भाष्यकार ने सीधे वेद पर क्यों नहीं लिखा?
प्रायः यह प्रश्न पूछा जाता है कि आदि शंकराचार्य जी ने प्रस्थान त्रयी (ब्रह्मसूत्र, उपनिषद, श्रीमद्भगवतगीता) पर भाष्य लिखा पर सीधे-सीधे वेद पर नहीं लिखा। जबकि वेद को इस तरह महिमामंडित किया गया है मानो उसके बिना मनुष्य का उद्धार असंभव है। दूसरी ओर क्या उपनिषद सबके लिए है? क्या उनम केवल आत्म ज्ञान का उपदेश है?
वेद के नाम से जो पुस्तक प्रकाशित हुई उसे पढा या न पढा, दोनों समान है। उसे पढने पढाने का खोखला अभिमान न पाले कोई और यह न सोचकर कोई इतराए की उसे पढने की जरूरत नहीं। इसकी आड में शोषण-दमन करने वालों पर कहा गया मानस में :- बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं॥
कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी॥
आजीविका या यश कमाने या समाज को वश में करने के लिए वेद को बेचने वाले पाशव (पाशविक स्वभाव) औरों के पाप सबको बतलाते रहते हैं। ऐसे कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी (अपना अवांछित अनैतिक अनाधिकार वाला लाभ न होने पर आया तामसी या राक्षसी क्रोध) सही में वेद का अवमूल्यन करने वाले और विश्व विरोधी हैं। यह कठोर टिप्पणी वेद की अपनी सुविधानुसार परिभाषा और अनुक्रमणिका तैयार करने वालों पर प्रहार है। ऐसे लोग गोस्वामी तुलसीदास जी के समय भी थे।
वेद विद् धातु से बना शब्द है जिसका प्रधान अर्थ है जानकारी जो अनुभव पश्चात व्यक्ति विशेष के लिए ग्यान कहलाती है। अनुभव बिना उसे ज्ञान कहें पर वह जानकारी है क्योंकि उसे केवल माना पर अनुभवहीन रहा या जाना नहीं। ज्ञ वर्ण ज + ञ से बना जो जानने की बात कहता है सीधे-सीधे ग्यान की नहीं। वैदिक वाङमय का संपादन महर्षि व्यास ने किया और उन्हें वेदव्यास भी कहा जाता है। यह एक व्यक्ति का नाम था या विद्वानों के समूह का या किसी संस्था का जो इस कार्य के बनी थी वह अलग विषय है। छन्द के आधार पर वेद तीन और सामग्री के आधार पर चार हैं। अथर्वेद को बाद में नहीं जोड़ा गया और उसके तो क्षात्र वेद (राजधर्म पर अधिक मन्त्र), ब्रह्म वेद (ब्रह्म नामक ऋषि के चलते जो ४०० से अधिक मन्त्रों के द्रष्टा थे), भिष्ज या भिष्ग वेद (जल एवं सूर्य किरण चिकित्सा इसीमें है), तीन नाम और भी हैं। इसमें तन्त्र मन्त्र की अवधारणा अधिक होने के कारण इसे पृथक कर दिया गया। जहाँ कहीं भी त्रयी विद्या का उल्लेख है वहाँ छन्द के अनुसार बात कही गयी है। अतः यह पुस्तक मात्र नहीं और न कोई आदेश जिसे मानना अनिवार्य है। अब जानकारी किसी भी विषय की हो सकता है। भले ही कुछ विषय किसी-किसी को पसंद न आए तब इसका मतलब यह नहीं कि वह ज्ञान ही नहीं। एक तो उसमें केवल जानकारी ऊपर से अधूरी तब वह किसी काम की नहीं।
जैसे प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से जन्मना वर्ण व्यवस्था मानने वालों ने अपने-अपने प्रायोजकों सहित मिलकर इसे पुस्तक रुपेण प्रचारित करवाया और बाहर से समाज सुधारक बनने का दिखावा किया जैसे जनेऊ आदि पर सबको अधिकार देना इत्यादि।
