने दर्शनों की गुणवत्ता को नकारा उसके जीवन में बिखराव, सीमाहीन टकराव, घुटन, ऊब, निराशा, विच्छेद जैसी समस्याएँ हावी हो गई। ऐसे मनुष्य अति महत्वाकांक्षी तथा उसके लिए औरों की कठपुतली तक बनते हैं। इनमें से कुछ एक का अन्तर्मन कचोटता है, रोकने का प्रयास करता है, वापस उसी घरौंदे में लौट आने को हल्का सा मचलता है। चूँकि तबतक देरी हो चुकी और खाई को पाटने (भरने) का समय नहीं रहा मनुष्य केवल अफसोस करके स्वयं को समझाने का प्रयास करता है। प्रथम अनुच्छेद में जहाँ सांख्य दर्शन के समर्पण वाला भाव है वहीं बाकी पंक्तियाँ निष्पक्ष विवेचना प्रस्तुत कर रही हैं। संबंध को सामान्य बनाए रखने की इच्छा जो पैदा हुई चिंतन-मनन से जो न्याय दर्शन की देन है। ‘कुछ सुस्त क़दम रस्ते कुछ तेज़ क़दम राहें’- सुस्त कदम थकान, प्रमाद या आलस्य का द्योतक न हो कर निकट के संबंध में पनप रही दुरियाँ हैं। यहाँ एक व्यक्ति का सोचसमझकर तथा उसके साथी का उतावलेपन में चलना दर्शाया गया जिसके चलते एक पवित्र संबध शेष हो जाता है। ‘एक राह अकेली सी रुकती है न चलती है’- यह प्रमाणित करता है कि संबंध परायों की योजनानुसार छिन्न-भिन्न हुआ। जहाँ अति महत्वाकांक्षा केवल एक में पैदा हो जाए तब राह विशेष की असमंजसता की ओर संकेत है इसमें। राजनीति में निकट के तो क्या रक्त संबंध का मूल्य तभी तक है जबतक वे अपनी-अपनी महत्वाकांक्षा में बाधा न बने।
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