(धन्यवाद देते हैं राजस्थान के आचार्य अजय पुंडीर को जो सत्संग के माध्यम से नाना प्रसंग उठाते हैं। उनको कहीं यह विवेचना पढने सुनने को नहीं मिली जो पाँच स्थान देनै का विश्लेषणात्मक उत्तर दे)
राजा परीक्षित ने कलियुग को पाँच स्थान रहने के लिए दिए - जुआ, मद्य, नारी संग, हिंसा तथा सोना। पाँचो स्थान हर समय थै, है, रहेंगे क्योंकि इनमें सभी मनुष्यों का पूरा जीवन समाया हुआ है। इससे यही प्रमाणित हुआ कि कलयुग कहाँ नहीं है। तब विकल्प क्या है बचने का - - अन्दरूनी अनुसन्धान या इच्छाओं के संग न बहना या अपने स्वरुप में स्थित रहना ही कलयुग से बचना है। यह कठिन है असंभव नहीं।
चूँकि शब्दार्थ से बात समझ में नहीं आएगी अतः लक्ष्यार्थ जानना जरूरी है। पहले कलियुग की परिभाषा देखे। चारों युग न्यूनाधिक रुप में हर समय और हर जगह रहते हैं। जहाँ कलह, क्लेश, हिंसात्मक प्रतिस्पर्धा का बोलबाला हो वहाँ कलियूग है।
जुआ / द्युत :- चौसर या चोपड समय व्यतीत करने वाला खेल है जो बिसात, गोटियाँ और पासे या कौडी से खेला जाता है। यह खेल धन, वस्तु, व्यक्ति को दाँव पर लगाने से जुआ कहलाता है और तब इसमे छल कपट प्रधान होता है। पासा या कौडी फेंकने में चतुराई दोनों में जरुरी है। पर उनकी बनावट में अन्दरूनी फेरबदल छल है।
जीवन चौसर, इन्द्रियाँ गोटियाँ और व्यवहार पासा है। सोच समझकर व्यवहार करना उचित है पर समाज को बाँटना, मन मुटाव बढवाना, अपनी अतृप्त एषणा की पूर्ति हेतु औरों के साथ घृणित व्यवहार जुआ है जो नाना तरीकों से होता है। जैसे शास्त्रों के नामपर छल - मनमानी व्याख्या, तथ्यों को छिपाना, भागवत के नामपर श्रृंगारिकता तथा इधर-उधर की बातें, अप्रामाणिक बातों का प्रचार-प्रसार, पौराणिक प्रसंगों को बिना जाँचे और संगति लगाए बोलना, प्याज लहसुन के नामपर धार्मिक राजनीति, शिखा सूत्र की उपनिषद वाली परिभाषा न बताना, आदि जुआ ही है।
भारतीय समाज में मुफ्तखोरी के प्रति आकर्षण अधिक है। कई आध्यात्मिक संस्थाएँ और राजनीतिक दल इसके माध्यम से कट्टर समर्थकों की संख्या बढाते हैं। लोगों को आजीविका के बदले मुफ्तखोरी की लत में डुबाए रखना चाहते हैं। (१)
जीवन के हर क्षेत्र में जुआ खेला जाता है। यह और बात है कि अधिकतर लोग समझ नहीं पाते या बहती नदी में डुबकी लगाने के फेर में रहते हैं। तभी समस्याओं के प्रति जागरूकता स्वयं को चर्चित कराने, समर्थकों की भीड जुटाने तथा आभासिय दुनिया के मंचों (सोशल नेटवर्किंग साइट्स) पर पसंद (लाइक), सदस्यता (सब्सक्राइब) तथा सहयोग (सपोर्ट) के लिए कहते रहते हैं। इसीलिए ऐसे जागरुक सतही चिन्तन को सबकुछ समझतै हैं।
मद्य - सुरा, शराब का लक्ष्यार्थ है नशा और वह आयु, पद, दैहिक बल, धनबल, जनबल, पहुँच, योग्यता आदि का होता है। यह आज नहीं तो कल जीवन को नष्ट करता है। अल्कोहॉल (शराब) का उपयोग सैकडों दवाओं में होता है यानी यह स्वयं में बुरी नहीं। इसका दुरुपयोग मानवीय मूल्यों को नष्ट करने लगता है। यह वैसा ही है जैसे धन स्वयं में अच्छा है और लक्ष्मी के नाना रूपों में सम्मानित होता है। इसका नशा जब सिर पर सवार होने लगे तब विवेक नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है। ऐसी स्थिति हर तरह के नशे के साथ होती है जहाँ येन केन प्रकारेण जीतने की ललक या अपनी