दो एक संस्थाएँ जन्मना वर्ण व्यवस्था का विरोध करती
हैपर शिखा सूत्र संध्या आदि की उपनिषद वाली परिभाषा नहीं बताती। और तो और अतिरंजित तरीके से पुस्तकों को महिमामंडित किया। कईयों ने अपने-अपने यहाँ उसे शीशे के ढाँचें में रख ऊपर से 'वेद भगवान' लिखवा प्रदर्शित किया। इस आग को मध्ययुगीन संप्रदायों ने आहूतियाँ देकर भड़काया। 'नास्तिकों वेद निनादकः (मनुस्मृति २.११) जैसी अनर्गल बातें सामने आई ताकि नौ आस्तिक दर्शनों की अन्दरूनी एकता दिखाई न दे और समाज उनकी उपयोगिता से वंचित रहे। देख जाए तो उपलब्ध मनुस्मृति के सारे संस्करण बाद में बने अतः ऐसी पंक्तियाँ लिखने में संकोच नहीं हुआ।
ज्ञान प्रस्फुटित होता है उन मनीषियों के ह्रदयाकाश या मानस पटल पर जिन्हें हम मन्त्र द्रष्टा ऋषी कहते हैं। समष्टि योजना में आवश्यकतानुसार वे धरा पर आते हैं। इनकी तुलना आविष्कारकों से कर तो सकते हैं पर स्तर दोनों का पूरा एक नहीं है। जिन आविष्कारों का खंडन नहीं हो सकता और वे जो जस के तस रहते हैं जैसे आग, चक्का, विज्ञान के वे सिद्धांत जो एक जैसे रहते हैं उनके आविष्कारको की तुलना मन्त्र द्रष्टा ऋषि से कर सकते हैं। उपभोक्ता प्रधान वस्तुएँ तकनीकी बदलाव पर निर्भर है। उसकी खोज करनेवाले वैज्ञानिक हैं मन्त्रद्रष्टा नहीं। बारुद का आविष्कार अल्फ्रेड नोबल ने स्वीडन में किया। यह ऋषि स्तरीय उदाहरण है। संक्षेप में समझें तब वह सिद्धांत जो सदा एक जैसे रहे। बारुद का मूल उपयोग आजतक वही है जो पहले था। कम से कम वह खाने या खाद बनाने या निर्माण में काम नहीं आ सकती।
सुनियोजित षड्यंत्र के चलते वेद को अतिरंजित तरीके से महिमामंडित किया गया संप्रदायों तथा संस्थाओं द्वारा। उसके लिए जरूरी था कि उसे इस भाँति प्रकाशित करें ताकि वे उपनिषद न आएं जिनसे धर्म दुकानदारी पर चोट पहुँचती है। एक वर्ग ने शोषण-दमन किया वेद के नामपर दूसरा आया सुधारक बन पर उनमे से अधिकतर लोगों ने तथ्यों को सामने नहीं रख, खुद को रखा मानो वे अपनी तरफ से कर रहे हैं भला जैसे सबको जनेऊ देना आदि। श्रीमद्भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय में बताए गए यज्ञों को न बताकर हवन रुपी कर्मकांड को महिमामंडित कर दिया। आजीविका के नामपर सब किया गया जिससे स्वाभिमान नहीं बढा। क्या कर्मकांड का अधिकार ही एकमात्र प्राप्ति है। समान अधिकार की आड में 'वेद' का भला नहीं हो रहा। वृहत समाज आत्मिक दृष्टि या आत्मज्ञान से दूर हो गया और उसके नाम पर ढोंग चल पडा। जो लोग हर तरह के आविष्कार का श्रेय वेद को देते हैं वे दो चार चीजें भी नहीं बनाकर दिखा पाए जो वेद पर आधारित हैं ।
कुछ अनर्गल बातें :-
१. सबसे पुराना ऋग्वेद और नया अथर्ववेद है जिसे वेद की मान्यता बाथ में मिली - - चारों नाम उपनिषदों में है तथा कई जगह अलग - अलग उपनिषदों के दो चार मन्त्र एक ही है।
२. उपनिषदों में कहानियां और ऐसे नाम आते हैं जो ऐतिहासिक है - एक तरफ श्रुति को माँ कहना और दूसरी ओर यह आशा करना की वह संतान विशेष की इच्छानुसार सारे कार्य करे। यहाँ श्रुति शब्द सुनना या श्रवण करना है। पहले सुनने का चलन था इसीलिए श्रुत और वेद रुपी जनकारी को श्रुति।
