Monday, 30 October 2023

जाति - वर्ण पर प्रश्न

अतिवादी बन आँख मूँद कर समर्थन न विरोध पर तत्वदर्शी समालोचना जरूरी है। 

क्या वर्ण व्यवस्था केवल मनुष्यों के लिए है? 
नहीं। सृष्टि प्रबंधन में चारों वर्ण आते हैं। 

यानि पशु पक्षी आदि चारों में विभाजित हैं। इसका प्रमाण? 
सहजतम प्रमाण है आयुर्वेद जहाँ साँपों को ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शुद्र में बाँटा गया है। 

वर्ण व्यवस्था का तात्पर्य क्या था?
वर्ण व्यवस्था सबको समान अवसर देने के लिए बनी। जैसे एक विधा में कुशल व्यक्ति उसे आजीविका का माध्यम बना ले। उसे चयन समिति या समाज द्वारा स्वीकारने में जन्मना परिचय, प्रांत आदि बाधा न सहायक बने।  

 जाति क्या है? 
जिस परिवार में जन्म लिया उससे जो पारिवारिक परिचय मिला वह जातक की जाति कहलाया। 

क्या इसके फलस्वरूप कोई विशेषता या न्युनता आती है? 
परिवार विशेष में आना वैज्ञानिक प्रक्रिया है इसमें सन्तान या माता-पिता की इच्छा अनिच्छा काम नहीं आती। 

क्या ईश्वर के कारण ब्राह्मण शरीर मिलता है? 
यह सरासर गलत है। ऐसा होता तब ईश्वर भेदभावपूर्ण वाला होगा जो उसे स्वयं पसंद नहीं आएगा। 

क्या जाति वर्ण एक हैं? 
जाति वर्ण एक बिल्कुल नहीं है। 


जाति परिवर्तिन के ऐतिहासिक और भागवत के उदाहरण पाठ्यक्रम में शामिल क्यों नहीं ? 
समाज को अपने-अपने तरीके से चलाने के लिए। 

आठ तरह के ब्राह्मणों में अधिक संख्या किस श्रेणी की है? 
मात्र जो प्रथम श्रेणी है। 
     
श्रीमद्भगवतगीता १८- ४२,४३, ४४ के अनुसार :- 
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥४२॥

śamo damastapaḥ śaucaṃ kṣāntirārjavameva ca
jñānaṃ vijñānamāstikyaṃ brahmakarma svabhāvajam ।। 42।।

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥४३॥

śauryaṃ tejo dhṛtirdākṣyaṃ yuddhe cāpyapalāyanam
dānamīśvarabhāvaśca kṣātraṃ karma svabhāvajam ।। 43।। 


कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् |
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् || 44||

kṛiṣhi-gau-rakṣhya-vāṇijyaṁ vaiśhya-karma svabhāva-jam
paricharyātmakaṁ karma śhūdrasyāpi svabhāva-jam।। 44।।

इन्हें पढाने - पढने वाले अधिकतर इसका पालन नहीं करते। वैवाहिक संबंध तथा कई बार व्यवहार में जन्मना वाली अवधारणा को आगे करते हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण है वर्ण संकरता का प्रचार-प्रसार। सही अर्थों में यह होती है की नहीं इसकी विश्लेषणहीनता दक्षिणपंथी की मजबूरी है।

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स्कन्दपुराणानुसार आठ तरह - 
मात्र - जिसका जन्म मात्र उस कुल में हुआ है पर योग्यता से वंचित है। 
ब्राह्मण - जो व्यक्तिगत स्वार्थ की उपेक्षा करके वैदिक आचार का पालन करता है ।
श्रोत्रिय - जो वेद की एक शाखा को कल्प और छहो अंगों सहित पढ़कर ब्राह्मणोचित छः कर्मों में संलग्न रहता है ।
अनूचान - जो वेद-वेदांग का तत्वज्ञ, शुद्धचित्त, श्रेष्ठ, श्रोत्रिय विद्यार्थियों को पढ़ाने वाला और विद्वान् है ।
 
भ्रूण - जो अनूचान के समस्त गुणों से युक्त होकर यज्ञ 
और स्वाध्याय में संलग्न, यज्ञशिष्ट भोजन और इन्द्रियों को वश में रखता है ।

ऋषिकल्प - जो वैदिक और लौकिक विषयों का ज्ञान प्राप्त करके, मन और इन्द्रियों को वश में रखते हुए सदा आश्रम में निवास करता है । 

ऋषि - जो नैष्ठिक ब्रह्मचारी होकर नियमित भोजन करता है, जिसको किसी विषय में कोई संदेह नहीं है तथा जो शाप - वरदान में समर्थ है ।

मुनि - जो निवृत्ति मार्ग में स्थित, तत्वज्ञ, काम-क्रोधादि में न बहने वाला ध्याननिष्ठ, नए विकार न पालने वाल तथा मिटटी और सुवर्ण को समान समझने वाला ।
इस प्रकार वंश, विद्या और सदाचार से ऊँचे उठे हुए ब्राह्मण 'त्रिशुक्ल' कहलाते है । वे ही यज्ञ आदि में पूजे जाते है ।

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