Monday, 30 October 2023

गायत्री मंत्र और आज का समाज

समाज में प्रचलित मान्यताएं असल में कितनी सही, सार्थक व सर्वभूत हितो रता की भावना अपने में संजोए रखती हैं, यह विचारणीय विषय है. विश्लेषण सामर्थ्य सबके पास समान है. इसका उपयोग तो दूर, इसे दबाने में मानव जाति निपुण है. पूर्वाग्रह या मताग्रह ग्रस्त मानसिकता येन-केन-प्रकारेण अपनी सत्ता कायम रखना चाहती है. भाषा, संस्कार, क्षेत्र के प्रति अन्य जंतु सजग रहते हैं. यहां मानव का एकाधिकार नहीं है. भले ही मन-बुद्धि अपनी प्रारंभिक अवस्था में हो, पर वह जंतुओं से लेकर पेड़-पौधों तक में है. मानव में विशेषता यही है कि वह अपने विकसित चिंतन का लाभ स्वयं ए‍वं औरों के आंतरिक-बाहरी विकास में लगा सकता है. यही नहीं, वह इसके द्वारा विकास रोक भी सकता है. स्वयं का खोखलापन ढकना जानता है. विश्लेषण करनेवालों का विरोध करता है. उनके विचारों को नकारात्मक कहने में गर्वबोध करता है. मात्र रोज़ी-रोटी के लिए उपाधियां या मानपत्र बटोरनेवालों के वास्ते ही संत कबीरदास ने कहा था -
  पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय ।
  ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।।

इसका अर्थ बहुधा अनपढ़ या निरक्षर होने से लगाया जाता है. कागज़ी विद्वान डट कर विश्लेषण का विरोध करते हैं. यूं समझाया जाता है मानो शिक्षा का आंतरिक विकास से लेना-देना नहीं है और वह मात्र पेट भरने का साधन है. ऐसे लोग तर्कशास्त्र की कक्षा में प्रश्न तक पूछने नहीं देते.
आचार्य मधुसूदन सरस्वती जी ने गीता पर टीका लिखते हुए अपने परम गुरु आदि शंकराचार्य जी के मत से तनिक भिन्न मत प्रकट कर दिया, गीता को समझाते हुए उनकी परंपरा में इसे गलत दृष्टि से देखा जाता है. उन्होंने अपने गुरु का खंडन नहीं किया, वरन एक तुलनात्मक दृष्टि से अपना चिंतन प्रकट किया. इसमें दोष नहीं है, पर यह समझ सबमें पनप नहीं पाती. विश्लेषण का मान रखते हुए मधुसूदन जी ने अपनी पुस्तक अद्वैत सिद्धि का खंडन करनेवाले अपने शिष्य रामाचार्य की प्रशंसा की. शिष्य भी कम नहीं था. उसने ‘तरंगिणी’ नामक टीका में खंडन किया और दक्षिणा के रूप में अर्पित कर दिया. आखिरकार चिंतन-मनन, विश्लेषण बुद्धि के दायरे में आते हैं और बुद्धि शरीर में रहती है. उसके साथ बहना ही पशुता है. यह समझ जिनमें होती है, वे ही विचारवान हैं. इस स्थिति पर संत कबीरदास जी ने कहा -
             आचारी सब जग मिला, बिचारी मिला ना कोय। क्रोटि अचारी वारिये, एक बिचारी होय ।।
             मानुष सोइ जानिये, जाहि विवेक बिचार । जाहि बिवेक विचार नहिं, सो नर ढोर गंवार ।।

समष्टि योजना के अधीन सभी अपनी भूमिका निभा रहे हैं. हमारी भूमिका विश्लेषण की है. बिना लाग-लपचेड़ के उसे किया जाय. स्वधर्म निभाते हुए सहसा ध्यान गया स्वामी रामसुखदासजी के वचन पर, जहां उन्होंने बजरंग-बाण के पाठ का निषेध किया है. अपने इष्ट को बाध्य या विवश करना धर्मसम्मत नहीं है. दूसरे कीलक द्वारा प्राप्त भोग सद्गुण विनाशक तो होता ही है और साथ में दूसरी या तीसरी पीढ़ी तक विनाश का कारण बनता है. ऐसे कई परिवार मिले, जो अपने इष्ट को बाध्य करके या कीलक प्रयोग द्वारा प्रभुतासंपन्न तो हो गये, पर बाद में पछताना पड़ा. कीलक एक तरह का तंत्र-प्रयोग है, जिसके द्वारा भूमि या भवन-शुद्धि करवाई जाती है. गीता के अनुसार तामसी वृत्तिवाले ही ऐसा करते-करवाते हैं. स्तोत्रों के मामले में कीलकवाले कदापि नहीं पढ़ने चाहिए.
मतभेद की आड़ में विश्लेषण न करके कई लोग पाठ करने को कहते हैं । वे ढेरों मुसीबतों से घिरे रहते हैं पर इस तरफ ध्यान नहीं देते । 

गायत्री मंत्र : स्त्रियों के लिए निषेध नहीं .