३, चतुर्थ वर्ण तथा नारियों को वेद के पठन-पाठन और श्रवण तक का अधिकारी नहीं - सरासर गलत। इन्हें दूर रखा गया मानो इनके चलते वेद अपवित्र हो जाएंगे। वर्ण व्यवस्था गुण कर्म पर आधारित है जन्मना पर नहीं। कहीं कोई पंक्ति दिखे दूसरी बात करने वाली तो जाँचना चाहिए शोर मचाने के बदले। जब चारों वर्ण मनुष्य को छोड औरों में पाए जाते हैं तब आधार जन्मना नहीं होगा। इसको पढने या सुनने से वंचित रखना कदापि उचित नहीं। यूँ कर दिया गया मानो न जाने इसमें ऎसा क्या अनोखा है जिसपर सबका अधिकार नहीं।
४, शिखा सूत्र चतुर्थ वर्ण के लिए नहीं और वेदाध्ययन हेतु वह जरुरी है - उपनिषद साहित्य में शिखा सूत्र (जनेऊ), संध्या, अष्टांग योग की परिभाषा समाज के सामने नहीं रखी गई। दो एक जगह पूछने पर उत्तर मिला - 'यह सिद्धों के लिए है जनता के लिए नहीं' - - वाह क्या दुकानदारों है। ज्ञानमयी शिखा को असली शिखा मानता है उपनिषद बालों के गुच्छे को नहीं। चैनल में प्लेलिस्ट है वेद पर - - उसे तनिक सुनें।
५. नारी वर्ग गायत्री मंत्र नहीं जप सकता - - क्योकि अगर गायत्री छन्द पर आधारित पंक्ति जिसे गायत्री मंत्र कहते हैं, का जाप करले तब वह माँ नहीं बन सकती। देखा जाए तो इस प्रक्रिया में पुरुष पहले आता है क्योंकि वीर्य उत्पन्न उसके शरीर में होता है। केवल बाकी उपकरण न होने के कारण नारी की आवश्यकता होती है। वे उसके शरीर में होते हैं। प्रश्नोंपनिषद में इसीका उल्लेख है। यह सांकेतिक शैली के द्वारा उपरोक्त तथ्य समझाया गया है। गायत्री जप से पुरुष सुरक्षित रहता है तो नारी क्यों नहीं रह सकती।
६. वेद में केवल शाकाहार तथा गौ दूथ की प्रशंसा है - - अष्टका श्राद्ध, सौत्रामणी यज्ञ जैसे कई कर्मकांडों में चुनिन्दा पशुओं की बलि देकर प्रसाद रूप में ग्रहण का विधान है राजवंश और क्षत्रियों के लिए। भागवत तक में कथा मिलती है जिसके अर्थ को कईयों ने घुमा दिया है। भागवत वाली प्लेलिस्ट में ३ - ९ स्कंध वाला वीडियो सुनें।
दूध के मामले में हाल यह है कि कथाकार नहीं बतलाते की कृष्ण गायों के साथ भैंस और बकरी चराया करते थे। चरवाहों के समाज में यह साधारण बात है। भेड बकरी का उल्लेख उपनिषद में है किसानों से संबंधित उपासना में - छान्दोग्य उपनिषद। भैंस का दूध और उससे बना घी क्षत्रियों तथा कठिन शारीरिक श्रम करने वालों के लिए उत्तम है। इन दो के लिए मांसाहार की छूट है। इसका चरित्र या तामसी स्वभाव से संबंध नहीं। अन्य आहार लेनेवाले चरित्रहीन निर्दयी कालाबाजारी विश्वासघाती आदि होते ही हैं। अपनी-अपनी हठधर्मिता वश इस विषय पर लोग एक तरफा विश्लेषण करते हैं। संस्कृत व्याकरण के लचीलेपन के चलते शब्दार्थ पलटना उचित नहीं।
७. वेद अपौरुषेय हैं - -
वेद को अपौरुषेय कहने के पीछे यही नियम है कि जो वस्तु जैसी है उसे वैसा ही समझना। सुपारी को सुपारी समझना अपौरुषेय ज्ञान है और गणेश समझना पौरुषेय या प्रयोजन हेतु पुरुष रचित ज्ञान। समाज में प्रचलित परिभाषा, की जिसका रचयिता कोई नहीं वह ज्ञान अपौरुषेय है, एक सोची समझी कूटनीति का फल है। इसके पीछे भौतिक सुखों की अदम्य लालसा काम कर रही थी।
