Monday, 30 October 2023

आई समझ

एक कुटिल कूटनीतिज्ञ, चालाक राजनीतिज्ञ ने भारतीय समाज को भ्रमित किया चतुराई से। 

उम्र के इस मोड पर रह रहकर याद आई वे तीन बात जो सुनी थी छुटपन में। उस समय की प्रायोजित शिक्षा ने कुछ का कुछ बतलाया और रटवाया। देखा है कई पीढ़ियों को उस भ्रम में जीते हुए। पाठ्यक्रम में गलत अर्थ दे दिए ताकि बच्चे उस पर अधिक सोच विचार न करे। रटंतु पढाई परीक्ष में अंक दिलाये, समाज में नाम और हो सके तो नौकरी दे कर मुँह बंद कर देती है पर समझदारी? वह जीवन संग्राम को झेलते हुए आती। उसका आनंद अलग है। 

तब आओ जरा देखे की समय ने इन तीन पंक्तियाँ का क्या अर्थ समझाया ही नहीं वरन दिखला दिया। बुरा-मत-कहो, बुरा-न-देखो, बुरा-मत-सुनो जैसे वाक्य 
 उन सभी संस्थाओं तथा संगठनों हेतु अनुकरणीय है जो सकारात्मक सोच पर ध्यान देना सिखाते हुए मुंडन करते है। जो व्यवस्था जितनी ऊँघी कुर्सी पर बैठता है उसे यह तीनों वाक्य जल्दी समझ में आते हैं। औरों को कई साल लगते है सयझने तथा विश्वास करने में। 

अपनों पर कौन आँघ आने देता है और ऊपर से सबकी सेवा करते-करते अपनी सुध तक रहती नहीं तब बुरा - भला सब एक हो जाता है। ऐसी दिव्यता - भव्यता वाली भक्ति समझाती है - बुरा मत देखो - किसी में नहीं और अपनों में बिल्कुल नहीं। कोई भूला भटका अपने में मिल जाए तब वह वैसे ही शुद्ध हो जाता है। अब विरोधियों को बुराई दिखती है तो दिखा करे। यूँ भी हर जगह, हर समय विरोधियों को बुराई तभी तक दिखती है जबतक सत्ता न मिले। ऊपर से कब किससे कौन-सा काम निकलवाना हो क्या पता? क्यों किसी में बुराई देखे? अगर कुर्सी पर दृष्टि है या वह मिल चुकी तब सबको अच्छा समझ उन्हें सीढियाँ बना अपनी उन्नति करथे रहो। किसी के लिए कभी स्वयं सीढ़ी बनना हो तो सोच समझ कर करे। अब बुरा मत देखो का सवाल है। 

इसी तरह बुरा-मत-सुनो, बुरा-मत-कहो को जीवन में सिद्ध करना चाहिए। संचार माध्यम भड़काना, लड़वाना जानते हैं पर वे स्वयं नहीं लडते। अपने तथा अपनो का विकास होता रहेगा। 

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               अहिंसा परमो धर्मः
               धर्म हिंसा तथैव च:

केवल प्रथम पंक्ति पढाई जाती है जानबूझकर और इतना ही नहीं वरन संचार माध्यम तथा साहित्य द्वारा इसका प्रचार-प्रसार किया गया। 

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कोई एक गाल पर तमाचा मारे तब दुसरा  गाल आगे करने की बात न्यूटेस्टामेन्ट में है वैदिक वाङमय में नहीं ।  कायर, डरपोक बनाने वाला उपदेश त्याज्य है। 

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