 गायत्री वैदिक छंद है. इसके आधार पर लिखी गयी पंक्ति को गायत्री-मंत्र कहते हैं. उपनिषदों द्वारा समर्थित 36 गायत्री-मंत्रों का पाठ कोई भी कर सकता है. यह प्रशस्ति-गान के रूप में वैदिक वांगमय में उल्लिखित है. ईश्वरीय सत्ता के विभिन्न रूपों, उनके वाहनों तथा आयुध पर मंत्र सबके लिए है. महानारायणोपनिषद में कुछ मंत्र एक साथ दिये गये हैं. शेष मंत्र उनसे संबद्ध उपनिषदों में हैं. उनमें भी कई स्पष्ट रूप से लिखे हुए नहीं हैं. प्रभुकृपा से उन्हें समझा जा सकता है. कहीं भी ना तो इसे नारियों के लिए वर्जित माना गया है, ना ही यज्ञोपवीत उपरांत ही इसका पाठ किये जाने का उल्लेख है. कर्मकांड वाले शास्त्रों की बात और है. गायत्री के मामले में वेद ही प्रमाण है. ऊपर से यह कहना की सही उच्चारण करने से नारियों की प्रजनन क्षमता शेष हो जाएगी एक बचकाना कुतर्क है । 

अब ज़रा देखें कि इस पर आदि शंकराचार्यजी क्या कहते हैं. सामवेद अंतर्गत छान्दोग्योपनिषद के 3, 12, 2-5 पर भाष्य लिखते हुए उन्होंने गायत्री को मंत्र नहीं माना. परंतु उनके द्वारा स्थापित पीठ और परंपरा का एक वर्ग इसे मंत्र मानता है, ‘स्वाहा’ बोल कर हवन करता है एवं नारियों, जनेऊहीन हेतु इसे अपठनीय मानता है. लगे हाथों यह भी जान लें कि महाभारत के सनत्सुजातीय-पर्व पर भाष्य लिखते हुए उन्होंने वेदज्ञ को ब्राह्मण माना है. उनके समर्थक कुछ और मानते हैं. मज़े की बात यह है कि गीताप्रेस के प्राचीन संस्करण में वह पंक्ति है, परंतु बाद के कई अन्य प्रकाशकों ने उसे रखा ही नहीं. अत: आगे बढ़ने से पहले यह जान लें कि उपरोक्त उपनिषद में क्या लिखा है, क्योंकि वेद में यह प्रशस्ति-गान के रूप में है.

छान्दोग्योपनिषद(सामवेद,तलवकार ब्राह्मण) - अध्याय 3, खंड 12, मंत्र 1-5.

गायत्री वा इद (gM) सर्वंभूतं यदिदं किं च वाग्वै गायत्री वाग्वा इद (gM) सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ।।1।।.....

 भाष्य - गायत्री वा इत्यवधारणार्थो वैशब्द: ।
इदं सर्वं भूतं प्राणिजातं यत्किंच स्थावर जंगमं वा तत्सर्वं गायत्र्येव । तस्याश्छन्दोमात्राया: सर्वभूतत्वमनुपपन्नमिति गायत्रीकारणं वाचं शब्दरूपामापादयति गायत्रीं, वाग्वै गायत्रीति ।

गायत्री वै - इस पद में - वै - निश्चयार्थक है. ये समस्त भूत - स्थावर जंगम प्राणी हैं, वे सब गायत्री ही हैं. वह छंदमात्र है. सर्वभूतरूप होना संभव नहीं है ; अत: वाग्वै गायत्री - कारणभूत शब्दरूप वाक् को ही गायत्री कहती हैं श्रुति. वाग्वा इदं सर्वं भूतं - वाक ही समस्त भूतों का गान - शब्द यानी नामोल्लेख करती है जैसे यह गाय है आदि ; तथा यही रक्षा - इससे मत डर. वाणी द्वारा भी रक्षा की जाती है.

या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिव्यस्या(gM) हीद(gM) सर्वं भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव नातिशीयते ।।2।।
प्राणियों से संबंध तभी गायत्री = पृथ्वी में सब स्थित है.

या वै सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन्पुरुषे शरीरमस्मिन्हीमे प्राणा: प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयते ।।3।।
शरीर = इसी में प्राण स्थित है, शरीर पृथ्वी का विकार है. भूत शब्द वाच्य प्राण (वायु) प्रतिष्ठित है यानी उसको अलग से प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं है.