८. वेद भौतिकवाद से ओतप्रोत - - -
चारों वेद में भौतिक सुखों की लालसा से ओतप्रोत प्रार्थनाएं हैं यानी येन-केन-प्रकारेण वही हाय- हाय। यहां तक कि शत्रु को सपरिवार मारने कि विनती की गई है। उपासना के नामपर लेन देन वाली भक्ति को महिमामंडित किया गया है। जैसे - हम यह आहुति दे
रहे हैं आप वह काम कर दें या फला काम करने के लिए यह आहुति दी जा रही है। देह निर्वाह हेतु रोजी-रोटी का साधन सबको चाहिए, परिश्रम से अधिक या उसके बराबर प्रार्थना करना उचित काम हो सकता है,उसके लिए हवनादि करना भी उचित हो सकता है पर उसके उपरांत यह कहना कि भारतीय संस्कृति भौतिकवाद से परे है यह उचित नहीं। इसी आधार पर चार्वाक को मौजमस्ती, सुखवादी, जडवादी, भौतिकवादी दर्शन कहकर उसका खंडन किया गया। जबकि लक्ष्मी पूजन, श्रीयंत्र अराधना आदि से लेकर अर्गला स्तोत्र, रुद्रं, जैसे सैकडों स्तोत्र भोतिकता का खुलकर समर्थन करते हैं। अनियंत्रित कामनाओं का अंबार का समर्थन चार्वाक दर्शन तक ने नहीं किया जबकि स्तोत्र उनसे भरे हुए हैं। पूरा-पूरा कर्मकांड वाला भाग भौतिकता के लिए है।
इसका सदुपयोग - दुरुपयोग दूसरा विषय है। यह अध्यात्म को साथ लिए चलती है यह और बात है।
आवश्यकता न्यूनाधिक हो सकती है पर उससे परे कोई नहीं। सनातन या वैदिक धर्म के नाम पर इसकी निंदा नहीं करनी चाहिए। केवल वर्तमान युग ही अर्थ प्रधान नहीं, यह तो पहले से ही परम्परा चली आ रही है। राम जी द्वारा अपने समय का जो चित्र खींचा गया था उसका प्रमाण योगवशिष्ठ में है। प्रश्नों के माध्यम से जो समस्याएं उठाई गई वे आज भी जीवित हैं। इसपर चर्चा कभी और की जाएगी आज हम वेद के सार पर ध्यान देते हैं। 'वेदांतो नाम उपनिषद् स प्रमाण' - यानी वेद का सार है उपनिषद्, कोई कोई वेदांत का अर्थ वेद के अंतिम अध्याय से लगाते हैं, यह उचित नहीं है क्योंकि दर्जनों उपनिषद् अलग अलग जगहों पर हैं । यह दुर्भाग्य ही है कि इस पर ध्यान नहीं दिया गया । वेद के रूप में जो भी प्रकाशित सामग्री है उनमें उनमें केवल ईशावास्योपनिषद् को संहिता का भाग बताकर रखना और बाकियों को अलग कर देना उचित नहीं है । कुछ विद्वानों का कहना है कि अन्य उपनिषदों में इतिहास या कथा का समावेश है अतः वे साथ में प्रकाशित नहीं हो सकते। अगर वेद को प्रभु कि मुर्ति या ज्ञान की मुर्ति सही में मानते हैं तब प्रभु को इतना अधिकार होना ही चाहिए कि वह किन - किन तरीकों से अपनी बात समझाए ।
उपनिषद् यानी समीप बैठकर उपयोगी बातों का श्रवण करना। वे आवश्यकता के अनुसार बतलाई जाती हैं। अगर हम वेद को प्रभु का रूप मानते हैं तब उन्हें इतना अधिकार होना चाहिए कि वे योग्यतानुसार समझाएं। कहीं क्लिष्ट तो कहीं कथात्मक शैली में एक ही बात समझाई जा रही है। कुछ स्थानों या व्यक्तियों के नाम आ जाने मात्र से इतिहास का अंग नहीँ बन जाती। पूरा साहित्य अलग- अलग काल खंड में लिखा गया है। आपसी तालमेल या संगति हेतु सूत्र दिए गए हैं जिनके आधार पर जांचने का अधिकार दिया गया है। उससे यह प्रमाणित हो जाता है कि किसी ग्रन्थ का भाग या पूरा ग्रन्थ ही वैदिक साहित्य का भाग है या नहीँ है।