श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए औरों को मारने तक में संकोच नहीं होता। ऊपर से ऐसे हजारों उदाहरण मिलते हैं जहाँ व्यक्ति अपनी आजीविका के क्षेत्र में किसी अन्य को आगे बढने नहीं देता। उसके द्वारा नष्ट करवाई प्रतिभाओं पर कोई नहीं रोता। यहाँ तक कि पैसेवालै अपने गरीब रिश्तेदार को मन से पसंद नहीं करते। जिस तरह मुनि अष्टावक्र को देख राजा जनक की सभा हँसने लगी थी उसी तरह का व्यवहार अभीतक हो रहा है समाज में फिर चाहे ऐआध्यात्मिक संस्था ही क्यों न हो। बाहरी या दैहिक आकर्षण के नशे में आन्तरिक सुन्दरता की बात समय व्यतीत करने का माध्यम बनती है व्यवहार में नहीं उतरढी। केवल गृहस्थ ही नहीं आध्यात्मिक संस्थाएँ तक पीछे नहीं है इस मामले में। तनिक उनको देखा जाए। पुष्कर के महंत स्वामी सोम गिरी कार दुर्घटना में चल बसे। जाँच पर उन्हें नशे में पाया गया और गाडी में शराब की बोतले थी। यह पद का नशा ही है मद्य के नशे के संग।
अपने कुरूप शिष्य की शिक्षा पूरी होने पर सुन्दर गुरु कह देता है कि 'यह मिशन है आश्रम नहीं', दूसरी जगह मुलायम तरीके से कहा गया कि 'हमारे लोग हँसेगे, बातें सुना सकते है आपको अच्छा नहीं लगेगा। बच्चे आपको देखकर डर जाएंगे। हम अपना सेन्टर कैसे दें'। जगन्नाथ पूरी में सत्संग करने गए एक सफेद दाग वाले साधु को रहने की अनुमति मठाधीश ने दी पर अन्य वरिष्ठ साधु ने आपत्ति उठाई और सचिव ने दूसरे दिन कहीं अन्य जगह रह कर कार्यक्रम में आने को कहा। उस साधु ने मठाधीश द्वारा दी गई अनुमति की बात कहते हुए उनसे मिलने की बात कही पर सचिव ने कठोर तरीके से कहा, 'हम फिर किसलिए हैं। हम यहाँ के सचिव हैं। महाराज ने कहा तो क्या आप तुरंत चले जाइए। चौथे मामले में उत्तराखंड के एक आश्रम के पुस्तकालय में एक साधु को सफेद दाग के चलते पुस्तक नहीं दी गई। देनेवाले व्यक्ति को संकेत से समझा दिया गया हाँलाकि महंत देने की बात कही थी पर तीन-चार घुमानै के बाद जब नहीं मिली तब काम-काज संभाले को पूछा पुस्तक माँगने वाले साधु ने। पुस्तकालय संभालने वाला वहां के अन्य वरिष्ठ साधु के पास गया और उसे संकेत से समझा दिया गया की ये सफेद दाग वाले हैं इन्हें मत देना। समानता वाला बिन्दु है महंत / मठाधीश द्वारा एक बात कहना और दूसरे द्वारा कुछ और। यह गृहस्थ शैली है व्यवहार की - स्वयं मत बोलो अन्य से कहलवाओ। ऋषिकेश मुझे ही सुनने को मिला, 'सफेद दागवालों को ज्ञान नहीं हो सकता और न व्यसनी को'। पढाई का नशा व्यक्ति को भारवाही बनाता है। शिक्षण संस्थाओं वाली दुनियादारी की पढाई हो या आध्यात्मिक प्रायः लोग पचा नहीं पाते। दूसयी ओर अनपढ या कम शिक्षित होने का नशा अधिक भयावह होता है।
नारी संग - इसकी व्याख्या केवल परस्त्रीगमन तक सीमित कर दी गई जो स्वयं में बौद्धिक हिंसा तथा जुआ का मिला-जुला उदाहरण है। नारियों के प्रति गलत भावना अधिक फैली जैसे वह संस्कृत नहीं बोल सकती, वेद नहीं पढ सकती, गायत्री मंत्र नहीं जप सकती इत्यादि। ब्रह्मचर्य शब्द की व्याख्या तक ठीक से नहीं की गई और नारियों को एक तरह से अपमानित किया गया। यह विशेष रूप से किया गया योग तथा कई संप्रदायों के उन महानुभावों द्वारा। राजतन्त्र के युग में नारी को अधिकतर वस्तु के रुप में समझा जाता था। राजाओं की उसके प्रति विलासिता वाली भावना को सुरक्षित तथा बढाने के लिए आयुर्वेद में अलग से दर्जनों औषधियों का उल्लेख किया राजा - आश्रित वैद्यों ने। ऐसी विचित्र परंपरा में नारी संग संकुचित रुप में रहेगा।