यद्वैतत्पुरुषे शरीरमिदं वाव सा यदिदमस्मिन्जन्त: पुरुषे हृदयमस्मिन्हीमे प्राणा: प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयते ।।4।।
प्राण हृदय में स्थित है. अत: वह गायत्री है.

ऐषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री तदेतद्दचाभ्यनूक्तम् ।।5।।
उपनिषद के अनुसार भूत, वाक, पृथ्वी, प्राण हृदय, शरीर -- छह प्रकार की गायत्री हैं. उसके चार पाद यानी चार चरण हैं. इस तरह कुल 24 अक्षर हैं. परिचय हेतु वाक् या वाणी की प्रतिष्ठा है. इससे जीवादि का परिचय मिलता है. अपरिचितों को जानने या उनसे संभल कर बर्ताव करने की शिक्षा मिलती है. इसके लिए वाणी ज़रूरी है. वह प्राण के भरोसे काम करती है. देह की दृष्टि से वायु का नाम पड़ा प्राण. उसको जगह चाहिए. वह हृदय में रहता है. हृदय देह में और देह पृथ्वी में. उपनिषद में यह तृतीय स्थान पर है. वहां समस्त भूतों यानी जीवों अर्थात् उनकी देहों को ध्यान में रखा गया है. यहां भी बात घूम कर देह या शरीर पर ही आती है.

समाज में प्रचलित एक गायत्री मंत्र के कंपन और प्रभाव पर चर्चा अधिक होती है. उसे सूर्यदेव की गायत्री कहा जाता है. सूर्यदेव पर दो गायत्री मंत्र और हैं.

मंत्रों में स्वयं कंपन नहीं होता - अष्टांग-योग का अभ्यास चाहिए. सतत अभ्यास, पाठ व ध्यान से अंदरूनी शक्ति का आभास होता है. यह कठिनता भी उपनिषद को पसंद नहीं. वह साधना को सरल बनाने के पक्ष में है. इसीलिए वह छह प्रकार की गायत्री की बात कह कर सहज मार्ग बतलाता है. उन पर ध्यान देने से सिद्धियां जल्द मिलती हैं और टिकती भी हैं. रोचक यह है कि वेद में ही एक पंक्ति (तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् )अनेक बार आयी है. जहां पर भु:, भुव: स्व: लगाया गया है, वहां भी सृष्टि के स्रष्टा, संचालक व संहारक को धन्यवाद ही दिया गया है. कहीं भी भिन्न अर्थ नहीं है. इसी आधार को उपनिषदों के अलग-अलग गायत्री मंत्री पुष्ट करते हैं. यह पक्ष भी सामने रखा जाना चाहिए था.

पूरे वैदिक वांगमय में कोई भी ग्रंथ तभी प्रमाण है, जब तक वह वेदानुकूल है. गायत्री के मामले में पुराण पूरे प्रमाण नहीं हैं, क्योंकि वे उपनिषद का समर्थन नहीं करते. देवी-भागवत में यह कुछ और रूप में वर्णित है. उस पुराण का विषय ही मातृरूप को प्रधानता देना है. उसे सिद्धांत नहीं माना जा सकता. यदि कोई मानने पर अड़ा हो, तब कहना पड़ेगा - वह शरीर की दृष्टि से नहीं वरन वात्सल्य की दृष्टि से है. वात्सल्य किसी में भी हो सकता है. जगज्जननी का अर्थ इसी रूप में लगेगा. वात्सल्य या ममता हेतु मादा शरीर की अनिवार्यता नहीं है.

 गायत्री धार्मिक राजनीति का एक स्रोत बन गया. इसे किस्मत की कुंजी के रूप में प्रचारित किया गया. यों लगने लगा मानो यह जीवन की आखिरी उपलब्धि है. इसके बिना सब बेकार है. इसे कर्मकांड का रूप देकर, दसियों पुस्तकें लिखी गयीं. इसे दैनिक तीन बार तिहराने को कहा गया - त्रिकाल-संध्या उपासना के नाम पर इसका प्रचार हुआ. धार्मिक राजनीति ने, गायत्री को, देवी में परिवर्तित कर दिया है. मूर्तियां और मुद्रित-चित्र बाजार में उपलब्ध हैं. महिलाओं को इसे जपने से रोका गया. हालांकि यह रोक समाज-सुधारकों ने काफी हद तक हटाई, परंतु वे भी एक ही पंक्ति का प्रचार करते रहे और पौराणिक अर्थ को महिमामंडित किया. इनसब का परिणाम यह हुआ कि लोग हर किसी पर गायत्री मंत्र बनाने लग गए । 