कुछ विद्वानों के अनुसार ब्रह्मसुत्र में दिए गए उपनिषद् ही प्राचीन है या आदि शंकराचार्य जी ने जिनपर भाष्य लिखा वे ही ग्रहणीय हैं। यहां यह बतलाना आवश्यक है कि उनके अन्य ग्रन्थ भी उपनिषदों पर ही आधारित हैं। भले ही कुछ एक मे कई उपनिषदों का सार हो पर हैं उपनिषद् ही आधार। जैसे शारीरकोपनिषद है आधार तत्व बोध का, तेजोबिन्दूपनिषद् आधार है अपरोक्षानुभूति, आदि। जिनपर भाष्य है वे ही कहाँ ठीक से समझाए जाते हैं ? विशेषतः छान्दोंग्य में छ प्रकार की गायत्री के विषय में नहीं बतलाया जाता समाज को और केवल कक्षा तक बात सिमट कर रह जाती है । वृहदारण्यक में गायत्री के चार पाद की जानकारी भी कक्षा के अन्दर ही रहती है। क्यों पौराणिक रूप प्रचारित किया गया? इसकी जानकारी हेतु Gayatri - In the eyes of Upanishads वाला पोस्ट देख लें । akshaygroundreality.blogspot.com
उपनिषदों का ज्ञान सबके अन्दर है और उसकी अनुभूति होती है विवेक के द्वारा जिसका प्रयोग कोई भी कर सकता है। जरूरत केवल उसके प्रयोग की है।
इन जैसे कुछ अवहेलित उपनिषदों को तनिक देखा जाए ताकि उनसे हम जैसे मूढ मति भी कुछ सीख सकें।
तेजोबिन्दूपनिषद् के खास बिन्दु :
१ संपूर्ण जगत ब्रह्ममय है ,इस निश्चय के उपरांत इन्द्रियों को वश में रखना ही यम है।
२ अपने स्वरूप में स्थित हो कर संसाराकार वृत्तियों में न बहना ही नियम है।
३. चैतन्य तत्व का साक्षात्कार (अनुभव ) करने के बाद नाम रूप प्रपंच का त्याग ही असली त्याग है।
४ स्वरूपस्थ साधक अन्दर से मौन तथा एकांत में रहता है और उसे ही अंगों की समता सिद्ध होती है। (हम बहुधा बाहर से रहने का दिखावा करते हैं और भ्रम पालते हैं कि अन्दर भी शान्ति है या केवल वाणी के मौन को मौन मानते हुए बाकी अंगों के साथ आराम से व्यवहार करते हैं या निष्क्रिय रहने को समता मानते हैं)
५ आनन्द स्वरूप ब्रह्म ही काल है और जगत का अधिष्ठान न होते हुए भी अधिष्ठान वत् दिखना ही आसन है।
६. द्रष्टा , दर्शन और द्दश्य के भेद का अभाव ही द्दष्टि है केवल नासिका के अग्रभाग को देखते रहना द्दष्टि नहीं है ।
७. सर्व पदार्थों में ब्रह्म भावना और इन्द्रिय जनित वृत्तियों को रोकना ही प्राणायाम है। प्रपंच के मिथ्यात्व का निश्चय ही रेचक है। सर्वत्र एक ब्रह्म है , यह वृत्ति पूरक प्राणायाम है। चलायमानता से रहित वृत्ति कुंभक है ।
८. चेतन तत्व में चित्त लगाना ही प्रत्याहार है।
९. जहाँ -जहाँ मन जाए वहाँ -वहाँ ब्रह्म का बोध होना ही धारणा है।
१०. समस्त विषयों से वैराग्य अंकुरित होने पर ध्यान की अवस्था शुरू होती है । जब इसमें दृढता आती है तब वह स्थिति समाधि कहलाती है ।
ब्रह्मबिन्दूपनिषद् के रोचक बिन्दु :
१. विषयासक्त मन बंधन और विषयों के आधीन न रहने वाला मन मुक्त है।
२. विषयों के संकल्प से दूर रहने पर ही मन का लय होता है । यही ज्ञान है, बाकि जो कुछ है वह ग्रन्थ का विस्तार मात्र है ।