तब प्रश्न उठता है कि कलियुग को रहने का स्थान देने के पीछे कारण क्या है। भारतीयों में भेदभावपूर्ण लालन-पालन के चलते बेटी के प्रति दो दृष्टि सामने आती है। एक में पूरी स्वाधीनता जिसके चलते वह उच्छृंखल, उदण्ड, अविवेकशील और दूसरे में उसकी क्षमता को विकसित न होने देना, उसे नाना कुंठाओं में जीने को विवश करना जैसी बातें रहती है। अधिकतर मामलों में वैसा ही परिवेश मिलते रहता है जिससे स्वस्थ समाज बनाने में उसकी भूमिका उसके लिए नुकसानदायक होती है तथा समाज का भला होनै से रहा।
कई उल्लेखित प्रसंगों से संबंधित लिंक दिए जा रहे हैं जिन्हें सुनने से वे बिन्दु अधिक स्पष्ट होगें। (२)
हिंसा :-
अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च न पढाकर ढोंगी पाखंडी केवल प्रथम तीन शब्द बोल कर गलत संदेश देते हैं। आतताइयों, आक्रमणकारियों को मारना हिंसा नहीं है। उपचार हेतु शल्यक्रिया रूपी हिंसा जरुरी है। सुधारने के लिए डाँटने जैसी हिंसा उचित है। क्रोध हमेशा गलत और कमजोरी की निशानी नहीं होता । क्रोध रूपी हिंसा तक अमृत तुल्य है। (३)
हिंसा की संकुचित व्याख्या करनेवाले बहुधा निजी जीवन में हिंसक, यश के नशे में मदमस्त तथा जुआ खेलने में पारंगत होते हैं।
स्वर्ण - इस पाँचवे स्थान को केवल धातु के अर्थ में न लें क्योंकि यह प्रतीक है धन का जो कई रुपों में रहता है। धन कमाने, रखने, बचाने, संभालने, बढाने में साम दाम दंड भेद का उपयोग साधारण बात है और इन चारों के बिना सरकारी, गैरसरकारी, आध्यात्मिक, आदि संस्थाएँ तक नहीं चलती। ऊपर से दो नम्बरी कमाई के भरोसे अधिकांश सेवाकार्य चलते हैं। अतः केवल दुष्ट वृत्ति वाले राजा का मुकूट पहनने से परीक्षित की मति भ्रष्ट हुई कहना शोभा नहीं देता। क्या के अनुसार राजा परीक्षित को अत्यधिक प्यास लगी थी। शरीर में जल की कमी सही नहीं जा रही थी जो स्वाभाविक प्रतिक्रिया है शरीर की। इससे संबंधित हॉर्मोन मन - बुद्धि पर हावी होता है ठीक उसी तरह जैसे अन्य हॉर्मोन कुपित (अनियंत्रित) होने पर। ऐसी विकट स्थिति को सही तरीके से समझाना चाहिए। दूसरी ओर जिसने देखा था राजा का व्यवहार उसने सहायता नहीं की। और तो और ऋषि पुत्र ने अपने विवेक का प्रयोग न करते हुए अपनी क्षमता का दुरुपयोग किया जो नशे का ही उदाहरण है।
संदर्भ
१ - रेवडी संस्कृति
https://youtu.be/Pwa-unw_9tA
Part time monk
http://akshaywaves.blogspot.com/2018/07/part-time-monk.html
२ - ब्रह्मचर्य जीवन शैली
https://youtu.be/JhzkKFbibas
छान्दोग्य उपनिषद में छ प्रकार की गायत्री
https://youtu.be/w3htB2B7ZOA
योगवासिष्ठ तथा पुष्प वाटिका में राम जी का व्यवहार
https://youtu.be/ho2wj6iNYKQ
संस्कारहीनता घर से शुरु होती है। तदनुसार वातावरण दिशा देता है बच्चों को।
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=442781291362346&id=100053847755549&sfnsn=wiwspwa&extid=a
३ - क्रोध अमृत तुल्य है
https://youtu.be/6hDOOzbMo2I
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