लकीर का फकीर नहीं बनाते उपनिषद

मनन का विषय यह है - गायत्री मंत्र को जप कर कितने आविष्कार हुए? हर क्षेत्र की महाविभूतियां क्या इसे प्रतिदिन तिहराती थीं? क्या उनकी सफलता परिश्रम या पुरुषार्थ पर केंद्रित नहीं थी? यदि यह इतना शक्तिशाली था, तब भारत सदियों तक पराधीन क्यों रहा? पूर्वकाल के लोग तो और भी विधि-विधान से अनुष्ठान या पुरश्चरण किया करते थे. स्वतंत्रता पश्चात भी इसे जप कर कितनों ने क्या इजाद कर लिये? इसे महिमामंडित करनेवाली कहानियों के पीछे का सच जानने कि कोशिश ही नहीं हुई. इसका वाकई यदि इतना प्रभाव होता, तब इसे जपनेवाले के आस-पास का वातावरण ही पलट जाता. कलियुग को दोष देना व्यर्थ है. अब यह तोता-रटंत की पुरानी आदत छोड़ देनी चाहिए. उपनिषद लकीर का फकीर बनाने के पक्षधर नहीं हैं.
सफलता के पीछे कारण होते हैं. मात्र मंत्र जपने का गुरुमंत्र बता दिया जाता है. प्रचार माध्यमों को प्रचार से मतलब - यही कि अन्य धर्मों के विद्यार्थियों ने मंत्र जपा और सफल हो गये - कुछ विद्यार्थी भी अपनी लगन को अनदेखा कर औरों की बातों में आकर कुछ का कुछ बोल जाते हैं. सफलता-विफलता के ढेरों कारण होते हैं. दो-एक माध्यमों को लेकर थेई-थेई करना उचित नहीं है.

कैसे शापित हो गया गायत्री-मंत्र ?

क्या गायत्री-मंत्र शापित है? प्रचलित मान्यताओं के अनुसार इसे कहीं एक तो कहीं तीन ऋषियों ने शाप दिया. उस पर कथाएं हैं और सच प्रमाणित करने हेतु बड़े ऋषियों के नाम जोड़ दिये गये. यह कपोल-कल्पना वेदोक्त या वेदसम्मत कदापि नहीं है. जब छह प्रकार की गायत्री का वर्णन स्वयं वेद में है और इसे छंद माना गया है, तब शाप कौन और किसको देगा भला? प्रशंसासूचक, प्रशस्तिवाचन या महिमामय वाक्य को कोई शाप देने की नासमझी नहीं दिखा सकता. जब शापित ही नहीं है, तब उसे मुक्त करने का दावा भी उचित नहीं है.

मनमाने तरीके से देव-देवी की कल्पना ने वेद-सम्मत ईश्वरीय सत्ता एवं उसके अवतारों को नकारा ही नहीं, वरन हेय तक प्रमाणित करने का प्रयास किया है. सबसे बड़ा उदाहरण हैं स्वर्गाधिपति इंद्र. उनके विषय में पुराण नकारात्मक चित्रण से भरे हुए हैं. वराह, कूर्म, मत्स्य तो ब्रह्मा के अवतार माने गये हैं. प्रजापति भी ब्रह्मा के प्रतिनिधि के रूप में सृजन-कार्य किया करते थे. कहीं-कहीं मत्स्य को भी प्रजापति का अवतार माना गया है. इसमें कोई विरोधाभास नहीं है. विष्णुजी की प्रधानता बढ़ने से वे सब उनके खाते में डाल दिये गये. सारे पुराण व उप-पुराणों को मनचाहे ढंग से तैयार किया गया एवं मुनिवर वेद व्यास के नाम से प्रचारित करवा दिया गया. ऐसे में गायत्री कैसे अछूती रहे.

आदि शंकराचार्य के चलते लोगों का रुझान रुद्रपीठ की ओर अधिक हुआ. इसमें गणेशजी अग्रपूज्य हैं. अधिकतर ग्रंथ गणेश-वंदना से शुरू हुए. उनसे पहले रचित ग्रंथों में ऐसा नहीं है. अब त्रिकाल-संध्या के चलते अर्धरात्रिवाली चतुर्थ संध्या अंधेरे में ही रह गयी. जबकि वह संक्षिप्त रूप से देव्युपनिषद में वर्णित है. यहां एक शंका और उठती है. इस लेख में अथर्ववेद का नाम क्यों नहीं आया? उच्चारण-शैली के अनुसार वेद तीन है या युं कहें कि छंदानुसार तीन और सामग्री के अनुसार चार. अथर्ववेद भी गायत्री-मंत्र के बारे में कोई अलग मत प्रकट नहीं करता.
वैदिक उपासना या साधना सबके लिए है. उसकी मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए.

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