३. मेधावी व्यक्ति ग्रन्थ के सार को ग्रहण करने के बाद पूरे ग्रन्थ को त्याग दे जैसे धान्य चाहने वाला अन्न लेकर पुआल को खलिहान में छोड देता है ।
४. असली ज्ञान बाहरी वेषभूषा पर निर्भर नहीं है ।
पैंगलोपनिषद् के रोचक बिन्दु :
१. अत्यंत चंचल जीवन में चेतन तत्व को जान लेना चाहिए और शास्त्रों के जाल का त्याग कर उस तत्व पर टीके रहने का अभ्यास करना चाहिए ।
२. आत्मज्ञान पश्चात वेद पढने से कोई लाभ नहीं । यानि वेद का उद्देश्य स्वरूपानुसंधान करवाना ही है ।
अब हम ब्रह्मसूत्र के भाष्य में लिखित उस पक्ष के अनुसार उपनिषदों को देखेंगे जहाँ बाहरी तामझाम का संबंध केवल शरीर से माना है । उनका रिश्ता आत्म ज्ञान से नहीं है । ज्ञान उनपर निर्भर नहीं है । जिनको ज्ञान की लालसा है उनके लिए यह जानना जरूरी है । सर्वसाधारण हेतु भी यह जानकारी जरूरी है क्योंकि बाहरी तामझाम के चलते समाज लहुलुहान हो चुका है ।
परब्रह्मोपनिषद् के कुछ रोचक बिन्दु :
१. जैसे धागा मोतियों में पिरोया हुआ रहता है वैसे ही यह नाम रूपात्मक प्रपंच में ब्रह्म । उस ब्रह्म रूप धागे को धारण करने वाला योगी ही ब्राह्मण है, यति है। (यह कोई विरोधाभास नहीं है पूरा वैदिक वाङमय इसी के पक्ष में है)।
२. बुद्धिमान बाहरी शिखा सूत्र के बदले ब्रह्म रूप सूत्र को धारण करे।
३. ज्ञानमयी शिखा परम पवित्र है और वही शिखा है। अग्नि की ज्वालारुप शिखा अग्नि से भिन्न नहीं है । अग्नि को अलग से जलाने की जरूरत नहीं है वैसे ही अलग से केश धारण करने जरूरत नहीं है।
उपरोक्त तथ्य नारदपरिव्राजकोपनिषद् उपदेश ३,मन्त्र ७७,७९ में भी है ।
परमहंसोपनिषद् के रोचक बिन्दु :
१. आत्मा - परमात्मा में कल्पित भेद को भंग करना ही संध्या है। यही हमारी शिखा और यज्ञोपवीत है ।
२. सर्व लौकिक कामनाओं का परित्याग करके अद्वैत में स्थित होना तथा आत्मज्ञान रूपी दण्ड को धारण करने वाला ही दण्डी कहलाता है ।
२. इससे रहित केवल काठ के दण्ड को धारण करने वाला पेट हेतु वेष बनाता है ।
मैत्रेय्युपनिषद् के कुछ बिन्दु :
१. केवल कर्मों के त्याग का नाम या बाहरी विधि से लिए गए सन्यास का नाम सन्यास नहीं है । जीव- ब्रह्म के मध्य जो सन्धि है उसके अभाव रूपी अभेद ज्ञान को ही सन्यास कहा है।
२. मोह रूपी माता की मृत्यु तथा ज्ञान रूपी सन्तान उत्पन्न होने से दो प्रकार का सूतक लगा है। हम किस प्रकार से संध्या उपासना करें ।
३. हृदयाकाश में चैतन्य रूपी सूर्य उदय हुआ है । सर्वदा एक जैसा प्रकाश रहता है । हम किस प्रकार संध्या उपासना करें ।
४. तत्वचिन्तन उत्तम, शास्त्र चिन्तन या अध्ययन जिसमें केवल शुष्क बौद्धिकता या कोरा तर्क हो वह मध्यम, मन्त्र चिन्तन या जप अधम और तीर्थाटन अधमाधम है। मन का विषय के साथ न बहना ही ज्ञान है और यही मोक्ष है । वह कोई अलग से प्राप्त होने वाली वस्तु या स्थिति नहीं है । शास्त्रों का प्रयोजन अविद्या या उपाधि प्रेम पर चोट करना है और इतना ही समझना है, बाकी ग्रन्थ का विस्तार है और उसमें क्या उलझना ?
ऐसी काम लायक बात समाज से छुपा लेना बौद्धिक आतंकवाद दर्शाता है। अगर यह सोच लें कि यह तथ्य आम जनों के लिए नहीं है तो वह एकतरह का आतंक ही है जो केवल अपनी दाल गलाने के चक्कर में है। समाज और संसाधनों पर अपनी पकड़ बनाय रखने की चाल है।
श्रीजाबालादर्शनोपनिषद् (कहीं - कहीं इसका नाम संन्यासोपनिषद भी है) के कुछ बिन्दु :
१. आत्म रूपी तीर्थ को छोड़कर बाहर के तीर्थों का सेवन वैसा ही है जैसे हाथ में प्राप्त महारत्न का त्याग करके कॉच की तलाश ।
२. सब तीर्थों में जल(यानि लगभग एक जैसी चीजें ) तथा देव प्रतिमा काष्ठ तथा पाषाण से निर्मित हैं । (भगवान् को अन्दर न खोजकर बाहर खोजना एक अन्तहीन खोज है) ।
जो पार करदे वही तीर्थ है। नदी पार करने के लिए नाव तीर्थ है। दसियों स्थलों को अर्थ शास्त्र की दृष्टि से तीर्थ रूप में प्रचलित किया गया है। इसमें कोई दोष नहीं है क्योंकि यूँ तो लोग आएगें नहीं और धर्म के नाम पर आ जाएंगे । पर इसके चलते वहाँ की जमीन के दाम या अन्य वस्तुओं के मुल्य काफी बढ़ गए । यह कलियुग की देन नहीं है । रामजी के जमाने से यही होता आया है किसी न किसी रूप में । तीर्थ वास की ललक ने धार्मिक स्थलों का व्यवसायीकरण कर दिया है।
३. आत्मन्यग्नीन् समारोप्य सोsग्निहोत्री महायति । प्रपञ्चमखिलं यस्तु ज्ञानाग्नौ जुहुयाद्यति ।।
आत्मा रूपी अग्नि के समीप रहने वाला ही अग्निहोत्री है और उसने ज्ञानाग्नि या उपाधि रहित आत्मज्ञान में प्रपंच की आहूति दे दी है।
इन उदाहरणों से यह स्पष्ट हो गया कि उपनिषदों में खजाने की कमी नहीं है । कमी उस भावना में है जो वैदिक साहित्य के नाम पर केवल अपनी दाल गलाना जानते हैं । अगर आदि शंकराचार्य के काल को ही इस मामले में प्रमाण मानें तो इन उदाहरणों के द्वारा भी इन उपनिषदों की प्राचीनता प्रमाणित होती है । उनके प्रकरण ग्रन्थ इन्हीं पर आधारित हैं। इस स्वस्थ सार्थक संवाद द्वारा यह समझ में आ गया की मोतिकता की प्रचुरता ने आदि शंकराचार्य जी को वेद पर सीधे-सीधे लिखने से रोक लिया।
Absolutely fantastic article swami ji.
ReplyDeleteNeed some points from Bahvricha Upanishad..
ReplyDeleteहिरेन जी आपकी इच्छा अवश्य पूरी हो सकती है। संसाधनों की व्यवस्था होते ही काम आगे हो पाएगा।
DeleteHiren ji, sorry for delay.
Deleteबह्वृचोपनिषद - ऋग्वेद के अन्तर्गत है। इसे शाक्त उपनिषद के विभाग में रखा गया है। इसमें चिन्मय सत्ता को नामरूपात्मक आवरण के द्वारा समझाया गया है। इसमें अनोखा या नया कुछ नहीं है। चीज एक ही है बस ग्रहण क्षमता के अनुसार श्रुति साधक को राह दिखला रही हैं।